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अंग 144

अंग
144
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
एक तुई एक तुई ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सदा कायम रहने वाला, हे प्रभू ! एक आप ही है, एक आप ही है। 2।
मः 1 ॥
न दादे दिहंद आदमी ॥ न सपत जेर जिमी ॥
असति एक दिगरि कुई ॥
एक तुई एक तुई ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ ना ही इंसाफ करने वाले (भाव, दूसरों के झगड़े निपटाने वाले) आदमी सदा टिके रहने वाले हैं, ना ही धरती के नीचे (पाताल में) ही सदा रह सकते हैं। सदा स्थिर रहने वाला और दूसरा कौन है? सदा कायम रहने वाला, हे प्रभू ! एक आप ही है, एक आप ही है। 3।
मः 1 ॥
न सूर ससि मंडलो ॥ न सपत दीप नह जलो ॥ अंन पउण थिरु न कुई ॥
एकु तुई एकु तुई ॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ ना सूरज ना चंद्रमा, ना यह दिखता आकाश, ना धरती के सप्त द्वीप ना पानी, ना अन्न, ना हवा- कोई भी स्थिर रहने वाला नहीं। सदा कायम रहने वाला, हे प्रभू ! एक आप ही है, एक आप ही है।
मः 1 ॥
न रिजकु दसत आ कसे ॥
हमा रा एकु आस वसे ॥
असति एकु दिगर कुई ॥
एक तुई एकु तुई ॥5॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (जीवों का) रिजक (परमात्मा के बिना) किसी और के हाथ में नहीं। सब जीवों को बस एक प्रभू की आस है (क्योंकि, सदा स्थिर) और है ही कोई नहीं। सदा रहने वाला, हे प्रभू ! एक आप ही है, एक आप ही है। 5।
मः 1 ॥
परंदए न गिराह जर ॥
दरखत आब आस कर ॥
दिहंद सुई ॥
एक तुई एक तुई ॥6॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ परिंदों के पल्ले धन नही है। वे (प्रभू के बनाए हुए) रुखों व पानी का आसरा ही लेते हैं। उनको रोजी देने वाला वही प्रभू है। (हे प्रभू ! इनका रिजक दाता) एक आप ही है, एक आप ही है। 6।
मः 1 ॥
नानक लिलारि लिखिआ सोइ ॥
मेटि न साकै कोइ ॥
कला धरै हिरै सुई ॥
एकु तुई एकु तुई ॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! (जीव के) माथे पर (जो कुछ करतार द्वारा) लिखा गया है, उसे कोई मिटा नहीं सकता। (जीव के अंदर) वही सक्ता डालता है, और वही छीन लेता है। (हे प्रभू !जीवों को सक्ता देने वाला और छीनने वाला) एक आप ही है, एक आप ही है। 7।
पउड़ी ॥
सचा तेरा हुकमु गुरमुखि जाणिआ ॥
गुरमती आपु गवाइ सचु पछाणिआ ॥
सचु तेरा दरबारु सबदु नीसाणिआ ॥
सचा सबदु वीचारि सचि समाणिआ ॥
मनमुख सदा कूड़िआर भरमि भुलाणिआ ॥
विसटा अंदरि वासु सादु न जाणिआ ॥
विणु नावै दुखु पाइ आवण जाणिआ ॥
नानक पारखु आपि जिनि खोटा खरा पछाणिआ ॥13॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) आपका हुकम सदा स्थिर रहने वाला है। गुरू के सन्मुख होने से इसकी समझ पड़ती है। जिसने गुरू की मति ले के स्वैभाव दूर कर लिया है, उसने आपको सदा कायम रहने वाले को पहिचान लिया है। हे प्रभू ! आपका दरबार सदा स्थिर है (इस तक पहुँचने के लिए गुरू का) शबद राहदारी है। जिन्होंने सच्चे शबद को विचारा है वे सच में लीन हो जाते हैं। (पर) मन के पीछे चलने वाले झूठ (ही) फैलाते हैं, भटकना में भटके रहते हैं। उनका वासा गंदगी में ही रहता है। (शबद का) आनंद वह नहीं समझसके; परमात्मा के नाम के बिना दुख पा के जनम मरण (के चक्र में पड़े रहते हैं)। हे नानक ! परखने वाला प्रभू खुद ही है, जिस ने खोटे खरे को पहिचाना है (भाव, प्रभू स्वयं ही जानता है कि खोटा कौन है और खरा कौन है)। 13।
सलोकु मः 1 ॥
