लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 166 · गउड़ी

इस पृष्ठ पर
अंग
166
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. मेरे राम मै मूरख हरि राखु मेरे गुसईआ ॥
  2. किरसाणी किरसाणु करे लोचै जीउ लाइ ॥
  3. नित दिनसु राति लालचु करे भरमै भरमाइआ ॥

मेरे राम मै मूरख हरि राखु मेरे गुसईआ ॥

अंग 165 से चला आ रहा अंश

मेरे राम मै मूरख हरि राखु मेरे गुसईआ ॥
जन की उपमा तुझहि वडईआ ॥1॥ रहाउ ॥
मंदरि घरि आनंदु हरि हरि जसु मनि भावै ॥
सभ रस मीठे मुखि लगहि जा हरि गुण गावै ॥
हरि जनु परवारु सधारु है इकीह कुली सभु जगतु छडावै ॥2॥
जो किछु कीआ सो हरि कीआ हरि की वडिआई ॥
हरि जीअ तेरे तूं वरतदा हरि पूज कराई ॥
हरि भगति भंडार लहाइदा आपे वरताई ॥3॥
लाला हाटि विहाझिआ किआ तिसु चतुराई ॥
जे राजि बहाले ता हरि गुलामु घासी कउ हरि नामु कढाई ॥
जनु नानकु हरि का दासु है हरि की वडिआई ॥4॥2॥8॥46॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे राम !हे मेरे मालिक ! हे हरी ! मुझ मूर्ख को (अपनी शरण में) रख। आपके सेवक का आदर आपका ही आदर है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य को अपने मन में परमात्मा की सिफत सालाह अच्छी लगती है, उसके हृदय मंदिर में, हृदय घर में सदा आनंद बना रहता है। जब वह हरी के गुण गाता है (उसे ऐसे प्रतीत होता है जैसे) सारे स्वादिष्ट मीठे रस उसके मुंह में पड़ रहे हैं। परमात्मा का सेवक-भगत अपने 21 कुलों का रक्षक है आसरा है। परमात्मा का सेवक सारे जगत को ही (विकारों से) बचा लेता है। 2। ये सारा जगत जो दिखाई देता है ये सारा परमात्मा ने ही पैदा किया है, ये सारा उसी का ही महान काम है। हे हरी ! (सारे जगत के जीव) आपके ही पैदा किए हुये हैं। (सब जीवों में) एक आप ही मौजूद हैं। (हे भाई ! सब जीवों से) परमात्मा (स्वयं ही अपनी पूजा-भक्ति) करवा रहा है। परमात्मा स्वयं ही अपनी भक्ति के खजाने (सब जीवों को) दिलवाता है, स्वयं ही बाँटता है। 3। अगर कोई गुलाम मंडी में से खरीदा गया हो, उस (गुलाम) की (अपने मालिक के सामने) कोई चालाकी नहीं चल सकती (परमात्मा का सेवक-भक्त सत्संग की दुकान में से परमात्मा का अपना बनाया हुआ होता है, उस सेवक को) अगर परमात्मा राज-तख्त पर बैठा दे, तो भी वह परमात्मा का गुलाम ही रहता है। (अपने बनाए हुये सेवक) घसियारे के मुंह से भी परमात्मा हरि-नाम ही जपाता है। (हे भाई !) दास नानक परमात्मा का (खरीदा हुआ) गुलाम है। ये परमात्मा की मेहर है (कि उसने नानक को अपना गुलाम बनाया हुआ है)। 4। 2। 8। 46।

