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गउड़ी
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संनिआसी बिभूत लाइ देह सवारी ॥
संनिआसी बिभूत लाइ देह सवारी ॥
पर त्रिअ तिआगु करी ब्रहमचारी ॥
मै मूरख हरि आस तुमारी ॥2॥
खत्री करम करे सूरतणु पावै ॥
सूदु वैसु पर किरति कमावै ॥
मै मूरख हरि नामु छडावै ॥3॥
सभ तेरी स्रिसटि तूं आपि रहिआ समाई ॥
गुरमुखि नानक दे वडिआई ॥
मै अंधुले हरि टेक टिकाई ॥4॥1॥39॥
पर त्रिअ तिआगु करी ब्रहमचारी ॥
मै मूरख हरि आस तुमारी ॥2॥
खत्री करम करे सूरतणु पावै ॥
सूदु वैसु पर किरति कमावै ॥
मै मूरख हरि नामु छडावै ॥3॥
सभ तेरी स्रिसटि तूं आपि रहिआ समाई ॥
गुरमुखि नानक दे वडिआई ॥
मै अंधुले हरि टेक टिकाई ॥4॥1॥39॥
हिन्दी अर्थ: सन्यासी ने राख मल के अपने शरीर को सवारा हुआ है। उसने पराईस्त्री का त्याग करके ब्रह्मचर्य धारण किया हुआ है। (उसने निरे ब्रह्मचर्य को ही अपने आत्मिक जीवन का सहारा बनाया हुआ है, उसकी निगाहों में मेरे जैसा गृहस्ती मूर्ख है, पर) हे हरी ! मैं मूर्ख को तो आपके नाम का ही आसरा है। 2। (स्मृतियों के धर्म अनुसार) क्षत्रीय (वीरता भरे) काम करता है और शूरवीरता की प्रसिद्धि कमाता है। (वह इसी को जीवन निशाना समझता है), शूद्र दूसरों की सेवा करता है, वैश्य भी (व्यापार आदि) कर्म करता है (शूद्र भी और वैश्य भी अपनी अपनी कृत में मग्न है। पर मैं निरे कर्म को जीवन मनोरथ नहीं मानता, इनकी नजरों में) मैं मूर्ख हूँ (पर मुझे यकीन है कि) परमात्मा का नाम (ही संसार समुंद्र के विकारों से) बचाता है। 3। (पर, हे प्रभू !) ये सारी सृष्टि आपकी रची हुई है। (सब जीवों में) आप स्वयं ही व्यापक हैं (जो कुछ आप सुझाते हैं उन्हें वही सूझता है)। हे नानक ! (जिस किसी पर प्रभू मेहर करता है उसे) गुरू की शरण में डाल के (अपने नाम का) आदर बख्शता है। (इन लोगों के लिए मैं अंधा हूँ, पर) पर, मैं अंधे ने परमात्मा के नाम का आसरा लिया हुआ है। 4। 1। 39।
निरगुण कथा कथा है हरि की ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥
निरगुण कथा कथा है हरि की ॥
भजु मिलि साधू संगति जन की ॥
तरु भउजलु अकथ कथा सुनि हरि की ॥1॥
गोबिंद सतसंगति मेलाइ ॥
हरि रसु रसना राम गुन गाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जो जन धिआवहि हरि हरि नामा ॥
तिन दासनि दास करहु हम रामा ॥
जन की सेवा ऊतम कामा ॥2॥
जो हरि की हरि कथा सुणावै ॥
सो जनु हमरै मनि चिति भावै ॥
जन पग रेणु वडभागी पावै ॥3॥
संत जना सिउ प्रीति बनि आई ॥ जिन कउ लिखतु लिखिआ धुरि पाई ॥
ते जन नानक नामि समाई ॥4॥2॥40॥
निरगुण कथा कथा है हरि की ॥
भजु मिलि साधू संगति जन की ॥
तरु भउजलु अकथ कथा सुनि हरि की ॥1॥
गोबिंद सतसंगति मेलाइ ॥
हरि रसु रसना राम गुन गाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जो जन धिआवहि हरि हरि नामा ॥
तिन दासनि दास करहु हम रामा ॥
जन की सेवा ऊतम कामा ॥2॥
जो हरि की हरि कथा सुणावै ॥
सो जनु हमरै मनि चिति भावै ॥
जन पग रेणु वडभागी पावै ॥3॥
संत जना सिउ प्रीति बनि आई ॥ जिन कउ लिखतु लिखिआ धुरि पाई ॥
