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अंग 160

अंग
160
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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तिन तूं विसरहि जि दूजै भाए ॥
मनमुख अगिआनी जोनी पाए ॥2॥
जिन इक मनि तुठा से सतिगुर सेवा लाए ॥ जिन इक मनि तुठा तिन हरि मंनि वसाए ॥
गुरमती हरि नामि समाए ॥3॥
जिना पोतै पुंनु से गिआन बीचारी ॥
जिना पोतै पुंनु तिन हउमै मारी ॥
नानक जो नामि रते तिन कउ बलिहारी ॥4॥7॥27॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: जो (सदा) माया के मोह में ही (फसे रहते हैं) उनके मन से आप बिसर जाता है। उन अपने मन के पीछे चलने वाले ज्ञानहीन लोगों को आप जूनों में डाल देता है। 2। (हे भाई !) जिन मनुष्यों पर परमात्मा खास ध्यान से प्रसंन्न होता है, उन्हें वह गुरू की सेवा में जोड़ता है। उनके मन में परमात्मा (अपना आप) बसा देता है। वह मनुष्य गुरू की मति पर चल कर परमात्मा के नाम में (सदा) लीन रहते हैं। 3। (हे भाई !) जिन मनुष्यों के सौभाग्य होते हैं, वही मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालते है। वही श्रेष्ठ विचार के मालिक बनते हैं। वह (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर लेते हैं। हे नानक ! (कह) मैं उन मनुष्यों से सदा सदके हूँ, जो परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे रहते हैं। 4। 7। 27।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
तूं अकथु किउ कथिआ जाहि ॥
गुर सबदु मारणु मन माहि समाहि ॥
तेरे गुण अनेक कीमति नह पाहि ॥1॥
जिस की बाणी तिसु माहि समाणी ॥
तेरी अकथ कथा गुर सबदि वखाणी ॥1॥ रहाउ ॥
जह सतिगुरु तह सतसंगति बणाई ॥
जह सतिगुरु सहजे हरि गुण गाई ॥
जह सतिगुरु तहा हउमै सबदि जलाई ॥2॥
गुरमुखि सेवा महली थाउ पाए ॥
गुरमुखि अंतरि हरि नामु वसाए ॥
गुरमुखि भगति हरि नामि समाए ॥3॥
आपे दाति करे दातारु ॥
पूरे सतिगुर सिउ लगै पिआरु ॥
नानक नामि रते तिन कउ जैकारु ॥4॥8॥28॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ हे प्रभू ! आप कथन से परे है। आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। जिस मनुष्य के पास गुरू का शबद रूपी मसाला है (उसने अपने मन को मार लिया है, उसके) मन में आप आ बसता है। हे प्रभू ! आपके अनेकों ही गुण हैं, जीव आपके गुणों का मूल्य नहीं पा सकते। 1। ये सिफत सालाह जिस (परमात्मा) की है उस (परमात्मा) में (ही) लीन रहती है। (भाव, जैसे परमात्मा बेअंत है वैसे ही उसकी सिफत सालाह भी बेअंत है, वैसे ही परमात्मा के गुण भी बेअंत हैं)। हे प्रभू ! आपके गुणों की कहानी बयान नहीं हैं सकती। गुरू के शबद ने यही बात बताई है। 1। रहाउ। जिस हृदय में सतिगुरू बसता है वहां सत्संगति बन जाती है (क्यूँकि) जिस मनुष्य के हृदय में गुरू बसता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के हरी के गुण गाता है। जिस दिल में गुरू बसता है, उसमें से गुरू के शबद ने अहंकार जला दिया है। 2। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा की सेवा-भक्ति करके परमात्मा की हजूरी में स्थान प्राप्त कर लेता है। गुरू के सन्मुख रहके मनुष्य अपने अंदर परमात्मा का नाम बसा लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू-भक्ति की बरकत से प्रभू के नाम में (सदा) लीन रहता है। 3। दातें देने वाला समर्थ परमात्मा खुद ही (जिस मनुष्य को सिफत सालाह की) दाति देता है उसका प्यार पूरे गुरू से बन जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे रहते हैं, उनको (लोक-परलोक में) वडिआई मिलती है (आदर मिलता है)। 4। 8। 28।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
एकसु ते सभि रूप हहि रंगा ॥
पउणु पाणी बैसंतरु सभि सहलंगा ॥
भिंन भिंन वेखै हरि प्रभु रंगा ॥1॥
एकु अचरजु एको है सोई ॥
गुरमुखि वीचारे विरला कोई ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि भवै प्रभु सभनी थाई ॥
