गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आपकी बेअंत ताकतें हैं, आपकी बेअंत बख्शिशें हैं। बेअंत जीव दिन रात आपकी सिफतें कर रहे हैं। आपके बेअंत ही रूप-रंग हैं, आपके पैदा किये बेअंत जीव हैं, जो कोई ऊँची व कोई नीच जातियों में हैं।3। हे नानक! यदि मनुष्य सिमरन करते हुए अडोल प्रभू में लीन रहे, तो उसे प्रमात्मा मिल जाता है। परमात्मा (उसके हृदय में) प्रगट हो जाता है, उसकी सुरति (प्रभू चरणों में) जुड़ी रहती है, (प्रभू के दर पर) उसे आदर मिलता है, गुरू के बचनों पर चल के वह संसारिक डर खत्म कर लेता है, तथा सदा स्थिर रहने वाला अडोल प्रभू-पातशाह उसको स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ लेता है।4।10।
सिरीरागु महला 1 ॥ भली सरी जि उबरी हउमै मुई घराहु ॥ दूत लगे फिरि चाकरी सतिगुर का वेसाहु ॥ कलप तिआगी बादि है सचा वेपरवाहु ॥1॥ मन रे सचु मिलै भउ जाइ ॥ भै बिनु निरभउ किउ थीऐ गुरमुखि सबदि समाइ ॥1॥ रहाउ ॥ केता आखणु आखीऐ आखणि तोटि न होइ ॥ मंगण वाले केतड़े दाता एको सोइ ॥ जिस के जीअ पराण है मनि वसिऐ सुखु होइ ॥2॥ जगु सुपना बाजी बनी खिन महि खेलु खेलाइ ॥ संजोगी मिलि एकसे विजोगी उठि जाइ ॥ जो तिसु भाणा सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥3॥ गुरमुखि वसतु वेसाहीऐ सचु वखरु सचु रासि ॥ जिनी सचु वणंजिआ गुर पूरे साबासि ॥ नानक वसतु पछाणसी सचु सउदा जिसु पासि ॥4॥11॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ (मेरे वास्ते बहुत) अच्छा हुआ कि मेरी जिंद विकारों से बच गई, मेरे हृदय में से अहम् मर गया। मुझे अपने गुरू का थापड़ा (पीठ पे शाबाशी भरा हाथ) मिला, और विकार (मुझे खुआर करने की बजाए) उल्टे मेरे बस में हो गये। अडोल बेपरवाह प्रभू (मुझे मिल गया), मैंने (माया मोह की) व्यर्थ की कल्पना छोड़ दी।1। हे (मेरे) मन! जब वह अडोल प्रभू मिल जाता है, तो दुनिया का डर सहम दूर हो जाता है। जब तक प्रमात्मा का भय अदब मन में ना हो, मनुष्य दुनिया के डरों से बच नहीं सकता। (और परमात्मा का भय-अदब तब ही पैदा होता है जब जीव) गुरू के द्वारा शबद से जुड़ता है।1।रहाउ। मनुष्य दुनिया वाली मांग कितनी ही मांगता रहता है, मांगें मांगने में कमी होती ही नहीं (भाव, दुनियावी मांगें खत्म नहीं होतीं) (फिर) बेअंत जीव हैं मांगे मांगने वाले, और देने वाला सिर्फ एक परमात्मा है (पर इस मांगने में सुख भी नहीं है)। जिस परमात्मा ने जिंद प्राण सुख दिये हुए हैं, यदि वह मन में बस जाए, तब ही सुख होता है।2। जगत (मानों) सपना है, जगत एक खेल बना हुआ है। जीव एक छिन में (जिंदगी की) खेल खेल के चला जाता है। (प्रभू की) संजोग-सत्य से प्राणी मिल के इकट्टे होते हैं। विजोग-सत्य अनुसार जीव (यहां से) उठ के चले जाते हैं। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है, वही होता है (उसके उलट) और कुछ नहीं किया जा सकता।3। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम ही असल सौदा है और पूँजी है (जिसके व्यापार के लिए जीव यहां आया है)। ये सौदा गुरू के द्वारा ही खरीदा जा सकता है। जिन लोगों ने यह सौदा खरीदा है उनको पूरे गुरू की शाबाशी मिलती है। हे नानक! जिस के पास यह सच्चा सौदा होता है, इस वस्तु की कद्र भी वही जानता है।4।11।