सीहा बाजा चरगा कुहीआ एना खवाले घाह ॥
घाहु खानि तिना मासु खवाले एहि चलाए राह ॥
नदीआ विचि टिबे देखाले थली करे असगाह ॥
कीड़ा थापि देइ पातिसाही लसकर करे सुआह ॥
जेते जीअ जीवहि लै साहा जीवाले ता कि असाह ॥
नानक जिउ जिउ सचे भावै तिउ तिउ देइ गिराह ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ इन शेरों, बाजों, चरगों, कुहियों (आदि मासाहारियों को अगर चाहे तो) घास खिला देता है (अर्थात उनके माँस खाने की बृति तबदील कर देता है)। जो घास खाते हैं उन्हे मास खिला देता है, सो प्रभू ऐसे राह चला देता है। (प्रभू) बहती नदियों में टिब्वे दिखा देता है, रेतीली जगहों में गहरे पानी बना देता है। कीड़े को बादशाही (तख्त) के ऊपर स्थापित कर देता है (बैठा देता है), (और बादशाहों के) लश्करों को राख कर देता है। जितने भी जीव (जगत में) जीवित हैं, साँस ले के जीवत है (अर्थात तब तक जीवित हैं जब तक साँस लेते हैं, पर अगर प्रभू) जीवित रखना चाहे, तो ‘श्वासों’ की भी क्या मुथाजगी? हे नानक ! जैसे जैसे प्रभू की रजा है, वैसे वैसे (जीवों) को रोजी देता है। 1।
मः 1 ॥
इकि मासहारी इकि त्रिणु खाहि ॥
इकना छतीह अंम्रित पाहि ॥
इकि मिटीआ महि मिटीआ खाहि ॥
इकि पउण सुमारी पउण सुमारि ॥
इकि निरंकारी नाम आधारि ॥
जीवै दाता मरै न कोइ ॥
नानक मुठे जाहि नाही मनि सोइ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ कई जीव माँस खाने वाले हैं, कई घास खाने वाले है। कई प्राणियों को कई किस्मों के स्वादिष्ट भोजन मिलते हैं, और कई मिट्टी में (रह कर) मिट्टी खाते हैं। कई प्रणायाम के अभ्यासी प्रणायाम में लगे रहते हैं। कई निरंकार के उपासक (उसके) नाम के आसरे जीते हैं। जो मनुष्य (ये मानता है कि) सिर पे दाता रक्षक है वह (प्रभू को विसार के आत्मिक मौत) नहीं मरता। हे नानक ! वे जीव ठगे जाते हैं, जिनके मन में वह प्रभू नहीं। 2।
पउड़ी ॥
पूरे गुर की कार करमि कमाईऐ ॥
गुरमती आपु गवाइ नामु धिआईऐ ॥
दूजी कारै लगि जनमु गवाईऐ ॥
विणु नावै सभ विसु पैझै खाईऐ ॥
सचा सबदु सालाहि सचि समाईऐ ॥
विणु सतिगुरु सेवे नाही सुखि निवासु फिरि फिरि आईऐ ॥
दुनीआ खोटी रासि कूड़ु कमाईऐ ॥
नानक सचु खरा सालाहि पति सिउ जाईऐ ॥14॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ पूरे सतिगुरू की बताए हुए कर्म भी (प्रभू की) मेहर से ही किए जा सकते हैं। गुरू की मति से स्वै भाव गवा के प्रभू का नाम सिमरा जा सकता है। (प्रभू की बंदगी बिसार के) और कामों में व्यस्त रहने से मानस जनम व्यर्थ जाता है, (क्यूँकि) नाम को बिसार के जो कुछ भी पहनते खाते हैं, वह (आत्मिक जीवन के वास्ते) ज़हर (समान) हो जाता है। सतिगुरू का सच्चा शबद गाने से सच्चे प्रभू में जुड़ते हैं। गुरू की बताई कार करे बिना सुख में (मन का) टिकाव नहीं हो सकता, मुड़ मुड़ जनम (मरण) में आते जाते हैं। दुनिया (का प्यार) खोटी पूँजी है, ये कमायी झूठ (का व्यापार है)। हे नानक ! सिर्फ सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करके (यहां से) आदर से जाते हैं। 14।
सलोकु मः 1 ॥
तुधु भावै ता वावहि गावहि तुधु भावै जलि नावहि ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जब आपकी रजा होती है (भाव, ये आपकी रजा है कि कई जीव साज) बजाते हैं और गाते हैं। (तीर्थों के) जल में स्नन करते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सदा कायम रहने वाला, हे प्रभू ! एक आप ही है, एक आप ही है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।