गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: सन्यासी ने राख मल के अपने शरीर को सवारा हुआ है। उसने पराईस्त्री का त्याग करके ब्रह्मचर्य धारण किया हुआ है। (उसने निरे ब्रह्मचर्य को ही अपने आत्मिक जीवन का सहारा बनाया हुआ है, उसकी निगाहों में मेरे जैसा गृहस्ती मूर्ख है, पर) हे हरी ! मैं मूर्ख को तो आपके नाम का ही आसरा है। 2। (स्मृतियों के धर्म अनुसार) क्षत्रीय (वीरता भरे) काम करता है और शूरवीरता की प्रसिद्धि कमाता है। (वह इसी को जीवन निशाना समझता है), शूद्र दूसरों की सेवा करता है, वैश्य भी (व्यापार आदि) कर्म करता है (शूद्र भी और वैश्य भी अपनी अपनी कृत में मग्न है। पर मैं निरे कर्म को जीवन मनोरथ नहीं मानता, इनकी नजरों में) मैं मूर्ख हूँ (पर मुझे यकीन है कि) परमात्मा का नाम (ही संसार समुंद्र के विकारों से) बचाता है। 3। (पर, हे प्रभू !) ये सारी सृष्टि आपकी रची हुई है। (सब जीवों में) आप स्वयं ही व्यापक है (जो कुछ आप सुझाता है उन्हें वही सूझता है)। हे नानक ! (जिस किसी पर प्रभू मेहर करता है उसे) गुरू की शरण में डाल के (अपने नाम का) आदर बख्शता है। (इन लोगों के लिए मैं अंधा हूँ, पर) पर, मैं अंधे ने परमात्मा के नाम का आसरा लिया हुआ है। 4। 1। 39।
गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ निरगुण कथा कथा है हरि की ॥ भजु मिलि साधू संगति जन की ॥ तरु भउजलु अकथ कथा सुनि हरि की ॥1॥ गोबिंद सतसंगति मेलाइ ॥ हरि रसु रसना राम गुन गाइ ॥1॥ रहाउ ॥ जो जन धिआवहि हरि हरि नामा ॥ तिन दासनि दास करहु हम रामा ॥ जन की सेवा ऊतम कामा ॥2॥ जो हरि की हरि कथा सुणावै ॥ सो जनु हमरै मनि चिति भावै ॥ जन पग रेणु वडभागी पावै ॥3॥ संत जना सिउ प्रीति बनि आई ॥ जिन कउ लिखतु लिखिआ धुरि पाई ॥ ते जन नानक नामि समाई ॥4॥2॥40॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ परमात्मा की सिफत सालाह की बातें तीनों गुणों से ऊपर हैं (दुनिया के लोगों की प्रशंसा की कहानियों से बहुत ऊँची हैं)। (हे भाई !) साधु जनों की संगति में मिल के (उस परमात्मा का) भजन करा कर। उस परमात्मा की सिफत सालाह सुना कर, जिसके गुण बताए नहीं जा सकते (और, सिफत सालाह की बरकति से) संसार समुंद्र से पार गुजर। 1। हे गोबिंद ! (मुझे) साध-संगति का मिलाप बख्श (ताकि मेरी) जीभ हरी नाम का स्वाद ले के हरी गुण गाती रहे। 1। रहाउ। हे हरी ! जो मनुष्य आपका नाम सिमरते हैं, हे राम ! मुझे उनके दासों का दास बना। (आपके) दासों की सेवा (मनुष्य जीवन में सबसे) श्रेष्ठ कर्म है। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य (मुझे) परमात्मा (की सिफत सालाह) की बातें सुनाता है, वह (मुझे) मेरे मन में मेरे चित्त में प्यारा लगता है। (परमात्मा के) भक्त के पैरों की ख़ाक कोई भाग्यशाली मनुष्य ही हासिल करता है। 3। हे नानक ! (प्रभू के) संत जनों से (उन मनुष्यों की) प्रीति निभती है, जिन के माथे पे परमात्मा ने धुर से ही (अपनी दरगाह से अपनी बख्शिश का) लेख लिख दिया हो, वह मनुष्य परमात्मा के नाम में (सदा के लिए) लीनता हासिल कर लेते हैं। 4। 2। 40।
गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ माता प्रीति करे पुतु खाइ ॥ मीने प्रीति भई जलि नाइ ॥ सतिगुर प्रीति गुरसिख मुखि पाइ ॥1॥ ते हरि जन हरि मेलहु हम पिआरे ॥ जिन मिलिआ दुख जाहि हमारे ॥1॥ रहाउ ॥ जिउ मिलि बछरे गऊ प्रीति लगावै ॥ कामनि प्रीति जा पिरु घरि आवै ॥ हरि जन प्रीति जा हरि जसु गावै ॥2॥ सारिंग प्रीति बसै जल धारा ॥ नरपति प्रीति माइआ देखि पसारा ॥ हरि जन प्रीति जपै निरंकारा ॥3॥ नर प्राणी प्रीति माइआ धनु खाटे ॥ गुरसिख प्रीति गुरु मिलै गलाटे ॥ जन नानक प्रीति साध पग चाटे ॥4॥3॥41॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ (हरेक) माँ खुशी मनाती है जब उसका पुत्र (कोई अच्छी चीज) खाता है। पानी में नहा के मछली को प्रसन्नता होती है। गुरू को खुशी मिलती है, जब कोई मनुष्य किसी गुरसिख के मुंह में (भोजन) डालता है (जब कोई किसी गुरसिख की सेवा करता है)। 1। हे हरी ! मुझे अपने वह सेवक मिला, जिनके मिलने से मेरे सारे दुख दूर हो जाएं (और मेरे अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो जाए)। 1। रहाउ। जैसे (अपने) बछड़े को मिल के गाय खुश होती है, जैसे स्त्री को खुशी होती है जब उसका पति घर आता है। (वैसे ही) परमात्मा के सेवक को तभी खुशी मिलती है जब वह परमात्मा की सिफत-सालाह गाता है। 2। पपीहे को खुशी होती है जब (स्वाति नछत्र में) मूसले धार वर्षा होती है, माया का फैलाव देख के (किसी) राजे-पातशाह को खुशी मिलती है। (वैसे ही) प्रभू के दास को खुशी होती है जब वह प्रभू का नाम जपता है। 3। हरेक मनुष्य को खुशी होती है जबवह माया अर्जित करता है धन कमाता है। गुरू के सिख को खुशी (महिसूस) होती है जब उसे उसका गुरू गले लगा के मिलता है। हे नानक ! परमात्मा के सेवक को खुशी होती है जब वह किसी गुरमुखि के पैर चूमता है। 4। 3। 41।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ मंगते को (तब) खुशी होती है (जब उसको किसी घर के) मालिक से भिक्षा मिलती है। भूखे मनुष्य को (तब) खुशी मिलती है (जब वह) अन्न खाता है। (इसी तरह) गुरू के सिख को खुशी होती है जब गुरू को मिल के वह माया की तृष्णा से संतुष्ट होता है। 1। मेरी तमन्ना पूरी कर, और मुझे दर्शन दे हे हरी ! कृपा कर (जीवन के कठिन राह में मुझे) आपकी ही (सहायता की) उम्मीद है । 1। रहाउ। चकवी को खुशी होती है जब उसे सूरज दिखता है (क्योंकि सूरज के चढ़ने पर वह अपने) प्यारे (चकवे) को मिलती है (और विछोड़े के) सारे दुख भुलाती है। गुरसिख को खुशी होती है जब उसे गुरू दिखता है। 2। बछड़े को (अपनी माँ का) दूध मुंह से पी के खुशी होती है, वह (अपनी) माँ को देखता है और दिल में प्रसन्न होता है। (इसी तरह) गुरसिख को गुरू का दर्शन करके खुशी होती है। 3। (गुरू परमात्मा के बिना) और मोह कच्चा है माया की प्रीति सारी नाशवंत है। और मोह नाश हो जाते हैं, झूठे हैं, निरे काँच से कच्चे हैं। हे दास नानक ! जिसे सच्चा गुरू मिलता है उसे (असल) खुशी होती है (क्योंकि उसे गुरू के मिलने से) संतोष प्राप्त होता है। 4। 4। 42।
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सन्यासी ने राख मल के अपने शरीर को सवारा हुआ है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।