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अंग 169

अंग
169
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि हरि निकटि वसै सभ जग कै अपरंपर पुरखु अतोली ॥
हरि हरि प्रगटु कीओ गुरि पूरै सिरु वेचिओ गुर पहि मोली ॥3॥
हरि जी अंतरि बाहरि तुम सरणागति तुम वड पुरख वडोली ॥
जनु नानकु अनदिनु हरि गुण गावै मिलि सतिगुर गुर वेचोली ॥4॥1॥15॥53॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: वह परमात्मा जो परे से परे है जो सर्व व्यापक है। जिसके गुणों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, सारे जगत के नजदीक बस रहा है। उस परमात्मा को पूरे गुरू ने मेरे अंदर प्रगट किया है, (इस वास्ते) मैंने अपना सिर गुरू के पास मोल में बेच दिया है (भाव, अपना कोई हॅक दावा नहीं रखा जैसे मूल्य लेकर बेची किसी चीज पर कोई हक नहीं रह जाता)। 3। हे हरी ! (सारे जगत में सब जीवों के) अंदर-बाहर आप बस रहा है। मैं आपकी शरण आया हूँ। मेरे वास्ते आप ही सबसे बड़ा मालिक है। दास नानक, गुरू विचोले को मिल के हर रोज हरी के गुण गाता है। 4। 1। 15। 531।
गउड़ी पूरबी महला 4 ॥
जगजीवन अपरंपर सुआमी जगदीसुर पुरख बिधाते ॥
जितु मारगि तुम प्रेरहु सुआमी तितु मारगि हम जाते ॥1॥
राम मेरा मनु हरि सेती राते ॥
सतसंगति मिलि राम रसु पाइआ हरि रामै नामि समाते ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु हरि हरि जगि अवखधु हरि हरि नामु हरि साते ॥
तिन के पाप दोख सभि बिनसे जो गुरमति राम रसु खाते ॥2॥
जिन कउ लिखतु लिखे धुरि मसतकि ते गुर संतोख सरि नाते ॥
दुरमति मैलु गई सभ तिन की जो राम नाम रंगि राते ॥3॥
राम तुम आपे आपि आपि प्रभु ठाकुर तुम जेवड अवरु न दाते ॥
जनु नानकु नामु लए तां जीवै हरि जपीऐ हरि किरपा ते ॥4॥2॥16॥54॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ हे जगत के जीवन प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! हे सवामी ! हे जगत के ईश्वर ! हे सर्व-व्यापक ! हे सुजनहार ! हम जीवों को आप जिस रास्ते पर (चलने के लिए) प्रेरित करता है, हम उसी रास्ते पर ही चलते हैं। 1। हे राम (मेहर कर) मेरा मन आपके (नाम) में रंगा रहे। (हे भाई ! जिन लोगों ने ईश्वर की कृपा से) साध-संगति में मिल के राम-रस प्राप्त कर लिया, वे परमात्मा के नाम में ही मस्त रहते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम जगत में (सब रोगों की) दवाई है, परमात्मा का नाम (आत्मिक) शांति देने वाला है । जो मनुष्य गुरू की मति ले के परमातमा का नाम-रस चखते हैं, उनके सारे पाप, सारे ऐब नाश हो जाते हैं। 2। जिन मनुष्यों के माथे पर धुर दरगाह से (भक्ति का) लेख लिखा जाता है, वह मनुष्य गुरू रूप संतोखसर में स्नान करते हैं (भाव, वे मनुष्य गुरू में अपना आप लीन कर देते हैं और वे संतोष वाला जीवन जीते हैं)। जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं, उनकी बुरी मति वाली सारी मैल दूर हो जाती है। 3। हे राम ! हे ठाकुर ! आप स्वयं ही आप खुद ही आप आप ही (सब जीवों का) मालिक है। आपके जितना बड़ा और कोई दाता नहीं। दास नानक जब परमात्मा का नाम जपता है, तो आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है। (पर) परमात्मा का नाम परमातमा की मेहर से ही जपा जा सकता है। 4। 2। 16। 54।
गउड़ी पूरबी महला 4 ॥
