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अंग 165

अंग
165
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥
सतिगुर सेवा सफल है बणी ॥
जितु मिलि हरि नामु धिआइआ हरि धणी ॥
जिन हरि जपिआ तिन पीछै छूटी घणी ॥1॥
गुरसिख हरि बोलहु मेरे भाई ॥
हरि बोलत सभ पाप लहि जाई ॥1॥ रहाउ ॥
जब गुरु मिलिआ तब मनु वसि आइआ ॥
धावत पंच रहे हरि धिआइआ ॥
अनदिनु नगरी हरि गुण गाइआ ॥2॥
सतिगुर पग धूरि जिना मुखि लाई ॥
तिन कूड़ तिआगे हरि लिव लाई ॥
ते हरि दरगह मुख ऊजल भाई ॥3॥
गुर सेवा आपि हरि भावै ॥
क्रिसनु बलभद्रु गुर पग लगि धिआवै ॥
नानक गुरमुखि हरि आपि तरावै ॥4॥5॥43॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ सतिगुरू की शरण (मनुष्य के आत्मिक जीवन के वास्ते) लाभदायक बन जाती है, क्योंकि इस (गुरू शरण) के द्वारा (साध-संगति में) मिल के मालिक प्रभू का नाम सिमरा जा सकता है। जिन मनुष्यों ने (गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम जपा है उनके रास्ते पर चल के बहुत सी दुनिया विकारों से बच जाती है। हे मेरे भाई !गुरू के सिख बन के (गुरू के बताए राह पर चल के) परमात्मा का सिमरन करो। (तभी) प्रभू का नाम सिमरने से हरेक किस्म के पाप (मन से) दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ। जब (मनुष्य को) गुरू मिल जाता है तब (इस का) मन वश में आ जाता है (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का सिमरन करते हुए (मनुष्य ने) पाँचों (ज्ञानेंद्रियां विकारों की तरफ) दौड़ने से हट जाती हैं, और शरीर की मालिक जीवात्मा हर रोज परमात्मा के गुण गाती है। 2। जिन (भाग्यशालियों) ने गुरू के चरणों की धूड़ अपने माथे पर लगा ली, उन्होंने झूठे मोह छोड़ दिए और परमात्मा के चरणों में अपनी सुरति जोड़ ली। परमात्मा की हजूरी में वह मनुष्य सुर्खरू होते हैं। 3। गुरू की शरण (पड़ना) परमात्मा को भी अच्छा लगता है। कृष्ण (भी) गुरू के चरण लग के परमात्मा को सिमरता रहा। बलभद्र भी गुरू के चरण लग के हरि-नाम ध्याता रहा। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उसे परमात्मा खुद (विकारों के संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 4। 5। 43।
गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥
हरि आपे जोगी डंडाधारी ॥
हरि आपे रवि रहिआ बनवारी ॥ हरि आपे तपु तापै लाइ तारी ॥1॥
ऐसा मेरा रामु रहिआ भरपूरि ॥
निकटि वसै नाही हरि दूरि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि आपे सबदु सुरति धुनि आपे ॥
हरि आपे वेखै विगसै आपे ॥
हरि आपि जपाइ आपे हरि जापे ॥2॥
हरि आपे सारिंग अंम्रितधारा ॥
हरि अंम्रितु आपि पीआवणहारा ॥
हरि आपि करे आपे निसतारा ॥3॥
हरि आपे बेड़ी तुलहा तारा ॥
हरि आपे गुरमती निसतारा ॥
हरि आपे नानक पावै पारा ॥4॥6॥44॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ हाथ में डण्डा रखने वाला जोगी भी परमात्मा खुद ही है क्योंकि वह हरी परमात्मा स्वयं ही (हर जगह) व्यापक है (तपियों में व्यापक हो के) हरी खुद ही ताड़ी लगा के तप-साधना कर रहा है। 1। (हे भाई !) मेरा राम ऐसा है कि वह हर जगह मौजूद है। वह (हरेक जीव के) नजदीक बसता है (किसी भी जगह से) वह हरी दूर नहीं। 1। रहाउ। परमात्मा खुद ही शबद है खुद ही सुरति है और खुद ही लगन है। परमात्मा स्वयं ही (सब जीवों में बैठ के जगत-तमाशा) देख रहा है (और, स्वयं ही ये तमाशा देख के) खुश हो रहा है। परमात्मा स्वयं ही (सब में बैठ के अपना नाम) जप रहा है। 