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गउड़ी
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· शबद · राग गउड़ी
तिन तूं विसरहि जि दूजै भाए ॥
तिन तूं विसरहि जि दूजै भाए ॥
मनमुख अगिआनी जोनी पाए ॥2॥
जिन इक मनि तुठा से सतिगुर सेवा लाए ॥ जिन इक मनि तुठा तिन हरि मंनि वसाए ॥
गुरमती हरि नामि समाए ॥3॥
जिना पोतै पुंनु से गिआन बीचारी ॥
जिना पोतै पुंनु तिन हउमै मारी ॥
नानक जो नामि रते तिन कउ बलिहारी ॥4॥7॥27॥
मनमुख अगिआनी जोनी पाए ॥2॥
जिन इक मनि तुठा से सतिगुर सेवा लाए ॥ जिन इक मनि तुठा तिन हरि मंनि वसाए ॥
गुरमती हरि नामि समाए ॥3॥
जिना पोतै पुंनु से गिआन बीचारी ॥
जिना पोतै पुंनु तिन हउमै मारी ॥
नानक जो नामि रते तिन कउ बलिहारी ॥4॥7॥27॥
हिन्दी अर्थ: जो (सदा) माया के मोह में ही (फसे रहते हैं) उनके मन से आप बिसर जाते हैं। उन अपने मन के पीछे चलने वाले ज्ञानहीन लोगों को आप जूनों में डाल देते हैं। 2। (हे भाई !) जिन मनुष्यों पर परमात्मा खास ध्यान से प्रसंन्न होता है, उन्हें वह गुरू की सेवा में जोड़ता है। उनके मन में परमात्मा (अपना आप) बसा देता है। वह मनुष्य गुरू की मति पर चल कर परमात्मा के नाम में (सदा) लीन रहते हैं। 3। (हे भाई !) जिन मनुष्यों के सौभाग्य होते हैं, वही मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालते है। वही श्रेष्ठ विचार के मालिक बनते हैं। वह (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर लेते हैं। हे नानक ! (कह) मैं उन मनुष्यों से सदा सदके हूँ, जो परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे रहते हैं। 4। 7। 27।
· शबद · राग गउड़ी
तूं अकथु किउ कथिआ जाहि ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
तूं अकथु किउ कथिआ जाहि ॥
गुर सबदु मारणु मन माहि समाहि ॥
तेरे गुण अनेक कीमति नह पाहि ॥1॥
जिस की बाणी तिसु माहि समाणी ॥
तेरी अकथ कथा गुर सबदि वखाणी ॥1॥ रहाउ ॥
जह सतिगुरु तह सतसंगति बणाई ॥
जह सतिगुरु सहजे हरि गुण गाई ॥
जह सतिगुरु तहा हउमै सबदि जलाई ॥2॥
गुरमुखि सेवा महली थाउ पाए ॥
गुरमुखि अंतरि हरि नामु वसाए ॥
गुरमुखि भगति हरि नामि समाए ॥3॥
आपे दाति करे दातारु ॥
पूरे सतिगुर सिउ लगै पिआरु ॥
नानक नामि रते तिन कउ जैकारु ॥4॥8॥28॥
तूं अकथु किउ कथिआ जाहि ॥
गुर सबदु मारणु मन माहि समाहि ॥
तेरे गुण अनेक कीमति नह पाहि ॥1॥
जिस की बाणी तिसु माहि समाणी ॥
तेरी अकथ कथा गुर सबदि वखाणी ॥1॥ रहाउ ॥
जह सतिगुरु तह सतसंगति बणाई ॥
जह सतिगुरु सहजे हरि गुण गाई ॥
जह सतिगुरु तहा हउमै सबदि जलाई ॥2॥
गुरमुखि सेवा महली थाउ पाए ॥
गुरमुखि अंतरि हरि नामु वसाए ॥
गुरमुखि भगति हरि नामि समाए ॥3॥
आपे दाति करे दातारु ॥
पूरे सतिगुर सिउ लगै पिआरु ॥
नानक नामि रते तिन कउ जैकारु ॥4॥8॥28॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ हे प्रभू ! आप कथन से परे हैं। आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। जिस मनुष्य के पास गुरू का शबद रूपी मसाला है (उसने अपने मन को मार लिया है, उसके) मन में आप आ बसते हैं। हे प्रभू ! आपके अनेकों ही गुण हैं, जीव आपके गुणों का मूल्य नहीं पा सकते। 