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अंग 162

अंग
162
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक नामि रते निहकेवल निरबाणी ॥4॥13॥33॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू के नाम में रंगे जाते हैं, उनका जीवन पवित्र हो जाता है, वे वासना रहित हो जाते हैं। 4। 13। 33।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
सतिगुरु मिलै वडभागि संजोग ॥
हिरदै नामु नित हरि रस भोग ॥1॥
गुरमुखि प्राणी नामु हरि धिआइ ॥
जनमु जीति लाहा नामु पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु गुर सबदु है मीठा ॥
गुर किरपा ते किनै विरलै चखि डीठा ॥2॥
करम कांड बहु करहि अचार ॥
बिनु नावै ध्रिगु ध्रिगु अहंकार ॥3॥
बंधनि बाधिओ माइआ फास ॥
जन नानक छूटै गुर परगास ॥4॥14॥34॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ जिस मनुष्य को बड़ी किस्मत से भले संजोगों से गुरू मिल जाता है, उसके दिल में परमात्मा का नाम बस जाता है।वह सदा परमात्मा के नाम रस का आनंद लेता है। 1। जो प्राणी गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरता रहता है, वह मानस जनम की बाजी जीत के (जाता है, और) परमात्मा के नाम-धन की कमाई कमा लेता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य को सत्गुरू का शबद मीठा लगता है, गुरू का शबद ही (उसके वास्ते) धर्म-चर्चा है (गुरू शबद ही उस वास्ते) समाधि है। पर किसी विरले भाग्यशाली मनुष्य ने गुरू की कृपा से (गुरू के मीठे शबद का रस) चख के देखा है। 2। जो लोग (जनम, जनेऊ, विवाह, किरिया आदिक समय शास्त्रों के अनुसार माने हुए) धार्मिक कर्म करते हैं व अन्य अनेको धार्मिक रस्में करते हैं, पर परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं (ये कर्मकाण्ड उनके अंदर) अहंकार (पैदा करता है और उनका जीवन) धिक्कारयोग्य ही (रहता है)। 3। हे दास नानक ! (परमात्मा से विछुड़ा मनुष्य) माया की फांसी में, माया के बंधन में बंधा रहता है (ये तभी इस बंधन से) आजाद होता है जब गुरू (के शबद) का प्रकाश (उसे प्राप्त होता) है। 4। 14। 34।
महला 3 गउड़ी बैरागणि ॥
जैसी धरती ऊपरिमेघुला बरसतु है किआ धरती मधे पाणी नाही ॥
जैसे धरती मधे पाणी परगासिआ बिनु पगा वरसत फिराही ॥1॥
बाबा तूं ऐसे भरमु चुकाही ॥
जो किछु करतु है सोई कोई है रे तैसे जाइ समाही ॥1॥ रहाउ ॥
इसतरी पुरख होइ कै किआ ओइ करम कमाही ॥
नाना रूप सदा हहि तेरे तुझ ही माहि समाही ॥2॥
इतने जनम भूलि परे से जा पाइआ ता भूले नाही ॥
जा का कारजु सोई परु जाणै जे गुर कै सबदि समाही ॥3॥
तेरा सबदु तूंहै हहि आपे भरमु कहाही ॥
नानक ततु तत सिउ मिलिआ पुनरपि जनमि न आही ॥4॥1॥15॥35॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3 गउड़ी बैरागणि ॥ (धरती और बादल का दृष्टांत ले के देख) जैसी धरती है वैसा ही ऊपर का बादल है, जो बरखा करता है। धरती में भी (वैसा ही) पानी है (जैसा बादलों में है)। (कूआँ खोदने से) जैसे धरती में से पानी निकल आता है वैसे ही बादल भी (पानी की) बरखा करते फिरते हैं। (जीवात्मा व परमात्मा में भी ऐसा ही फर्क समझो जैसे धरती के पानी और बादलों के पानी का है। पानी एक ही वही पानी है। जीव चाहे माया में फंसा हुआ है चाहे ऊँची उड़ाने भर रहा है, है एक ही परमात्मा का अंश)। 1। क्या स्त्री, क्या मर्द – आपसे आकी हैं के कोई कुछ नहीं कर सकते। (ये सब सि्त्रयां और मर्द) सदा आपके ही अलग अलग रूप हैं, और आखिर में आपके में ही समां जाते हैं। 2। (परमात्मा की याद से) भूल के जीव अनेकों जन्मों में पड़े रहते हैं। जब परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब गलत रास्ते से हट जाते हैं। यदि जीव गुरू के शबद में टिके रहें तो ये समझ आ जाती है कि जिस परमात्मा का ये जगत बनाया हुआ है, वही इसे अच्छी तरह समझता है। 3। (हे प्रभू !हर जगह) आपका (ही) हुकम (बरत रहा) है। (हर जगह) आप खुद ही (मौजूद) है – (जिस मनुष्य के अंदर ये निश्चय बन जाए, उसे) भुलेखा कहां रह जाता है? हे नानक ! (जिन मनुष्यों के अंदर से अनेकता का भुलेखा दूर हो जाता है, उनकी सुरति परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है जैसे, हवा, पानी आदि हरेक) तत्व (अपने) तत्व से मिल जाता है। ऐसे मनुष्य मुड़-मुड़ के जन्मों में नहीं आते। 4। 1। 15। 35।
गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥
सभु जगु कालै वसि है बाधा दूजै भाइ ॥
हउमै करम कमावदे मनमुखि मिलै सजाइ ॥1॥
मेरे मन गुर चरणी चितु लाइ ॥
गुरमुखि नामु निधानु लै दरगह लए छडाइ ॥1॥ रहाउ ॥
लख चउरासीह भरमदे मनहठि आवै जाइ ॥
गुर का सबदु न चीनिओ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥2॥
गुरमुखि आपु पछाणिआ हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥
अनदिनु भगती रतिआ हरि नामे सुखि समाइ ॥3॥
मनु सबदि मरै परतीति होइ हउमै तजे विकार ॥
जन नानक करमी पाईअनि हरि नामा भगति भंडार ॥4॥2॥16॥36॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥ (जब तक) ये जगत माया के मोह में बंधा रहता है (तब तक ये) सारा जगत आत्मिक मौत के काबू में आया रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (सारे) काम अहंकार के आसरे करते हैं और उन्हें (आत्मिक मौत की ही) सजा मिलती है। 1। हे मेरे मन ! गुरू के चरणों में सुरति जोड़। गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम खजाना इकट्ठा कर ले। (ये तूझे) परमात्मा की हजूरी में (आपके किए कर्मों का लेखा करने के समय) सुर्खरू करेगा। 1। रहाउ। (माया के मोह में बंधे हुए जीव) चौरासी लाख जोनियों में फिरते रहते हैं। अपने मन के हठ के कारण (माया के मोह में फंसा जीव) जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। जो मनुष्य गुरू के शबद (की कद्र) को नहीं समझता वह मुड़ मुड़ जोनियों में पड़ता है। 2। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहके आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है, उसके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। हर रोज परमात्मा की भगती (के रंग में) रंगा रहने के कारण वह परमात्मा के नाम में लीन रहता है वह आत्मिक आनंद में टिका रहता है। 3। जिस मनुष्य का मन गुरू के शबद में जुड़ने के कारण स्वै-भाव की ओर से मर जाता है, उसकी (गुरू के शबद में) श्रद्धा बन जाती है और वह अपने अंदर से अहंकार (आदि) विकार त्यागता है। हे दास नानक ! परमात्मा के नाम के खजाने, परमात्मा की भगती के खजाने, परमात्मा की मेहर से ही मिलते हैं। 4। 2। 16। 36।
गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥
पेईअड़ै दिन चारि है हरि हरि लिखि पाइआ ॥
सोभावंती नारि है गुरमुखि गुण गाइआ ॥
पेवकड़ै गुण संमलै साहुरै वासु पाइआ ॥
गुरमुखि सहजि समाणीआ हरि हरि मनि भाइआ ॥1॥
ससुरै पेईऐ पिरु वसै कहु कितु बिधि पाईऐ ॥
आपि निरंजनु अलखु है आपे मेलाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 3 ॥ परमात्मा ने (हरेक जीव के माथे पे यही लेख) लिख के रख दिए हैं कि हरेक को इस लोक में रहने के वास्ते थोड़े ही दिन मिले हुए हैं (फिर भी सब जीव माया के मोह में फंसे रहते हैं)। वह जीव स्त्री (लोक परलोक में) शोभा कमाती है, जो गुरू की शरण पड़ के परमात्मा के गुण गाती है। जो जीव-स्त्री इस पिता के घर में रहने के समय परमात्मा के गुण अपने दिल में संभालती है उसे परलोक में (प्रभू की हजूरी में) आदर मिल जाता है। गुरू के सन्मुख रहके वह जीवस्त्री (सदा) आत्मिक अडोलता में लीन रहती है। परमात्मा (का नाम) उसे अपने मन में प्यारा लगता है। 1। (हे सत्संगी ! हे बहिन !) बता, वह पति प्रभू किस ढंग से मिल सकता है जो इस लोक में और परलोक में (हर जगह) बसता है? (हे जिज्ञासु जीव स्त्री !) वह प्रभू पति (हर जगह पर मौजूद होते हुए भी) माया के प्रभाव से परे है, और अदृश्य भी है। वह स्वयं ही अपना मेल कराता है। 1। रहाउ।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू के नाम में रंगे जाते हैं, उनका जीवन पवित्र हो जाता है, वे वासना रहित हो जाते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।