आवण जाण रहे सुख सारे ॥1॥
भै बिनसे निरभउ हरि धिआइआ ॥
साधसंगि हरि के गुण गाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कवल रिद अंतरि धारे ॥
अगनि सागर गुरि पारि उतारे ॥2॥
बूडत जात पूरै गुरि काढे ॥
जनम जनम के टूटे गाढे ॥3॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥
जिसु भेटत गति भई हमारी ॥4॥56॥125॥
साधसंगि ता की सरनी परहु ॥
मनु तनु अपना आगै धरहु ॥1॥
अंम्रित नामु पीवहु मेरे भाई ॥
सिमरि सिमरि सभ तपति बुझाई ॥1॥ रहाउ ॥
तजि अभिमानु जनम मरणु निवारहु ॥
हरि के दास के चरण नमसकारहु ॥2॥
सासि सासि प्रभु मनहि समाले ॥
सो धनु संचहु जो चालै नाले ॥3॥
तिसहि परापति जिसु मसतकि भागु ॥
कहु नानक ता की चरणी लागु ॥4॥57॥126॥
सूके हरे कीए खिन माहे ॥
अंम्रित द्रिसटि संचि जीवाए ॥1॥
काटे कसट पूरे गुरदेव ॥
सेवक कउ दीनी अपुनी सेव ॥1॥ रहाउ ॥
मिटि गई चिंत पुनी मन आसा ॥
करी दइआ सतिगुरि गुणतासा ॥2॥
दुख नाठे सुख आइ समाए ॥
ढील न परी जा गुरि फुरमाए ॥3॥
इछ पुनी पूरे गुर मिले ॥
नानक ते जन सुफल फले ॥4॥58॥127॥
ताप गए पाई प्रभि सांति ॥
सीतल भए कीनी प्रभ दाति ॥1॥
प्रभ किरपा ते भए सुहेले ॥
जनम जनम के बिछुरे मेले ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत सिमरत प्रभ का नाउ ॥
सगल रोग का बिनसिआ थाउ ॥2॥
सहजि सुभाइ बोलै हरि बाणी ॥
आठ पहर प्रभ सिमरहु प्राणी ॥3॥
दूखु दरदु जमु नेड़ि न आवै ॥
कहु नानक जो हरि गुन गावै ॥4॥59॥128॥
भले दिनस भले संजोग ॥
जितु भेटे पारब्रहम निरजोग ॥1॥
ओह बेला कउ हउ बलि जाउ ॥
जितु मेरा मनु जपै हरि नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
सफल मूरतु सफल ओह घरी ॥
जितु रसना उचरै हरि हरी ॥2॥
सफलु ओहु माथा संत नमसकारसि ॥
चरण पुनीत चलहि हरि मारगि ॥3॥
कहु नानक भला मेरा करम ॥
जितु भेटे साधू के चरन ॥4॥60॥129॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(साध-संगति में पहुँचे हुए जिन मनुष्यों के) मानसिक झगड़े और कलेश गुरू के शबद ने दूर कर दिए, उनके जनम मरण के चक्कर खत्म हो गए, उन्हें सारे सुख प्राप्त हो गए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।