किरसाणी किरसाणु करे लोचै जीउ लाइ ॥

गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥
किरसाणी किरसाणु करे लोचै जीउ लाइ ॥
हलु जोतै उदमु करे मेरा पुतु धी खाइ ॥
तिउ हरि जनु हरि हरि जपु करे हरि अंति छडाइ ॥1॥
मै मूरख की गति कीजै मेरे राम ॥
गुर सतिगुर सेवा हरि लाइ हम काम ॥1॥ रहाउ ॥
लै तुरे सउदागरी सउदागरु धावै ॥
धनु खटै आसा करै माइआ मोहु वधावै ॥
तिउ हरि जनु हरि हरि बोलता हरि बोलि सुखु पावै ॥2॥
बिखु संचै हटवाणीआ बहि हाटि कमाइ ॥
मोह झूठु पसारा झूठ का झूठे लपटाइ ॥
तिउ हरि जनि हरि धनु संचिआ हरि खरचु लै जाइ ॥3॥
इहु माइआ मोह कुटंबु है भाइ दूजै फास ॥
गुरमती सो जनु तरै जो दासनि दास ॥
जनि नानकि नामु धिआइआ गुरमुखि परगास ॥4॥3॥9॥47॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ किसान खेती का काम जी लगा के (पूरी मेहनत से) करता है। हल चलाता है, उद्यम करता है और चाह रखता है (कि फसल अच्छी हो, ता कि) मेरा पुत्र मेरी बेटी खाए। इसी तरह परमात्मा का दास परमात्मा के नाम का जाप करता है (जिसका नतीजा ये निकलता है कि) अंत समय (जब और कोई साथी नहीं रह जाता) परमात्मा उसे (मोह आदि के पंजे से) छुड़ाता है। 1। हे मेरे राम ! मुझ मूर्ख को ऊँची आत्मिक अवस्था बख्श। मुझे गुरू की सेवा के काम में जोड़। 1। रहाउ। सौदागर सौदागरी करने के लिए चल पड़ता है (सौदागरी में वह) धन कमाता है (और धन की) उम्मीद करता है (ज्यों ज्यों कमाई करता है त्यों त्यों) माया का मोह बढ़ता जाता है। इसी तरह परमात्मा का दास परमात्मा का नाम सिमरता है। नाम सिमर सिमर के आत्मिक आनंद लेता है। 2। दुकानदार दुकान में बैठ के दुकान का काम करता है और (माया) एकत्र करता है (जो उसके आत्मिक जीवन के वास्ते) जहर (का काम करती जाती) है (क्योंकि ये तो निरा) मोह का झूठा फैलाव है, झूठ का पसारा है (ज्यों ज्यों इसमें ज्यादा खचित होता जाता है त्यों त्यों) इस नाशवंत के मोह में फंसता जाता है। इसी तरह परमात्मा के दास ने (भी) धन एकत्र किया होता है पर वह हरि-नाम का धन है। ये नाम धन वह अपनी जिंदगी के सफर वास्ते खर्च (के तौर पर) ले जाता है। 3। माया के मोह का ये फैलाव (तो) माया के मोह में फसाने वाली फांसी है। इस में से वही मनुष्य पार लांघता है, जो गुरू की मति ले के परमात्मा के दासों का दास बनता है। दास नानक ने (भी) गुरू की शरण पड़ के (आत्मिक जीवन के वास्ते) प्रकाश हासिल करके परमात्मा का नाम सिमरा है। 4। 3। 9। 47।

नित दिनसु राति लालचु करे भरमै भरमाइआ ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥
नित दिनसु राति लालचु करे भरमै भरमाइआ ॥
वेगारि फिरै वेगारीआ सिरि भारु उठाइआ ॥
जो गुर की जनु सेवा करे सो घर कै कंमि हरि लाइआ ॥1॥
मेरे राम तोड़ि बंधन माइआ घर कै कंमि लाइ ॥
नित हरि गुण गावह हरि नामि समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
नरु प्राणी चाकरी करे नरपति राजे अरथि सभ माइआ ॥
कै बंधै कै डानि लेइ कै नरपति मरि जाइआ ॥
धंनु धनु सेवा सफल सतिगुरू की जितु हरि हरि नामु जपि हरि सुखु पाइआ ॥2॥
नित सउदा सूदु कीचै बहु भाति करि माइआ कै ताई ॥
जा लाहा देइ ता सुखु मने तोटै मरि जाई ॥
जो गुण साझी गुर सिउ करे नित नित सुखु पाई ॥3॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥ जो मनुष्य सदा दिन रात (माया का) लालच करता रहता है। माया के प्रभाव में आ के माया की खातिर भटकता फिरता है, वह उस वैरागी की तरह है जो अपने सिर पर (बेगाना) भार उठा के बेमतलब में व्यस्त है। पर जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है (गुरू की बताई हुई सेवा करता है) उसे परमात्मा ने (नाम सिमरन के) उस काम में लगा दिया है जो उसका असलियत में अपना काम है। 1। हे मेरे राम ! (हम जीवों के) माया के बंधन तोड़ और हमें हमारे असली काम में जोड़। हम हरि-नाम में लीन हो के सदा हरि गुण गाते रहें। 1। रहाउ। सिर्फ माया की खातिर कोई मनुष्य किसी राजे-बादशाह की नौकरी करता है। राजा कई बार (किसी खुनामी के कारण उसे) कैद कर देता है या (कोई जुर्माना आदि) सजा देता है, या, राजा (खुद ही) मर जाता है (तो उस मनुष्य की नौकरी ही खत्म हो जाती है)। पर सत्गुरू की सेवा सदा फल देने वाली है सदा सलाहने योग्य है, क्योंकि इस सेवा से मनुष्य परमात्मा का नाम जप के आत्मिक आनंद पाता है। 2। माया कमाने की खातिर कई तरह का सदा वणज-व्यवहार भी करते हैं। जब (वणज-व्यापार) नफा देता है तो मन में खुशी होती है, पर घाटा पड़ने पर मनुष्य (सदमे से) मर जाता है। पर, जो मनुष्य अपने गुरू के साथ परमात्मा की सिफत सालाह के सौदे की सांझ डालता है, वह सदा ही आत्मिक आनंद लेता है। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 166 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।