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अंग 141

अंग
141
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मः 1 ॥
हकु पराइआ नानका उसु सूअर उसु गाइ ॥
गुरु पीरु हामा ता भरे जा मुरदारु न खाइ ॥
गली भिसति न जाईऐ छुटै सचु कमाइ ॥
मारण पाहि हराम महि होइ हलालु न जाइ ॥
नानक गली कूड़ीई कूड़ो पलै पाइ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! पराया हक मुसलमान के लिए सूअर है और हिन्दू के लिए गाय है। गुरू पैग़ंबर तभी सिफारिश करते हैं अगर मनुष्य पराया हक ना मारे। निरी बातों से बहिश्त नही जाया जा सकता। सॅच को (भाव, जिसे सच्चा रास्ता कहते हो, उसे) अमली जीवन में लाने से ही निजात मिलती है। (बहस आदि बातों के) मसाले हराम माल में डालने से वह हक का माल नहीं बन जाते। हे नानक ! झूठी बातें करने से झूठ ही मिलता है। 2।
मः 1 ॥
पंजि निवाजा वखत पंजि पंजा पंजे नाउ ॥
पहिला सचु हलाल दुइ तीजा खैर खुदाइ ॥
चउथी नीअति रासि मनु पंजवी सिफति सनाइ ॥
करणी कलमा आखि कै ता मुसलमाणु सदाइ ॥
नानक जेते कूड़िआर कूड़ै कूड़ी पाइ ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (मुसलमानों की) पाँच नमाजें हैं, (उनके) पाँच वक्त हैं और पाँचों ही निमाजों के (अलग अलग) पाँच नाम हैं। (पर, हमारे मत में असल निमाजें यूँ हैं) सच बोलना नमाज का पहला नाम है (भाव, सुबह की पहली नमाज है), हक की कमाई दूसरी नमाज है, रॅब से सबका भला माँगना नमाज का तीसरा नाम है। नीयति को साफ करना मन को साफ रखना ये चौथी नमाज है और परमात्मा की सिफति सालाह व उस्तति करनी ये पाँचवीं नमाज है। (इन पाँचों नमाजों के साथ साथ) उच्च आचरण बनाने जैसी कलमा पढ़ें तो (अपने आप को) मुसलमान कहलवाएं (भाव, तो ही सच्चा मुसलमान कहलवा सकता है)। हे नानक ! (इन नमाजों व कलमें से टूटे हुए) जितने भी हैं वे झूठ के व्यापारी हैं और झूठे की इज्जत भी झूठी ही होती है। 3।
पउड़ी ॥
इकि रतन पदारथ वणजदे इकि कचै दे वापारा ॥
सतिगुरि तुठै पाईअनि अंदरि रतन भंडारा ॥
विणु गुर किनै न लधिआ अंधे भउकि मुए कूड़िआरा ॥
मनमुख दूजै पचि मुए ना बूझहि वीचारा ॥
इकसु बाझहु दूजा को नही किसु अगै करहि पुकारा ॥
इकि निरधन सदा भउकदे इकना भरे तुजारा ॥
विणु नावै होरु धनु नाही होरु बिखिआ सभु छारा ॥
नानक आपि कराए करे आपि हुकमि सवारणहारा ॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। कई मनुष्य (परमात्मा की सिफत सालाह रूपी) कीमती सौदा कमाते हैं, और कई (दुनिया रूपी) कच्चे के व्यापारी हैं। (प्रभू के गुण-रूप ये) रत्नों के खजाने (मनुष्य के) अंदर ही हैं, पर सतिगुरू के प्रसन्न होने से ही मिलते हैं। गुरू (की शरण आए) बगैर किसी को ये खजाना नहीं मिला। झूठ के व्यापारी अंधे लोग (माया की खातिर ही दर दर पे) तरले करते मर जाते हैं। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं, वे माया में खचित होते हैं। उन्हें असल राह नहीं सूझता। (इस दुखी हालत की) पुकार भी वह लोग किस के सामने करें? एक प्रभू के बगैर और कोई (सहायता करने वाला ही) नहीं। (नाम रूपी खजाने के बगैर) कई कंगाल सदा (दर दर पे) तरले लेते फिरते हैं, इनके (हृदय रूपी) खजाने (बंदगी रूपी धन से) भरे पड़े हैं। (परमात्मा के) नाम के बिना और कोई (साथ निभने वाला) धन नहीं है, तथा माया का धन राख के (समान) है। (पर) हे नानक ! सब (जीवों में बैठा प्रभू) स्वयं ही (काँच का व रत्नों का व्यापार) कर रहा है। (जिनको सुधारता है उनको अपने) हुकम में ही सीधे राह पे डाल लेता है। 7।
सलोकु मः 1 ॥
