सतिगुर सेवा सफल है बणी ॥
जितु मिलि हरि नामु धिआइआ हरि धणी ॥
जिन हरि जपिआ तिन पीछै छूटी घणी ॥1॥
गुरसिख हरि बोलहु मेरे भाई ॥
हरि बोलत सभ पाप लहि जाई ॥1॥ रहाउ ॥
जब गुरु मिलिआ तब मनु वसि आइआ ॥
धावत पंच रहे हरि धिआइआ ॥
अनदिनु नगरी हरि गुण गाइआ ॥2॥
सतिगुर पग धूरि जिना मुखि लाई ॥
तिन कूड़ तिआगे हरि लिव लाई ॥
ते हरि दरगह मुख ऊजल भाई ॥3॥
गुर सेवा आपि हरि भावै ॥
क्रिसनु बलभद्रु गुर पग लगि धिआवै ॥
नानक गुरमुखि हरि आपि तरावै ॥4॥5॥43॥
हरि आपे जोगी डंडाधारी ॥
हरि आपे रवि रहिआ बनवारी ॥ हरि आपे तपु तापै लाइ तारी ॥1॥
ऐसा मेरा रामु रहिआ भरपूरि ॥
निकटि वसै नाही हरि दूरि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि आपे सबदु सुरति धुनि आपे ॥
हरि आपे वेखै विगसै आपे ॥
हरि आपि जपाइ आपे हरि जापे ॥2॥
हरि आपे सारिंग अंम्रितधारा ॥
हरि अंम्रितु आपि पीआवणहारा ॥
हरि आपि करे आपे निसतारा ॥3॥
हरि आपे बेड़ी तुलहा तारा ॥
हरि आपे गुरमती निसतारा ॥
हरि आपे नानक पावै पारा ॥4॥6॥44॥
साहु हमारा तूं धणी जैसी तूं रासि देहि तैसी हम लेहि ॥
हरि नामु वणंजह रंग सिउ जे आपि दइआलु होइ देहि ॥1॥
हम वणजारे राम के ॥
हरि वणजु करावै दे रासि रे ॥1॥ रहाउ ॥
लाहा हरि भगति धनु खटिआ हरि सचे साह मनि भाइआ ॥
हरि जपि हरि वखरु लदिआ जमु जागाती नेड़ि न आइआ ॥2॥
होरु वणजु करहि वापारीए अनंत तरंगी दुखु माइआ ॥
ओइ जेहै वणजि हरि लाइआ फलु तेहा तिन पाइआ ॥3॥
हरि हरि वणजु सो जनु करे जिसु क्रिपालु होइ प्रभु देई ॥
जन नानक साहु हरि सेविआ फिरि लेखा मूलि न लेई ॥4॥1॥7॥45॥
जिउ जननी गरभु पालती सुत की करि आसा ॥
वडा होइ धनु खाटि देइ करि भोग बिलासा ॥
तिउ हरि जन प्रीति हरि राखदा दे आपि हथासा ॥1॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ सतिगुरू की शरण (मनुष्य के आत्मिक जीवन के वास्ते) लाभदायक बन जाती है, क्योंकि इस (गुरू शरण) के द्वारा (साध-संगति में) मिल के मालिक प्रभू का नाम सिमरा जा सकता ह।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।