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अंग 193

अंग
193
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गउड़ी महला 5 ॥
तूं समरथु तूंहै मेरा सुआमी ॥
सभु किछु तुम ते तूं अंतरजामी ॥1॥
पारब्रहम पूरन जन ओट ॥
तेरी सरणि उधरहि जन कोटि ॥1॥ रहाउ ॥
जेते जीअ तेते सभि तेरे ॥
तुमरी क्रिपा ते सूख घनेरे ॥2॥
जो किछु वरतै सभ तेरा भाणा ॥
हुकमु बूझै सो सचि समाणा ॥3॥
करि किरपा दीजै प्रभ दानु ॥
नानक सिमरै नामु निधानु ॥4॥66॥135॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे पारब्रह्म !) आप सब ताकतों का मालिक है, आप ही मेरा मालिक है (मुझे आपका ही आसरा है)। आप सबके दिल की जानने वाला है। जो कुछ जगत में हैं रहा है आपकी प्रेरणा से ही हैं रहा है। 1। हे सर्व-व्यापक पारब्रह्म प्रभू ! आपके सेवकों को आपका ही आसरा होता है। करोड़ों ही मनुष्य आपकी शरण पड़ कर (संसार समुंद्र से) बच जाते हैं। 1। रहाउ। (हे पारब्रह्म ! जगत में) जितने भी जीव हैं, सारे आपके ही पैदा किए हुए हैं। आपकी मेहर से ही (जीवों को) अनेकों सुख मिल रहे हैं। 2। (हे पारब्रहम् ! संसार में) जो कुछ घटित हो रहा है, वही घटित होता है जो आपको अच्छा लगता है। जो मनुष्य आपकी रजा को समझ लेता है, वह आपके सदा स्थिर रहने वाले नाम में लीन रहता है। 3। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! मेहर कर के अपने नाम की दाति बख्श, ता कि आपका दास नानक आपका नाम सिमरता रहे (आपका नाम ही आपके दास के वास्ते सब सुखों का) खजाना है। 4। 66। 135।
गउड़ी महला 5 ॥
ता का दरसु पाईऐ वडभागी ॥
जा की राम नामि लिव लागी ॥1॥
जा कै हरि वसिआ मन माही ॥
ता कउ दुखु सुपनै भी नाही ॥1॥ रहाउ ॥
सरब निधान राखे जन माहि ॥
ता कै संगि किलविख दुख जाहि ॥2॥
जन की महिमा कथी न जाइ ॥
पारब्रहमु जनु रहिआ समाइ ॥3॥
करि किरपा प्रभ बिनउ सुनीजै ॥
दास की धूरि नानक कउ दीजै ॥4॥67॥136॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) उसका दर्शन बड़े भाग्यों से मिलता है जिस मनुष्य की लगन परमात्मा के नाम में लगी रहती है। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में (सदा) परमात्मा (का नाम) बसा रहता है, उस मनुष्य को कभी सपने में भी (कोई) दुख छू नहीं सकता। 1। रहाउ। (हे भाई ! नाम की लगन वाले) सेवक (के हृदय में) (परमात्मा) सारे (आत्मिक गुणों के) खजाने डाल के रखता है। ऐसे सेवक की संगति में रहने से पाप और दुख दूर हो जाते हैं। 2। (हे भाई ! ऐसे) सेवक की आत्मिक उच्चता बयान नहीं की जा सकती। वह सेवक उस पारब्रहम् का रूप बन जाता है जो सब जीवों में व्यापक है। 3। (हे नानक ! कह) हे प्रभू ! मेरी विनती सुन। मेहर करके मुझ नानक को अपने ऐसे सेवक के चरणों की धूड़ दे। 4। 67। 136।
गउड़ी महला 5 ॥
हरि सिमरत तेरी जाइ बलाइ ॥
सरब कलिआण वसै मनि आइ ॥1॥
भजु मन मेरे एको नाम ॥
जीअ तेरे कै आवै काम ॥1॥ रहाउ ॥
रैणि दिनसु गुण गाउ अनंता ॥
गुर पूरे का निरमल मंता ॥2॥
छोडि उपाव एक टेक राखु ॥
महा पदारथु अंम्रित रसु चाखु ॥3॥
बिखम सागरु तेई जन तरे ॥
नानक जा कउ नदरि करे ॥4॥68॥137॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा का सिमरन करते हुए आपकी वैरन (माया डायन) आपसे परे हट जाएगी। (अगर परमात्मा का नाम आपके) मन में आ बसे तो (आपके अंदर) सारे सुख (आ बसेंगे)। 1। हे मेरे मन ! एक परमात्मा का ही नाम सिमरता रह। ये नाम ही आपकी जीवात्मा के काम आएगा (जिंद के साथ निभेगा)। 1। रहाउ। दिन रात बेअंत परमात्मा के गुण गाया कर। (हे भाई !) पूरे गुरू का(यह) पवित्र उपदेश ले। 2 (हे भाई ! संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए) और सारे तरीके छोड़, और एक परमात्मा (के नाम) का आसरा रख। आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस चख – यही है सब पदार्थों से श्रेष्ठ पदार्थ। 3। हे नानक ! वही मनुष्य मुश्किल (संसार) समुंद्र से (आत्मिक पूँजी समेत) पार लांघते हैं, जिन पे (परमात्मा खुद मेहर की) नजर करता है। 4। 68। 137।
