जिन कउ गुरु सतिगुरु नही भेटिआ ते साकत मूड़ दिवाने ॥
तिन के करमहीन धुरि पाए देखि दीपकु मोहि पचाने ॥3॥
जिन कउ तुम दइआ करि मेलहु ते हरि हरि सेव लगाने ॥
जन नानक हरि हरि हरि जपि प्रगटे मति गुरमति नामि समाने ॥4॥4॥18॥56॥
मेरे मन सो प्रभु सदा नालि है सुआमी कहु किथै हरि पहु नसीऐ ॥
हरि आपे बखसि लए प्रभु साचा हरि आपि छडाए छुटीऐ ॥1॥
मेरे मन जपि हरि हरि हरि मनि जपीऐ ॥
सतिगुर की सरणाई भजि पउ मेरे मना गुर सतिगुर पीछै छुटीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मेरे मन सेवहु सो प्रभ स्रब सुखदाता जितु सेविऐ निज घरि वसीऐ ॥
गुरमुखि जाइ लहहु घरु अपना घसि चंदनु हरि जसु घसीऐ ॥2॥
मेरे मन हरि हरि हरि हरि हरि जसु ऊतमु लै लाहा हरि मनि हसीऐ ॥
हरि हरि आपि दइआ करि देवै ता अंम्रितु हरि रसु चखीऐ ॥3॥
मेरे मन नाम बिना जो दूजै लागे ते साकत नर जमि घुटीऐ ॥
ते साकत चोर जिना नामु विसारिआ मन तिन कै निकटि न भिटीऐ ॥4॥
मेरे मन सेवहु अलख निरंजन नरहरि जितु सेविऐ लेखा छुटीऐ ॥
जन नानक हरि प्रभि पूरे कीए खिनु मासा तोलु न घटीऐ ॥5॥5॥19॥57॥
हमरे प्रान वसगति प्रभ तुमरै मेरा जीउ पिंडु सभ तेरी ॥
दइआ करहु हरि दरसु दिखावहु मेरै मनि तनि लोच घणेरी ॥1॥
राम मेरै मनि तनि लोच मिलण हरि केरी ॥
गुर क्रिपालि क्रिपा किंचत गुरि कीनी हरि मिलिआ आइ प्रभु मेरी ॥1॥ रहाउ ॥
जो हमरै मन चिति है सुआमी सा बिधि तुम हरि जानहु मेरी ॥
अनदिनु नामु जपी सुखु पाई नित जीवा आस हरि तेरी ॥2॥
गुरि सतिगुरि दातै पंथु बताइआ हरि मिलिआ आइ प्रभु मेरी ॥
अनदिनु अनदु भइआ वडभागी सभ आस पुजी जन केरी ॥3॥
जगंनाथ जगदीसुर करते सभ वसगति है हरि केरी ॥
जन नानक सरणागति आए हरि राखहु पैज जन केरी ॥4॥6॥20॥58॥
इहु मनूआ खिनु न टिकै बहु रंगी दह दह दिसि चलि चलि हाढे ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू को मिल के मैंने आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-रस चखा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।