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अंग 170

अंग
170
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
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हरि का नामु अंम्रित रसु चाखिआ मिलि सतिगुर मीठ रस गाने ॥2॥
जिन कउ गुरु सतिगुरु नही भेटिआ ते साकत मूड़ दिवाने ॥
तिन के करमहीन धुरि पाए देखि दीपकु मोहि पचाने ॥3॥
जिन कउ तुम दइआ करि मेलहु ते हरि हरि सेव लगाने ॥
जन नानक हरि हरि हरि जपि प्रगटे मति गुरमति नामि समाने ॥4॥4॥18॥56॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गुरू को मिल के मैंने आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-रस चखा है। वह रस मीठा है जैसे गन्ने का रस मीठा होता है। 2। जिन मनुष्यों को गुरू नहीं मिलता, वे मूर्ख, ईश्वर से टूटे हुए रहते हैं। वे माया के पीछे झल्ले हुए फिरते हैं। (पर, उनके भी क्या बस?) धुर से ही (परमात्मा ने) उनके भाग्यों में (ये) नीच कर्म ही डाले हुए हैं, वे माया के मोह में ऐसे जलते रहते हैं जैसे दीपक को देख के (पतंगे)। 3। हे प्रभू ! जिन मनुष्यों को आप मेहर करके (गुरू चरणों में) मिलाता है, वे, हे हरी ! आपकी सेवा-भक्ति में लगे रहते हैं। हे दास नानक ! वे परमात्मा का नाम जप जप के चमक पड़ते हैं। गुरू की मति पर चल के वे प्रभू के नाम में लीन रहते हैं। 4। 4। 18। 56।
गउड़ी पूरबी महला 4 ॥
मेरे मन सो प्रभु सदा नालि है सुआमी कहु किथै हरि पहु नसीऐ ॥
हरि आपे बखसि लए प्रभु साचा हरि आपि छडाए छुटीऐ ॥1॥
मेरे मन जपि हरि हरि हरि मनि जपीऐ ॥
सतिगुर की सरणाई भजि पउ मेरे मना गुर सतिगुर पीछै छुटीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मेरे मन सेवहु सो प्रभ स्रब सुखदाता जितु सेविऐ निज घरि वसीऐ ॥
गुरमुखि जाइ लहहु घरु अपना घसि चंदनु हरि जसु घसीऐ ॥2॥
मेरे मन हरि हरि हरि हरि हरि जसु ऊतमु लै लाहा हरि मनि हसीऐ ॥
हरि हरि आपि दइआ करि देवै ता अंम्रितु हरि रसु चखीऐ ॥3॥
मेरे मन नाम बिना जो दूजै लागे ते साकत नर जमि घुटीऐ ॥
ते साकत चोर जिना नामु विसारिआ मन तिन कै निकटि न भिटीऐ ॥4॥
मेरे मन सेवहु अलख निरंजन नरहरि जितु सेविऐ लेखा छुटीऐ ॥
जन नानक हरि प्रभि पूरे कीए खिनु मासा तोलु न घटीऐ ॥5॥5॥19॥57॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ हे मेरे मन ! वह स्वामी हर वक्त (जीवों के) साथ (बसता) है। बताओ वह कौन सी जगह है जहां उस प्रभू से हम भाग सकते हैं? वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा स्वयं ही (हमारे अवगुण) बख्श लेता है। वह हरी खुद ही (विकारों के पँजों से) छुड़ा लेता है (उसी की सहायता से विकारों से) बच सकते हैं। 1। हे मेरे मन ! सदा हरी-नाम जप। (हे भाई !) हरी-नाम सदा मन में जपना चाहिए। हे मेरे मन ! सत्गुरू की शरण पड़। गुरू का आसरा लेने से (माया के बंधनों से) बच जाते हैं। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! सारे सुख देने वाले उस परमात्मा का सिमरन कर, जिसकी शरण पड़ने से अपने घर में बस सकते हैं (माया की भटकना से बच के अंतरात्मे टिक सकते हैं)। (हे मन !) गुरू की शरण पड़ कर अपना (असल) घर जा के ढूँढ ले (प्रभू के चरणों में टिक)। (जैसे) चंदन (सिल्ली पे) घिसने से (सुगंधि देता है, वैसे ही) परमात्मा की सिफत सालाह (उपमा, प्रशंसा) को (अपने मन के साथ) घसाना चाहिए (आत्मिक जीवन में सुगंधि पैदा होगी)। 