न दादे दिहंद आदमी ॥ न सपत जेर जिमी ॥
असति एक दिगरि कुई ॥
एक तुई एक तुई ॥3॥
न सूर ससि मंडलो ॥ न सपत दीप नह जलो ॥ अंन पउण थिरु न कुई ॥
एकु तुई एकु तुई ॥4॥
न रिजकु दसत आ कसे ॥
हमा रा एकु आस वसे ॥
असति एकु दिगर कुई ॥
एक तुई एकु तुई ॥5॥
परंदए न गिराह जर ॥
दरखत आब आस कर ॥
दिहंद सुई ॥
एक तुई एक तुई ॥6॥
नानक लिलारि लिखिआ सोइ ॥
मेटि न साकै कोइ ॥
कला धरै हिरै सुई ॥
एकु तुई एकु तुई ॥7॥
सचा तेरा हुकमु गुरमुखि जाणिआ ॥
गुरमती आपु गवाइ सचु पछाणिआ ॥
सचु तेरा दरबारु सबदु नीसाणिआ ॥
सचा सबदु वीचारि सचि समाणिआ ॥
मनमुख सदा कूड़िआर भरमि भुलाणिआ ॥
विसटा अंदरि वासु सादु न जाणिआ ॥
विणु नावै दुखु पाइ आवण जाणिआ ॥
नानक पारखु आपि जिनि खोटा खरा पछाणिआ ॥13॥
सीहा बाजा चरगा कुहीआ एना खवाले घाह ॥
घाहु खानि तिना मासु खवाले एहि चलाए राह ॥
नदीआ विचि टिबे देखाले थली करे असगाह ॥
कीड़ा थापि देइ पातिसाही लसकर करे सुआह ॥
जेते जीअ जीवहि लै साहा जीवाले ता कि असाह ॥
नानक जिउ जिउ सचे भावै तिउ तिउ देइ गिराह ॥1॥
इकि मासहारी इकि त्रिणु खाहि ॥
इकना छतीह अंम्रित पाहि ॥
इकि मिटीआ महि मिटीआ खाहि ॥
इकि पउण सुमारी पउण सुमारि ॥
इकि निरंकारी नाम आधारि ॥
जीवै दाता मरै न कोइ ॥
नानक मुठे जाहि नाही मनि सोइ ॥2॥
पूरे गुर की कार करमि कमाईऐ ॥
गुरमती आपु गवाइ नामु धिआईऐ ॥
दूजी कारै लगि जनमु गवाईऐ ॥
विणु नावै सभ विसु पैझै खाईऐ ॥
सचा सबदु सालाहि सचि समाईऐ ॥
विणु सतिगुरु सेवे नाही सुखि निवासु फिरि फिरि आईऐ ॥
दुनीआ खोटी रासि कूड़ु कमाईऐ ॥
नानक सचु खरा सालाहि पति सिउ जाईऐ ॥14॥
तुधु भावै ता वावहि गावहि तुधु भावै जलि नावहि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सदा कायम रहने वाला, हे प्रभू ! एक आप ही है, एक आप ही है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।