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अंग १३९ · माझ

अंग
139
माझ
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  1. सोभा सुरति सुहावणी जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥2॥
  2. अखी बाझहु वेखणा विणु कंना सुनणा ॥
  3. दिसै सुणीऐ जाणीऐ साउ न पाइआ जाइ ॥
  4. सदा सदा तूं एकु है तुधु दूजा खेलु रचाइआ ॥
  5. सुइने कै परबति गुफा करी कै पाणी पइआलि ॥
  6. वसत्र पखालि पखाले काइआ आपे संजमि होवै ॥
  7. पवड़ी ॥
  8. कूड़ु बोलि मुरदारु खाइ ॥

सोभा सुरति सुहावणी जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥2॥

अंग १३८ से चला आ रहा अंश

सोभा सुरति सुहावणी जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने प्रभू के साथ चित्त जोड़ा है, (जगत में उसकी) शोभा होती है और उसकी सुंदर सूझ हो जाती है। 2।

अखी बाझहु वेखणा विणु कंना सुनणा ॥

सलोकु मः 2 ॥
अखी बाझहु वेखणा विणु कंना सुनणा ॥
पैरा बाझहु चलणा विणु हथा करणा ॥
जीभै बाझहु बोलणा इउ जीवत मरणा ॥
नानक हुकमु पछाणि कै तउ खसमै मिलणा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ अर्थ: अगर आँखों के बिना देखें (अर्थात, अगर पराया रूप देखने वाली आदत से हट के जगत को देखें), कानों से बिना सुनें (भाव, अगर निंदा सुनने की वृक्ति से हटा के बरतें), अगर बिना पैरों के चलें (भाव, यदि गलत मार्ग पर चलने से पैरों को रोके रखें), यदि हाथों के बिना काम करें (भाव, अगर पराया नुकसान करने से रोक के हाथों का बरतें), यदि जीभ के बिना बोलें (अर्थात, पराई निंदा रस से बचा के जीभ से काम लें), इस तरह जीते हुए मरना है। हे नानक ! पति प्रभू का हुकम पहचाने तो ही उससे मिल सकते हैं (भाव, यदि ये समझ लें कि पति प्रभू द्वारा आँख आदि इंद्रियों को कैसे इस्तेमाल करने का हुकम है, तो उस प्रभू से मिल सकते हैं)। 1।

दिसै सुणीऐ जाणीऐ साउ न पाइआ जाइ ॥

मः 2 ॥
दिसै सुणीऐ जाणीऐ साउ न पाइआ जाइ ॥
रुहला टुंडा अंधुला किउ गलि लगै धाइ ॥
भै के चरण कर भाव के लोइण सुरति करेइ ॥
नानकु कहै सिआणीए इव कंत मिलावा होइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ (परमात्मा, कुदरति में बसता) दिखाई दे रहा है। (उसकी जीवन रौं सारी रचना) में सुनी जा रही है। (उसके कामों से) प्रतीत हो रहा है (कि वह कुदरति में मौजूद है, फिर भी उसके मिलाप का) स्वाद (जीव को) हासिल नहीं होता। (ऐसा क्यों?) इसलिए कि प्रभू को मिलने के लिए (जीव के पास) ना पैर हैं, ना हाथ हैं और ना ही आँखें हैं। (फिर ये) भाग के कैसे (प्रभू के) गले जा लगे? यदि (जीव प्रभू के) डर (में चलने) को (अपने) पैर बनाए, प्यार के हाथ बनाए और (प्रभू की) याद (में जुड़ने) को आँखें बनाए, तो नानक कहता है, हे सुजान जीवस्त्री !इस तरह पति प्रभू से मेल होता है। 2।

सदा सदा तूं एकु है तुधु दूजा खेलु रचाइआ ॥

पउड़ी ॥
सदा सदा तूं एकु है तुधु दूजा खेलु रचाइआ ॥
हउमै गरबु उपाइ कै लोभु अंतरि जंता पाइआ ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू सभ करे तेरा कराइआ ॥
इकना बखसहि मेलि लैहि गुरमती तुधै लाइआ ॥
इकि खड़े करहि तेरी चाकरी विणु नावै होरु न भाइआ ॥
होरु कार वेकार है इकि सची कारै लाइआ ॥
पुतु कलतु कुटंबु है इकि अलिपतु रहे जो तुधु भाइआ ॥
ओहि अंदरहु बाहरहु निरमले सचै नाइ समाइआ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) आप सदा ही एक (स्वयं ही स्वयं) हैं। ये (आपसे अलग दिखता तमाशा) आपने खुद ही रचा है। (आपने ही जीवों के अंदर) अहंकार पैदा करके, जीवों के अंदर लोभ (भी) डाल दिया है। (इसलिए) सारे ही जीव आपकी ही परोई हुई कार कर रहे है। जैसे आपको भाए वैसे इनकी रक्षा कर। कई जीवों को आप बख्शते हैं (और अपने चरणों में) जोड़ लेते हैं। गुरू की शिक्षा में आपने स्वयं ही उनको लगाया है। (ऐसे) कई जीव सुचेत हो के आपकी बंदगी कर रहे हैं। आपके नाम (की याद) के बिना कोई और काम उन्हें नहीं भाता (भाव, किसी और काम की खातिर आपका नाम भुलाने को वे तैयार नहीं)। जिन ऐसे लोगों को आपने इस सच्ची कार में लगाया है, उन्हें (आपका नाम विसार के) कोई और काम करना बुरा लगता है। ये जो पुत्र, स्त्री व परिवार है, (हे प्रभू !) जो लोग आपको प्यारे लगते हैं, वे इनसे निर्मोही रहते हैं। आपके सदा कायम रहने वाले नाम में जुड़े हुए वह लोग अंदर बाहर से निर्मल रहते हैं। 3।

