नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: (दुनिया से अपना) हुकम (मनवाना) तथा (हुकम के) और और बोल बोलने (और इसमें खुशी महसूस करनी मेरे वास्ते) आपकी रजा में राजी रहना है। हे नानक! सदा स्थिर रहने वाला प्रभू पातशाह ऐसे जीवन वाले से (कोई) सवाल जवाब नहीं करता (भाव, उसका जीवन उसकी नज़रों में प्रवान है)।4। ऐशौ-ईश्रत शरीर को रोगी करते हैं और मन में भी विकार चल पड़ते हैं, हे भाई! (प्रभू की सिफत सलाह की खुशी छोड़ के) अन्य ऐशौ-ईश्रत की खुशी खुआर करती है।1।रहाउ।4।7।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ जिस मनुष्य का शरीर केसर (जैसा शुद्ध विकार रहित) हो, जिसकी जिहवा (प्रभू की सिफत सलाह के) रतनों से जड़ी हो, जिसके शरीर के हरेक श्वास उस की लकड़ी की सुगंधि वाली हो (भाव, प्रभू के नाम की याद से सुगन्धित हों), जिस मनुष्य के माथे पे अढ़सठ तीर्थों का टीका लगा हो (भाव, जो प्रभू का नाम जप के अढ़सठ तीरथों से भी ज्यादा पवित्र हो चुका हो) उस मनुष्य के अंदर मति खिलती है, उस प्रफूल्लित हुई बुद्धि से ही सच्चा नाम सलाहा जा सकता है, गुणों का खजाना प्रभू सराहा जा सकता है। हे भाई! प्रभू के नाम से वंचित हुई बुद्धि (आदमी को) और और ही तरफ ले जाती है। सिफत सलाह छोड़ के अगर और कर्म सैकड़ों बार भी करें (तो कुछ नहीं बनता, क्योंकि) झूठा कर्म करने से झूठ का ही जोर बढ़ता है।1। रहाउ। अगर कोई मनुष्य पीर कहलाने लगे, सारा संसार आ के उसके दर्शन करे, उसकी पूजा होने लग जाए, यदि वह पहुँचा हुआ (करामाती) योगी गिना जाने लगे,क्योंकि) अगर प्रभू की हजूरी में किये कर्मों का हिसाब होने के समय उसको इज्जत नहीं मिलती, तो (दुनिया में हुई) सारी पूजा खुआर ही करती है।2। जिन लोगों को सत्गुरू ने साबाशी दी है, उनकी उस इज्जत को कोई मिटा नहीं सकता (क्योंकि) उनके हृदय में प्रभू के नाम का खजाना बसता है उनके अंदर नाम ही बसता है। (ये पक्का नियम जानो कि) प्रभू का नाम ही पूजा जाता है, नाम ही सत्कारा जाता है। प्रभू ही सदा एक रस सदा स्थिर रहने वाला है।3। (जिन मनुष्यों ने कभी नाम नहीं जपा, उनका) शरीर जब मिट्टी हो के मिट्टी में मिल गया, तो नामहीन जिंद का हाल बुरा ही होता है। (दुनियां में की) सारी चतुराईयां राख हो जातीं हैं, जगत से जीव दुखी हो के ही चलता है। हे नानक! अगर प्रभू का नाम भुला दें, तो प्रभू के दर पे पहॅुच के बुरा हाल ही होता है।4।7।
सिरीरागु महला 1 ॥ गुणवंती गुण वीथरै अउगुणवंती झूरि ॥ जे लोड़हि वरु कामणी नह मिलीऐ पिर कूरि ॥ ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना पाईऐ पिरु दूरि ॥1॥ मेरे ठाकुर पूरै तखति अडोलु ॥ गुरमुखि पूरा जे करे पाईऐ साचु अतोलु ॥1॥ रहाउ ॥ प्रभु हरिमंदरु सोहणा तिसु महि माणक लाल ॥ मोती हीरा निरमला कंचन कोट रीसाल ॥ बिनु पउड़ी गड़ि किउ चड़उ गुर हरि धिआन निहाल ॥2॥ गुरु पउड़ी बेड़ी गुरू गुरु तुलहा हरि नाउ ॥ गुरु सरु सागरु बोहिथो गुरु तीरथु दरीआउ ॥ जे तिसु भावै ऊजली सत सरि नावण जाउ ॥3॥ पूरो पूरो आखीऐ पूरै तखति निवास ॥ पूरै थानि सुहावणै पूरै आस निरास ॥ नानक पूरा जे मिलै किउ घाटै गुण तास ॥4॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ जिस जीव-स्त्री ने अपने हृदय में प्रभू की सिफत-सलाह बसाई हई है वह प्रभू के गुणों की ही कथा वारता करती है। पर, जिसके अंदर (माया के मोह के कारण) अवगुण ही अवगुण हैं वह (अपने ही अवगुण के प्रभाव से) सदा चिंतातुर रहती है। हे जीव-स्त्री! आप प्रभू पति को मिलना चाहती है, तो (याद रख कि) झूठे मोह में फसे रहने से प्रभू-पति को नहीं मिल सकती। (आप तो मोह के समुंदर में गोते खा रही है) आपके पास ना बेड़ी (नाव) है ना तुलहा है, इस तरह प्रभू पति नहीं मिल सकता, (क्योंकि) वह तो (इस संसार समुंदर से पार है) दूर है।1। मेरे पालनहार प्रभू का अहिल ठिकाना उस तख्त पर है जो (प्रभू की तरह ही) संपूर्ण है (जिसमें कोई कमी नहीं है)। वह प्रभू सदा स्थिर रहने वाला है, उसका तौल माप बताया नहीं जा सकता। पूरा गुरू यदि मेहर करे, तोही वह मिल सकता है।1।रहाउ। हरि प्रमात्मा (मानों) एक खूबसूरत सा मन्दिर है जिसमें माणक लाल हैं । मोती व चमकते हीरे हैं (जिसके चारों तरफ) सोने के सुन्दर किले हैं। पर उस (मंदिर) किले पर सीढ़ी के बिना चढ़ा नहीं जा सकता। हाँ, यदि गुरू चरणों का ध्यान धरा जाए, जो प्रभू चरणों का ध्यान धरा जाए, तो दर्शन हो जाता है।2। उस (हरि मंदिर किले के ऊपर चढ़ने के लिए) गुरू सीढ़ी है। (इस संसार समुंदर से पार लांघने के वास्ते) गुरू नाव है, प्रभू का नाम (देने वाला) गुरू तुलहा है। गुरू सरोवर है, गुरू समुंदर है, गुरू ही जहाज है, गुरू ही तीर्थ है, और दरिया है। यदि प्रभू की रजा हो, तो (गुरू को मिल के) मनुष्य की बुद्धि शुद्ध हो जाती है। (क्योंकि) मनुष्य साध-संगति सरोवर में (मानसिक) स्नान करने जाने लग पड़ता है।3। हर कोई कहता है कि परमात्मा में कोई कमी नही है, उसका निवास भी ऐसे तख्त पर है जिसमें कोई कमी नहीं। वह पूरा प्रभू सुंदर कमी रहित जगह पर बैठा हैऔर टूटे दिल वालों की उम्मीदें पूरी करता है। हे नानक! वह पूर्ण प्रभू अगर मनुष्य को मिल जाए तो उसके गुणों में भी कैसे कोई कमी आ सकती है? 4।9।
सिरीरागु महला 1 ॥ आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह ॥ मिलि कै करह कहाणीआ संम्रथ कंत कीआह ॥ साचे साहिब सभि गुण अउगण सभि असाह ॥1॥ करता सभु को तेरै जोरि ॥ एकु सबदु बीचारीऐ जा तू ता किआ होरि ॥1॥ रहाउ ॥ जाइ पुछहु सोहागणी तुसी राविआ किनी गुणंी ॥ सहजि संतोखि सीगारीआ मिठा बोलणी ॥ पिरु रीसालू ता मिलै जा गुर का सबदु सुणी ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे सत्संगी सहेलियो व बहनों! आओ, प्यार से (सत्संग में) इकट्ठे हों, सत्संग में मिल के उस प्रभू-पति की बातें करें जो सर्व-शक्तिमान है। (हे सहेलिओ!) उस सदा स्थिर मालक में सारे ही गुण हैं (उस से विछुड़ के ही) सारे अवगुण हमारे में आ जाते हैं।1। हे करतार! हरेक जीव आपके हुकम में (ही चल सकता है)। जब आपकी सिफत सलाह की बाणी का विचार करते हैं (तब ये समझ आती है कि) जब आप (हमारे सिर पर रक्षक है, रखवाला है), तो और कोई हमारा क्या बिगाड़ सकते हैं।1 रहाउ। (हे सत्संगी बहिनों! बेशक) जा के सुहागन (जीव-स्त्री) को पूछ लो कि आपने किन गुणों से प्रभू मिलाप हासिल किया है। वहाँ से यही पता लगेगा कि वे अडोलता से, संतोष से और मीठे बोलों से श्रिंगारी हुई हैं (तभी उन्हें मिल गया)। वह आनन्द दाता प्रभू-पति तभी मिलता है, जब गुरू का उपदेश ध्यान से सुना जाए (तथा संतोष, मृदुभाषी मीठे बोलों वाले गुण धारण किये जाएं)।2।
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(दुनिया से अपना) हुकम (मनवाना) तथा (हुकम के) और और बोल बोलने (और इसमें खुशी महसूस करनी मेरे वास्ते) आपकी रजा में राजी रहना है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।