गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जीव जगत में आया और चला गया। (जगत में उसका) नाम भी भूल गया। (उसके मरने के) बाद पत्तलों पे (पिण्ड भरा के) कौओं को ही बुलाते हैं (उस जीव को कुछ नहीं पहुँचता)। हे नानक ! मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का (जगत से) प्यार अंधों वाला प्यार है। गुरू (की शरण आए) बगैर जगत (इस ‘अंधे प्यार’ में) डूब रहा है। 2।
मः 1 ॥ दस बालतणि बीस रवणि तीसा का सुंदरु कहावै ॥ चालीसी पुरु होइ पचासी पगु खिसै सठी के बोढेपा आवै ॥ सतरि का मतिहीणु असीहां का विउहारु न पावै ॥ नवै का सिहजासणी मूलि न जाणै अप बलु ॥ ढंढोलिमु ढूढिमु डिठु मै नानक जगु धूए का धवलहरु ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मः 1 ॥ दस सालों का (जीव) बालपन में (होता है)। बीस वर्षों का हो के काम चेष्टा वाली अवस्था में पहुँचता है, तीस सालों का हो के खूबसूरत कहलाता है। चालिस सालों की उम्र तक भर जवान होता है। पचास पे पहुँच के पैर (जवानी से नीचे) खिसकने लग पड़ता है। साठ सालों पे बुढ़ापा आ जाता है, सक्तर सालों का जीव अक्ल से हीन होने लग पड़ता है, और अस्सी सालों का काम काज के लायक नहीं रहता। नब्बे साल का चारपाई से ही नहीं हिल सकता, अपने आप को भी संभाल नहीं सकता। हे नानक! मैंने ढूँढा है, तलाशा है। ये जगत सफेद पलस्तरी मंदिर है (अर्थात, देखने को सुंदर है) पर है धूएं का (भाव सदा कायम रहने वाला नहीं)। 3।
पउड़ी ॥ तूं करता पुरखु अगंमु है आपि स्रिसटि उपाती ॥ रंग परंग उपारजना बहु बहु बिधि भाती ॥ तूं जाणहि जिनि उपाईऐ सभु खेलु तुमाती ॥ इकि आवहि इकि जाहि उठि बिनु नावै मरि जाती ॥ गुरमुखि रंगि चलूलिआ रंगि हरि रंगि राती ॥ सो सेवहु सति निरंजनो हरि पुरखु बिधाती ॥ तूं आपे आपि सुजाणु है वड पुरखु वडाती ॥ जो मनि चिति तुधु धिआइदे मेरे सचिआ बलि बलि हउ तिन जाती ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे (प्रभू!) आप सृजनहार है। सब में मौजूद है। (फिर भी) आपके तक किसी की पहुँच नहीं। तूने स्वयं (सारी) सृष्टि पैदा की है। ये रचना तूने कई रंगों कई किस्मों, कई तरीकों से बनाई है। (जगत का ये) सारा तमाशा आपका ही (बनाया हुआ) है। (इस तमाशे के भेद को) आप स्वयं ही जानता है, जिसने (खेल बनाया हुआ) है। (इस तमाशे में) कई जीव आ रहे हैं, कई (तमाशा देख के) चलते जा रहे हैं। (पर जो) ‘नाम’ से वंचित हैं, वह मर के (भाव दुखी हो के) जाते हैं। पर वे मनुष्य जो गुरू के सन्मुख हैं वे (प्रभू के) प्यार में गहरे रंगे हुए हैं, वे निरोल हरी के प्यार में रंगे हुए हैं। (हे भाई!) जो प्रभू सब में व्यापक (पुरुष) है, जगत का रचनहार है, सदा स्थिर रहने वाला है और माया से रहित है, उसे सिमरो। हे प्रभू! आप सबसे बड़ी हस्ती वाला है, आप स्वयं ही सब कुछ जानने वाला है। हे मेरे सच्चे (साहिब!) जो आपको मन लगा के चित्त लगा के सिमरते हैं, मैं उनसे सदके जाता हूँ। 1।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अर्थ: (प्रभू ने) जिंद डाल के (मनुष्य का) शरीर बनाया है, (क्या सोहणी) घाढ़त घढ़ के रखी है। आँखों से यह देखता है, जीभ से बोलता है। (इस के) कानों में सुनने की शक्ति मौजूद है। पैरों से चलता है, हाथों से (काम) करता है, और (प्रभू का) दिया खाता पहनता है। पर, जिस (प्रभू) ने (इसके शरीर को) बनाया सवारा है, उसे ये पहचानता (भी नहीं)। अंधा मनुष्य (अर्थात आत्मिक जीवन से बे-समझ) अंधों वाला काम करता है। जब (ये शरीर रूपी बरतन) टूट जाता है, तो (ये तो) ठीकरा हो जाता है (भाव, किसी काम का नहीं रहता) और मुड़ के ये (शारीरिक) बनतर बन भी नहीं सकती। हे नानक! (अंधा मनुष्य) गुरू (की शरण) के बिना बख्शिश से वंचित रह जाता है, और प्रभू की मेहर के बिना (इस मुश्किल में से) पार नहीं लांघ सकता। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ मन के पीछे चलने वाला मनुष्य को ऐसा समझ लो (कि उसको) देने वाले (परमात्मा) की अपेक्षा (उसका) दिया हुआ (पदार्थ) अच्छा लगता है। उस मनुष्य की सूझ, अक्ल और सियानप (इतनी नीची है कि) शब्दों में बयान नहीं की जा सकती। (वह अपनी ओर से) छुप के (बुरे) काम करता है, (पर जो कुछ वह करता है) वह हर जगह दिखाई दे जाता है (कुदरत का नियम ही ऐसा है कि) जो मनुष्य भला काम करता है, उसका नाम ‘धर्मी’ पड़ जाता है। बुरे काम करने वाला मनुष्य बुरा ही समझा जाता है। (पर बुरा किसे कहें?) (हे प्रभू!) सारे चमत्कार आप खुद ही कर रहा है। आपसे अलग और किसे कहें? (जीव के अंदर) जब तक आपकी ज्योति मौजूद है, तब तक उस ज्योति में आप (स्वयं ही) बोलता है। जब आपकी ज्योति निकल जाए, तब कोई भला कुछ करे तो सही, हम भी परख के देखें (भाव, आपकी ज्योति के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता; मनमुख में भी आपकी ज्योति है)। हे नानक! गुरू की शरण आए मनुष्य को (हर जगह) एक ही सियाना और सुजान प्रभू ही दिखाई देता है।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू!) आप खुद ही जगत पैदा करके खुद ही (इसे) जंजाल में डाल देता है। (माया के) मोह की ठग बूटी खिला के आप जगत को अपने आप से (भाव, अपनी याद से) वंचित कर देता है। (जगत के) अंदर तृष्णा की आग (जल रही) है। (इस वास्ते ये माया की) प्यास व भूख का मारा हुआ तृप्त नहीं होता। ये जगत है ही तौखला (रूप), (इस तौखले में पड़ा जीव) पैदा होता मरता व जनम मरन के चक्कर में पड़ा रहता है।(ज्यादातर जीव) और और (धार्मिक) कर्म करके हार चुके हैं। प्रभू का नाम गुरू की शिक्षा के द्वारा ही सिमरा जा सकता है। (हे प्रभू!) जब आपको भाए (तो जीव आपके नाम के) सुख में (टिक के) तृप्त होते हैं। धन्य है (उस जीव को) पैदा करने वाली माँ, (नाम की बरकति से वह) अपना खानदान (ही विकारों से) बचा लेती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।