मुसलमाणु कहावणु मुसकलु जा होइ ता मुसलमाणु कहावै ॥
अवलि अउलि दीनु करि मिठा मसकल माना मालु मुसावै ॥
होइ मुसलिमु दीन मुहाणै मरण जीवण का भरमु चुकावै ॥
रब की रजाइ मंने सिर उपरि करता मंने आपु गवावै ॥
तउ नानक सरब जीआ मिहरंमति होइ त मुसलमाणु कहावै ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अर्थ: (असल) मुसलमान कहलवाना बड़ा ही मुश्किल है। अगर (वैसा) बने तो मनुष्य अपने आप को मुसलमान कहलवाए। (असली मुसलमान बनने के लिए) सबसे पहले (ये जरूरी है कि) मजहब प्यारा लगे। (फिर) जैसे मिसकले से जंग उतारते हैं वैसे ही (अपनी कमाई का) धन (जरूरतमंदों में) बाँट के बरते (और इस तरह दौलत का अहंकार दूर करे)। मजहब की अगुवाई में चल के मुसलमान बने, और सारी उम्र की भटकना मिटा डाले (अर्थात, सारी उम्र कभी मजहब के राह से अलग ना जाए)। रॅब के किए को स्वीकार करे, कादर को ही (सब कुछ करने वाला) माने और खुदी मिटा दे। इस तरह, हे नानक ! (रॅब के पैदा किए) सारे लोगों से प्यार करे। ऐसा बने, तो मुसलमान कहलवाए। 1।
महला 4 ॥
परहरि काम क्रोधु झूठु निंदा तजि माइआ अहंकारु चुकावै ॥
तजि कामु कामिनी मोहु तजै ता अंजन माहि निरंजनु पावै ॥
तजि मानु अभिमानु प्रीति सुत दारा तजि पिआस आस राम लिव लावै ॥
नानक साचा मनि वसै साच सबदि हरि नामि समावै ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (अगर मनुष्य) काम, गुस्सा, झूठ व निंदा छोड़ दे, अगर माया का लालच छोड़ के अहंकार (भी) दूर कर ले। अगर विषयों की वासना छोड़ के, स्त्री का मोह त्याग दे तो मनुष्य माया की कालिख में रहता हुआ ही माया-रहित प्रभू को पा लेता है। (यदि मनुष्य) अहंकार दूर करके पुत्र व पत्नी का मोह त्याग दे, अगर (दुनिया के पदार्थों की) आशा और तृष्णा छोड़ के परमात्मा के साथ सुरति जोड़ ले, तो, हे नानक ! सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा उसके मन में बस जाता है। गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा के नाम में वह लीन हो जाता है। 2।
पउड़ी ॥
राजे रयति सिकदार कोइ न रहसीओ ॥
हट पटण बाजार हुकमी ढहसीओ ॥
पके बंक दुआर मूरखु जाणै आपणे ॥
दरबि भरे भंडार रीते इकि खणे ॥
ताजी रथ तुखार हाथी पाखरे ॥ बाग मिलख घर बार किथै सि आपणे ॥ तंबू पलंघ निवार सराइचे लालती ॥
नानक सच दातारु सिनाखतु कुदरती ॥8॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। राजे, प्रजा, चौधरी, कोई भी सदा नहीं रहेगा। हाट, शहर, बाजार प्रभू के हुकम में (अंत को) ढहि जाएंगे। सुंदर पक्के (घरों के) दरवाजों को मूर्ख मनुष्य अपने समझता है, (पर ये नहीं जानता कि) धन से भरे हुए खजाने एक पलक में खाली हो जाते हैं। बढ़िया घोड़े, ऊठ, हाथी, हउदे, बाग-जमीनें, घर-घाट, तंबू, निवारी पलंघ और अतलसी कनातें जिन्हें मनुष्य अपने समझता है, कहाँ चले जाते हैं पता नहीं चलता । हे नानक ! सदा रहने वाला सिर्फ वही है, जो इन पदार्थों के देने वाला है, उसकी पहचान उसकी रची हुई कुदरति में से होती है। 8।
सलोकु मः 1 ॥
नदीआ होवहि धेणवा सुंम होवहि दुधु घीउ ॥
सगली धरती सकर होवै खुसी करे नित जीउ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर सारी नदियां (मेरे वास्ते) गाएं बन जाएं, (पानी के) चश्में दूध और घी बन जाए, सारी जमीन शक्कर बन जाए, (इन पदार्थों को देख के) मेरी जिंद निक्त प्रसन्न हो।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 1॥ हे नानक ! पराया हक मुसलमान के लिए सूअर है और हिन्दू के लिए गाय है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।