हरि हरि प्रगटु कीओ गुरि पूरै सिरु वेचिओ गुर पहि मोली ॥3॥
हरि जी अंतरि बाहरि तुम सरणागति तुम वड पुरख वडोली ॥
जनु नानकु अनदिनु हरि गुण गावै मिलि सतिगुर गुर वेचोली ॥4॥1॥15॥53॥
जगजीवन अपरंपर सुआमी जगदीसुर पुरख बिधाते ॥
जितु मारगि तुम प्रेरहु सुआमी तितु मारगि हम जाते ॥1॥
राम मेरा मनु हरि सेती राते ॥
सतसंगति मिलि राम रसु पाइआ हरि रामै नामि समाते ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु हरि हरि जगि अवखधु हरि हरि नामु हरि साते ॥
तिन के पाप दोख सभि बिनसे जो गुरमति राम रसु खाते ॥2॥
जिन कउ लिखतु लिखे धुरि मसतकि ते गुर संतोख सरि नाते ॥
दुरमति मैलु गई सभ तिन की जो राम नाम रंगि राते ॥3॥
राम तुम आपे आपि आपि प्रभु ठाकुर तुम जेवड अवरु न दाते ॥
जनु नानकु नामु लए तां जीवै हरि जपीऐ हरि किरपा ते ॥4॥2॥16॥54॥
करहु क्रिपा जगजीवन दाते मेरा मनु हरि सेती राचे ॥
सतिगुरि बचनु दीओ अति निरमलु जपि हरि हरि हरि मनु माचे ॥1॥
राम मेरा मनु तनु बेधि लीओ हरि साचे ॥
जिह काल कै मुखि जगतु सभु ग्रसिआ गुर सतिगुर कै बचनि हरि हम बाचे ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कउ प्रीति नाही हरि सेती ते साकत मूड़ नर काचे ॥
तिन कउ जनमु मरणु अति भारी विचि विसटा मरि मरि पाचे ॥2॥
तुम दइआल सरणि प्रतिपालक मो कउ दीजै दानु हरि हम जाचे ॥
हरि के दास दास हम कीजै मनु निरति करे करि नाचे ॥3॥
आपे साह वडे प्रभ सुआमी हम वणजारे हहि ता चे ॥
मेरा मनु तनु जीउ रासि सभ तेरी जन नानक के साह प्रभ साचे ॥4॥3॥17॥55॥
तुम दइआल सरब दुख भंजन इक बिनउ सुनहु दे काने ॥
जिस ते तुम हरि जाने सुआमी सो सतिगुरु मेलि मेरा प्राने ॥1॥
राम हम सतिगुर पारब्रहम करि माने ॥
हम मूड़ मुगध असुध मति होते गुर सतिगुर कै बचनि हरि हम जाने ॥1॥ रहाउ ॥
जितने रस अन रस हम देखे सभ तितने फीक फीकाने ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह परमात्मा जो परे से परे है जो सर्व व्यापक है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।