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सचा सबदु बीचारि कालु विधउसिआ ॥
सचा सबदु बीचारि कालु विधउसिआ ॥
ढाढी कथे अकथु सबदि सवारिआ ॥
नानक गुण गहि रासि हरि जीउ मिले पिआरिआ ॥23॥
ढाढी कथे अकथु सबदि सवारिआ ॥
नानक गुण गहि रासि हरि जीउ मिले पिआरिआ ॥23॥
हिन्दी अर्थ: सिफत सालाह करने वाला मनुष्य सच्चा गुरू शबद विचार के (आत्मिक) मौत (का डर) दूर कर लेता है। गुरू शबद की बरकति से सुधरा हुआ ढाढी अकॅथ प्रभू के गुण गाता है। (इस तरह) हे नानक ! प्रभू के गुणों की पूँजी एकत्र करके प्यारे प्रभू के साथ मिल जाता है। 23।
खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि ॥
सलोकु मः 1 ॥
खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि ॥
धोते मूलि न उतरहि जे सउ धोवण पाहि ॥
नानक बखसे बखसीअहि नाहि त पाही पाहि ॥1॥
खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि ॥
धोते मूलि न उतरहि जे सउ धोवण पाहि ॥
नानक बखसे बखसीअहि नाहि त पाही पाहि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ पापों के कारण (जो जीव) पैदा होते हैं, (यहां भी) पाप करते हैं और (आगे भी इनके किए पापों के संस्कारों करके) पापों में ही प्रवृर्ति होते हैं। ये पाप धोने से बिल्कुल नहीं उतरते, चाहे सौ धोने धोएं (चाहे सौ बार धोने का यत्न करें)। हे नानक ! यदि प्रभू मेहर करे (तो ये पाप) बख्शे जाते हैं, नहीं तो जूतियां ही पड़ती हैं।
नानक बोलणु झखणा दुख छडि मंगीअहि सुख ॥
मः 1 ॥
नानक बोलणु झखणा दुख छडि मंगीअहि सुख ॥
सुखु दुखु दुइ दरि कपड़े पहिरहि जाइ मनुख ॥
जिथै बोलणि हारीऐ तिथै चंगी चुप ॥2॥
नानक बोलणु झखणा दुख छडि मंगीअहि सुख ॥
सुखु दुखु दुइ दरि कपड़े पहिरहि जाइ मनुख ॥
जिथै बोलणि हारीऐ तिथै चंगी चुप ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! (ये जो) दुख छोड़ के सुख मांगते हैं, ऐसा बोलना सिर खपाई ही है। सुख और दुख दोनों प्रभू के दर से कपड़े मिले हुए हैं, जो मनुष्य जन्म ले कर यहाँ पहनते हैं (भाव, दुख और सुख के चक्र हरेक पर आते ही रहते हैं); सो जिसके सामने एतराज गिला करने से (अंत को) हार ही माननी पड़ती है वहाँ चुप रहना ही ठीक है (भाव रजा में चलना सबसे अच्छा है)। 2।
चारे कुंडा देखि अंदरु भालिआ ॥
पउड़ी ॥
चारे कुंडा देखि अंदरु भालिआ ॥
सचै पुरखि अलखि सिरजि निहालिआ ॥
उझड़ि भुले राह गुरि वेखालिआ ॥
सतिगुर सचे वाहु सचु समालिआ ॥
पाइआ रतनु घराहु दीवा बालिआ ॥
सचै सबदि सलाहि सुखीए सच वालिआ ॥
निडरिआ डरु लगि गरबि सि गालिआ ॥
नावहु भुला जगु फिरै बेतालिआ ॥24॥
चारे कुंडा देखि अंदरु भालिआ ॥
सचै पुरखि अलखि सिरजि निहालिआ ॥
उझड़ि भुले राह गुरि वेखालिआ ॥
सतिगुर सचे वाहु सचु समालिआ ॥
पाइआ रतनु घराहु दीवा बालिआ ॥
सचै सबदि सलाहि सुखीए सच वालिआ ॥
निडरिआ डरु लगि गरबि सि गालिआ ॥