कहा गुपतु प्रगटु प्रभि बणत बणाई ॥
आपे सुतिआ देइ जगाई ॥2॥
तिस की कीमति किनै न होई ॥
कहि कहि कथनु कहै सभु कोई ॥
गुर सबदि समावै बूझै हरि सोई ॥3॥
सुणि सुणि वेखै सबदि मिलाए ॥
वडी वडिआई गुर सेवा ते पाए ॥
नानक नामि रते हरि नामि समाए ॥4॥9॥29॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ (संसार में दिखते ये) सारे (विभिन्न) रूप और रंग उस परमात्मा से ही बने हैं। उस एक से ही हवा पैदा हुई है पानी बना है आग पैदा हुई है और ये सारे (तत्व अलग अलग रूप रंग वाले सब जीवों में) मिले हुए हैं। वह परमातमा (स्वयं ही) विभिन्न रंगों (वाले जीवों) की संभाल करता है। 1। ये एक आश्चर्यजनक चमत्कार है कि परमात्मा स्वयं ही (इस बहुरंगी संसार में हर जगह) मौजूद है। कोई विरला मनुष्य ही गुरू की शरण पड़ के (इस आश्चर्यजनक चमत्कार को) विचारता है। 1। रहाउ। (अपनी) आत्मिक अडोलता में (टिका हुआ ही वह) परमात्मा सभी जगहों व्यापक हो रहा है। कहीं वह गुप्त है कहीं प्रत्यक्ष है। ये सारा जगत खेल प्रभू ने खुद ही बनाया है। (माया के मोह की नींद में) सोए हुए जीव को वह परमात्मा खुद ही जगा देता है। 2। किसी जीव द्वारा उसका मोल नहीं पड़ सकता पर, हरेक जीव (अपनी ओर से परमात्मा के गुण) कह कह के (उन गुणों का) वर्णन करता है हां, जो मनुष्य सत्गुरू के शबद में जुड़ता है, वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 3। (इस बहुरंगी संसार का मालिक परमात्मा हरेक जीव की आरजू) सुन सुन के (हरेक की) संभाल करता है। (और अरदास सुन के ही जीव को) गुरू के शबद में जोड़ता है। (गुरू-शबद में जुड़ा मनुष्य) गुरू की बताई हुई सेवा से (लोक परलोक में) बहुत आदर मान प्राप्त करता है। हे नानक ! (गुरू के शबद की बरकति से ही अनेकों जीव) परमात्मा के नाम (रंग) में रंगे जाते हैं, परमात्मा के नाम में लीन हो जाते हैं। 4। 9। 29।
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
मनमुखि सूता माइआ मोहि पिआरि ॥
गुरमुखि जागे गुण गिआन बीचारि ॥
से जन जागे जिन नाम पिआरि ॥1॥
सहजे जागै सवै न कोइ ॥
पूरे गुर ते बूझै जनु कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
असंतु अनाड़ी कदे न बूझै ॥
कथनी करे तै माइआ नालि लूझै ॥
अंधु अगिआनी कदे न सीझै ॥2॥
इसु जुग महि राम नामि निसतारा ॥
विरला को पाए गुर सबदि वीचारा ॥
आपि तरै सगले कुल उधारा ॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में माया के प्यार में (आत्मिक जीवन की ओर से) गाफिल हुआ रहता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा के गुणों के साथ जान पहिचान की विचार में (टिक के माया की तरफ से) सुचेत रहता है। जिस मनुष्य का परमात्मा के नाम में प्यार पड़ जाता है, वह मनुष्य (माया के मोह से) सुचेत रहते हैं। 1। वह आत्मिक अडोलता में टिक के (माया के हमलों की ओर से) सुचेत रहता है। वह माया के मोह की नींद में नहीं फंसता जो कोई (भाग्यशाली मनुष्य) पूरे गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त करता है। 1। रहाउ। विकारी मनुष्य, विकारों की ओर अड़ी करने वाले बेसमझ मनुष्य कभी आत्मिक जीवन की समझ प्राप्त नहीं कर सकते। वह ज्ञान की बातें (भी) करते रहते हैं, माया में भी खचित रहते हैं। (ऐसे माया के मोह में) अंधे व ज्ञान हीन मनुष्य (जिंदगी की बाजी में) कभी कामयाब नहीं होते। 2। इस मनुष्य जनम में आ के परमात्मा के नाम के द्वारा ही (संसार समुंद्र से) पार उतारा हो सकता है। कोई विरला मनुष्य ही गुरू के शबद में जुड़ के ये विचारता है। ऐसा मनुष्य खुद (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है, अपने सारे कुलों को भी पार लंघा लेता है। 3।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो (सदा) माया के मोह में ही (फसे रहते हैं) उनके मन से आप बिसर जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।