1। ये सिफत सालाह जिस (परमात्मा) की है उस (परमात्मा) में (ही) लीन रहती है। (भाव, जैसे परमात्मा बेअंत है वैसे ही उसकी सिफत सालाह भी बेअंत है, वैसे ही परमात्मा के गुण भी बेअंत हैं)। हे प्रभू ! आपके गुणों की कहानी बयान नहीं हो सकती। गुरू के शबद ने यही बात बताई है। 1। रहाउ। जिस हृदय में सतिगुरू बसता है वहां सत्संगति बन जाती है (क्यूँकि) जिस मनुष्य के हृदय में गुरू बसता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के हरी के गुण गाता है। जिस दिल में गुरू बसता है, उसमें से गुरू के शबद ने अहंकार जला दिया है। 2। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा की सेवा-भक्ति करके परमात्मा की हजूरी में स्थान प्राप्त कर लेता है। गुरू के सन्मुख रहके मनुष्य अपने अंदर परमात्मा का नाम बसा लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू-भक्ति की बरकत से प्रभू के नाम में (सदा) लीन रहता है। 3। दातें देने वाला समर्थ परमात्मा खुद ही (जिस मनुष्य को सिफत सालाह की) दाति देता है उसका प्यार पूरे गुरू से बन जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे रहते हैं, उनको (लोक-परलोक में) वडिआई मिलती है (आदर मिलता है)। 4। 8। 28।
· शबद · राग गउड़ी
एकसु ते सभि रूप हहि रंगा ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
एकसु ते सभि रूप हहि रंगा ॥
पउणु पाणी बैसंतरु सभि सहलंगा ॥
भिंन भिंन वेखै हरि प्रभु रंगा ॥1॥
एकु अचरजु एको है सोई ॥
गुरमुखि वीचारे विरला कोई ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि भवै प्रभु सभनी थाई ॥
कहा गुपतु प्रगटु प्रभि बणत बणाई ॥
आपे सुतिआ देइ जगाई ॥2॥
तिस की कीमति किनै न होई ॥
कहि कहि कथनु कहै सभु कोई ॥
गुर सबदि समावै बूझै हरि सोई ॥3॥
सुणि सुणि वेखै सबदि मिलाए ॥
वडी वडिआई गुर सेवा ते पाए ॥
नानक नामि रते हरि नामि समाए ॥4॥9॥29॥
एकसु ते सभि रूप हहि रंगा ॥
पउणु पाणी बैसंतरु सभि सहलंगा ॥
भिंन भिंन वेखै हरि प्रभु रंगा ॥1॥
एकु अचरजु एको है सोई ॥
गुरमुखि वीचारे विरला कोई ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि भवै प्रभु सभनी थाई ॥
कहा गुपतु प्रगटु प्रभि बणत बणाई ॥
आपे सुतिआ देइ जगाई ॥2॥
तिस की कीमति किनै न होई ॥
कहि कहि कथनु कहै सभु कोई ॥
गुर सबदि समावै बूझै हरि सोई ॥3॥
सुणि सुणि वेखै सबदि मिलाए ॥
वडी वडिआई गुर सेवा ते पाए ॥
नानक नामि रते हरि नामि समाए ॥4॥9॥29॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ (संसार में दिखते ये) सारे (विभिन्न) रूप और रंग उस परमात्मा से ही बने हैं। उस एक से ही हवा पैदा हुई है पानी बना है आग पैदा हुई है और ये सारे (तत्व अलग अलग रूप रंग वाले सब जीवों में) मिले हुए हैं। वह परमातमा (स्वयं ही) विभिन्न रंगों (वाले जीवों) की संभाल करता है। 1। ये एक आश्चर्यजनक चमत्कार है कि परमात्मा स्वयं ही (इस बहुरंगी संसार में हर जगह) मौजूद है। कोई विरला मनुष्य ही गुरू की शरण पड़ के (इस आश्चर्यजनक चमत्कार को) विचारता है। 1। रहाउ। (अपनी) आत्मिक अडोलता में (टिका हुआ ही वह) परमात्मा सभी जगहों व्यापक हो रहा है। कहीं वह गुप्त है कहीं प्रत्यक्ष है। ये सारा जगत खेल प्रभू ने खुद ही बनाया है। (माया के मोह की नींद में) सोए हुए जीव को वह परमात्मा खुद ही जगा देता है। 