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अंग 140

अंग
140
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अवरी नो समझावणि जाइ ॥
मुठा आपि मुहाए साथै ॥
नानक ऐसा आगू जापै ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: औरों को शिक्षा देने जाता है (कि झूठ ना बोलो)। खुद तो ठगा जा ही रहा है, अपने साथ को भी लुटाता है हे नानक ! ऐसा नेता की (अंत में जब) सच्चाई सामने आती है (तब पता चलता है) । 1।
महला 4 ॥
जिस दै अंदरि सचु है सो सचा नामु मुखि सचु अलाए ॥
ओहु हरि मारगि आपि चलदा होरना नो हरि मारगि पाए ॥
जे अगै तीरथु होइ ता मलु लहै छपड़ि नातै सगवी मलु लाए ॥
तीरथु पूरा सतिगुरू जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआए ॥
ओहु आपि छुटा कुटंब सिउ दे हरि हरि नामु सभ स्रिसटि छडाए ॥
जन नानक तिसु बलिहारणै जो आपि जपै अवरा नामु जपाए ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिस मनुष्य का हृदय में सदा कायम रहने वाला प्रभू बसता है, जो मुंह से (भी) सदा स्थिर रहने वाला सच्चा नाम ही बोलता है, वह स्वयं परमात्मा के राह पे चलता है और औरों को भी प्रभू के राह पर चलाता है। (जहां नहाने जाएं) अगर वह खुले साफ पानी का श्रोत हो तो (नहाने वाले की) मैल उतर जाती है। पर छॅपड़ में नहाने से वल्कि और मैल चढ़ जाएगी। (यही नियम समझो मन की मैल धोने के लिए), पूरा गुरू जो हर समय परमात्मा का नाम सिमरता है (मानो) खुले साफ पानी का श्रोत है। वह खुद अपने परिवार समेत विकारों से बचा हुआ है, परमात्मा का नाम दे के वह सारी सृष्टि को भी बचाता है। हे दास नानक ! (कह, मैं) उससे सदके हूँ, जो खुद (प्रभू का) नाम जपता है और औरों को भी जपाता है। 2।
पउड़ी ॥
इकि कंद मूलु चुणि खाहि वण खंडि वासा ॥
इकि भगवा वेसु करि फिरहि जोगी संनिआसा ॥
अंदरि त्रिसना बहुतु छादन भोजन की आसा ॥
बिरथा जनमु गवाइ न गिरही न उदासा ॥
जमकालु सिरहु न उतरै त्रिबिधि मनसा ॥
गुरमती कालु न आवै नेड़ै जा होवै दासनि दासा ॥
सचा सबदु सचु मनि घर ही माहि उदासा ॥
नानक सतिगुरु सेवनि आपणा से आसा ते निरासा ॥5॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ कई लोग कंद मूल खाते हैं (मूली आदि खा के गुजारा करते हैं) और जंगल के आगोश में जा के रहते हैं। कई लोग भगवे कपड़े पहन के जोगी और संन्यासी बन के घूमते हैं। (पर, उनके मन में) बहुत लालच होता है। कपड़े और भोजन की लालसा बनी रहती है। (इस तरह) मानस जनम व्यर्थ में गवां के ना वो गृहस्ती रहते हैं ना ही फ़कीर। (उनके अंदर) त्रिगुणी (माया की) लालसा होने के कारण आत्मिक मौत उनके सिर पे से टलती नहीं। जब मनुष्य प्रभू के सेवकों का सेवक बन जाता है, तो सतिगुरू की शिक्षा पे चल के आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं आती। गुरू का सच्चा शबद और प्रभू (उसके) मन में होने के कारण वह गृहस्थ में रहता हुआ भी त्यागी है। हे नानक ! जो मनुष्य अपने गुरू के हुकम में चलते हैं, वे (दुनिया की) लालसा से उपराम हो जाते हैं। 5।
सलोकु मः 1 ॥
जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु ॥
जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु ॥
नानक नाउ खुदाइ का दिलि हछै मुखि लेहु ॥
अवरि दिवाजे दुनी के झूठे अमल करेहु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर कपड़े को लहू लग जाए, तो कपड़ा (चोला) पलीत (गंदा) हो जाता है (और नमाज़ नहीं हो सकती), (पर) जो लोग मनुष्यों का लहू पीते हैं (भाव, जोर-जबरदस्ती करके हराम की कमाई खाते हैं) उनका मन कैसे पाक (साफ) रह सकता है (तो पलीत मन से पढ़ी नमाज़ कैसे कबूल है) ? हे नानक ! रॅब का नाम मुंह से साफ़ दिल से ले। (इसके बगैर) और काम दुनिया वाले दिखावे हैं। ये तो आप कूड़े काम ही करते हैं। 1।
