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अंग 142

अंग
142
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
परबतु सुइना रुपा होवै हीरे लाल जड़ाउ ॥
भी तूंहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: अगर हीरे व लालों से जड़े हुए सोने व चाँदी के पहाड़ बन जाएं, तो भी (हे प्रभू ! मैं इन पदार्थों में ना फंसूँ और) आपकी ही सिफत सालाह करूँ। आपकी उस्तति करने का मेरा चाव खत्म ना हैं जाए।
मः 1 ॥
भार अठारह मेवा होवै गरुड़ा होइ सुआउ ॥
चंदु सूरजु दुइ फिरदे रखीअहि निहचलु होवै थाउ ॥
भी तूंहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ अगर सारी बनस्पति मेवा बन जाए, जिसका स्वाद बहुत रसीला हो। अगर मेरी रहने की जगह अटल हो जाए तो चाँद और सूरज दोनों (मेरी रहाइश की सेवा करने के लिए) सेवा के लिए लगाए जांए, (तो भी हे प्रभू ! मैं इनमें ना फसूँ और) आपकी ही सिफत सालाह करूँ। आपकी उस्तति करने का मेरा चाव खत्म ना हैं जाए। 2।
मः 1 ॥
जे देहै दुखु लाईऐ पाप गरह दुइ राहु ॥
रतु पीणे राजे सिरै उपरि रखीअहि एवै जापै भाउ ॥
भी तूंहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥3॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ यदि (मेरे) शरीर को दुख लग जाए, दोनों मनहूस तारे राहू और केआप (मुझ पे लागू हैं जाएं), जालिम राजे मेरे सिर पे हों, अगर आपका प्यार इस तरह (भाव, इन दुखों की शकल में ही मेरे ऊपर) प्रगट हो, तो भी (हे प्रभू ! मैं इससे घबरा के आपको विसार ना दूँ) आपकी ही सिफत सालाह करूँ। आपकी उस्तति करने का मेरा चाव खत्म ना हैं जाए। 3।
मः 1 ॥
अगी पाला कपड़ु होवै खाणा होवै वाउ ॥
सुरगै दीआ मोहणीआ इसतरीआ होवनि नानक सभो जाउ ॥
भी तूहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (अगर गरमियों की) धूप और (सर्दियों का) पाला मेरे (पहनने के) कपड़े हों (अर्थात, यदि मैं नंगा रह के धूप और पाला भी सहूँ), अगर सिर्फ हवा मेरी खुराक हो (भाव, अगर मैं पवनाहारी हो जाऊँ, तो भी, हे प्रभू ! आपकी सिफत सालाह के सामने ये तुच्छ हैं)। यदि स्वर्ग की अप्सराएं भी मेरे घर में हों, तो भी, हे नानक ! ये तो नाशवंत हैं (इनके मोह में फस के मैं आपको ना विसारूँ) आपकी ही सिफत सालाह करूँ। आपकी उस्तति करने का मेरा चाव खत्म ना हैं जाए। 4।
पवड़ी ॥
बदफैली गैबाना खसमु न जाणई ॥
सो कहीऐ देवाना आपु न पछाणई ॥
कलहि बुरी संसारि वादे खपीऐ ॥
विणु नावै वेकारि भरमे पचीऐ ॥
राह दोवै इकु जाणै सोई सिझसी ॥
कुफर गोअ कुफराणै पइआ दझसी ॥
सभ दुनीआ सुबहानु सचि समाईऐ ॥
सिझै दरि दीवानि आपु गवाईऐ ॥9॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जो मनुष्य) छुप के पाप कमाता है और मालिक को (हर जगह हाजिर नाजर नहीं) समझता, उसे पागल समझना चाहिए, वह अपनी अस्लियत को नहीं पहचानता। जगत में (विकारों की) बिखांद (इतनी) बुरी है कि (विकारों में फंसा मनुष्य विकारों के) झमेलों में ही खपता रहता है। प्रभू का नाम छोड़ के बुरे कर्मों व भटकना में खुआर होता है। (मनुष्य जीवन के) दो रास्ते हैं (माया का या नाम का), इस (जीवन में) वही कामयाब होता है जो (दोनों रास्तों में से) एक परमात्मा को याद रखता है, (नहीं तो) झूठ में गलतान हुआ हुआ ही जलता है। जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले प्रभू में जुड़ा हुआ है, उसके लिए सारा जगत ही सुंदर है। वह खुदी मिटा के प्रभू के दर पर प्रभू की दरगाह में सुर्खरू होता है। 9।
मः 1 सलोकु ॥
सो जीविआ जिसु मनि वसिआ सोइ ॥
नानक अवरु न जीवै कोइ ॥
जे जीवै पति लथी जाइ ॥
सभु हरामु जेता किछु खाइ ॥
राजि रंगु मालि रंगु ॥ रंगि रता नचै नंगु ॥
नानक ठगिआ मुठा जाइ ॥
