आपे ही प्रभु देहि मति हरि नामु धिआईऐ ॥ वडभागी सतिगुरु मिलै मुखि अंम्रितु पाईऐ ॥ हउमै दुबिधा बिनसि जाइ सहजे सुखि समाईऐ ॥ सभु आपे आपि वरतदा आपे नाइ लाईऐ ॥2॥ मनमुखि गरबि न पाइओ अगिआन इआणे ॥ सतिगुर सेवा ना करहि फिरि फिरि पछुताणे ॥ गरभ जोनी वासु पाइदे गरभे गलि जाणे ॥ मेरे करते एवै भावदा मनमुख भरमाणे ॥3॥ मेरै हरि प्रभि लेखु लिखाइआ धुरि मसतकि पूरा ॥ हरि हरि नामु धिआइआ भेटिआ गुरु सूरा ॥ मेरा पिता माता हरि नामु है हरि बंधपु बीरा ॥ हरि हरि बखसि मिलाइ प्रभ जनु नानकु कीरा ॥4॥3॥17॥37॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: (हे परमात्मा !) आप स्वयं ही (सब जीवों का) मालिक है। जिस जीव को आप स्वयं ही मति देता है, उसीसे हरि नाम सिमरा जा सकता है। जिस मनुष्य को बड़े भाग्यों से गुरू मिल जाता है, उसके मुँह में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पड़ता है। उस मनुष्य के अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। उसकी मानसिक डाँवाडोल दशा समाप्त हो जाती है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह आत्मिक आनंद में मगन रहता है। (हे भाई !) हर जगह प्रभू स्वयं ही स्वयं मौजूद है। वह स्वयं ही जीवों कोअपने नाम में जोड़ता है। 2। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ज्ञान से हीन होते हैं (जीवन जुगति से) अंजान होते हैं। वे अहंकार में रहते हैं उन्हें परमात्मा का मेल नहीं होता। वे (अपने गुमान में रह के) सतिगुरू की शरण नहीं पड़ते (गलत रास्ते पर पड़ के) बार बार पछताते रहते हैं। वे मनुष्य जनम मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। इस चक्कर में उनका आत्मिक जीवन गल जाता है। मेरे करतार को यही अच्छा लगता है कि अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में भटकते रहें। 3। (जिस भाग्यशाली मनुष्य के) माथे पे मेरे हरि प्रभू ने अपनी धुर दरगाह से (बख्शिश का) अटॅल लेख लिख दिया, उसे (सब विकारों से हाथ दे के बचाने वाला) शूरवीर गुरू मिल जाता है, (गुरू की कृपा से) वह सदा परमात्मा का नाम सिमरता है। (हे भाई !) परमात्मा का नाम ही मेरा पिता है नाम ही मेरी माँ है। परमात्मा (का नाम) ही मेरा संबंधी है मेरा भाई है। (मैं सदा परमात्मा के दर पर ही आरजू करता हूँ कि) हे प्रभू ! हे हरी ! ये नानक आपका निमाणा दास है, इस पे बख्शिश कर और इसे (अपने चरणों में) जोड़े रख !4। 3। 17। 37।
गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥ सतिगुर ते गिआनु पाइआ हरि ततु बीचारा ॥ मति मलीण परगटु भई जपि नामु मुरारा ॥ सिवि सकति मिटाईआ चूका अंधिआरा ॥ धुरि मसतकि जिन कउ लिखिआ तिन हरि नामु पिआरा ॥1॥ हरि कितु बिधि पाईऐ संत जनहु जिसु देखि हउ जीवा ॥ हरि बिनु चसा न जीवती गुर मेलिहु हरि रसु पीवा ॥1॥ रहाउ ॥ हउ हरि गुण गावा नित हरि सुणी हरि हरि गति कीनी ॥ हरि रसु गुर ते पाइआ मेरा मनु तनु लीनी ॥ धनु धनु गुरु सत पुरखु है जिनि भगति हरि दीनी ॥ जिसु गुर ते हरि पाइआ सो गुरु हम कीनी ॥2॥ गुणदाता हरि राइ है हम अवगणिआरे ॥ पापी पाथर डूबदे गुरमति हरि तारे ॥ तूं गुणदाता निरमला हम अवगणिआरे ॥ हरि सरणागति राखि लेहु मूड़ मुगध निसतारे ॥3॥ सहजु अनंदु सदा गुरमती हरि हरि मनि धिआइआ ॥ सजणु हरि प्रभु पाइआ घरि सोहिला गाइआ ॥ हरि दइआ धारि प्रभ बेनती हरि हरि चेताइआ ॥ जन नानकु मंगै धूड़ि तिन जिन सतिगुरु पाइआ ॥4॥4॥18॥38॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥ जिन मनुष्यों ने गुरू से (परमात्मा के साथ) गहरी सांझ (डालनी) सीख ली, (जगत के) मूल परमात्मा (के गुणों) को विचारना (सीख लिया)। परमात्मा का नाम सिमर सिमर के उनकी मति (जो पहले विकारों के कारण) मैली (हुई पड़ी थी) निखर उठी। कल्याण-स्वरूप परमात्मा ने (उनके अंदर से) माया का (प्रभाव) मिटा दिया, (उनके अंदर से माया के मोह का) अंधेरा दूर हो गया। (पर) परमात्मा का नाम उन्हें ही प्यारा लगता है जिनके माथे पे धुर से ही (खुद परमात्मा ने अपने नाम की दाति का लेख) लिख दिया। 