मुठा आपि मुहाए साथै ॥
नानक ऐसा आगू जापै ॥1॥
जिस दै अंदरि सचु है सो सचा नामु मुखि सचु अलाए ॥
ओहु हरि मारगि आपि चलदा होरना नो हरि मारगि पाए ॥
जे अगै तीरथु होइ ता मलु लहै छपड़ि नातै सगवी मलु लाए ॥
तीरथु पूरा सतिगुरू जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआए ॥
ओहु आपि छुटा कुटंब सिउ दे हरि हरि नामु सभ स्रिसटि छडाए ॥
जन नानक तिसु बलिहारणै जो आपि जपै अवरा नामु जपाए ॥2॥
इकि कंद मूलु चुणि खाहि वण खंडि वासा ॥
इकि भगवा वेसु करि फिरहि जोगी संनिआसा ॥
अंदरि त्रिसना बहुतु छादन भोजन की आसा ॥
बिरथा जनमु गवाइ न गिरही न उदासा ॥
जमकालु सिरहु न उतरै त्रिबिधि मनसा ॥
गुरमती कालु न आवै नेड़ै जा होवै दासनि दासा ॥
सचा सबदु सचु मनि घर ही माहि उदासा ॥
नानक सतिगुरु सेवनि आपणा से आसा ते निरासा ॥5॥
जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु ॥
जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु ॥
नानक नाउ खुदाइ का दिलि हछै मुखि लेहु ॥
अवरि दिवाजे दुनी के झूठे अमल करेहु ॥1॥
जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा ॥
कीता करणा कहिआ कथना भरिआ भरि भरि धोवां ॥
आपि न बुझा लोक बुझाई ऐसा आगू होवां ॥
नानक अंधा होइ कै दसे राहै सभसु मुहाए साथै ॥
अगै गइआ मुहे मुहि पाहि सु ऐसा आगू जापै ॥2॥
माहा रुती सभ तूं घड़ी मूरत वीचारा ॥
तूं गणतै किनै न पाइओ सचे अलख अपारा ॥
पड़िआ मूरखु आखीऐ जिसु लबु लोभु अहंकारा ॥
नाउ पड़ीऐ नाउ बुझीऐ गुरमती वीचारा ॥
गुरमती नामु धनु खटिआ भगती भरे भंडारा ॥
निरमलु नामु मंनिआ दरि सचै सचिआरा ॥
जिस दा जीउ पराणु है अंतरि जोति अपारा ॥
सचा साहु इकु तूं होरु जगतु वणजारा ॥6॥
मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ॥
सरम सुंनति सीलु रोजा होहु मुसलमाणु ॥
करणी काबा सचु पीरु कलमा करम निवाज ॥
तसबी सा तिसु भावसी नानक रखै लाज ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “औरों को शिक्षा देने जाता है (कि झूठ ना बोलो)।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।