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अंग १४० · माझ

अंग
140
माझ
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  1. अवरी नो समझावणि जाइ ॥
  2. जिस दै अंदरि सचु है सो सचा नामु मुखि सचु अलाए ॥
  3. इकि कंद मूलु चुणि खाहि वण खंडि वासा ॥
  4. जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु ॥
  5. जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा ॥
  6. माहा रुती सभ तूं घड़ी मूरत वीचारा ॥
  7. मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ॥

अवरी नो समझावणि जाइ ॥

अंग १३९ से चला आ रहा अंश

अवरी नो समझावणि जाइ ॥
मुठा आपि मुहाए साथै ॥
नानक ऐसा आगू जापै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: औरों को शिक्षा देने जाता है (कि झूठ ना बोलो)। खुद तो ठगा जा ही रहा है, अपने साथ को भी लुटाता है हे नानक ! ऐसा नेता की (अंत में जब) सच्चाई सामने आती है (तब पता चलता है) । 1।

जिस दै अंदरि सचु है सो सचा नामु मुखि सचु अलाए ॥

महला 4 ॥
जिस दै अंदरि सचु है सो सचा नामु मुखि सचु अलाए ॥
ओहु हरि मारगि आपि चलदा होरना नो हरि मारगि पाए ॥
जे अगै तीरथु होइ ता मलु लहै छपड़ि नातै सगवी मलु लाए ॥
तीरथु पूरा सतिगुरू जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआए ॥
ओहु आपि छुटा कुटंब सिउ दे हरि हरि नामु सभ स्रिसटि छडाए ॥
जन नानक तिसु बलिहारणै जो आपि जपै अवरा नामु जपाए ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिस मनुष्य का हृदय में सदा कायम रहने वाला प्रभू बसता है, जो मुंह से (भी) सदा स्थिर रहने वाला सच्चा नाम ही बोलता है, वह स्वयं परमात्मा के राह पे चलता है और औरों को भी प्रभू के राह पर चलाता है। (जहां नहाने जाएं) अगर वह खुले साफ पानी का श्रोत हो तो (नहाने वाले की) मैल उतर जाती है। पर छॅपड़ में नहाने से वल्कि और मैल चढ़ जाएगी। (यही नियम समझो मन की मैल धोने के लिए), पूरा गुरू जो हर समय परमात्मा का नाम सिमरता है (मानो) खुले साफ पानी का श्रोत है। वह खुद अपने परिवार समेत विकारों से बचा हुआ है, परमात्मा का नाम दे के वह सारी सृष्टि को भी बचाता है। हे दास नानक ! (कह, मैं) उससे सदके हूँ, जो खुद (प्रभू का) नाम जपता है और औरों को भी जपाता है। 2।

इकि कंद मूलु चुणि खाहि वण खंडि वासा ॥

पउड़ी ॥
इकि कंद मूलु चुणि खाहि वण खंडि वासा ॥
इकि भगवा वेसु करि फिरहि जोगी संनिआसा ॥
अंदरि त्रिसना बहुतु छादन भोजन की आसा ॥
बिरथा जनमु गवाइ न गिरही न उदासा ॥
जमकालु सिरहु न उतरै त्रिबिधि मनसा ॥
गुरमती कालु न आवै नेड़ै जा होवै दासनि दासा ॥
सचा सबदु सचु मनि घर ही माहि उदासा ॥
नानक सतिगुरु सेवनि आपणा से आसा ते निरासा ॥5॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ कई लोग कंद मूल खाते हैं (मूली आदि खा के गुजारा करते हैं) और जंगल के आगोश में जा के रहते हैं। कई लोग भगवे कपड़े पहन के जोगी और संन्यासी बन के घूमते हैं। (पर, उनके मन में) बहुत लालच होता है। कपड़े और भोजन की लालसा बनी रहती है। (इस तरह) मानस जनम व्यर्थ में गवां के ना वो गृहस्ती रहते हैं ना ही फ़कीर। (उनके अंदर) त्रिगुणी (माया की) लालसा होने के कारण आत्मिक मौत उनके सिर पे से टलती नहीं। जब मनुष्य प्रभू के सेवकों का सेवक बन जाता है, तो सतिगुरू की शिक्षा पे चल के आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं आती। गुरू का सच्चा शबद और प्रभू (उसके) मन में होने के कारण वह गृहस्थ में रहता हुआ भी त्यागी है। हे नानक ! जो मनुष्य अपने गुरू के हुकम में चलते हैं, वे (दुनिया की) लालसा से उपराम हो जाते हैं। 5।

जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु ॥

सलोकु मः 1 ॥
जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु ॥
जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु ॥
नानक नाउ खुदाइ का दिलि हछै मुखि लेहु ॥
अवरि दिवाजे दुनी के झूठे अमल करेहु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर कपड़े को लहू लग जाए, तो कपड़ा (चोला) पलीत (गंदा) हो जाता है (और नमाज़ नहीं हो सकती), (पर) जो लोग मनुष्यों का लहू पीते हैं (भाव, जोर-जबरदस्ती करके हराम की कमाई खाते हैं) उनका मन कैसे पाक (साफ) रह सकता है (तो पलीत मन से पढ़ी नमाज़ कैसे कबूल है) ? हे नानक ! रॅब का नाम मुंह से साफ़ दिल से ले। (इसके बगैर) और काम दुनिया वाले दिखावे हैं। ये तो आप कूड़े काम ही करते हैं। 1।

जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा ॥

मः 1 ॥
जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा ॥
कीता करणा कहिआ कथना भरिआ भरि भरि धोवां ॥
आपि न बुझा लोक बुझाई ऐसा आगू होवां ॥
नानक अंधा होइ कै दसे राहै सभसु मुहाए साथै ॥
अगै गइआ मुहे मुहि पाहि सु ऐसा आगू जापै ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जब मैं हूँ ही कुछ नहीं (अर्थात, मेरी आत्मिक हसती ही कुछ नहीं बनी), तो मैं (औरों को) उपदेश क्यूँ करूं? (अंदर) कोई आत्मिक गुण ना होते हुए भी कितना कुछ बन बन के दिखाऊँ? मेरा काम कार, मेरी बोलचाल- इनसे (बुरे संस्कारों से) भरा हुआ कभी बुरी तरफ गिरता हूँ और (फिर कभी मन को) धोने का यत्न करता हूँ। जब मुझे खुद को ही समझ नहीं आई और लोगों को राह बताता फिरता हूँ (इस हालत में मैं) हास्यास्पद् आगू ही बनता हूँ। हे नानक ! जो मनुष्य खुद अंधा है, पर औरों को राह बताता है, वह सारे साथ को लुटा देता है। आगे चल के मुंह पर उसे (जूतियां) पड़ती हैं तब ऐसे नायक की (अस्लियत) सामने उघड़ के आती है। 2।

माहा रुती सभ तूं घड़ी मूरत वीचारा ॥

पउड़ी ॥
माहा रुती सभ तूं घड़ी मूरत वीचारा ॥
तूं गणतै किनै न पाइओ सचे अलख अपारा ॥
पड़िआ मूरखु आखीऐ जिसु लबु लोभु अहंकारा ॥
नाउ पड़ीऐ नाउ बुझीऐ गुरमती वीचारा ॥
गुरमती नामु धनु खटिआ भगती भरे भंडारा ॥
निरमलु नामु मंनिआ दरि सचै सचिआरा ॥
जिस दा जीउ पराणु है अंतरि जोति अपारा ॥
सचा साहु इकु तूं होरु जगतु वणजारा ॥6॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) सभी महीनों, ऋतुओं, घड़ियों व महूरतों में आपको सिमरा जा सकता है (अर्थात आपके सिमरन के लिए किसी खास ऋतु या तिथि की जरूरत नहीं है)। हे अदृष्ट और बेअंत प्रभू ! तिथियों की गणना करके किसी ने भी आपको नहीं पाया। ऐसी (तिथि विद्या) पढ़े हुए को मूर्ख कहना चाहिए क्योंकि उसके अंदर लोभ व अहंकार है। (किसी तिथि महूर्त की जरूरत नही, सिर्फ) सतिगुरू की दी मति को विचार के परमात्मा का नाम जपना चाहिए और (उस में) सुरति जोड़नी चाहिए। जिन्होंने गुरू की शिक्षा पे चल के नाम रूपी धन कमाया है, उनके खजाने भक्ति से भर गए हैं। जिन्होंने प्रभू का पवित्र नाम कबूल किया है, वे प्रभू के दर पे सुर्खरू होते हैं। आपके द्वारा दिए गये जिंद प्राण हरेक जीव को मिले हैं, आपकी ही अपार ज्योति हरेक जीव के अंदर है हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाले शाह हैं, और सारा जगत बंजारा है (भाव, अन्य सभी जीव यहां, मानों, फेरी लगा के सौदा करने आए हैं)। 6।

मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ॥

सलोकु मः 1 ॥
मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ॥
सरम सुंनति सीलु रोजा होहु मुसलमाणु ॥
करणी काबा सचु पीरु कलमा करम निवाज ॥
तसबी सा तिसु भावसी नानक रखै लाज ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ (लोगों पे) तरस की मस्जिद (बनाओ), श्रद्धा को मुसल्ला और हक की कमाई को कुरान (बनाओ)। विकारों से शर्म- ये सुन्नत हो और अच्छा स्वभाव रोजा बने। इस तरह (का हे भाई !) मुसलमान बन। ऊँचा आचरण काबा हो, अंदर बाहर एक जैसा ही रहना-पीर हो, नेक अमलों की निमाज और कलमा बने। जो बात उस रॅब को अच्छी लगे वही (सिर माथे पे माननी, ये) तसबी हो। हे नानक ! (ऐसे मुसलमान की रॅब लाज रखता है)। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १४० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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