2। किसी जीव द्वारा उसका मोल नहीं पड़ सकता पर, हरेक जीव (अपनी ओर से परमात्मा के गुण) कह कह के (उन गुणों का) वर्णन करता है हां, जो मनुष्य सत्गुरू के शबद में जुड़ता है, वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 3। (इस बहुरंगी संसार का मालिक परमात्मा हरेक जीव की आरजू) सुन सुन के (हरेक की) संभाल करता है। (और अरदास सुन के ही जीव को) गुरू के शबद में जोड़ता है। (गुरू-शबद में जुड़ा मनुष्य) गुरू की बताई हुई सेवा से (लोक परलोक में) बहुत आदर मान प्राप्त करता है। हे नानक ! (गुरू के शबद की बरकति से ही अनेकों जीव) परमात्मा के नाम (रंग) में रंगे जाते हैं, परमात्मा के नाम में लीन हो जाते हैं। 4। 9। 29।
· शबद · राग गउड़ी
मनमुखि सूता माइआ मोहि पिआरि ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥
मनमुखि सूता माइआ मोहि पिआरि ॥
गुरमुखि जागे गुण गिआन बीचारि ॥
से जन जागे जिन नाम पिआरि ॥1॥
सहजे जागै सवै न कोइ ॥
पूरे गुर ते बूझै जनु कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
असंतु अनाड़ी कदे न बूझै ॥
कथनी करे तै माइआ नालि लूझै ॥
अंधु अगिआनी कदे न सीझै ॥2॥
इसु जुग महि राम नामि निसतारा ॥
विरला को पाए गुर सबदि वीचारा ॥
आपि तरै सगले कुल उधारा ॥3॥
मनमुखि सूता माइआ मोहि पिआरि ॥
गुरमुखि जागे गुण गिआन बीचारि ॥
से जन जागे जिन नाम पिआरि ॥1॥
सहजे जागै सवै न कोइ ॥
पूरे गुर ते बूझै जनु कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
असंतु अनाड़ी कदे न बूझै ॥
कथनी करे तै माइआ नालि लूझै ॥
अंधु अगिआनी कदे न सीझै ॥2॥
इसु जुग महि राम नामि निसतारा ॥
विरला को पाए गुर सबदि वीचारा ॥
आपि तरै सगले कुल उधारा ॥3॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 3 ॥ अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में माया के प्यार में (आत्मिक जीवन की ओर से) गाफिल हुआ रहता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा के गुणों के साथ जान पहिचान की विचार में (टिक के माया की तरफ से) सुचेत रहता है। जिस मनुष्य का परमात्मा के नाम में प्यार पड़ जाता है, वह मनुष्य (माया के मोह से) सुचेत रहते हैं। 1। वह आत्मिक अडोलता में टिक के (माया के हमलों की ओर से) सुचेत रहता है। वह माया के मोह की नींद में नहीं फंसता जो कोई (भाग्यशाली मनुष्य) पूरे गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त करता है। 1। रहाउ। विकारी मनुष्य, विकारों की ओर अड़ी करने वाले बेसमझ मनुष्य कभी आत्मिक जीवन की समझ प्राप्त नहीं कर सकते। वह ज्ञान की बातें (भी) करते रहते हैं, माया में भी खचित रहते हैं। (ऐसे माया के मोह में) अंधे व ज्ञान हीन मनुष्य (जिंदगी की बाजी में) कभी कामयाब नहीं होते। 2। इस मनुष्य जनम में आ के परमात्मा के नाम के द्वारा ही (संसार समुंद्र से) पार उतारा हो सकता है। कोई विरला मनुष्य ही गुरू के शबद में जुड़ के ये विचारता है। ऐसा मनुष्य खुद (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है, अपने सारे कुलों को भी पार लंघा लेता है। 3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 160 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।