1। हे संत जनो ! जिस परमात्मा का दर्शन करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है (बताओ) उसे किस तरीके से मिला जा सकता है? उस प्रभू से बिछुड़ के मैं रत्ती भर समय के लिए भी (आत्मिक जीवन) जी नहीं सकती। (हे संत जनों !) मुझे गुरू (से) मिलाओ (ता कि गुरू की कृपा से) मैं परमात्मा के नाम का रस पी सकूँ। 1। रहाउ। (हे संत जनों ! प्यारे गुरू की मेहर से) मैं नित्य परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ। मैं नित्य परमात्मा का नाम सुनता रहता हूँ। उस परमात्मा ने मुझे ऊँची आत्मिक अवस्था बख्श दी है। गुरू के द्वारा मैंने परमात्मा के नाम का स्वाद हासिल किया है, (अब) मेरा मन मेरा तन (उस स्वाद में) मगन रहता है। (हे संत जनो !) जिस गुरू ने (मुझे) परमात्मा की भक्ति (की दाति) दी है (मेरे वास्ते तो वह) सत्पुरख गुरू (सदा ही) सलाहने योग्य है। जिस गुरू के द्वारा मैंने परमात्मा का नाम प्राप्त किया है उस गुरू को मैंने अपना बना लिया है। 2। (हे भाई !सारे जगत का) शहनशाह परमात्मा (सब जीवों को सब) गुणों की दाति देने वाला है। हम (जीव) अवगुणों से भरे रहते हैं। (जैसे) पत्थर (पानी में डूब जाते हैं, वैसे ही हम) पापी (जीव विकारों के समुंद्र में) डूबे रहते हैं। परमात्मा (हमें) गुरू की मति दे कर (उस समुंद्र से) पार लंघाता है। हे प्रभू ! आप पवित्र स्वरूप है। आप गुण बख्शने वाला है। हम जीव अवगुणों से भरे पड़े हैं। हे हरी ! हम आपकी शरण आए हैं, (हमें अवगुणों से) बचा ले। (हम) मूर्खों को महामूर्खों को (विकारों के समुंद्र में से) पार लंघा ले। 3। जिन मनुष्यों ने परमात्मा को (अपने) मन में (सदा) सिमरा है, वे गुरू की मति पर चल कर सदैव आत्मिक अडोलता में रहते हैं, (आत्मिक) आनंद लेते हैं। जिन्हें हरी प्रभू सज्जन मिल जाता है, वह अपने हृदय घर मेंपरमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहते हैं। हे हरी ! हे प्रभू ! मिहर कर, (मेरी) विनती (सुन)। (मुझे) अपने नाम का सिमरन दे। (हे प्रभू ! आपका) दास नानक (आपके दर से) उन मनुष्यों के चरणों की धूड़ मांगता है जिन्हें (आपकी मेहर से) गुरू मिल गया है। 4। 4। 18। 38।
गउड़ी गुआरेरी महला 4 चउथा चउपदे ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ पंडितु सासत सिम्रिति पड़िआ ॥ जोगी गोरखु गोरखु करिआ ॥ मै मूरख हरि हरि जपु पड़िआ ॥1॥ ना जाना किआ गति राम हमारी ॥ हरि भजु मन मेरे तरु भउजलु तू तारी ॥1॥ रहाउ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 4 चउथा चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। पण्डित शास्त्र-स्मृतियां (आदि धर्म पुस्तकें) पढ़ता है (और इस विद्ववता का गुमान करता है। जोगी (अपने गुरू) गोरख (के नाम का जाप) करता है (और उसकी बताई समाधियों को आत्मिक जीवन की टेक बनाए बैठा है), पर, मुझ मूर्ख ने (पंडितों और जोगियों के हिसाब से मूर्ख ने) परमात्मा के नाम का जप करना ही (अपने गुरू से) सीखा है। 1। हे मेरे राम ! (किसी को धर्म-विद्या का गुरूर, किसी को समाधियों का सहारा, पर) मुझे समझ नहीं आती (कि अगर मैं आपका नाम भुला दूँ तो) मेरी कैसी आत्मिक दशा हैं जाएगी। (हे राम ! मैं तो अपने मन को यही समझाता हूँ) हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सिमर (और) संसार समुंद्र से पार लांघ जा, (परमात्मा का नाम ही संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए) बेड़ी है। 1। रहाउ।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे परमात्मा !) आप स्वयं ही (सब जीवों का) मालिक है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।