गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: सच्चे शबद-रूपी राहदारी से (प्रभू से मिलने की राह में) कोई रोक-टोक नहीं पड़ती। प्रभू का नाम सुन के, समझ के तथा सिमर के प्रभू के महल से बुलावा आता है। 18।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर मैं आग (भी) पहन लूँ, (या) बर्फ में घर बनां लूँ (अर्थात, अगर मेरे मन में इतनी ताकत आ जाए कि मैं आग में और बरफ में बैठ सकूँ) लोहे को भोजन बना लूँ (लोहा खा सकूँ)। अगर मैं सारे ही दुख बड़ी ही आसानी से उठा सकूँ, सारी धरती को अपने हुकम में चला सकूँ। अगर मैं सारे आसमान को तराजू पे रखके और दूसरे छाबे में चार मासे का बाँट रख के तोल सकूँ। अगर मैं अपने शरीर को इतना बढ़ा सकूँ कि कहीं समा ही न सकूँ। सारे जीवों को नाथ डाल के चलाऊँ (भाव अपने हुकम में चलाऊँ)। अगर मेरे मन में इतना बल आ जाए कि जो चाहे करूँ व कह के औरों से करवाऊँ (तो भी ये सब कुछ तुच्छ है)। पति प्रभू जितना बड़ा खुद है उतनी ही बड़ी उसकी बख्शिशें हैं। अगर रजा का मालिक सांई और भी बेअंत (ताकतों की) दातें मुझे दे दे, (ता भी ये तुच्छ हैं)। (असल बात) हे नानक ! (ये है कि वह) जिस बंदे पर मेहर की नजर करता है, उसे (अपने) उच्चे नाम के द्वारा मान सम्मान बख्शता है (भाव, इन मानसिक ताकतों से बढ़ करनाम की बरकति है)। 1।
मः 2 ॥ आखणु आखि न रजिआ सुनणि न रजे कंन ॥ अखी देखि न रजीआ गुण गाहक इक वंन ॥ भुखिआ भुख न उतरै गली भुख न जाइ ॥ नानक भुखा ता रजै जा गुण कहि गुणी समाइ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ मुंह बोल बोल के तृप्त नहीं होता (भाव, बातें करने का चस्का खत्म नहीं होता)। कान (बातें) सुनने से नहीं तृप्त होते। आँखें (रंग-रूप) देख-देख के तृप्त नहीं होती। (ये सारी इंद्रयां) एक एक किस्म के गुणों के गाहक हैं (अपने अपने रसों की गाहकी में तृप्त नहीं होते। रसों के अधीन हुई इन इंद्रियों का चस्का नहीं हटता)। समझाने से भी भूख मिट नहीं सकती। हे नानक ! तृष्णा का मारा हुआ मनुष्य तभी तृप्त हो सकता है, अगर गुणों के मालिक परमात्मा के गुण उचार के उस में लीन हो जाए। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ अगर प्रभू का नाम बिसार दें, तो बाकी सब कुछ झूठ ही कमाते हैं। (इस झूठ में मन इतना खचित हो जाता है कि) नाम से टूटे हुए झूठ के व्यापारी को माया के बंधन जकड़ के भटकाते फिरते हैं। (इसका) यह नकारा शरीर मिट्टी में ही मिल जाता है (भाव, ऐसे ही व्यर्थ चला जाता है), जो कुछ खाता पहनता है वह बल्कि और तृष्णा को बढ़ाता है। प्रभू का नाम बिसार के झूठ में लगने से प्रभू का दरबार प्राप्त नहीं होता। झूठे लालच में फंस के प्रभू का दर गवा लेते हैं (और इस करके ये जगत) जनम मरण के चक्कर में पड़ा हुआ है। (मनुष्य के) शरीर में ये (जो) तृष्णा की आग है, ये केवल गुरू के शबद द्वारा ही बुझ सकती है। 19।