करहु क्रिपा जगजीवन दाते मेरा मनु हरि सेती राचे ॥
सतिगुरि बचनु दीओ अति निरमलु जपि हरि हरि हरि मनु माचे ॥1॥
राम मेरा मनु तनु बेधि लीओ हरि साचे ॥
जिह काल कै मुखि जगतु सभु ग्रसिआ गुर सतिगुर कै बचनि हरि हम बाचे ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कउ प्रीति नाही हरि सेती ते साकत मूड़ नर काचे ॥
तिन कउ जनमु मरणु अति भारी विचि विसटा मरि मरि पाचे ॥2॥
तुम दइआल सरणि प्रतिपालक मो कउ दीजै दानु हरि हम जाचे ॥
हरि के दास दास हम कीजै मनु निरति करे करि नाचे ॥3॥
आपे साह वडे प्रभ सुआमी हम वणजारे हहि ता चे ॥
मेरा मनु तनु जीउ रासि सभ तेरी जन नानक के साह प्रभ साचे ॥4॥3॥17॥55॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ हे जगत के जीवन ! हे दातार ! कृपा कर, मेरा मन आपकी याद में मस्त रहे। (आपकी कृपा से) सत्गुरू ने मुझे बहुत पवित्र उपदेश दिया है, अब मेरा मन हरी नाम जप जप के खुश हो रहा है। 1। हे राम ! हे सदा कायम रहने वाले हरी ! तूने (मेहर कर के) मेरे मन को मेरे तन को (अपने चरणों में) बेध लिया है। जिस आत्मिक मौत के मुंह में सारा संसार निगला हुआ है, (उस आत्मिक मौत से) मैं सतिगरू के उपदेश (की बरकति से) बच गया हूँ। 1। रहाउ। जिन मनुष्यों को परमातमा (के चरणों) के साथ प्रीति प्राप्त नहीं हुई, वे माया के आँगन में मूर्ख मनुष्य कमजोर जीवन वाले रहते हैं। उनके वास्ते जनम मरण का दुखदायक चक्र बना रहता है। वे (विकारों की) गंदगी में आत्मिक मौत ले ले कर दुखी होते रहते हैं। 2। हे दयाल प्रभू ! हे शरण आए की रक्षा करने वाले प्रभू ! मैं आपके दर से आपका नाम मांगता हूँ, मुझे ये दाति बख्श। मुझे अपने दासों का दास बनाए रख। ता कि मेरा मन (आपके नाम में जुड़ के) सदा नृत्य करता रहे (सदैव आत्मिक आनंद में लीन रहे)। 3। प्रभू स्वयं ही (नाम रस की पूँजी देने वाले सब जीवों के) बड़ा शाह है, मालिक है। हम सभी जीव उस (शाह) के (भेजे हुए) वणजारे हैं (व्यापारी हैं)। हे दास नानक के सदा स्थिर शाह व प्रभू ! मेरा मन, मेरा तन, मेरा जीवात्मा- ये सब कुछ आपकी बख्शी हुई राशि-पूँजी है (मुझे अपने नाम की दाति भी बख्श)। 4। 3। 17। 55।
गउड़ी पूरबी महला 4 ॥
तुम दइआल सरब दुख भंजन इक बिनउ सुनहु दे काने ॥
जिस ते तुम हरि जाने सुआमी सो सतिगुरु मेलि मेरा प्राने ॥1॥
राम हम सतिगुर पारब्रहम करि माने ॥
हम मूड़ मुगध असुध मति होते गुर सतिगुर कै बचनि हरि हम जाने ॥1॥ रहाउ ॥
जितने रस अन रस हम देखे सभ तितने फीक फीकाने ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ हे (जीवों के) सारे दुख नाश करने वाले स्वामी ! आप दया का घर है। मेरी एक आरजू ध्यान से सुन। मुझे वह सत्गुरू मिला जो मेरी जीवात्मा (का सहारा) है, जिसकी कृपा से आपके साथ गहरी सांझ पड़ती है। 1। (हे भाई !) मैंने सत्गुरू को (आत्मिक जीवन में) राम पारब्रह्म के बराबर का माना है। मैं मूर्ख था, महा मूर्ख था, मलीन मति वाला था, गुरू सत्गुरू के उपदेश (की बरकति से) मैंने परमात्मा के साथ जान-पहिचान डाल ली है। 1। रहाउ। जगत के जितने भी अन्य रस हैं, मैंने देख लिए हैं, वे सारे ही फीके हैं, बेस्वाद हैं।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह परमात्मा जो परे से परे है जो सर्व व्यापक है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।