जिसु हरि आपि क्रिपा करे सो वेचे सिरु गुर आगै ॥
जन नानक हरि रसि त्रिपतिआ फिरि भूख न लागै ॥4॥4॥10॥48॥
हमरै मनि चिति हरि आस नित किउ देखा हरि दरसु तुमारा ॥
जिनि प्रीति लाई सो जाणता हमरै मनि चिति हरि बहुतु पिआरा ॥
हउ कुरबानी गुर आपणे जिनि विछुड़िआ मेलिआ मेरा सिरजनहारा ॥1॥
मेरे राम हम पापी सरणि परे हरि दुआरि ॥
मतु निरगुण हम मेलै कबहूं अपुनी किरपा धारि ॥1॥ रहाउ ॥
हमरे अवगुण बहुतु बहुतु है बहु बार बार हरि गणत न आवै ॥
तूं गुणवंता हरि हरि दइआलु हरि आपे बखसि लैहि हरि भावै ॥
हम अपराधी राखे गुर संगती उपदेसु दीओ हरि नामु छडावै ॥2॥
तुमरे गुण किआ कहा मेरे सतिगुरा जब गुरु बोलह तब बिसमु होइ जाइ ॥
हम जैसे अपराधी अवरु कोई राखै जैसे हम सतिगुरि राखि लीए छडाइ ॥
तूं गुरु पिता तूंहै गुरु माता तूं गुरु बंधपु मेरा सखा सखाइ ॥3॥
जो हमरी बिधि होती मेरे सतिगुरा सा बिधि तुम हरि जाणहु आपे ॥
हम रुलते फिरते कोई बात न पूछता गुर सतिगुर संगि कीरे हम थापे ॥
धंनु धंनु गुरू नानक जन केरा जितु मिलिऐ चूके सभि सोग संतापे ॥4॥5॥11॥49॥
कंचन नारी महि जीउ लुभतु है मोहु मीठा माइआ ॥
घर मंदर घोड़े खुसी मनु अन रसि लाइआ ॥
हरि प्रभु चिति न आवई किउ छूटा मेरे हरि राइआ ॥1॥
मेरे राम इह नीच करम हरि मेरे ॥
गुणवंता हरि हरि दइआलु करि किरपा बखसि अवगण सभि मेरे ॥1॥ रहाउ ॥
किछु रूपु नही किछु जाति नाही किछु ढंगु न मेरा ॥
किआ मुहु लै बोलह गुण बिहून नामु जपिआ न तेरा ॥
हम पापी संगि गुर उबरे पुंनु सतिगुर केरा ॥2॥
सभु जीउ पिंडु मुखु नकु दीआ वरतण कउ पाणी ॥
अंनु खाणा कपड़ु पैनणु दीआ रस अनि भोगाणी ॥
जिनि दीए सु चिति न आवई पसू हउ करि जाणी ॥3॥
सभु कीता तेरा वरतदा तूं अंतरजामी ॥
हम जंत विचारे किआ करह सभु खेलु तुम सुआमी ॥
जन नानकु हाटि विहाझिआ हरि गुलम गुलामी ॥4॥6॥12॥50॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “और और रसों की और और स्वादों की जितनी भी तृष्णा (मनुष्य को लगती) है, (ज्यों ज्यों रसों के स्वाद लेते जाते हैं) उतनी ही तृष्णा बारंबार लगती जाती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।