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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 15 · सिरी राग

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अंग
15
सिरी राग
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  1. नानक कागद लख मणा पड़ि पड़ि कीचै भाउ ॥
  2. लेखै बोलणु बोलणा लेखै खाणा खाउ ॥
  3. लबु कुता कूड़ु चूहड़ा ठगि खाधा मुरदारु ॥
  4. अमलु गलोला कूड़ का दिता देवणहारि ॥

गुरु नानक देव जी · शबद · सिरी राग

नानक कागद लख मणा पड़ि पड़ि कीचै भाउ ॥

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नानक कागद लख मणा पड़ि पड़ि कीचै भाउ ॥
मसू तोटि न आवई लेखणि पउणु चलाउ ॥
भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें, हे प्रभू! अगर मेरे पास आपकी वडियाईयों से भरे हुए) लाखों मन कागज़ हों, उनको बार बार पढ़ के विचार भी की जाए, यदि (आपकी वडियाई लिखने के वास्ते) मैं हवा को कलम बना लूँ (लिखते-लिखते) स्याही की भी कभी कमी ना आए, तो भी हे प्रभू! मैं आपका मुल्य नहीं पा सकता, मैं आपकी वडिआई महानता बताने के काबिल नहीं हूँ। 4।2

गुरु नानक देव जी · शबद · सिरी राग

लेखै बोलणु बोलणा लेखै खाणा खाउ ॥

सिरीरागु महला 1 ॥
लेखै बोलणु बोलणा लेखै खाणा खाउ ॥
लेखै वाट चलाईआ लेखै सुणि वेखाउ ॥
लेखै साह लवाईअहि पड़े कि पुछण जाउ ॥1॥
बाबा माइआ रचना धोहु ॥
अंधै नामु विसारिआ ना तिसु एह न ओहु ॥1॥ रहाउ ॥
जीवण मरणा जाइ कै एथै खाजै कालि ॥
जिथै बहि समझाईऐ तिथै कोइ न चलिओ नालि ॥
रोवण वाले जेतड़े सभि बंनहि पंड परालि ॥2॥
सभु को आखै बहुतु बहुतु घटि न आखै कोइ ॥
कीमति किनै न पाईआ कहणि न वडा होइ ॥
साचा साहबु एकु तू होरि जीआ केते लोअ ॥3॥
नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥ नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥
जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ ये बात हर कोई जानता है कि हम जिंदगी की सांसे गिने-चुने समय के लिए ही ले रहे हैं, हमारा बोल-चाल, हमारा खाना पीना थोड़े ही समय के लिए है। जिस जीवन सफर पर हम चले हुए हैं ये सफर भी थोड़े ही समय के लिए है, (दुनिया के राग-रंग और रंग-तमाशे) सुनने देखने भी थोड़े ही समय के लिये हैं। 1। हे भाई! माया की खेल (जीवों के लिये) चार दिन की ही खेल है। पर इस चार दिन की खेल में अंधे हुए मनुष्य ने प्रभू का नाम विसार दिया है, ना माया साथ ही निभती है ना प्रभू का नाम ही मिलता है। 1। रहाउ। जगत में जनम से ले कर मरने तक सारी उम्र (मनुष्य) पदार्थ एकत्र करने की कोशिश में लगा रहता है। (जिनकी खातिर ये दौड़-भाग करता है, उनमें से) कोई भी उस जगह तक साथ नहीं निभाता जहाँ इसको (सारी जिंदगी किये कामों का लेखा) समझाया जाता है। (इसके मरने के बाद) इसको रोने वाले सारे ही संबंधी (इसके भार की) पराली की गठड़ी उठाते हैं (कयोंकि मरने वाले को कोई लाभ नहीं होता)। 2। (हे प्रभू!) हरेक जीव (आपको) बहुत बहुत धन वास्ते ही कहता है, कोई भी थोड़ा नहीं मांगता, किसी ने भी कभी मांगने से बस नहीं की, मांग मांग के कभी कोई तृप्त नहीं हुआ (पर वह सारा ही धन यहाँ रह जाता है)। हे प्रभू! आप अकेले ही सदा कायम रहने वाले खालिक हैं, और सारे जीअ-जंतु और सारे जगत मण्डल नाशवंत हैं। 3। जो नीच से नीच जाति के हैं जो नीचों से भी अति नीच कहलाते हैं,(हे प्रभू! मैं आपसे यही मांगता हूँ कि आपका) नानक उन लोगों से साथ बनाये, मुझे मायाधारियों के राह पर चलने की कोई तमन्ना नहीं है (क्योंकि मुझे पता है कि) आपकी मंहर की नजर वहाँ है जहाँ गरीबों की सार ली जाती है। 4।3