गउड़ी महला 5 ॥
हिरदै चरन कमल प्रभ धारे ॥
पूरे सतिगुर मिलि निसतारे ॥1॥
गोविंद गुण गावहु मेरे भाई ॥
मिलि साधू हरि नामु धिआई ॥1॥ रहाउ ॥
दुलभ देह होई परवानु ॥
सतिगुर ते पाइआ नाम नीसानु ॥2॥
हरि सिमरत पूरन पदु पाइआ ॥
साधसंगि भै भरम मिटाइआ ॥3॥
जत कत देखउ तत रहिआ समाइ ॥
नानक दास हरि की सरणाइ ॥4॥69॥138॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे मेरे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के चरण अपने हृदय में टिकाते हैं, पूरे सतगुरू को मिल के वह (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। हे मेरे भाई ! गोबिंद की सिफत सालाह के गीत गाते रहो। गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरो। 1। रहाउ। उनका मानस शरीर- बड़ी कठनाई से मिली हुई मनुष्य देह- (परमात्मा की नजरों में) कबूल हो जाती है (हे मेरे भाई ! जिन मनुष्यों ने इस जीवन सफर में) सत्गुरू से परमात्मा के नाम की राहदारी हासिल कर ली है। 2। (हे मेरे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरते हुए वह मनुष्य वह आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है, जहाँ किसी कमी की संभावना नहीं रह जाती। साध-संगति में रह के मनुष्य सारे डर सारी ही भटकनें मिटा लेता है। हे नानक ! (कह, हे मेरे भाई !गुरू की शरण की बरकति से) मैं जिधर भी देखता हूँ, उधर ही परमात्मा व्यापक दिखता है। (हे भाई ! प्रभू के) सेवक प्रभू की शरण में ही टिके रहते हैं। 4। 69। 138।
गउड़ी महला 5 ॥
गुर जी के दरसन कउ बलि जाउ ॥
जपि जपि जीवा सतिगुर नाउ ॥1॥
पारब्रहम पूरन गुरदेव ॥
करि किरपा लागउ तेरी सेव ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कमल हिरदै उर धारी ॥
मन तन धन गुर प्रान अधारी ॥2॥
सफल जनमु होवै परवाणु ॥
गुरु पारब्रहमु निकटि करि जाणु ॥3॥
संत धूरि पाईऐ वडभागी ॥
नानक गुर भेटत हरि सिउ लिव लागी ॥4॥70॥139॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (हे भाई !) मैं सत्गुरू जी के दर्शन से सदके जाता हूँ। सतिगुरू जी का नाम याद करके मेरे अंदर उच्च आत्मिक जीवन पैदा होता है। 1। हे पूरन पारब्रहम् ! हे गुरदेव ! कृपा कर, मैं आपकी सेवा भक्ति में लगा रहूँ। 1। रहाउ। (इस वास्ते, हे भाई ! गुरू के) सुंदर चरण मैं अपने मन में हृदय में टिकाता हूँ। गुरू के चरण मेरे मन का, मेरे तन का, मेरे धन का, मेरी जीवात्मा का आसरा हैं। 2। (इस तरह आपका मानस) जनम कामयाब हैं जाएगा। आप (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हैं जाएगा (हे भाई !) गुरू को पारब्रहम् प्रभू को (सदा अपने) नजदीक बसता समझ। 3। हे नानक ! गुरू संत के चरणों की धूड़ बड़े भाग्यों से मिलती है। गुरू को मिलने से परमात्मा (के चरणों) के साथ लगन लग जाती है। 4। 70। 139।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी महला 5 ॥ (हे पारब्रह्म !) आप सब ताकतों का मालिक है, आप ही मेरा मालिक है (मुझे आपका ही आसरा है)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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