नावहु भुला जगु फिरै बेतालिआ ॥24॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य चारों तरफ देख के (भाव, बाहर की चारों तरफ की भटकना छोड़ के) अपना अंदर का ढूँढता है (उसे दिख जाता है कि) सच्चे अलख अकाल पुरख ने (जगत) पैदा करके स्वयं ही उसकी संभाल की है (भाव, संभाल कर रहा है)। गलत रास्ते पर भटक रहे मनुष्य को गुरू ने रास्ता दिखाया है (राह गुरू दिखाता है), सच्चे सत्गुरू को शाबाश है (जिसकी बरकति से) सच्चे प्रभू को सिमरते हैं। (जिस मनुष्य के अंदर सत्गुरू ने ज्ञान का) दीपक जगा दिया है उसे अपने अंदर से ही (नाम) रत्न मिल गया है। (गुरू की शरण आ के) सच्चे शबद के द्वारा प्रभू की सिफति सालाह करके (मनुष्य) सुखी हो जाते हैं, खसम वाले हो जाते हैं। (पर) जिन्होंने प्रभू का भय नहीं रखा, उन्हें (और) डर सताते हैं। वे अहंकार में गलते हैं। प्रभू के नाम से भूला हुआ जगत बेताला हुआ फिरता है। 24।
भै विचि जंमै भै मरै भी भउ मन महि होइ ॥
सलोकु मः 3 ॥
भै विचि जंमै भै मरै भी भउ मन महि होइ ॥
नानक भै विचि जे मरै सहिला आइआ सोइ ॥1॥
भै विचि जंमै भै मरै भी भउ मन महि होइ ॥
नानक भै विचि जे मरै सहिला आइआ सोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जगत सहम में पैदा होता है, सहम में मरता है। सदा ही सहम इसमें टिका रहता है। (पर) हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के डर में स्वैभाव मारता है उसका पैदा होना मुबारक है (जगत की ममता मनुष्य के अंदर सहम पैदा करती है। जब ये अपनत्व व ममता खत्म हो जाए तो किसी चीज के छीने जाने का डर सहम नहीं रहता)। 1।
भै विणु जीवै बहुतु बहुतु खुसीआ खुसी कमाइ ॥
मः 3 ॥
भै विणु जीवै बहुतु बहुतु खुसीआ खुसी कमाइ ॥
नानक भै विणु जे मरै मुहि कालै उठि जाइ ॥2॥
भै विणु जीवै बहुतु बहुतु खुसीआ खुसी कमाइ ॥
नानक भै विणु जे मरै मुहि कालै उठि जाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ परमात्मा का डर हृदय में बसाए बिना मनुष्य लंबी उम्र भी जीता रहे और बड़ी मौजें करता रहे, तो भी, हे नानक ! अगर प्रभू का डर हृदय में बसाए बिना ही मरता है, तो मुंह पे कालिख़ कमा के ही जाता है। 2।
सतिगुरु होइ दइआलु त सरधा पूरीऐ ॥
पउड़ी ॥
सतिगुरु होइ दइआलु त सरधा पूरीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु न कबहूं झूरीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता दुखु न जाणीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता हरि रंगु माणीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता जम का डरु केहा ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता सद ही सुखु देहा ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता नव निधि पाईऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु त सचि समाईऐ ॥25॥
सतिगुरु होइ दइआलु त सरधा पूरीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु न कबहूं झूरीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता दुखु न जाणीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता हरि रंगु माणीऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता जम का डरु केहा ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता सद ही सुखु देहा ॥
सतिगुरु होइ दइआलु ता नव निधि पाईऐ ॥
