अंग 191

अंग
191
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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कलि कलेस गुर सबदि निवारे ॥
आवण जाण रहे सुख सारे ॥1॥
भै बिनसे निरभउ हरि धिआइआ ॥
साधसंगि हरि के गुण गाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कवल रिद अंतरि धारे ॥
अगनि सागर गुरि पारि उतारे ॥2॥
बूडत जात पूरै गुरि काढे ॥
जनम जनम के टूटे गाढे ॥3॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥
जिसु भेटत गति भई हमारी ॥4॥56॥125॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (साध-संगति में पहुँचे हुए जिन मनुष्यों के) मानसिक झगड़े और कलेश गुरू के शबद ने दूर कर दिए, उनके जनम मरण के चक्कर खत्म हो गए, उन्हें सारे सुख प्राप्त हो गए। 1। हे भाई ! उनके (दुनिया के सारे) डर दूर हो गए हैं जिन्होंने निर्भय हरी का ध्यान (अपने हृदय में) धारण किया है और साध-संगति में (जा के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए हैं। 1। रहाउ। (साध-संगति की बरकति से जिन मनुष्यों ने) परमात्मा के सुंदर चरण अपने दिल में बसा लिए, गुरू ने उन्हें तृष्णा की आग के समुंद्र में से पार लंघा दिया। 2। (विकारों के समुंद्र में) डूब रहे मनुष्य को पूरे गुरू ने (बाँह से पकड़ के बाहर) निकाल लिया (और जब वे साध-संगति में पहुँच गए), उनको (परमात्मा से) अनेकों जन्मों से बिछुड़ों हुओं को (गुरू ने दुबारा परमात्मा के साथ) मिला दिया। 3। हे नानक ! कह, मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ, जिसको मिल के हमारी (जीवों की) उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। 4। 56। 125।
गउड़ी महला 5 ॥
साधसंगि ता की सरनी परहु ॥
मनु तनु अपना आगै धरहु ॥1॥
अंम्रित नामु पीवहु मेरे भाई ॥
सिमरि सिमरि सभ तपति बुझाई ॥1॥ रहाउ ॥
तजि अभिमानु जनम मरणु निवारहु ॥
हरि के दास के चरण नमसकारहु ॥2॥
सासि सासि प्रभु मनहि समाले ॥
सो धनु संचहु जो चालै नाले ॥3॥
तिसहि परापति जिसु मसतकि भागु ॥
कहु नानक ता की चरणी लागु ॥4॥57॥126॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे मेरे भाई !) साध-संगति में जा के उस परमात्मा का आसरा ले। अपना मन अपना तन (अर्थात अपने हरेक ज्ञानेंद्रियों को) उस परमात्मा के हवाले कर दे। 1। हे मेरे वीर ! परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी (श्वास-श्वास परमात्मा का नाम सिमर। जिसने नाम सिमरा है) उसने सिमर सिमर के (अपने अंदर से विकारों की) सारी सड़न बुझा ली है। 1। रहाउ। (हे मेरे वीर !)अहंकार दूर करके जनम मरण के चक्कर समाप्त कर दे परमात्मा के सेवक के चरणों पे अपना सिर रख दे । 2। (हे मेरे भाई !) हरेक श्वास के साथ परमात्मा को अपने मन में संभाल के रख। वह (नाम-) धन इकट्ठा कर, जो आपके साथ निभे। 3। (पर ये नाम-धन इकट्ठा करना जीवों के वश की बात नहीं। ये नाम-धन) उस मनुष्य को ही मिलता है, जिसके माथे पे भाग्य जागे। हे नानक ! कह, (हे मेरे भाई !) आप उस मनुष्य के चरणों में लग (जिसे नाम धन मिला हुआ है)। 4। 57। 126।
गउड़ी महला 5 ॥
सूके हरे कीए खिन माहे ॥
अंम्रित द्रिसटि संचि जीवाए ॥1॥
काटे कसट पूरे गुरदेव ॥
सेवक कउ दीनी अपुनी सेव ॥1॥ रहाउ ॥
मिटि गई चिंत पुनी मन आसा ॥
करी दइआ सतिगुरि गुणतासा ॥2॥
दुख नाठे सुख आइ समाए ॥
ढील न परी जा गुरि फुरमाए ॥3॥
इछ पुनी पूरे गुर मिले ॥
