Lulla Family

अंग 143

अंग
143
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
खुंढा अंदरि रखि कै देनि सु मल सजाइ ॥
रसु कसु टटरि पाईऐ तपै तै विललाइ ॥
भी सो फोगु समालीऐ दिचै अगि जालाइ ॥
नानक मिठै पतरीऐ वेखहु लोका आइ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: फिर वेलने की लाठियों में रख के पहलवान (भाव, जिमीदार) इसे (मानो) सजा देते हैं (पीढ़ते हैं)। सारा रस कड़ाहे में डाल लेते हैं। (आग के सेक के साथ ये रस) कढ़ता है और (मानो) विलकता है। (गन्ने का) वह फोग (फोक, चूरा) भी संभाल लेते हैं और (सुखा के कड़ाहे के नीचे) आग में जला दिया जाता है। हे नानक ! (कह) हे लोगो ! आ के (गन्ने का हाल) देखो, मीठे के कारण (माया की मिठास के मोह के कारण गन्ने की तरह यूं ही) प्रताड़ित होते हैं, दुख झेलते हैं। 2। (नोट: यहां भाव ये नहीं कि अच्छों को दुख बर्दाश्त करने पड़ते हैं। शलोक का भाव ‘मिठै पतरीअै’ में आ गया है, यही ख्याल इस पौड़ी में है;)
पवड़ी ॥
इकना मरणु न चिति आस घणेरिआ ॥
मरि मरि जंमहि नित किसै न केरिआ ॥
आपनड़ै मनि चिति कहनि चंगेरिआ ॥
जमराजै नित नित मनमुख हेरिआ ॥
मनमुख लूण हाराम किआ न जाणिआ ॥
बधे करनि सलाम खसम न भाणिआ ॥
सचु मिलै मुखि नामु साहिब भावसी ॥
करसनि तखति सलामु लिखिआ पावसी ॥11॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ कई लोग (दुनिया की) बड़ी बड़ी आशाएं (मन में बनाए रहते हैं, मौत का ख्याल उनके) चित्त में भी नहीं आता। वे रोज पैदा होते मरते हैं (भाव, हर वक्त संशयों में दुखी होते हैं; कभी एक आध घड़ी भर के लिए सुख तो फिर दुखी के दुखी)। किसी के भी (कभी यार) नहीं बनते। वे लोग अपने मन में चित्त में (अपने आपको) ठीक कहते हैं। (पर) उन मनमुखों को सदा ही जमराज देखता रहता है (भाव, समझते तो अपने आप को नेक हैं पर करतूतें ऐसी हैं जिस करके जमों के वस पड़ते हैं)। अपने मन के पीछे चलने वाले लूण हरामी लोग परमात्मा के किए उपकार (की सार) नहीं जानते। फसे हुए ही (उसे) सलामें करते हैं, (इस तरह) वे पति को प्यारे नहीं लग सकते। (जिस मनुष्य को) ईश्वर मिल गया है, जिसके मुंह में ईश्वर का नाम है, वह पति (प्रभू) को प्यारा लगता है। उसे तख्त पे बैठे को सारे लोग सलाम करते हैं, (धुर से ही रॅब द्वारा) लिखे इस लेख (के फल को) प्राप्त करता है। 11।
मः 1 सलोकु ॥
मछी तारू किआ करे पंखी किआ आकासु ॥
पथर पाला किआ करे खुसरे किआ घर वासु ॥
कुते चंदनु लाईऐ भी सो कुती धातु ॥
बोला जे समझाईऐ पड़ीअहि सिंम्रिति पाठ ॥
अंधा चानणि रखीऐ दीवे बलहि पचास ॥
चउणे सुइना पाईऐ चुणि चुणि खावै घासु ॥
लोहा मारणि पाईऐ ढहै न होइ कपास ॥
नानक मूरख एहि गुण बोले सदा विणासु ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1 शलोक॥ तैरने योग्य पानी मछली का क्या कर सकता है? (चाहे कितना ही गहरा क्यों ना हो मछली को कोई परवाह नहीं)। आकाश पंछी का क्या कर सकता है? (आकाश कितना ही खुला हो जाए पंछी को कोई परवाह नहीं) (पानी अपनी गहराई और आकाश अपने खुले होने की सीमा का असर नहीं डाल सकते)। पाला (कक्कर) पत्थर पर असर नहीं कर सकता। घर के बसने का असर हिजड़े पर नहीं पड़ता। अगर कुत्ते को चंदन भी लगा दें, तो भी उसका असला कुत्तों वाला ही रहता है। बहरे मनुष्य को समझाएं और स्मृतियों के पाठ उसके पास करें (वह तो सुन ही नहीं सकता)। अंधे मनुष्य को प्रकाश में रखा जाए, (उसके पास चाहे) पचास दीए भले जलें (उसे कुछ नहीं दिखना)। चरने गए पशुओं के झुण्ड के आगे अगर सोना बिखेर दें, तो भी वह घास चुग चुग के ही खाएंगे (सोने की कद्र नहीं पड़ सकती)। लोहे का कुष्ता कर दें, तो भी ढल के वह कपास (जैसा नर्म) नहीं बन सकता। हे नानक ! यहीबातें मूर्ख की हैं, (कितनी भी मति दो, वह जब भी) बोलता है सदा (वही बोलता है जिससे किसी का) नुकसान ही हो। 6।
मः 1 ॥
कैहा कंचनु तुटै सारु ॥
अगनी गंढु पाए लोहारु ॥
गोरी सेती तुटै भतारु ॥