सिरीरागु महलु 1 ॥ धातु मिलै फुनि धातु कउ सिफती सिफति समाइ ॥ लालु गुलालु गहबरा सचा रंगु चड़ाउ ॥ सचु मिलै संतोखीआ हरि जपि एकै भाइ ॥1॥ भाई रे संत जना की रेणु ॥ संत सभा गुरु पाईऐ मुकति पदारथु धेणु ॥1॥ रहाउ ॥ ऊचउ थानु सुहावणा ऊपरि महलु मुरारि ॥ सचु करणी दे पाईऐ दरु घरु महलु पिआरि ॥ गुरमुखि मनु समझाईऐ आतम रामु बीचारि ॥2॥ त्रिबिधि करम कमाईअहि आस अंदेसा होइ ॥ किउ गुर बिनु त्रिकुटी छुटसी सहजि मिलिऐ सुखु होइ ॥ निज घरि महलु पछाणीऐ नदरि करे मलु धोइ ॥3॥ बिनु गुर मैलु न उतरै बिनु हरि किउ घर वासु ॥ एको सबदु वीचारीऐ अवर तिआगै आस ॥ नानक देखि दिखाईऐ हउ सद बलिहारै जासु ॥4॥12॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महलु 1 ॥ प्रभू की सिफत सलाह करके गुणों के मालिक प्रभू में मनुष्य इस तरह लीन हो जाता है, जैसे (सोना आदि धातु का बना हुआ जेवर ढल के) मुड़ (उसी) धातु के साथ एकरूप हो जाता है। (सिफति सलाह की बरकति से) मनुष्य पर गाढ़ा लाल रंग चढ़ जाता है (मनुष्य का चेहरा चमक उठता है)। पर वह अडोल प्रभू उन संतोखी जीवन वालों को ही मिलता है जो परमेश्वर की सिफत सलाह करते करते उस एक के प्रेम में ही (मगन रहते) हैं।1। हे भाई! (अगर प्रभू का दर्शन करना है तो) संत जनों के चरणों की धूड़ बनो। संत जनों की सभा में (सत्संग में) गुरू मिलता है जो विकारों से बचा लेता है।1।रहाउ। परमात्मा (के रहने) का सुंदर स्थल ऊँचा है, उस का महल (सब से) ऊपर है। उस का दर उसका घर महल प्यार से मिलता है।मन विकारों की ओर ही प्रेरता रहता है, तथा) मन को गुरू के द्वारा सीधे रास्ते लगाना, सर्व-व्यापी प्रभू के गुणों की विचार से समझाना है।2। (दुनियां में आम तौर पे) माया के तीन गुणों के अधीन रह के ही कर्म किए जाते हैं, जिस करके आशाओं व शंकाओं का चक्र बना रहता है। (इनके कारण मन भी अशांत रहता है) ये अशांति गुरू की शरण पड़े बिना नहीं हटती। (गुरू के द्वारा ही अडोलता पैदा होती है), अडोलता में टिके रह के ही आत्मिक आनन्द मिलता है। जब प्रभू मेहर की नजर करता है, मनुष्य (अपने मन की) मैल साफ करता है (और मन भटकने से हट जाता है) और अडोलता में परमात्मा के ठिकाने को (अपने अंदर ही) पहचान लेता है।3। गुरू के बगैर मन की मैल नहीं धुलती। परमात्मा में जुड़े बिना मानसिक अडोलता नही मिलती। (हे भाई!) (रिजक देने वाले) एक प्रभू की ही सिफत सलाह विचारनी चाहिए। (जो सिफत सलाह करता है वह) और और आशाएं त्याग देता है। हे नानक! (कह) जो गुरू स्वयं प्रभू के दर्शन करके मुझे दर्शन करवाता है, मैं उससे सदा सदके जाता हूँ।4।12।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ जो भाग्यहीन जीव स्त्री (प्रभू-पति के बिना माया आदि) और दूसरे प्यार में ठगी रहती है उसका जीना धिक्कार ही है। जैसे कॅलर की दीवार (सहजे-सहजे) झर-झर के नष्ट होती है, वैसे ही उसका आत्मिक जीवन भी दिन रात (माया के मोह में) धीरे धीरे क्षय हो जाता है। (सुख की खातिर वह दौड़-भाग करती है, पर) गुरू की शरण के बिना सुख नहीं मिल सकता (माया का मोह तो बल्कि दुख ही दुख पैदा करता है, और) प्रभू-पति को मिले बिना मानसिक दुख दूर नहीं होता।1। हे मूर्ख जीव-स्त्री! अगर पति ना मिले तो श्रृंगार करने का कोई लाभ नहीं होता।
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपकी बेअंत ताकतें हैं, आपकी बेअंत बख्शिशें हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।