Lulla Family

अंग 157

अंग
157
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करमा उपरि निबड़ै जे लोचै सभु कोइ ॥3॥
नानक करणा जिनि कीआ सोई सार करेइ ॥
हुकमु न जापी खसम का किसै वडाई देइ ॥4॥1॥18॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: हलांकि, यद्यपि हरेक मनुष्य (सिर्फ जबानी जबानी) नाम धन की लालसा करे, पर ये हरेक जीव के अमलों पर फैसला होता है (कि किस को प्राप्ति होगी। सो, निरा दुनिया की खातर ना भटको)। 3। हे नानक ! (उद्यम करते हुए भी हक नहीं जतलाया जा सकता। ये नहीं कहा जा सकता कि किस को मिलेगा। उद्यम का गर्व ही सारे उद्यम को व्यर्थ कर देता है)। जिस परमातमा ने ये जगत रचा है, वह हरेक जीव की संभाल करता है। (उद्यम के फल के बारे में) उस प्रभू पति का हुकम समझा नहीं जा सकता। (ये पता नही लग सकता कि) किस मनुष्य को वह (नाम जपने की) वडिआई देता है (हम जीव किसी मनुष्य के दिखाई देते कर्मों पर गलती खा सकते हैं। इसलिए उद्यम करते हुए भी प्रभू से मेहर की दाति मांगते रहें)। 4। 1। 18।
गउड़ी बैरागणि महला 1 ॥
हरणी होवा बनि बसा कंद मूल चुणि खाउ ॥
गुर परसादी मेरा सहु मिलै वारि वारि हउ जाउ जीउ ॥1॥
मै बनजारनि राम की ॥
तेरा नामु वखरु वापारु जी ॥1॥ रहाउ ॥
कोकिल होवा अंबि बसा सहजि सबद बीचारु ॥
सहजि सुभाइ मेरा सहु मिलै दरसनि रूपि अपारु ॥2॥
मछुली होवा जलि बसा जीअ जंत सभि सारि ॥
उरवारि पारि मेरा सहु वसै हउ मिलउगी बाह पसारि ॥3॥
नागनि होवा धर वसा सबदु वसै भउ जाइ ॥
नानक सदा सोहागणी जिन जोती जोति समाइ ॥4॥2॥19॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 1 ॥ (हिरनी जंगल में घास-तृण खाती है और मौज में फुदकती फिरती है) हे प्रभू ! आपका नाम मेरी जीवात्मा के लिए खुराक बने, जैसे हिरनी के लिए कंद-मूल है। मैं आपके नाम रस को प्रीति से खाऊँ। मैं संसार-वन में बेफिक्र हैं के विचरूँ, जैसे जंगल में हिरनी। अगर गुरू की कृपा से मेरा पति प्रभू मुझे मिल जाए, तो मैं बारंबार उससे सदके जाऊँ। 1। (हे प्रभू ! अगर आपकी मेहर हैं तो) मैं आपके नाम की वंजारन बन जाऊूं। आपका नाम मेरा सौदा बने, आपके नाम को ही फैलाऊँ। 1। रहाउ। (कोयल की आम से प्रीति प्रसिद्ध है। आम के वृक्ष पर बैठ के कोयल मीठी मस्त सुर में कू-कूह करती है। अगर मेरी प्रीति प्रभू से वैसी हो जाए जैसी कोयल की आम के साथ है तो) मैं कोयल बनूँ, आम पे बैठूँ (भाव, प्रभू नाम को अपनी जिंदगी का सहारा बना लूँ) और मस्त अडोल हालत में टिक के प्रभू की सिफत सालाह के शबद की विचार करूँ (शबद में चित्त जोड़ दूँ)। मस्त अडोल अवस्था में टिकने से, प्रेम में जुड़ने से ही प्यारा दर्शनीय, सोहना बेअंत प्रभू पति मिलता है। 2। (मछली पानी के बिना नहीं जी सकती। प्रभू के साथ अगर मेरी प्रीति भी ऐसी ही बन जाए तो) मैं मछली बन जाऊँ। सदैव उस जल-प्रभू में टिकी रहूँ जो सारे जीव-जंतुओं की संभाल करता है। प्यारा प्रभू पति (इस संसार समुंद्र के अथाह जल के) इस पार और उस पार (हर जगह) बसता है (जैसे मछली अपने बाजू पसार के पानी में तैरती है) मैं भी अपनी बाँहें पसार के (भाव निसंग हो के) उसे मिलूँगी। 3। (नागिन बीन पर मस्त होती है। प्रभू से अगर मेरी प्रीति भी ऐसी ही बन जाए, तो) मैं नागिन बनूँ। धरती पे बसूँ (भाव, सबकी चरणधूड़ बनूँ, मेरे अंदर प्रभू की सिफत सालाह वाला) गुरू शबद बसे (जैसे बीन में मस्त हो के सपनी को वैरी की सुध-बुधि भूल जाती है) मेरा भी (दुनिया वाला सारा) डर-भय दूर हो जाए। हे नानक ! जिन जीव-सि्त्रयों की ज्योति (सुरति) सदा ज्योति रूप प्रभू में टिकी रहती है, वह बड़ी भाग्यशाली हैं। 4। 2। 19।
गउड़ी पूरबी दीपकी महला 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥
तितु घरि गावहु सोहिला सिवरहु सिरजणहारो ॥1॥
तुम गावहु मेरे निरभउ का सोहिला ॥
हउ वारी जाउ जितु सोहिलै सदा सुखु होइ ॥1॥ रहाउ ॥
नित नित जीअड़े समालीअनि देखैगा देवणहारु ॥
तेरे दानै कीमति ना पवै तिसु दाते कवणु सुमारु ॥2॥
संबति साहा लिखिआ मिलि करि पावहु तेलु ॥
देहु सजण आसीसड़ीआ जिउ होवै साहिब सिउ मेलु ॥3॥