सुइने कै परबति गुफा करी कै पाणी पइआलि ॥

सलोकु मः 1 ॥
सुइने कै परबति गुफा करी कै पाणी पइआलि ॥
कै विचि धरती कै आकासी उरधि रहा सिरि भारि ॥
पुरु करि काइआ कपड़ु पहिरा धोवा सदा कारि ॥
बगा रता पीअला काला बेदा करी पुकार ॥
होइ कुचीलु रहा मलु धारी दुरमति मति विकार ॥
ना हउ ना मै ना हउ होवा नानक सबदु वीचारि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ मैं (चाहे) सोने के (सुमेर) पर्वत पर गुफा बनां लूँ, चाहे नीचे पानी में (जा के रहूँ); चाहे धरती में रहूँ, चाहे आकाश में उल्टा सिर भार खड़ा रहूं। चाहे शरीर को पूरी तरह से कपड़ों से ढक लूँ, चाहे शरीर को सदा ही धोता रहूँ। चाहे मैं सफेद, लाल, पीले या काले कपड़े पहन के (चार) वेदों का उच्चारन करूँ, या फिर (सरेवड़ियों की तरह) गंदा व मैला रहूँ - ये सारे बुरी मति के बुरे काम (विकार) ही हैं। हे नानक ! (मैं तो ये चाहता हूँ कि सतिगुरू के) शबद को विचार के (मेरा) अहंकार ना रहे। 1।

वसत्र पखालि पखाले काइआ आपे संजमि होवै ॥

मः 1 ॥
वसत्र पखालि पखाले काइआ आपे संजमि होवै ॥
अंतरि मैलु लगी नही जाणै बाहरहु मलि मलि धोवै ॥
अंधा भूलि पइआ जम जाले ॥
वसतु पराई अपुनी करि जानै हउमै विचि दुखु घाले ॥
नानक गुरमुखि हउमै तुटै ता हरि हरि नामु धिआवै ॥
नामु जपे नामो आराधे नामे सुखि समावै ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जो मनुष्य नित्य) कपड़े धो के शरीर धोता है (और सिर्फ कपड़े और शरीर स्वच्छ रखने से ही) अपनी ओर से तपस्वी बन बैठता है।(सदा शरीर को) बाहर से मल मल के धोता है। (वह) अंधा मनुष्य (सीधे राह से) भटक के मौत का डर पैदा करने वाले जाल में फंसा हुआ है, क्योंकि, पराई वस्तु (शरीर व अन्य पदार्थों आदिक) को अपनी समझ बैठता है। अहंकार में दुख सहता है। हे नानक ! (जब) गुरू के सन्मुख हो के (मनुष्य का) अहम् दूर होता है, तबवह प्रभू का नाम सिमरता है, नाम जपता है। नाम ही याद करता है व नाम ही की बरकति से सुख में टिका रहता है। 2।

पवड़ी ॥

पवड़ी ॥
काइआ हंसि संजोगु मेलि मिलाइआ ॥
तिन ही कीआ विजोगु जिनि उपाइआ ॥
मूरखु भोगे भोगु दुख सबाइआ ॥
सुखहु उठे रोग पाप कमाइआ ॥
हरखहु सोगु विजोगु उपाइ खपाइआ ॥
मूरख गणत गणाइ झगड़ा पाइआ ॥
सतिगुर हथि निबेड़ु झगड़ु चुकाइआ ॥
करता करे सु होगु न चलै चलाइआ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ शरीर व जीव (आत्मा) का संयोग निर्धारित करके (परमात्मा ने इनको मानस जन्म में) इकट्ठा कर दिया है। जिस (प्रभू) ने (शरीर व जीव को) पैदा किया है उसने ही (इनके लिए) विछोड़ा (भी) बना रखा है। (पर इस विछोड़े को भुला के) मूर्ख (जीव) भोग भोगता रहता है, जो सारे दुखों का (मूल बनता) है। पाप कमाने के कारण (भोगों के) सुख से रोग पैदा होते हैं (भोगों की) खुशी से चिंता (और अंत को) विछोड़ा पैदा करके जनम मरण का लंबा झमेला अपने सिर ले लेता है। जनम मरन के चक्र को खत्म करने की ताकत सतिगुरू के हाथ में है, (जिस को गुरू मिलता है उसका ये) झमेला खत्म हो जाता है। (जीवों की कोई) अपनी चलाई सियानप चल नहीं सकती। जो करतार करता है वही होता है। 4।

कूड़ु बोलि मुरदारु खाइ ॥

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सलोकु मः 1 ॥
कूड़ु बोलि मुरदारु खाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (जो मनुष्य) झूठ बोल के (खुद तो) दूसरों का हक खाता है और

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला २: गुरु अंगद देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १३९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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