Lulla Family

अंग 156

अंग
156
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
एकसु चरणी जे चितु लावहि लबि लोभि की धावसिता ॥3॥
जपसि निरंजनु रचसि मना ॥
काहे बोलहि जोगी कपटु घना ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ कमली हंसु इआणा मेरी मेरी करत बिहाणीता ॥
प्रणवति नानकु नागी दाझै फिरि पाछै पछुताणीता ॥4॥3॥15॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: अगर आप एक परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़े, तो लब और लोभ के कारण बनी हुई आपकी भटकना दूर हैं जाए। 3। अपना मन जोड़ के माया-रहित प्रभू का नाम सिमर। 1। रहाउ। हे जोगी ! ज्यादा ठॅगी-फरेब के बोल क्यूँ बोलता है? जिस मनुष्य का शरीर पागल हुआ हुआ हो (जिसकी ज्ञानेंद्रियां विकारों में पागल हुई पड़ी हों) जिसकी जीवात्मा अंजान हो (जिंदगी का सही रास्ता ना समझता हो) उसकी सारी उम्र माया की ममता में बीत जाती है। (तथा) नानक बिनती करता है कि जब (ममता के सारे पदार्थ जगत में ही छोड़ के) शरीर अकेला ही (शमशान में) जलता है। समय व्यर्थ में गवा के जीव पछताता है। 4। 3। 15।
गउड़ी चेती महला 1 ॥
अउखध मंत्र मूलु मन एकै जे करि द्रिड़ु चितु कीजै रे ॥
जनम जनम के पाप करम के काटनहारा लीजै रे ॥1॥
मन एको साहिबु भाई रे ॥
तेरे तीनि गुणा संसारि समावहि अलखु न लखणा जाई रे ॥1॥ रहाउ ॥
सकर खंडु माइआ तनि मीठी हम तउ पंड उचाई रे ॥
राति अनेरी सूझसि नाही लजु टूकसि मूसा भाई रे ॥2॥
मनमुखि करहि तेता दुखु लागै गुरमुखि मिलै वडाई रे ॥
जो तिनि कीआ सोई होआ किरतु न मेटिआ जाई रे ॥3॥
सुभर भरे न होवहि ऊणे जो राते रंगु लाई रे ॥
तिन की पंक होवै जे नानकु तउ मूड़ा किछु पाई रे ॥4॥4॥16॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी चेती महला 1 ॥ हे भाई ! अगर आप (उसके नाम के सिमरन में) अपने चित्त को पक्का कर ले, तो (आपको यकीन आ जाएगा कि) मन के रोग दूर करने वाली सबसे बढ़िया दवा प्रभू का नाम ही है। मन को वश में करने वाला सबसे बढ़िया मंत्र परमात्मा का नाम ही है अगर आप जनमों जन्मांतजरों के किये बुरे कर्मों के संस्कारों को काटने वाले परमात्मा का नाम लेता रहे। 1। हे भाई ! (विकारों से बचा सकने वाला) मन का रक्षक एक प्रभू का नाम ही है (उसके गुण पहिचान), पर जितने समय तक आपकी त्रिगुणी इंद्रियां संसार (के मोह) में खचित हैं, उस अलॅख परमात्मा को समझा नहीं जा सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! हम जीवों ने ता माया की गठड़ी (हर वक्त सिर पर) उठाई हुई है। हमें तो माया, अपने अंदर शक्कर जैसी मीठी लग रही है, (हमारे लिए तो माया के मोह की) अंधेरी रात पड़ी हुई है (जिसमें हमें कुछ दिखता ही नहीं) और (उधर से) यम रूपी चूहा हमारी उम्र की लाज कतरता जा रहा है (उम्र घटती जा रही है)। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चल के मनुष्य जितने भी उद्यम करते हैं, उतने ही दुख घटित होते हैं। (लोक परलोक में) शोभा उन्हीं को मिलती है जो गुरू के सन्मुख रहते हैं। जो (नियम) उस परमात्मा ने बना दिया है वही घटित होता है। (उस नियम के अनुसार) जनमों जन्मांतरों के किए कर्मों के संस्कारों के समूह को (जो हमारे मन में टिका हुआ है, अपने मन के पीछे चल के) मिटाया नहीं जा सकता। 3। नानक (कहता है) जो मनुष्य प्रभू के चरणों में प्रीत जोड़ के उसके प्रेम में रंगे रहते हैं, उनके मन प्रेम रस के साथ लबा-लब भरे रहते हैं। वह (प्रेम से) खाली नहीं होते। अगर (हमारा) मूर्ख (मन) उनके चरणों की धूड़ बने, तो इसे भी कुछ प्राप्ति हो जाए। 4। 4। 16।
गउड़ी चेती महला 1 ॥
कत की माई बापु कत केरा किदू थावहु हम आए ॥
अगनि बिंब जल भीतरि निपजे काहे कंमि उपाए ॥1॥
मेरे साहिबा कउणु जाणै गुण तेरे ॥
कहे न जानी अउगण मेरे ॥1॥ रहाउ ॥
केते रुख बिरख हम चीने केते पसू उपाए ॥
केते नाग कुली महि आए केते पंख उडाए ॥2॥
हट पटण बिज मंदर भंनै करि चोरी घरि आवै ॥
अगहु देखै पिछहु देखै तुझ ते कहा छपावै ॥3॥
तट तीरथ हम नव खंड देखे हट पटण बाजारा ॥