ते जन नानक नामि समाई ॥4॥2॥40॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ परमात्मा की सिफत सालाह की बातें तीनों गुणों से ऊपर हैं (दुनिया के लोगों की प्रशंसा की कहानियों से बहुत ऊँची हैं)। (हे भाई !) साधु जनों की संगति में मिल के (उस परमात्मा का) भजन करा कर। उस परमात्मा की सिफत सालाह सुना कर, जिसके गुण बताए नहीं जा सकते (और, सिफत सालाह की बरकति से) संसार समुंद्र से पार गुजर। 1। हे गोबिंद ! (मुझे) साध-संगति का मिलाप बख्श (ताकि मेरी) जीभ हरी नाम का स्वाद ले के हरी गुण गाती रहे। 1। रहाउ। हे हरी ! जो मनुष्य आपका नाम सिमरते हैं, हे राम ! मुझे उनके दासों का दास बना। (आपके) दासों की सेवा (मनुष्य जीवन में सबसे) श्रेष्ठ कर्म है। 2। (हे भाई !) जो मनुष्य (मुझे) परमात्मा (की सिफत सालाह) की बातें सुनाता है, वह (मुझे) मेरे मन में मेरे चित्त में प्यारा लगता है। (परमात्मा के) भक्त के पैरों की ख़ाक कोई भाग्यशाली मनुष्य ही हासिल करता है। 3। हे नानक ! (प्रभू के) संत जनों से (उन मनुष्यों की) प्रीति निभती है, जिन के माथे पे परमात्मा ने धुर से ही (अपनी दरगाह से अपनी बख्शिश का) लेख लिख दिया हो, वह मनुष्य परमात्मा के नाम में (सदा के लिए) लीनता हासिल कर लेते हैं। 4। 2। 40।
माता प्रीति करे पुतु खाइ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥
माता प्रीति करे पुतु खाइ ॥
मीने प्रीति भई जलि नाइ ॥
सतिगुर प्रीति गुरसिख मुखि पाइ ॥1॥
ते हरि जन हरि मेलहु हम पिआरे ॥
जिन मिलिआ दुख जाहि हमारे ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ मिलि बछरे गऊ प्रीति लगावै ॥
कामनि प्रीति जा पिरु घरि आवै ॥
हरि जन प्रीति जा हरि जसु गावै ॥2॥
सारिंग प्रीति बसै जल धारा ॥
नरपति प्रीति माइआ देखि पसारा ॥
हरि जन प्रीति जपै निरंकारा ॥3॥
नर प्राणी प्रीति माइआ धनु खाटे ॥
गुरसिख प्रीति गुरु मिलै गलाटे ॥
जन नानक प्रीति साध पग चाटे ॥4॥3॥41॥
माता प्रीति करे पुतु खाइ ॥
मीने प्रीति भई जलि नाइ ॥
सतिगुर प्रीति गुरसिख मुखि पाइ ॥1॥
ते हरि जन हरि मेलहु हम पिआरे ॥
जिन मिलिआ दुख जाहि हमारे ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ मिलि बछरे गऊ प्रीति लगावै ॥
कामनि प्रीति जा पिरु घरि आवै ॥
हरि जन प्रीति जा हरि जसु गावै ॥2॥
सारिंग प्रीति बसै जल धारा ॥
नरपति प्रीति माइआ देखि पसारा ॥
हरि जन प्रीति जपै निरंकारा ॥3॥
नर प्राणी प्रीति माइआ धनु खाटे ॥
गुरसिख प्रीति गुरु मिलै गलाटे ॥
जन नानक प्रीति साध पग चाटे ॥4॥3॥41॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ (हरेक) माँ खुशी मनाती है जब उसका पुत्र (कोई अच्छी चीज) खाता है। पानी में नहा के मछली को प्रसन्नता होती है। गुरू को खुशी मिलती है, जब कोई मनुष्य किसी गुरसिख के मुंह में (भोजन) डालता है (जब कोई किसी गुरसिख की सेवा करता है)। 1। हे हरी ! मुझे अपने वह सेवक मिला, जिनके मिलने से मेरे सारे दुख दूर हो जाएं (और मेरे अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो जाए)। 