नानक ते जन सुफल फले ॥4॥58॥127॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ आत्मिक जीवन देने वाली निगाह करके गुरू नाम-जल से सींच के जिन्हें आत्मिक जीवन देता है, उन आत्मिक जीवन के रस से वंचित हो चुके मनुष्यों को गुरू एक छिन में हरे (भाव, आत्मिक जीवन वाले) बना देता है। 1। पूरे गुरू ने उसके सारे कष्ट काट दिए जिस सेवक को (परमात्मा ने) अपनी सेवा-भक्ति (की दाति) दी। 1। रहाउ। उसकी (हरेक किस्म की) चिंता मिट गई, उसके मन की (हरेक) आस पूरी हो गई गुणों के खजाने सतिगुरू ने जिस मनुष्य पर मेहर की। 2। उसके सारे दुख दूर हो गए, उसके अंदर (सारे) सुख आ के टिक गए जब गुरू ने जिस मनुष्य पर बख्शिश होने का हुकम किया, थोड़ी सी भी ढील ना हुई ।3 । हे नानक ! जो मनुष्य पूरे गुरू से मिल गए, उनकी (हरेक किस्म की) इच्छा पूरी हो गई, उन्हें उच्च आत्मिक गुणों के सुंदर फल लग गए। 4। 58। 127।
गउड़ी महला 5 ॥
ताप गए पाई प्रभि सांति ॥
सीतल भए कीनी प्रभ दाति ॥1॥
प्रभ किरपा ते भए सुहेले ॥
जनम जनम के बिछुरे मेले ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत सिमरत प्रभ का नाउ ॥
सगल रोग का बिनसिआ थाउ ॥2॥
सहजि सुभाइ बोलै हरि बाणी ॥
आठ पहर प्रभ सिमरहु प्राणी ॥3॥
दूखु दरदु जमु नेड़ि न आवै ॥
कहु नानक जो हरि गुन गावै ॥4॥59॥128॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ परमात्मा ने उनके अंदर ऐसी ठण्ड समा दी होती है कि उनके सारे ताप-कलेश दूर हो जाते हैं जिन्हें परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वे ठंडे जिगरे वाले बन जाते हैं। 1। (जिन मनुष्यों को परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वह मनुष्य) परमात्मा की कृपा से आसान (जीवन वाले) हो जाते हैं, उनको अनेक जन्मों के विछुड़ों को परमात्मा (अपने साथ) मिला लेता है। 1। रहाउ। (जिन्हें परमात्मा अपने नाम की दाति देता है) परमात्मा का नाम सिमर सिमर के (उनके अंदर से) सारे रोगों के निशान ही मिट जाते हैं। 2। (जिस मनुष्य को परमात्मा नाम की दाति देता है वह) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रेम-प्यार में लीन हो के परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उचारता रहता है। हे प्राणी ! (आप भी उसके दर से नाम की दाति माँग, और) आठों पहर प्रभू का नाम सिमरता रह। 3। कोई दुख दर्द उसके नजदीक नहीं आता, उसे मौत का डर नहीं छूता (आत्मिक मौत का उसे खतरा नहीं रह जाता हे नानक ! कह, (परमात्मा की मेहर से) जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है।)। 4। 59। 128।
गउड़ी महला 5 ॥
भले दिनस भले संजोग ॥
जितु भेटे पारब्रहम निरजोग ॥1॥
ओह बेला कउ हउ बलि जाउ ॥
जितु मेरा मनु जपै हरि नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
सफल मूरतु सफल ओह घरी ॥
जितु रसना उचरै हरि हरी ॥2॥
सफलु ओहु माथा संत नमसकारसि ॥
चरण पुनीत चलहि हरि मारगि ॥3॥
कहु नानक भला मेरा करम ॥
जितु भेटे साधू के चरन ॥4॥60॥129॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) वे दिन सुहावने होते हैं, वे मिलाप के अवसर सुखदायक होते हैं जब (माया से) निर्लिप प्रभू जी मिल जाते हैं। 1। अर्थ: (हे भाई !) मैं उस समय से कुर्बान जाता हूँ जिस समय मेरा मन परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) मनुष्य के लिए वह महूरत भाग्यशाली होता है, वह घड़ी अनमोल होती है जब उसकी जीभ परमात्मा का नाम उचारती है। 2। (हे भाई !) वह माथा भी भाग्यशाली है, जो गुरू-संत के चरणों में झुकता है। वह पैर पवित्र हो जाते हैं जो परमात्मा (के मिलाप) के रास्ते पर चलते हैं। 3। हे नानक ! कह,मेरे बड़े भाग्य (जाग पड़ते हैं) जब मैं गुरू के चरण परसता हूँ। 4। 60। 128।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(साध-संगति में पहुँचे हुए जिन मनुष्यों के) मानसिक झगड़े और कलेश गुरू के शबद ने दूर कर दिए, उनके जनम मरण के चक्कर खत्म हो गए, उन्हें सारे सुख प्राप्त हो गए।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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