घरि घरि एहो पाहुचा सदड़े नित पवंनि ॥
सदणहारा सिमरीऐ नानक से दिह आवंनि ॥4॥1॥20॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी पूरबी दीपकी महला 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस (साध-संगति) घर में (परमात्मा की) सिफत सालाह होती है और करतार के गुणों की विचार होती है (हे जीवात्मा कन्या !) उस सत्संग घर में (जा के आप भी) परमातमा के सिफत सालाह के गीत (सुहाग मिलाप की तांघ के शबद) गा। और अपने पैदा करने वाले प्रभू को याद कर। 1। (हे जीवात्मा !) आप (सतसंगियों के साथ मिल के) प्यारे निरभउ (पति) की सिफत के गीत गा। (और कह) मैं सदके हूँ उस सिफत के गीत से जिसकी बरकति से सदा का सुख मिलता है। 1। रहाउ। (हे जीवात्मा ! जिस पति की हजूरी में) सदा ही जीव की संभाल हो रही है। जो दातें देने वाला मालिक (हरेक जीव की) संभाल करता है। (जिस दातार की) दातों का मूल्य (हे जीवात्मा !) आपके पास नहीं पड़ सकता, उस दातार का क्या अंदाजा (आप लगा सकती है) ? (भाव, वह दातार प्रभू बहुत बेअंत है)। 2। (सत्संग में जा के हे जीवात्मा ! अरजोई किया कर) वह साल, वह दिन (जो पहले ही) निश्चित है (जब पति के देश जाने के लिए मेरे वास्ते मौत पाहोचा आना है। हे सत्संगी सहेलियो !) मिल के मुझे माईएं डालो ! और हे सज्जन (सहेलियो !) मुझे शुभाशीशें भी दो (भाव, मेरे लिए प्रार्थना भी करो) जिससे पति प्रभू से मेरा मेल हो जाए। 3। (परलोक में जाने के लिए मौत रूप) ये पहोचा हरेक घर में । ये आमंत्रण नित्य आ रहे हैं। (हे सत्संगियो !) उस निमंत्रण भेजने वाले पति प्रभू को याद करना चाहिए। (क्योंकि) हे नानक ! (हमारे भी) वह दिन (नजदीक) आ रहे हैं। 4। 1। 20।
रागु गउड़ी गुआरेरी ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी गुआरेरी ॥
महला 3 चउपदे ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरि मिलिऐ हरि मेला होई ॥
आपे मेलि मिलावै सोई ॥
मेरा प्रभु सभ बिधि आपे जाणै ॥
हुकमे मेले सबदि पछाणै ॥1॥
सतिगुर कै भइ भ्रमु भउ जाइ ॥
भै राचै सच रंगि समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरि मिलिऐ हरि मनि वसै सुभाइ ॥
मेरा प्रभु भारा कीमति नही पाइ ॥
सबदि सालाहै अंतु न पारावारु ॥
मेरा प्रभु बखसे बखसणहारु ॥2॥
गुरि मिलिऐ सभ मति बुधि होइ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 3 चउपदे ॥ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। अगर गुरू मिल जाए तो परमात्मा से मिलाप हो जाता है। वह परमात्मा स्वयं ही (जीव को गुरू से) मिला के (अपने चरणों में) मिला लेता है। प्यारा प्रभू स्वयं ही (जीवों को अपने चरणों में मिलाने के) सारे तरीके जानता है। (जिस मनुष्य को परमात्मा अपने) हुकम अनुसार (गुरू के साथ) मिलाता है, वह मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा से सांझ पा लेता है। 1। गुरू के डर अदब में रहने से (दुनियावी) भटकना दूर हो जाती है। जो मनुष्य (गुरू के) डर अदब में मगन रहता है वह सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के (प्रेम) रंग में समाया रहता है। 1। रहाउ। अगर गुरू मिल जाए तो परमात्मा (भी अपनी) प्यार रुची के कारण (मनुष्य के) मन में आ बसता है। प्यारा प्रभू बेअंत गुणों का मालिक है। कोई जीव उसका मूल्य नहीं पा सकता (अर्थात, ये नहीं बता सकता कि दुनिया के किसी पदार्थ के बदले परमात्मा मिल सकता है)। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के उस परमात्मा की सिफत सालाह करता है जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता जिसकी हस्ती का इस पार व उस पार का छोर नहीं ढूँढा जा सकता। बख्शनहार प्रभू (उसके सारे गुनाह) बख्श लेता है। 2। अगर गुरू मिल जाए (तो मनुष्य के अंदर) ऊँची बुद्धि पैदा हो जाती है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हलांकि, यद्यपि हरेक मनुष्य (सिर्फ जबानी जबानी) नाम धन की लालसा करे, पर ये हरेक जीव के अमलों पर फैसला होता है (कि किस को प्राप्ति होगी।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।