जिउ जननी सुतु जणि पालती राखै नदरि मझारि ॥
अंतरि बाहरि मुखि दे गिरासु खिनु खिनु पोचारि ॥
तिउ सतिगुरु गुरसिख राखता हरि प्रीति पिआरि ॥1॥
मेरे राम हम बारिक हरि प्रभ के है इआणे ॥
धंनु धंनु गुरू गुरु सतिगुरु पाधा जिनि हरि उपदेसु दे कीए सिआणे ॥1॥ रहाउ ॥
जैसी गगनि फिरंती ऊडती कपरे बागे वाली ॥
ओह राखै चीतु पीछै बिचि बचरे नित हिरदै सारि समाली ॥
तिउ सतिगुर सिख प्रीति हरि हरि की गुरु सिख रखै जीअ नाली ॥2॥
जैसे काती तीस बतीस है विचि राखै रसना मास रतु केरी ॥
कोई जाणहु मास काती कै किछु हाथि है सभ वसगति है हरि केरी ॥
तिउ संत जना की नर निंदा करहि हरि राखै पैज जन केरी ॥3॥
भाई मत कोई जाणहु किसी कै किछु हाथि है सभ करे कराइआ ॥
जरा मरा तापु सिरति सापु सभु हरि कै वसि है कोई लागि न सकै बिनु हरि का लाइआ ॥
ऐसा हरि नामु मनि चिति निति धिआवहु जन नानक जो अंती अउसरि लए छडाइआ ॥4॥7॥13॥51॥
जिसु मिलिऐ मनि होइ अनंदु सो सतिगुरु कहीऐ ॥
मन की दुबिधा बिनसि जाइ हरि परम पदु लहीऐ ॥1॥
मेरा सतिगुरु पिआरा कितु बिधि मिलै ॥
हउ खिनु खिनु करी नमसकारु मेरा गुरु पूरा किउ मिलै ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा हरि मेलिआ मेरा सतिगुरु पूरा ॥
इछ पुंनी जन केरीआ ले सतिगुर धूरा ॥2॥
हरि भगति द्रिड़ावै हरि भगति सुणै तिसु सतिगुर मिलीऐ ॥
तोटा मूलि न आवई हरि लाभु निति द्रिड़ीऐ ॥3॥
जिस कउ रिदै विगासु है भाउ दूजा नाही ॥
नानक तिसु गुर मिलि उधरै हरि गुण गावाही ॥4॥8॥14॥52॥
हरि दइआलि दइआ प्रभि कीनी मेरै मनि तनि मुखि हरि बोली ॥
गुरमुखि रंगु भइआ अति गूड़ा हरि रंगि भीनी मेरी चोली ॥1॥
अपुने हरि प्रभ की हउ गोली ॥
जब हम हरि सेती मनु मानिआ करि दीनो जगतु सभु गोल अमोली ॥1॥ रहाउ ॥
करहु बिबेकु संत जन भाई खोजि हिरदै देखि ढंढोली ॥
हरि हरि रूपु सभ जोति सबाई हरि निकटि वसै हरि कोली ॥2॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥ जैसे माँ, पुत्र को जनम दे के (उसको) अपनी निगाह के नीचे रखती है और पालती है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।