मः 1 ॥
जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा ॥
कीता करणा कहिआ कथना भरिआ भरि भरि धोवां ॥
आपि न बुझा लोक बुझाई ऐसा आगू होवां ॥
नानक अंधा होइ कै दसे राहै सभसु मुहाए साथै ॥
अगै गइआ मुहे मुहि पाहि सु ऐसा आगू जापै ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जब मैं हूँ ही कुछ नहीं (अर्थात, मेरी आत्मिक हसती ही कुछ नहीं बनी), तो मैं (औरों को) उपदेश क्यूँ करूं? (अंदर) कोई आत्मिक गुण ना होते हुए भी कितना कुछ बन बन के दिखाऊँ? मेरा काम कार, मेरी बोलचाल- इनसे (बुरे संस्कारों से) भरा हुआ कभी बुरी तरफ गिरता हूँ और (फिर कभी मन को) धोने का यत्न करता हूँ। जब मुझे खुद को ही समझ नहीं आई और लोगों को राह बताता फिरता हूँ (इस हालत में मैं) हास्यास्पद् आगू ही बनता हूँ। हे नानक ! जो मनुष्य खुद अंधा है, पर औरों को राह बताता है, वह सारे साथ को लुटा देता है। आगे चल के मुंह पर उसे (जूतियां) पड़ती हैं तब ऐसे नायक की (अस्लियत) सामने उघड़ के आती है। 2।
पउड़ी ॥
माहा रुती सभ तूं घड़ी मूरत वीचारा ॥
तूं गणतै किनै न पाइओ सचे अलख अपारा ॥
पड़िआ मूरखु आखीऐ जिसु लबु लोभु अहंकारा ॥
नाउ पड़ीऐ नाउ बुझीऐ गुरमती वीचारा ॥
गुरमती नामु धनु खटिआ भगती भरे भंडारा ॥
निरमलु नामु मंनिआ दरि सचै सचिआरा ॥
जिस दा जीउ पराणु है अंतरि जोति अपारा ॥
सचा साहु इकु तूं होरु जगतु वणजारा ॥6॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) सभी महीनों, ऋतुओं, घड़ियों व महूरतों में आपको सिमरा जा सकता है (अर्थात आपके सिमरन के लिए किसी खास ऋतु या तिथि की जरूरत नहीं है)। हे अदृष्ट और बेअंत प्रभू ! तिथियों की गणना करके किसी ने भी आपको नहीं पाया। ऐसी (तिथि विद्या) पढ़े हुए को मूर्ख कहना चाहिए क्योंकि उसके अंदर लोभ व अहंकार है। (किसी तिथि महूर्त की जरूरत नही, सिर्फ) सतिगुरू की दी मति को विचार के परमात्मा का नाम जपना चाहिए और (उस में) सुरति जोड़नी चाहिए। जिन्होंने गुरू की शिक्षा पे चल के नाम रूपी धन कमाया है, उनके खजाने भक्ति से भर गए हैं। जिन्होंने प्रभू का पवित्र नाम कबूल किया है, वे प्रभू के दर पे सुर्खरू होते हैं। आपके द्वारा दिए गये जिंद प्राण हरेक जीव को मिले हैं, आपकी ही अपार ज्योति हरेक जीव के अंदर है हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला शाह है, और सारा जगत बंजारा है (भाव, अन्य सभी जीव यहां, मानों, फेरी लगा के सौदा करने आए हैं)। 6।
सलोकु मः 1 ॥
मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ॥
सरम सुंनति सीलु रोजा होहु मुसलमाणु ॥
करणी काबा सचु पीरु कलमा करम निवाज ॥
तसबी सा तिसु भावसी नानक रखै लाज ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ (लोगों पे) तरस की मस्जिद (बनाओ), श्रद्धा को मुसल्ला और हक की कमाई को कुरान (बनाओ)। विकारों से शर्म- ये सुन्नत हो और अच्छा स्वभाव रोजा बने। इस तरह (का हे भाई !) मुसलमान बन। ऊँचा आचरण काबा हो, अंदर बाहर एक जैसा ही रहना-पीर हो, नेक अमलों की निमाज और कलमा बने। जो बात उस रॅब को अच्छी लगे वही (सिर माथे पे माननी, ये) तसबी हो। हे नानक ! (ऐसे मुसलमान की रॅब लाज रखता है)। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “औरों को शिक्षा देने जाता है (कि झूठ ना बोलो)।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।