गुरु नानक देव जी · शबद · सिरी राग

लबु कुता कूड़ु चूहड़ा ठगि खाधा मुरदारु ॥

सिरीरागु महला 1 ॥
लबु कुता कूड़ु चूहड़ा ठगि खाधा मुरदारु ॥
पर निंदा पर मलु मुख सुधी अगनि क्रोधु चंडालु ॥
रस कस आपु सलाहणा ए करम मेरे करतार ॥1॥
बाबा बोलीऐ पति होइ ॥
ऊतम से दरि ऊतम कहीअहि नीच करम बहि रोइ ॥1॥ रहाउ ॥
रसु सुइना रसु रुपा कामणि रसु परमल की वासु ॥
रसु घोड़े रसु सेजा मंदर रसु मीठा रसु मासु ॥
एते रस सरीर के कै घटि नाम निवासु ॥2॥
जितु बोलिऐ पति पाईऐ सो बोलिआ परवाणु ॥
फिका बोलि विगुचणा सुणि मूरख मन अजाण ॥
जो तिसु भावहि से भले होरि कि कहण वखाण ॥3॥
तिन मति तिन पति तिन धनु पलै जिन हिरदै रहिआ समाइ ॥
तिन का किआ सालाहणा अवर सुआलिउ काइ ॥
नानक नदरी बाहरे राचहि दानि न नाइ ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे मेरे करतार! मेरी तो ये करतूतें हैं,खाने का लालच (मेरे अंदर) कुत्ता है (जो हर वक्त खाने को मांगता है भौंकता है), झूठ (बोलने की आदत मेरे अंदर) चूहड़ा है (जिस ने मुझे बहुत नीच कर दिया है), (दूसरों को) ठॅग के खाना (मेरे अंदर) मुरदार है (जो स्वार्थ की बदबू बढ़ा रहा है), पराई निंदा मेरे मुंह में समूची पराई मैल है, क्रोधाग्नि (मेरे अंदर) चंडाल (बनी हुई है), मुझे कई चसके हैं, मैं अपने आप को वडिआता हूँ, स्वै-प्रशंसा में लिप्त हूँ। 1। हे भाई! वे बोल बोलने चाहिए (जिससे प्रभू की हजूरी में) इज्जत मिले। वही मनुष्य (असल में) अच्छे हैं, जो परमेश्वर की हजूरी में अच्छे कहे जाते हैं, मंदकर्मी बंदे चिंता में झुरते ही हैं। 1। रहाउ। सोना चांदी (एकत्र करने) का चस्का, स्त्री (भाव, काम) का चस्का, सुगंधियों की लगन, घोड़ों (की सवारी) का शौक, (नर्म नर्म) सेजों (सुंदर) महलों की लालसा, (स्वाद भरपूर) मीठे पदार्थ, तथा मास (खाने) का चस्का, अगर मनुष्य के शरीर को इतने चस्के लगे हुये हैं, तो परमात्मा के नाम का ठिकाना किस हृदय में हो सकता है? 2। बोल वही बोले हुए बढ़िया हैं जिस बोल के बोलने से (प्रभू की हजूरी में) आदर मिलता है। हे मूर्ख अन्जान मन! सुनें, फीके बोल (नाम रस विहीन) बोलने से दुख मिलता है (भाव, यदि सारी उम्र सिर्फ निरी-कोरी बातें ही करते रहे, जो प्रभू की याद से खाली हों तो दूखी ही रहते हैं) प्रभू की सिफत सलाह के बिना और सब बातें व्यर्थ हैं। जो मनुष्य (प्रभू की सिफत सलाह करके) उस प्रभू को प्यारे लगते हैं वही अच्छे हैं। 3। जिन लोगों के हृदय में प्रभू हर वक्त बस रहा है, वे अक्ल वाले हैं, इज्जत वाले हैं और धनवान हैं। ऐसे भले मनुष्यों की सिफतिनहीं की जा सकती। उनके जैसा खूबसूरत और कौन है? हे नानक! प्रभू की नज़र से वंचित लोग उसके नाम से नहीं जुड़ते, बल्कि, उसके दिए धन-पदार्थों में मस्त रहते हैं। 4। 4।

गुरु नानक देव जी · शबद · सिरी राग

अमलु गलोला कूड़ का दिता देवणहारि ॥

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सिरीरागु महला 1 ॥
अमलु गलोला कूड़ का दिता देवणहारि ॥
मती मरणु विसारिआ खुसी कीती दिन चारि ॥
सचु मिलिआ तिन सोफीआ राखण कउ दरवारु ॥1॥
नानक साचे कउ सचु जाणु ॥
जितु सेविऐ सुखु पाईऐ तेरी दरगह चलै माणु ॥1॥ रहाउ ॥
सचु सरा गुड़ बाहरा जिसु विचि सचा नाउ ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ देनहार प्रभू ने स्वयं ही जगत को मोह रूपी अफीम का गोला जीवों को दिया हुआ है। (इस मोह अफीम को खा के) मस्त हुई जीवात्मा ने मौत को भुला दिया है, चार दिन की जिंदगी में रंग-रलियां मना रही है। जिन्होंने मोह का नशा त्याग के प्रमात्मा के दर पर पहुँचने की कोशिश की है, उन्हें स्थाई प्रभू मिल गया। 1। हे नानक! सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ सच्ची सांझ बनाएँ जिसका सिमरन करने से सुख मिलता है। (और अरदास करें कि हे प्रभू! अपना नाम दें जिस करके) आपकी हजूरी में आदर मिल सके। 1। रहाउ। सदा की मस्ती कायम रखने वाली शराब गुड़ के बिना ही तैयार की जाती है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 15 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।