2। परमात्मा खुद ही पपीहा है (और खुद ही उस पपीहे के लिए) बरखा की धार है। परमात्मा स्वयं ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस है, और स्वयं ही वह (जीवों को अमृत) पिलाने वाला है। प्रभू स्वयं ही (जगत के जीवों को) पैदा करता है और स्वयं ही (जीवों को संसार समुंद्र से) पार लंघाता है। 3। परमात्मा स्वयं (जीवों के संसार समुंद्र से पार लंघने के लिए) बेड़ी है तुलहा है (पतवार है) और स्वयं ही पार लंघाने वाला है। प्रभू खुद ही गुरू की मति पर चला के विकारों से बचाता है। हे नानक ! परमात्मा स्वयं ही संसार समुंद्र से पार लंघाता है। 4। 6। 44।
गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥
साहु हमारा तूं धणी जैसी तूं रासि देहि तैसी हम लेहि ॥
हरि नामु वणंजह रंग सिउ जे आपि दइआलु होइ देहि ॥1॥
हम वणजारे राम के ॥
हरि वणजु करावै दे रासि रे ॥1॥ रहाउ ॥
लाहा हरि भगति धनु खटिआ हरि सचे साह मनि भाइआ ॥
हरि जपि हरि वखरु लदिआ जमु जागाती नेड़ि न आइआ ॥2॥
होरु वणजु करहि वापारीए अनंत तरंगी दुखु माइआ ॥
ओइ जेहै वणजि हरि लाइआ फलु तेहा तिन पाइआ ॥3॥
हरि हरि वणजु सो जनु करे जिसु क्रिपालु होइ प्रभु देई ॥
जन नानक साहु हरि सेविआ फिरि लेखा मूलि न लेई ॥4॥1॥7॥45॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥ हे प्रभू ! आप हमारा शाह है आप हमारा मालिक है। आप हमें जैसी राशि देता है वैसा सरमाया हम ले लेते हैं। अगर आप स्वयं मेहरवान हैं के (हमें अपने नाम का सरमाया) दे तो हम प्यार से आपके नाम का व्यापार करने लग जाते हैं। 1। हे भाई !हम जीव परमात्मा (शाहूकार) के (भेजे हुए) व्यापारी हैं। वह शाह (अपने नाम की) राशि (सरमाया) दे के (हम जीवों से) व्यापार करवाता है। 1। रहाउ। (जिस जीव वणजारे ने) परमात्मा की भगती की कमाई कमायी है परमात्मा का नाम-धन कमाया है, वह उस सदा कायम रहने वाले शाह प्रभू का प्यारा लगता है। (जिस जीव व्यापारी ने) परमात्मा का नाम जप के परमात्मा के नाम का सौदा फैलाया है, जम- मसूलिया उसके नजदीक भी नहीं फटकता। 2। पर जो जीव वणजारे (प्रभू नाम के बिना) और ही वणज करते हैं, वे माया के मोह की बेअंत लहरों में फंस के दुख सहते हैं। (उनके भी क्या वश?) जिस तरह के व्यापार में परमात्मा ने उन्हें लगा दिया है, वैसा ही फल उन्होंने पा लिया है। 3। परमात्मा के नाम का व्यापार वही मनुष्य करता है जिसे परमात्मा स्वयं मेहरवान हो के देता है। हे दास नानक ! जिस मनुष्य ने (सबके) शाह परमात्मा की सेवा-भक्ति की है, उससे वह शाह-प्रभू कभी भी (उसके वणज-व्यापार का) लेखा नहीं मांगता। 4। 1। 7। 45।
गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥
जिउ जननी गरभु पालती सुत की करि आसा ॥
वडा होइ धनु खाटि देइ करि भोग बिलासा ॥
तिउ हरि जन प्रीति हरि राखदा दे आपि हथासा ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥ जैसे कोई माँ पुत्र (पैदा करने) की आशारख के (नौ महीने अपनी) कोख में पालती है (वह उम्मीद करती है कि मेरा पुत्र) बड़ा हो के धन कमा के हमारे सुख-आनंद के लिए हमें (ला के) देगा। इसी तरह परमात्मा अपने सेवकों की प्रीति को स्वयं अपना हाथ दे कर कायम रखता है। 1।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ सतिगुरू की शरण (मनुष्य के आत्मिक जीवन के वास्ते) लाभदायक बन जाती है, क्योंकि इस (गुरू शरण) के द्वारा (साध-संगति में) मिल के मालिक प्रभू का नाम सिमरा जा सकता ह।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।