सलोक मः 1 ॥ नानक गुरु संतोखु रुखु धरमु फुलु फल गिआनु ॥ रसि रसिआ हरिआ सदा पकै करमि धिआनि ॥ पति के साद खादा लहै दाना कै सिरि दानु ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! (पूर्ण) संतोष (-स्वरूप) गुरू (मानो एक) वृक्ष है (जिसे) धर्म (रूपी) फल (लगता) है और ज्ञान (रूपी) फल लगता है। प्रेम जल से रसा हुआ (ये वृक्ष) सदैव हरा रहता है। (परमात्मा की) बख्शिश से (प्रभू चरणों में) ध्यान जोड़ने से यह (ज्ञान फल) पकता है (भाव, जो मनुष्य प्रभू की मेहर से प्रभू चरणों में सुरति जोड़ता है उसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है)। (इस ज्ञान फल को) खाने वाला मनुष्य प्रभू-मिलन का आनंद पाता है, (मनुष्य के लिए प्रभू दर से) ये सबसे बड़ी बख्शिश है। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (गुरू मानो) सोने का वृक्ष है, मोंगा (श्रेष्ठ वचन) उसके पत्ते हैं। उस (गुरू) वृक्ष को, मुंह से उचारे हुए (श्रेष्ठ वचन रूपी) फल लगते हैं। (गुरू) अपने हृदय में सदा खिला रहता है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू की मेहर हो, जिसके मुंह माथे पे भाग्य हों, वह गुरू के चरणों में लग के (गुरू के चरणों को) अढ़सठ तीर्थों से भी विशेष जान के (गुरू चरणों को) पूजता है। र्निदयता, मोह, लोभ और क्रोध – ये चारों आग की नदियां (जगत में चल रही) हैं। जो जो मनुष्य इन नदियों में घुसते हैं जल जाते हैं। हे नानक ! प्रभू की मेहर से (गुरू के चरण) लग के (इन नदियों से) पार लांघना होता है। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे बंदे) (इस तृष्णा को) मार के जीवित ही मर (ता कि अंत को) पछताना ना पड़े। किसी बिरले को समझ आई है, कि ये संसार झूठा है, (आम तौर पर जीव तृष्णा के अधीन हो के) जगत के धंघे में भटकता फिरता है और सत्य के साथ प्यार नहीं डालता, (ये बात याद नहीं रखता कि) बुरा काल, नाश करने वाला काल दुनिया के सिर पे (हर वक्त खड़ा) है। ये जम प्रभू के हुकम में (हरेक के) सिर पे (मौजूद) है और दाव लगा के मारता है। (जीव के भी क्या बस?) प्रभू खुद ही अपना प्यार बख्शता है (और जीव के) मन में (अपना आप) बसाता है। जब श्वास पूरे हैं जाते हैं, पलक मात्र भी यहां ढील नहीं दी जा सकती। (ये बात) सत्गुरू की मेहर से (कोई विरला ही) समझ के सत्य से जुड़ता है। 20।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ उसके मन में और मुंह में तुमी तुंमा, जहिर, अॅक, धतूरा तथा नीम रूप फल बस रहे हैं (भाव, उसके मन में भी कड़वाहट है और मुंह से भी कड़वे वचन बोलता है)। (हे प्रभू !) जिस मनुष्य के चित्त में आप नहीं बसता, हे नानक ! ऐसे बदनसीब लोग भटकते फिरते हैं, (प्रभू के बिना और) किस के आगे (इनकी व्यथा) बताएं? (भाव, प्रभू खुद ही इनका यह रोग दूर करने वाला है)। 1।
मः 1 ॥ मति पंखेरू किरतु साथि कब उतम कब नीच ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (मनुष्य की) मति (मानो एक) पंछी है। उसके पिछले किए कामों के कारण बना हुआ स्वभावउसके साथ (साथी) है। (इस स्वभाव के संग करक ‘मति’) कभी ठीक है कभी गलत।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सच्चे शबद-रूपी राहदारी से (प्रभू से मिलने की राह में) कोई रोक-टोक नहीं पड़ती।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।