Lulla Family

अंग 159

अंग
159
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भगति करहि मूरख आपु जणावहि ॥
नचि नचि टपहि बहुतु दुखु पावहि ॥
नचिऐ टपिऐ भगति न होइ ॥
सबदि मरै भगति पाए जनु सोइ ॥3॥
भगति वछलु भगति कराए सोइ ॥
सची भगति विचहु आपु खोइ ॥
मेरा प्रभु साचा सभ बिधि जाणै ॥
नानक बखसे नामु पछाणै ॥4॥4॥24॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मूर्ख लोग रास डालते हैं और अपने आप को भक्त जतलाते हैं, (वे मूर्ख रास डालने के वक्त) नाच नाच के कूदते हैं (पर अंतरात्मे अहंकार के कारण आत्मिक आनंद की जगह) दुख ही दुख पाते हैं। नाचने-कूदने से भक्ति नहीं होती। परमात्मा की भक्ति वही मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो गुरू के शबद में जुड़ के (स्वैभाव, अहम् से) स्वयं को मार लेता है। 3। भक्तवत्सल प्रभु स्वयं ही भक्तों से अपनी भक्ति करवाता है। अपने अन्तर्मन में से अहंकार को नाश करना ही सच्ची भक्ति है। (पर जीवों के भी क्या बस?) भक्ति से प्यार करने वाला वह परमात्मा सब जीवों के ढंग जानता है (कि ये भक्ति करते हैं या पाखण्ड)। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करता है वह मनुष्य उसके नाम को पहचानता है (नाम के साथ) गहरी सांझ डाल लेता है। 4। 4। 24।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
मनु मारे धातु मरि जाइ ॥
बिनु मूए कैसे हरि पाइ ॥
मनु मरै दारू जाणै कोइ ॥
मनु सबदि मरै बूझै जनु सोइ ॥1॥
जिस नो बखसे दे वडिआई ॥
गुर परसादि हरि वसै मनि आई ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि करणी कार कमावै ॥
ता इसु मन की सोझी पावै ॥
मनु मै मतु मैगल मिकदारा ॥
गुरु अंकसु मारि जीवालणहारा ॥2॥
मनु असाधु साधै जनु कोइ ॥
अचरु चरै ता निरमलु होइ ॥
गुरमुखि इहु मनु लइआ सवारि ॥
हउमै विचहु तजे विकार ॥3॥
जो धुरि राखिअनु मेलि मिलाइ ॥
कदे न विछुड़हि सबदि समाइ ॥
आपणी कला आपे ही जाणै ॥
नानक गुरमुखि नामु पछाणै ॥4॥5॥25॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ (गुरू की शरण पड़ के जो मनुष्य अपने) मन को काबू कर लेता है, उस मनुष्य की (माया वाली) भटकन समाप्त हो जाती है। मन वश में आए बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। उसी मनुष्य का मन बस में आता है, जो इसे वश में लाने की दवा जानता है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है) वही समझता है कि मन गुरू के शबद में जुड़ने से ही वश में आ सकता है। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य पे परमात्मा मेहर करता है उसे (ये) आदर देता है (कि) गुरू की कृपा से वह प्रभू उसके मन में आ बसता है। 1। रहाउ। जब मनुष्य गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों वाला आचरण बनाने की कार करता है, तब उसको इस मन (के स्वभाव) की समझ आ जाती है, (तब वह समझ लेता है कि) मन अहम् में मस्त रहता है जैसे कोई हाथी शराब में मस्त हो। गुरू ही (आत्मिक मौत मरे हुए इस मन को अपने शबद का) अंकुश मार के (पुनः) आत्मिक जीवन देने के समर्थ है। 2। (ये) मन (आसानी से) वश में नहीं आ सकता। कोई विरला मनुष्य (गुरू की शरण पड़ के इसे) वश में लाता है। जग मनुष्य (गुरू की सहायता से अपने मन के) अमोड़ पने को खत्म कर लेता है, तब मन पवित्र हो जाता है। गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य इस मन को सुंदर बना लेता है। वह (अपने अंदर से) अहंकार त्याग के विकारों को छोड़ देता है। 3। जिन मनुष्यों को परमात्मा ने अपनी धुर दरगाह से ही गुरू के चरणों में जोड़ के (विकारों से) बचा लिया है, वह गुरू के शबद में लीन रह के कभी उस परमात्मा से विछड़ते नहीं। हे नानक ! परमात्मा अपनी ये असीम ताकत खुद ही जानता है। (ये बात प्रत्यक्ष है कि) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह परमात्मा के नाम को पहचान लेता है (नाम के साथ गहरी सांझ बना लेता है)। 4। 5। 25।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