पुतंी गंढु पवै संसारि ॥
राजा मंगै दितै गंढु पाइ ॥
भुखिआ गंढु पवै जा खाइ ॥
काला गंढु नदीआ मीह झोल ॥
गंढु परीती मिठे बोल ॥
बेदा गंढु बोले सचु कोइ ॥
मुइआ गंढु नेकी सतु होइ ॥
एतु गंढि वरतै संसारु ॥
मूरख गंढु पवै मुहि मार ॥
नानकु आखै एहु बीचारु ॥
सिफती गंढु पवै दरबारि ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ अगर कांसा, सोना या लोहा टूट जाए, आग से लोहार (आदि) जोड़ लगा देता है। अगर पत्नी से पति नाराज हो जाए, तो जगत में (इनका) जोड़ पुत्रों द्वारा बनता है। राजा (प्रजा से मामला, कर) मांगता है (ना दिया जाए तो राजा-प्रजा की बिगड़ती है, मामला) देने से (राजा-प्रजा का) मेल बनता है। भूख से आतुर हुए आदमी का (अपने शरीर से तभी) संबंध बना रहता है अगर वह (खाना) खाए। काल थमता है (भाव, सूखा समाप्त होता है) अगर खूब बरसात हो और नदियां चलें। मीठे वचनों से प्यार का जोड़ जुड़ता है (भाव, प्यार पक्का होता है)। वेद (आदि धार्मिक पुस्तकों) से (मनुष्य का तभी) जोड़ जुड़ता है अगर मनुष्य सच बोले। मरे हुए लोगों का (जगत से) संबंध बना रहता है (अर्थात, लोग उसे ही याद रखते हैं) अगर मनुष्य भलाई और दान करता रहे। (सो) इस तरह के संबंध से जगत (का व्यवहार) चलता है। मुंह पे मार पड़ने से मूर्ख (के मूर्खपन) को रोक लगती है। नानक ये विचार (की बात) बताता है, कि (परमात्मा की) सिफत सालाह के द्वारा (प्रभू के) दरबार में (आदर-प्यार का) जोड़ जुड़ता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे कुदरति साजि कै आपे करे बीचारु ॥
इकि खोटे इकि खरे आपे परखणहारु ॥
खरे खजानै पाईअहि खोटे सटीअहि बाहर वारि ॥
खोटे सची दरगह सुटीअहि किसु आगै करहि पुकार ॥
सतिगुर पिछै भजि पवहि एहा करणी सारु ॥
सतिगुरु खोटिअहु खरे करे सबदि सवारणहारु ॥
सची दरगह मंनीअनि गुर कै प्रेम पिआरि ॥
गणत तिना दी को किआ करे जो आपि बखसे करतारि ॥12॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा स्वयं ही दुनिया पैदा करके स्वयं ही इसका ध्यान रखता है। (पर यहां) कई जीव खोटे हैं (भाव, मनुष्यता के पैमाने पर हल्के हैं) और कई (शाही सिक्के की तरह) खरे हैं, (इन सब की) परख करने वाला भी वह स्वयं ही है। (रुपए आदि की तरह) खरे लोग (प्रभू के) खजाने में पाए जाते हैं (भाव, उनका जीवन परवान होता है, और) खोटे बाहर की ओर फेंक दिए जाते हैं (अर्थात, ये जीव भले लोगों में मिल नहीं सकते), सच्ची दरगाह में इनको धक्का मिलता है। कोई अन्य जगह ऐसी नहीं जहाँ ये (सहायता के लिए) फरयाद कर सकें। (इन हल्के जीवन वाले जीवों के लिए) करने वाली सबसे अच्छी बात यही है कि सतिगुरू की शरण पड़ें। गुरू खोटे से खरे बना देता है (क्योंकि गुरू अपने) शबद द्वारा खरे बनाने के स्मर्थ है। (फिर वह) सतिगुर के बख्शे प्रेम प्यार के कारण परमात्मा की दरगाह में आदर पाते हैं और जिन्हें करतार ने स्वयं बख्श लिया उनके गुनाहों का किसी ने क्या करना?। 12।
सलोकु मः 1 ॥
हम जेर जिमी दुनीआ पीरा मसाइका राइआ ॥
मे रवदि बादिसाहा अफजू खुदाइ ॥
एक तूही एक तुही ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ पीर, शेख, राय (आदि) सारी दुनिया धरती के नीचे (अंत को समा जाते हैं) (इस धरती पे हुकम करने वाले) बादशाह भी नाश हो जाते हैं। सदा टिके रहने वाला, हे खुदाय ! एक आप ही है ! एक आप ही है ! । 1।
मः 1 ॥
न देव दानवा नरा ॥ न सिध साधिका धरा ॥
असति एक दिगरि कुई ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ ना देवते, ना दैंत, ना मनुष्य, ना योग साधना में माहिर योगी, ना योग साधना करने वाले, कोई भी धरती पे नहीं रहा। सदा स्थिर रहने वाला और दूसरा कौन है?

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “फिर वेलने की लाठियों में रख के पहलवान (भाव, जिमीदार) इसे (मानो) सजा देते हैं (पीढ़ते हैं)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।