1। रहाउ। जैसे (अपने) बछड़े को मिल के गाय खुश होती है, जैसे स्त्री को खुशी होती है जब उसका पति घर आता है। (वैसे ही) परमात्मा के सेवक को तभी खुशी मिलती है जब वह परमात्मा की सिफत-सालाह गाता है। 2। पपीहे को खुशी होती है जब (स्वाति नछत्र में) मूसले धार वर्षा होती है, माया का फैलाव देख के (किसी) राजे-पातशाह को खुशी मिलती है। (वैसे ही) प्रभू के दास को खुशी होती है जब वह प्रभू का नाम जपता है। 3। हरेक मनुष्य को खुशी होती है जबवह माया अर्जित करता है धन कमाता है। गुरू के सिख को खुशी (महिसूस) होती है जब उसे उसका गुरू गले लगा के मिलता है। हे नानक ! परमात्मा के सेवक को खुशी होती है जब वह किसी गुरमुखि के पैर चूमता है। 4। 3। 41।
भीखक प्रीति भीख प्रभ पाइ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥
भीखक प्रीति भीख प्रभ पाइ ॥
भूखे प्रीति होवै अंनु खाइ ॥
गुरसिख प्रीति गुर मिलि आघाइ ॥1॥
हरि दरसनु देहु हरि आस तुमारी ॥
करि किरपा लोच पूरि हमारी ॥1॥ रहाउ ॥
चकवी प्रीति सूरजु मुखि लागै ॥
मिलै पिआरे सभ दुख तिआगै ॥
गुरसिख प्रीति गुरू मुखि लागै ॥2॥
बछरे प्रीति खीरु मुखि खाइ ॥
हिरदै बिगसै देखै माइ ॥
गुरसिख प्रीति गुरू मुखि लाइ ॥3॥
होरु सभ प्रीति माइआ मोहु काचा ॥
बिनसि जाइ कूरा कचु पाचा ॥
जन नानक प्रीति त्रिपति गुरु साचा ॥4॥4॥42॥
भीखक प्रीति भीख प्रभ पाइ ॥
भूखे प्रीति होवै अंनु खाइ ॥
गुरसिख प्रीति गुर मिलि आघाइ ॥1॥
हरि दरसनु देहु हरि आस तुमारी ॥
करि किरपा लोच पूरि हमारी ॥1॥ रहाउ ॥
चकवी प्रीति सूरजु मुखि लागै ॥
मिलै पिआरे सभ दुख तिआगै ॥
गुरसिख प्रीति गुरू मुखि लागै ॥2॥
बछरे प्रीति खीरु मुखि खाइ ॥
हिरदै बिगसै देखै माइ ॥
गुरसिख प्रीति गुरू मुखि लाइ ॥3॥
होरु सभ प्रीति माइआ मोहु काचा ॥
बिनसि जाइ कूरा कचु पाचा ॥
जन नानक प्रीति त्रिपति गुरु साचा ॥4॥4॥42॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 ॥ मंगते को (तब) खुशी होती है (जब उसको किसी घर के) मालिक से भिक्षा मिलती है। भूखे मनुष्य को (तब) खुशी मिलती है (जब वह) अन्न खाता है। (इसी तरह) गुरू के सिख को खुशी होती है जब गुरू को मिल के वह माया की तृष्णा से संतुष्ट होता है। 1। मेरी तमन्ना पूरी कर, और मुझे दर्शन दे हे हरी ! कृपा कर (जीवन के कठिन राह में मुझे) आपकी ही (सहायता की) उम्मीद है । 1। रहाउ। चकवी को खुशी होती है जब उसे सूरज दिखता है (क्योंकि सूरज के चढ़ने पर वह अपने) प्यारे (चकवे) को मिलती है (और विछोड़े के) सारे दुख भुलाती है। गुरसिख को खुशी होती है जब उसे गुरू दिखता है। 2। बछड़े को (अपनी माँ का) दूध मुंह से पी के खुशी होती है, वह (अपनी) माँ को देखता है और दिल में प्रसन्न होता है। (इसी तरह) गुरसिख को गुरू का दर्शन करके खुशी होती है। 3। (गुरू परमात्मा के बिना) और मोह कच्चा है माया की प्रीति सारी नाशवंत है। और मोह नाश हो जाते हैं, झूठे हैं, निरे काँच से कच्चे हैं। हे दास नानक ! जिसे सच्चा गुरू मिलता है उसे (असल) खुशी होती है (क्योंकि उसे गुरू के मिलने से) संतोष प्राप्त होता है। 4। 4। 42।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 164 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।