हउमै विचि सभु जगु बउराना ॥
दूजै भाइ भरमि भुलाना ॥
बहु चिंता चितवै आपु न पछाना ॥
धंधा करतिआ अनदिनु विहाना ॥1॥
हिरदै रामु रमहु मेरे भाई ॥
गुरमुखि रसना हरि रसन रसाई ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि हिरदै जिनि रामु पछाता ॥
जगजीवनु सेवि जुग चारे जाता ॥
हउमै मारि गुर सबदि पछाता ॥
क्रिपा करे प्रभ करम बिधाता ॥2॥
से जन सचे जो गुर सबदि मिलाए ॥
धावत वरजे ठाकि रहाए ॥
नामु नव निधि गुर ते पाए ॥
हरि किरपा ते हरि वसै मनि आए ॥3॥
राम राम करतिआ सुखु सांति सरीर ॥
अंतरि वसै न लागै जम पीर ॥
आपे साहिबु आपि वजीर ॥
नानक सेवि सदा हरि गुणी गहीर ॥4॥6॥26॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ (हे भाई ! प्रभू नाम से वंचित हो के) अहंकार में (फस के) सारा जगत झल्ला (बउरा) हो रहा है, माया के मोह के कारण भटकना में पड़ के गलत रास्ते पे जा रहा है। और ही कई प्रकार की सोचें सोचता रहता है पर अपने आत्मिक जीवन को नहीं पड़तालता। (इस तरह) माया की खातिर दौड़-भाग करते हुए (मायाधारी जीव का) हरेक दिन बीत रहा है। 1। हे मेरे भाई !अपने हृदय में परमात्मा का नाम सिमरता रह। गुरू की शरण पड़ के अपनी जीभ को परमात्मा के नाम रस से रसीली बना। 1। रहाउ। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर अपने हृदय में परमात्मा के साथ जान पहिचान बना ली, वह मनुष्य जगत की जिंदगी के आसरे परमात्मा की सेवा भक्ति करके सदा के लिए प्रगट हो जाता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के साथ) सांझ डाल लेता है (जीवों के किए) कर्मों अनुसार (जीवों को) पैदा करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य पर कृपा करता है । 2। जिन मनुष्यों को परमात्मा गुरू के शबद से जोड़ता है, जिनको माया के पीछै दौड़ने से वर्जता है और रोक के रखता है, वे मनुष्य परमातमा का रूप हो जाते हैं। वे मनुष्य गुरू से परमात्मा का नाम हासिल कर लेते हैं जो उनके वास्ते (जैसे, धरती के) नौ ही खजाने हैं। अपनी मेहर से परमात्मा उनके मन में आ बसता है। 3। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरने से शरीर को आनंद मिलता है शांति मिलती है। जिस मनुष्य के अंदर (हरि-नाम) आ बसता है, उसे जम का दुख छू नहीं सकता। हे नानक ! जो परमात्मा खुद जगत का मालिक है और खुद ही (जगत की पालना आदि करने में) सलाह देने वाला है। जो सारे गुणों का मालिक है जो बड़े जिगरे वाला है, आप सदा उसकी सेवा-भक्ति कर। 4। 6। 26।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
सो किउ विसरै जिस के जीअ पराना ॥
सो किउ विसरै सभ माहि समाना ॥
जितु सेविऐ दरगह पति परवाना ॥1॥
हरि के नाम विटहु बलि जाउ ॥
तूं विसरहि तदि ही मरि जाउ ॥1॥ रहाउ ॥
तिन तूं विसरहि जि तुधु आपि भुलाए ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ (हे भाई !) जिस परमात्मा के दिए हुए ये जिंद-प्राण हैं जो परमात्मा सब जीवों में व्यापक है, जिसकी सेवा-भक्ति करने से उसकी दरगाह में आदर मिलता है, दरगाह में कबूल हो जाते हैं, उसे कभी भी (मन से) भुलाना नहीं चाहिए। 1। मैं परमात्मा के नाम से (सदा) सदके जाता हूँ। (हे प्रभू !) जब आप मुझे बिसर जाता है, उस वक्त मेरी आत्मिक मौत हो जाती है। 1। रहाउ। (हे प्रभू !) जिन लोगों को तूने खुद ही गलत रास्ते पर डाल दिया है,

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मूर्ख लोग रास डालते हैं और अपने आप को भक्त जतलाते हैं, (वे मूर्ख रास डालने के वक्त) नाच नाच के कूदते हैं (पर अंतरात्मे अहंकार के कारण आत्मिक आनंद की जगह) दुख ही दुख पाते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।