विणु नावै पति गइआ गवाइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 श्लोक॥ (असल में) वह मनुष्य जीवित है जिसके मन में परमात्मा बस रहा है। हे नानक ! (बंदगी वाले के बिना) कोई और जीवित नहीं। अगर नाम-विहीन (देखने को) जीवित (भी) है तो इज्जत गवा के (यहां से) जाता है। जो कुछ (यहां) खाता-पीता है, हराम ही खाता है। जिस मनुष्य को राज में प्यार है, माल में मोह है, वह इस मोह में मस्ताया हुआ बे-शर्म हो के नाचता है (भाव, जलता है, अकड़ता है)। हे नानक ! मनुष्य ठॅगा जा रहा है, लूटा जा रहा है, प्रभू के नाम से विहीन मनुष्य इज्जत गवा के (यहाँ से) जाता है। 1।
मः 1 ॥
किआ खाधै किआ पैधै होइ ॥
जा मनि नाही सचा सोइ ॥
किआ मेवा किआ घिउ गुड़ु मिठा किआ मैदा किआ मासु ॥
किआ कपड़ु किआ सेज सुखाली कीजहि भोग बिलास ॥
किआ लसकर किआ नेब खवासी आवै महली वासु ॥
नानक सचे नाम विणु सभे टोल विणासु ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1II (स्वादिष्ट भोजन) खाने तथा (सुंदर कपड़े) पहनने का क्या स्वाद? (जिस प्रभू ने सारे सुंदर पदार्थ दिए हैं) अगर वह सच्चा प्रभू दिल में नहीं बसता, (तो) क्या हुआ यदि मेवे, घी, मीठा गुड़, मैदा और मास आदि पदार्थ इस्तेमाल किए? क्या हुआ यदि (सुंदर) कपड़े और आरामदायक सेज मिल गई और अगर मौजें कर लीं? तो क्या बन गया अगर फौज, चौबदार, चौरी बरदार मिल गए और महलों में बसना नसीब हो गया? हे नानक ! परमात्मा के नाम के बिना सारे पदार्थ नाशवंत हैं। 2।
पवड़ी ॥
जाती दै किआ हथि सचु परखीऐ ॥
महुरा होवै हथि मरीऐ चखीऐ ॥
सचे की सिरकार जुगु जुगु जाणीऐ ॥
हुकमु मंने सिरदारु दरि दीबाणीऐ ॥
फुरमानी है कार खसमि पठाइआ ॥
तबलबाज बीचार सबदि सुणाइआ ॥
इकि होए असवार इकना साखती ॥
इकनी बधे भार इकना ताखती ॥10॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू के दर पे तो) सच्चा नाम (रूपी सौदा) परखा जाता है, जाति के हाथ में कुछ नहीं है (भाव, किसी की जाति वर्ण का कोई लिहाज नहीं होता। (जाति का अहंकार जहर के समान है) अगर किसी के पास जहर हो (चाहे वह किसी भी जाति का हो) अगर जहर खाएगा तो मरेगा। अकाल-पुरख का यह न्याय हरेक युग में घटित होता है (भाव किसी भी युग में जाति का लिहाज नहीं हुआ)। प्रभू के दर पे, प्रभू की दरगाह में वही इज्जत वाला है जो प्रभू का हुकम मानता है। पति (प्रभू) ने (जीव को) हुकम मानने की कार दे के (जगत में) भेजा है। नगारची गुरू ने शबद के द्वारा यही बात सुनाई है (अर्थात गुरू ने शबद के द्वारा यही ढंढोरा दे दिया है)। (ये ढंढोरा सुन के) कई (गुरमुख) तो सवार हो गए हैं (भाव, इस राह पर चल पड़े हैं), कई लोग तैयार हो गए हैं, कईयों ने असबाब लाद लिए हैं, और कई जल्दी दौड़ पड़े है। 10।
सलोकु मः 1 ॥
जा पका ता कटिआ रही सु पलरि वाड़ि ॥
सणु कीसारा चिथिआ कणु लइआ तनु झाड़ि ॥
दुइ पुड़ चकी जोड़ि कै पीसण आइ बहिठु ॥
जो दरि रहे सु उबरे नानक अजबु डिठु ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ जब (गेहूँ आदिक फसल का पौधा) पक जाता है तो (ऊपर ऊपर से) काट लेते हैं। (गेहूँ की) नाड़ और (खेत की) बाड़ पीछे रह जाती है। इसे सिट्टों समेत मसल लेते हैं और हवा में उड़ा के दाने अलग कर लेते है। फिरचक्की के दोनों हिस्से रख के (इन दानों को) पीसने के लिए (प्राणी) आ बैठता है। (पर) हे नानक ! एक आश्चर्यजनक तमाशा देखा है, जो दाने (चक्की के) दर पर (भाव, केंद्र में किल्ली के नजदीक) रहते हैं, वे पिसने से बच जाते हैं (इसी तरह, जो मनुष्य प्रभू के दर पर रहते हैं उन्हें जगत के विकार छूह नहीं सकते)। 1।
मः 1 ॥
वेखु जि मिठा कटिआ कटि कुटि बधा पाइ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (हे भाई !) देख, कि गन्ना काटा जाता है, छील छील के, रस्सी से बाँध लेते हैं (भाव बंडल बना लेते हैं)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर हीरे व लालों से जड़े हुए सोने व चाँदी के पहाड़ बन जाएं, तो भी (हे प्रभू ! मैं इन पदार्थों में ना फंसूँ और) आपकी ही सिफत सालाह करूँ।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।