लै कै तकड़ी तोलणि लागा घट ही महि वणजारा ॥4॥
जेता समुंदु सागरु नीरि भरिआ तेते अउगण हमारे ॥
दइआ करहु किछु मिहर उपावहु डुबदे पथर तारे ॥5॥
जीअड़ा अगनि बराबरि तपै भीतरि वगै काती ॥
प्रणवति नानकु हुकमु पछाणै सुखु होवै दिनु राती ॥6॥5॥17॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी चेती महला 1 ॥ (हे मेरे साहिब ! अनगिनत अवगुणों के कारण ही हमें अनेको योनियों में भटकना पड़ता है, हम क्या बताएं कि) कब की हमारी (कोई) माँ है। कब का (भाव, किस जून का) हमारा कोई बाप है किस किस जगह से (जूनियों में से हो के) हम (अब इस मनुष्य जनम में) आए हैं? (इन अवगुणों के कारण ही हमें ये भी नहीं सूझता कि) हम किस मनोरथ उद्देश्य के लिए पिता के वीर्य से माँ के पेट की आग में तपे, और किस वास्ते पैदा हुए। 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! (और, जिस जीव के अंदर अनगिनत अवगुण हों, वह ऐसा) कोई भी नहीं होता जो आपके गुणों के साथ गहरी सांझ डाल सके (जो आपकी सिफत सालाह में जुड़ सके)। मेरे अंदर इतने अवगुण है कि वे गिने नहीं जा सकते। 1। रहाउ। (अनगिनत अवगुणों के कारण) हमने अनेकों रुखों, वृक्षों की जूनियां देखीं। अनेकों बार पशू जून में हम जन्मे। अनेकों बार साँपों की कुलों में पैदा हुए, और अनेकों बार पंछी बन बन के उड़ते रहे। 2। (जनमों जन्मांतरों में किये कुकर्मों के असर में ही) मनुष्य शहरों की दुकानें तोड़ता है, पक्के घर तोड़ता है (सेंध लगाता है), चोरी करके (माल ले के) अपने घर आता है, (चोरी का माल लाता) आगे पीछे ताकता है (कि कोई देख ना ले, पर मूर्ख ये नहीं समझता कि हे प्रभू !) आपके से कहीं छुपा नहीं रह सकता। 3। (इन किए कुकर्मों को धोने के लिए हम जीव) सारी धरती के सारे तीर्थों के दर्शन करते फिरते हैं। सारे शहरों, बाजारों की दुकान-दुकान देखते हैं (भाव, भीख मांगते फिरते हैं, पर ये कुकर्म फिर भी नहीं मिटते)। (जब कोई भाग्यशाली जीव-) वणजारा (आपकी मेहर के सदका) अच्छी तरह परख विचार करता है (तो उसे समझ आती है कि आप तो) हमारे हृदय में ही बसता है। 4। (हे मेरे साहिब !) जैसे (अनमापे, अथाह) पानी के साथ समुंद्र भरा हुआ है, वैसे ही हम जीवों के अनगिनत ही अवगुण हैं। (हम इन्हें धो सकने में अस्मर्थ हैं), आप खुद ही दया करके मेहर कर। आप तो डूबते पत्थरों को भी उबार सकता है। 5। (हे मेरे साहिब !) मेरी जीवात्मा आग की तरह तप रही है। मेरे अंदर तृष्णा की छुरी चल रही है। नानक विनती करता है, जो मनुष्य परमात्मा की रज़ा को समझ लेता है, उसके अंदर दिन रात (हर वक्त ही) आत्मिक आनंद बना रहता है। 6। 5। 17।
गउड़ी बैरागणि महला 1 ॥
रैणि गवाई सोइ कै दिवसु गवाइआ खाइ ॥
हीरे जैसा जनमु है कउडी बदले जाइ ॥1॥
नामु न जानिआ राम का ॥
मूड़े फिरि पाछै पछुताहि रे ॥1॥ रहाउ ॥
अनता धनु धरणी धरे अनत न चाहिआ जाइ ॥
अनत कउ चाहन जो गए से आए अनत गवाइ ॥2॥
आपण लीआ जे मिलै ता सभु को भागठु होइ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 1 ॥ (हे मूर्ख !) आप रात सो के गुजारता जा रहा है और दिन खा खा के व्यर्थ बिताता जाता है। आपका ये मानस जन्म हीरे जैसा कीमती है, पर (सिमरन हीन होने के कारण) कउड़ी के मोल जा रहा है। 1। हे मूर्ख ! तूने परमात्मा के नाम के साथ गहरी सांझ नहीं डाली। (ये मानस जीवन ही सिमरन के लिए समय है, जब ये उम्र सिमरन के बगैर गुजर गई तो) फिर समय बीत जाने पे अफसोस करेगा। 1। रहाउ। जो मनुष्य (सिर्फ) बेअंत धन ही इकट्ठा करता रहता है, उसके अंदर बेअंत प्रभू को सिमरने की तमन्ना पैदा नहीं हो सकती। जो जो भी बेअंत दौलत की लालच में दौड़े फिरते हैं, वे बेअंत प्रभू के नाम धन को गवा लेते हैं। 2। (पर) अगर सिर्फ इच्छा करने से ही नाम धन मिल सकता हो, तो हरेक जीव नाम-धन खजानों का मालिक बन जाए।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर आप एक परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़े, तो लब और लोभ के कारण बनी हुई आपकी भटकना दूर हैं जाए।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।