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अंग 158

अंग
158
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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मनि निरमलि वसै सचु सोइ ॥
साचि वसिऐ साची सभ कार ॥
ऊतम करणी सबद बीचार ॥3॥
गुर ते साची सेवा होइ ॥
गुरमुखि नामु पछाणै कोइ ॥
जीवै दाता देवणहारु ॥
नानक हरि नामे लगै पिआरु ॥4॥1॥21॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य के) पवित्र (हुए) मन में वह सदा स्थिर प्रभू प्रगट हो जाता है। अगर सदा स्थिर प्रभू (जीव के मन में) आ बसे, तो सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह उसकी नित्य की कृत हो जाती है। उसकी करणी श्रेष्ठ हो जाती है। गुरू के शबद की विचार उसके मन में टिकी रहती है। 3। सदा स्थिर प्रभू की सेवा-भक्ति गुरू से ही मिलती है। गुरू के सन्मुख रहके ही कोई मनुष्य प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल सकता है। (उसे निश्चय हो जाता है कि सब दातें) देने के समर्थ दातार प्रभू (सदा उसके सिर पर) जीता जागता कायम है हे नानक ! जिस मनुष्य का प्यार हरी के नाम में बन जाता है। 4। 1। 21।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
गुर ते गिआनु पाए जनु कोइ ॥
गुर ते बूझै सीझै सोइ ॥
गुर ते सहजु साचु बीचारु ॥
गुर ते पाए मुकति दुआरु ॥1॥
पूरै भागि मिलै गुरु आइ ॥
साचै सहजि साचि समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरि मिलिऐ त्रिसना अगनि बुझाए ॥
गुर ते सांति वसै मनि आए ॥
गुर ते पवित पावन सुचि होइ ॥
गुर ते सबदि मिलावा होइ ॥2॥
बाझु गुरू सभ भरमि भुलाई ॥
बिनु नावै बहुता दुखु पाई ॥
गुरमुखि होवै सु नामु धिआई ॥
दरसनि सचै सची पति होई ॥3॥
किस नो कहीऐ दाता इकु सोई ॥
किरपा करे सबदि मिलावा होई ॥
मिलि प्रीतम साचे गुण गावा ॥
नानक साचे साचि समावा ॥4॥2॥22॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ कोई (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू के द्वारा परमात्मा से गहरी सांझ हासिल करता है। जो मनुष्य गुरू से ये राज समझ लेता है वह (जीवन के खेल में) कामयाब हो जाता है। वह मनुष्य गुरू से स्थायित्व वाली आत्मिक अडोलता प्राप्त कर लेता है। सदा स्थिर (के गुणों) की विचार हासिल कर लेता है वह मनुष्य गुरू की सहायता से (विकारों से) मुक्ति (हासिल करने) का दरवाजा ढूँढ लेता है। 1। जिस मनुष्य को पूरी किस्मत से गुरू आ के मिल जाता है, वह सदा स्थिर रहने वाली आत्मिक अडोलता में टिका रहता है वह सदा स्थिर प्रभू में लीन हो जाता है। 1। रहाउ। अगर गुरू मिल जाए तो (मनुष्य अपने अंदर से) तृष्णा की आग बुझा लेता है। गुरू के द्वारा ही (मनुष्य के) मन में शांति आ बसती है। गुरू के द्वारा ही आत्मिक पवित्रता व आत्मिक स्वच्छता मिलती है। गुरू के द्वारा ही गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा से मिलाप होता है। 2। गुरू के बिना सारी लुकाई भटकी हुई कुमार्ग पर पड़ी रहती है (और प्रभू के नाम से वंचित रहती है), प्रभू के नाम के बिना (संसार) बहुत दुख नपाता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह परमात्मा का नाम सिमरता है। परमात्मा के दर्शन में लीन होने से सदा स्थिर प्रभू में टिकने से उसे सदा स्थिर रहने वाला मान सम्मान प्राप्त हो जाता है। 3। (पर, हे भाई !प्रभू नाम की इस दाति के वास्ते प्रभू के बिना और) किससे बिनती की जाए? सिर्फ परमात्मा ही ये दाति देने के स्मर्थ है। जिस मनुष्य पे वह मेहर करता है गुरू के शबद के द्वारा उसका प्रभू के साथ मिलाप हो जाता है। नानक (की भी यही प्रार्थना है कि) प्रीतम गुरू को मिल के मैं (भी) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण गाता रहूँ, और सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन रहूँ। 4। 2। 22।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
सु थाउ सचु मनु निरमलु होइ ॥
सचि निवासु करे सचु सोइ ॥
सची बाणी जुग चारे जापै ॥
सभु किछु साचा आपे आपै ॥1॥
करमु होवै सतसंगि मिलाए ॥
हरि गुण गावै बैसि सु थाए ॥1॥ रहाउ ॥