2। हे मेरे मन ! परमात्मा की सिफत सालाह सब से श्रेष्ठ पदार्थ है। (हे भाई !) हरी नाम की कमाई कमा के मन में आत्मिक आनंद ले सकते हैं। जब परमात्मा खुद मेहर करके अपने नाम की दाति देता है, तब आत्मिक जीवन देने वाला उसका नाम-रस चख सकते हैं। 3। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम भुला के जो मनुष्य और तरफ व्यस्त रहते हैं, वे परमात्मा से टूट जाते हैं। यम ने उन्हें जकड़ लिया होता है (आत्मिक मौत उनका दायरा कम कर देती है)। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम बिसार दिया, वे माया के मोह में जकड़े गए, वे ईश्वर के चोर बन गए। हे मेरे मन ! उनके नजदीक नहीं होना चाहिए। 4। हे मेरे मन ! उस परमातमा की सेवा भक्ति करजो अदृश्य है जो माया के प्रभाव से परे है। उसकी सेवा भक्ति करने से (किए कर्मों का) लेखा समाप्त हो जाता है (माया की तरफ प्रेरित करने वाले संस्कार मनुष्य के अंदर से समाप्त हो जाते हैं)। हे दास नानक ! जिन मनुष्यों को हरी प्रभू ने पूर्णत: शुद्ध जीवन वाला बना दिया है, उनके आत्मिक जीवन में एक तौला भर, मासा भर, रॅत्ती भर भी कमजोरी नहीं आती। 5। 5। 19। 57।
गउड़ी पूरबी महला 4 ॥
हमरे प्रान वसगति प्रभ तुमरै मेरा जीउ पिंडु सभ तेरी ॥
दइआ करहु हरि दरसु दिखावहु मेरै मनि तनि लोच घणेरी ॥1॥
राम मेरै मनि तनि लोच मिलण हरि केरी ॥
गुर क्रिपालि क्रिपा किंचत गुरि कीनी हरि मिलिआ आइ प्रभु मेरी ॥1॥ रहाउ ॥
जो हमरै मन चिति है सुआमी सा बिधि तुम हरि जानहु मेरी ॥
अनदिनु नामु जपी सुखु पाई नित जीवा आस हरि तेरी ॥2॥
गुरि सतिगुरि दातै पंथु बताइआ हरि मिलिआ आइ प्रभु मेरी ॥
अनदिनु अनदु भइआ वडभागी सभ आस पुजी जन केरी ॥3॥
जगंनाथ जगदीसुर करते सभ वसगति है हरि केरी ॥
जन नानक सरणागति आए हरि राखहु पैज जन केरी ॥4॥6॥20॥58॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ हे प्रभू ! मेरे प्राण आपके वश में ही हैं। मेरी जीवात्मा और मेरा शरीर ये सब आपके ही दिए हुए हैं। हे प्रभू ! (मेरे ऊपर) मेहर कर, मुझे अपना दर्शन दे, (आपके दर्शन की) मेरे मन में मेरे दिल में बड़ी तमन्ना है। 1। हे मेरे राम !हे मेरे हरी ! मेरे मन में मेरे दिल में आपको मिलने की (बहुत) चाह है। (हे भाई !) कृपालु गुरू ने जब थोड़ी सी कृपा की, तो मेरा हरी प्रभू मुझे आ मिला। 1। रहाउ। हे हरी ! हे मेरे स्वामी ! हम जीवों के मन में, चित्त में जो कुछ घटित होता है, वह हालत आप खुद ही जानता है। हे हरी ! मुझे (सदा) आपकी (मेहर की) आशा रहती है (कि आप कृपा करे तो) मैं हर रोज आपका नाम जपता रहूँ, आत्मिक आनंद लेता रहूं, और सदा आत्मिक जीवन जीता रहूँ। 2। (नाम की) दात देने वाले गुरू ने सत्गुरू ने मुझे (परमात्मा से मिलने का) राह बताया और मेरा हरी-प्रभू मुझे आ मिला। बड़े भाग्यों से (मेरे हृदय में) हर रोज (हर वक्त) आत्मिक आनंद बना रहता है। मुझ दास की आशा पूरी हो गई है। 3। हे जगत के नाथ ! हे जगत के ईश्वर ! हे करतार ! ये सारी सृष्टि (जगत खेल) आपके वश में है। हे दास नानक ! (अरदास कर और कह) हे हरी ! मैं आपकी शरण आया हूँ, मुझ दास की लाज (इज्जत) रख। 4। 6। 20। 58।
गउड़ी पूरबी महला 4 ॥
इहु मनूआ खिनु न टिकै बहु रंगी दह दह दिसि चलि चलि हाढे ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़दसों दिशाओं में दौड़ दौड़ के भटकता है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू को मिल के मैंने आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-रस चखा है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।