सतिगुरु होइ दइआलु त सचि समाईऐ ॥25॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस मनुष्य के ऊपर सत्गुरू कृपा करे (उसके अंदर परमात्मा पर) पक्का भरोसा बंध जाता है, वह (किसी दुख-कलेश के आने पे) कभी गिला शिकवा नहीं करता (क्योंकि) वह (किसी आए दुख को) दुख नहीं समझता, सदा प्रभू के मेल का आनंद लेता है। (दुख कलेश तो कहीं रहा) उसे यम का डर भी नहीं रहता (इस तरह) उसके शरीर को सदा सुख रहता है। जिस पे गुरू दयावान हो जाए उसे (मानो) जगत में नौ खजाने मिल गए हैं। (क्योंकि) वह तो (खजानों के मालिक) सच्चे प्रभू में जुड़ा रहता है। 25।
सिरु खोहाइ पीअहि मलवाणी जूठा मंगि मंगि खाही ॥
सलोकु मः 1 ॥
सिरु खोहाइ पीअहि मलवाणी जूठा मंगि मंगि खाही ॥
फोलि फदीहति मुहि लैनि भड़ासा पाणी देखि सगाही ॥
भेडा वागी सिरु खोहाइनि भरीअनि हथ सुआही ॥
माऊ पीऊ किरतु गवाइनि टबर रोवनि धाही ॥
ओना पिंडु न पतलि किरिआ न दीवा मुए किथाऊ पाही ॥
अठसठि तीरथ देनि न ढोई ब्रहमण अंनु न खाही ॥
सदा कुचील रहहि दिनु राती मथै टिके नाही ॥
झुंडी पाइ बहनि निति मरणै दड़ि दीबाणि न जाही ॥
लकी कासे हथी फुंमण अगो पिछी जाही ॥
ना ओइ जोगी ना ओइ जंगम ना ओइ काजी मुंला ॥
सिरु खोहाइ पीअहि मलवाणी जूठा मंगि मंगि खाही ॥
फोलि फदीहति मुहि लैनि भड़ासा पाणी देखि सगाही ॥
भेडा वागी सिरु खोहाइनि भरीअनि हथ सुआही ॥
माऊ पीऊ किरतु गवाइनि टबर रोवनि धाही ॥
ओना पिंडु न पतलि किरिआ न दीवा मुए किथाऊ पाही ॥
अठसठि तीरथ देनि न ढोई ब्रहमण अंनु न खाही ॥
सदा कुचील रहहि दिनु राती मथै टिके नाही ॥
झुंडी पाइ बहनि निति मरणै दड़ि दीबाणि न जाही ॥
लकी कासे हथी फुंमण अगो पिछी जाही ॥
ना ओइ जोगी ना ओइ जंगम ना ओइ काजी मुंला ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (ये सरेवड़े जीव हिंसा के वहिम में) सिर (के बाल) उखड़वा के (कि कहीं जुआं ना पड़ जाएं) मैला पानी पीते हैंऔर झूठी रोटी मांग मांग के खाते हैं। (अपने) पाखाने को फोल के मुंह में (गंदी) हवाड़ लेते हैं ओर पानी देख के (इससे) झिझकते हैं (भाव, पानी का इस्तेमाल नहीं करते)। भेड़ों की तरह सिर (के बाल) उखड़वाते हैं, (बाल उखाड़ने वालों के) हाथ राख से भरे जाते हैं। माता-पिता के किए काम (भाव, मेहनत से कमाई करके परिवार पालने का काम) छोड़ बैठते हैं (इसलिए) इनका परिवार धाहें मार के रोता है। (ये लोक तो ऐसे ही गवाया, आगे जा के इनके परलोक का हाल सुनिए) ना तो हिन्दू मत के अनुसार (मरणोपरांत) पिण्ड पक्तल क्रिया दीआ आदि की रस्म करते हैं। मरे हुए पता नहीं कहां जा पड़ते हैं (भाव परलोक सवारने की कोई कोशश नहीं है) (हिन्दुओं के) अढ़सठ तीर्थ इन्हें कोई सहारा नहीं देते (भाव, हिन्दुओं की तरह किसी तीर्थ पर भी नहीं जाते) ब्राहमण (इनका) अंन्न नहीं खाते (भाव, ब्राहमण की भी सेवा नहीं करते)। सदा दिन रात बड़े गंदे रहते हैं। माथे पे तिलक नहीं लगाते (भाव, नहा धो के शरीर को साफ सुथरा भी नहीं करते)। सदा गर्दन गिरा के बैठे रहते हैं जैसे किसी के मरने का सोग कर रहे हैं। (भाव, इनके अंदर कोई आत्मिक हुलारा भी नहीं।) किसी सत्संग आदि में भी कभी नहीं जाते हैं। लोगों के साथ प्याले बांधे हुए हैं, हाथों में चउरियां पकड़ी हुई हैं, और (जीव हिंसा के डर से) एक कतार में चलते हैं। ना इनकी जोगियों वाली रहुरीति, ना जंगमों वाली, ना काज़ी मौलवियों वाली।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 149 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।