जलउ इह जिहवा दूजै भाइ ॥
हरि रसु न चाखै फीका आलाइ ॥
बिनु बूझे तनु मनु फीका होइ ॥
बिनु नावै दुखीआ चलिआ रोइ ॥2॥
रसना हरि रसु चाखिआ सहजि सुभाइ ॥ गुर किरपा ते सचि समाइ ॥
साचे राती गुर सबदु वीचार ॥
अंम्रितु पीवै निरमल धार ॥3॥
नामि समावै जो भाडा होइ ॥
ऊंधै भांडै टिकै न कोइ ॥
गुर सबदी मनि नामि निवासु ॥
नानक सचु भांडा जिसु सबद पिआस ॥4॥3॥23॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ वह (सत्संग) स्थान, सच्चा स्थान है, (वहां बैठने से मनुष्य का) मन पवित्र हो जाता है। सदा स्थिर प्रभू में (मनुष्य का मन) निवास करता है (सत्संग की बरकति से मनुष्य) सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है। (सत्संग में रहके) सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी की बरकति से मनुष्य चारों युगों में प्रसिद्ध हो जाता है। (उसे यकीन हो जाता है कि) ये सारा आकार सदा स्थिर प्रभू खुद ही अपने आप से बनाने वाला है (स्वयंभू या सैभं)। 1। (जिस मनुष्य पर परमात्मा की) कृपा हैं (उसे वह) सत्संग में मिलाता है, उस जगह पर वह मनुष्य बैठ के परमात्मा के गुण गाता है। 1। रहाउ। जल जाए ये जीभ अगर ये और और स्वादों में ही रहती है।उल्टा (निंदा आदि के) फीके बोल ही बोलती है। परमातमा के नाम का स्वाद समझे बिना मनुष्य का मन फीका (प्रेम से विहीन) हो जाता है। शरीर भी फीका हो जाता है (भाव, ज्ञानेंद्रियां भी दुनिया के होछे पदार्थों की तरफ दौड़ने के आदी हो जाते हैं)। नाम से विहीन मनुष्य दुखी जीवन व्यतीत करता है, दुखी हो के ही आखिर यहां से चला जाता है। 2। (जिस मनुष्य की) जीभ ने हरि नाम का स्वाद चखा है, वह आत्मिक अडोलता में, प्रभू प्रेम में मगन रहता है। गुरू की मेहर से वह सदा स्थिर प्रभू (सिफत सालाह) में रंगी रहती है। गुरू का शबद ही उसकी विचार बना रहता है। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस पीता है, नाम जल की पवित्र धार पीता है। 3। (गुरू की कृपा से) जो हृदय शुद्ध हो जाता है, वह प्रभू के नाम में ही लीन रहता है। परमात्मा की ओर से पलटे हुए हृदय में कोई गुण नहीं टिकता। गुरू के शबद की बरकति से मनुष्य के मन में परमात्मा के नाम का निवास हो जाता है। हे नानक ! उस मनुष्य का हृदस असल हृदय है जिसे परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी की तांघ लगी रहती है। 4। 3। 23।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
इकि गावत रहे मनि सादु न पाइ ॥
हउमै विचि गावहि बिरथा जाइ ॥
गावणि गावहि जिन नाम पिआरु ॥
साची बाणी सबद बीचारु ॥1॥
गावत रहै जे सतिगुर भावै ॥
मनु तनु राता नामि सुहावै ॥1॥ रहाउ ॥
इकि गावहि इकि भगति करेहि ॥
नामु न पावहि बिनु असनेह ॥
सची भगति गुर सबद पिआरि ॥
अपना पिरु राखिआ सदा उरि धारि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ कई मनुष्य ऐसे हैं जो (भक्ति के गीत) गाते (तो) रहते हैं (पर उनके) मन में कोई आनंद पैदा नहीं होता (क्योंकि वे अपने भक्त होने के) अहंकार में (भक्ति के गीत) गाते हैं (उनका ये उद्यम) व्यर्थ चला जाता है। (सिफत सालाह के गीत) असल में वह मनुष्य गाते हैं, जिनका परमात्मा के नाम से प्यार है, जो सदा प्रभू की सिफत सालाह की बाणी का, शबद का विचार (अपने हृदय में टिकाते हैं)। 1। अगर गुरू को ठीक लगे (अगर गुरू मेहर करे तो उसकी मेहर सदका उसकी शरण आया मनुष्य) परमात्मा के गुण गाता रहता है। उसका मन उसका तन प्रभू के नाम में रंगा जाता है और उसका जीवन सुंदर बन जाता है। 1। रहाउ। कई मनुष्य ऐसे हैं जो (भक्ति के गीत) गाते हैं और रास करते हैं, पर प्रभू के चरणों में प्यार के बिना उन्हें परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं होता। उनकी ही भक्ति परवान होती है, जो गुरू के शबद के प्यार में जुड़े रहते हैं, जिन्होंने अपने प्रभू पति को सदा अपने हृदय में टिका के रखा हुआ है। 2।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मनुष्य के) पवित्र (हुए) मन में वह सदा स्थिर प्रभू प्रगट हो जाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।