राग: Salok Fareed Jee · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मिसल फकीरां गाखड़ी सु पाईऐ पूर करंमि ॥111॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (उठ के रॅब को याद कर। ये) फकीरों वाली रहणी बहुत मुश्किल है। और मिलती है बहुत बड़े भाग्यों से। 111।
पहिलै पहरै फुलड़ा फलु भी पछा राति ॥ जो जागंनि॑ लहंनि से साई कंनो दाति ॥112॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: (रात के) पहले पहर की बँदगी (जैसे) एक सुंदर सा फूल है। फल अमृत बेला की बँदगी ही हो सकती है। जो लोग (अमृत बेला में) जागते हैं वे परमात्मा से बख्शिशें हासिल करते हैं। 112।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: बख्शिशें। मालिक की (अपनी) हैं। उस मालिक के साथ (किसी का) क्या जोर चल सकता है। कई (अमृत बेला में) जागते हुए भी (ये बख्शिशें) नहीं ले सकते। कई (भाग्यशालियों को) सोए हुओं को (वह खुद) जगा देता है (भाव। कई अमृत बेला में जागते हुए भी किसी अहंकार आदि रूप माया में सोए रह जाते हैं। और कई गाफिलों को मेहर कर के खुद सूझ दे देता है)। 113।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: सुहाग (-परमात्मा) को तलाशने वाली (हे जीव-सि्त्रए !) (आप अमृत बेला में उठ के पति-परमात्मा को मिलने के लिए बँदगी करती है पर आपको अभी भी नहीं मिला) आपके अपने अंदर ही कोई कसर है। जिनका नाम ‘सोहगनें’ है उनके अंदर और कोई टेक नहीं होती (भाव। पति-मिलाप की ‘दाति’ उनको ही मिलती है जो अमृत वेला में उठने का कोई ‘हक’ नहीं जमातीं)। 114।
सबर मंझ कमाण ए सबरु का नीहणो ॥ सबर संदा बाणु खालकु खता न करी ॥115॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: यदि मन में इस सब्र की कमान हो। और सब्र की कमान का चिल्ला हो। सब्र का ही तीर हो। तो परमात्मा (इसका निशाना) हाथ से जाने नहीं देगा। 115।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: सब्र वाले बँदे सब्र में रह के इसी तरह (सदा सब्र में ही) बँदगी की घाल घालते (मेहनत करते) हैं (इस तरह वे) रॅब के नजदीक होते जाते हैं। और किसी को अपने दिल का भेद नहीं देते। 116।
सबरु एहु सुआउ जे तूं बंदा दिड़ु करहि ॥ वधि थीवहि दरीआउ टुटि न थीवहि वाहड़ा ॥117॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे बँदे ! यह सब्र ही जिंदगी का असल निशाना है। अगर आप (सब्र को हृदय में) पक्का कर ले। तो आप बढ़ के दरिया हैं जाएगा। (पर) कम हैं के छोटा सा बहाव नहीं बनेगा (भाव। सब्र वाला जीवन बनाने से आपका दिल बढ़ के दरिया हैं जाएगा। आपके दिल में सारे जगत के लिए प्यार पैदा हैं जाएगा। आपके अंदर तंग-दिली नहीं रह जाएगी)। 117।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (ये सब्र वाला जीवन असल) फकीरी (है। और यह) कठिन (काम) है। पर (हे फरीद ! रॅब से आपकी) प्रीति तो ऊपर-ऊपर से है। फकीरों का (यह सब्र वाला) काम किसी विरले बँदे ने कमाया है। 118।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: मेरा शरीर (बेशक) तंदूर की तरह तपे। मेरी हड्डियाँ (चाहे इस तरह) जलें जैसे ईधन (जलता) है। (प्यारे रॅब को मिलने की राह में अगर मैं) पैरों से (चलता-चलता) थक जाऊँ। तो मैं सिर भार चलने लग पड़ूँ। (मैं ये सारी मुश्किलें सहने को तैयार हूँ) अगर मुझे प्यारे रॅब जी मिल जाएं (भाव। रॅब को मिलने के लिए यह जरूरी हो कि शरीर को धूणियां तपा-तपा के दुखी किया जाए। तो मैं ये कष्ट सहने को भी तैयार हूँ)। 119।
तनु न तपाइ तनूर जिउ बालणु हड न बालि ॥ सिरि पैरी किआ फेड़िआ अंदरि पिरी निहालि ॥120॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: शरीर को (धूणियों से) तंदूर की तरह ना जला; और हड्डियों को इस तरह ना जला जैसे यह ईधन है। सिर ने और पैरों ने कुछ नहीं बिगाड़ा है। (इस वास्ते इनको दुखी ना कर) परमात्मा को अपने अंदर देख। 120।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: मैं (जीव-स्त्री) सज्जन (-प्रभू) को (बाहर) तलाश रही हूँ। (पर वह) सज्जन (तो) मेरे हृदय में बस रहा है। हे नानक ! उस (सज्जन) का कोई लक्षण नहीं। (अपने उद्यम से जीव से) वह पहचाना नहीं जा सकता। सतिगुरू दिखा देता है। 121।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हंसों को तैरता हुआ देख के बगुलों को भी चाव चढ़ गया। पर बेचारे बगुले (ये उद्यम करने के चक्कर में) सिर तले और पैर ऊपर (हो के) डूब के मर गए। 122।
मै जाणिआ वड हंसु है तां मै कीता संगु ॥ जे जाणा बगु बपुड़ा जनमि न भेड़ी अंगु ॥123॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: मैंने समझा कि ये कोई बड़ा हँस है। इसीलिए मैंने उसकी संगति की। पर अगर मुझे पता होता कि ये नाकारा बगुला है। तो मैं कभी उसके नजदीक ना फटकती। 123।
किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि धरे ॥ जे तिसु भावै नानका कागहु हंसु करे ॥124॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: जिस पर (प्रभू) कृपा की नजर करे (उसको अपना बना लेता है; सो किसी से नफरत क्यों।) हे नानक ! अगर परमात्मा को ठीक लगे तो (बगुला तो एक तरफ रहा। वह) कौए से (भी) हँस बना देता है (भाव। बड़े से बड़े विकारी को भी सुधार लेता है)। 124।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (जगत रूप) तालाब में (ये जीव-रूपी) पंछी अकेला ही है। फसाने वाले (कामादिक) पचास हैं। (मेरा) यह शरीर (संसार-रूप तालाब की विकार-रूप) लहरों में फस गया है। हे सच्चे (प्रभू) ! (इनसे बचने के लिए) एक आपकी (सहायता की ही) आस है (इस वास्ते आपको मिलने के लिए अगर तप तपाने पड़ें। तो भी सौदा सस्ता है)। 125।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: (हे बहन !) वह कौन सा अक्षर है। वह कौन सा गुण है। वह कौन सा शिरोमणि मंत्र है। वह कौन सा भेष मैं करूँ जिससे (मेरा) पति (मेरे) वश में आ जाए। 126। हे बहन ! झुकना अक्षर है। सहना गुण है। मीठा बोलना शिरोमणि मंत्र है। अगर ये तीन वेश (भेष) कर ले तो (मेरा) पति (आपके) वश में आ जाएगा। 127।
मति होदी होइ इआणा ॥ ताण होदे होइ निताणा ॥ अणहोदे आपु वंडाए ॥ को ऐसा भगतु सदाए ॥128॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (जो मनुष्य) अक्ल के होते हुए भी अंजान बना रहे (भाव। अकल के ताण से ताकत से दूसरों पर कोई दबाव ना डाले)। जोर होते हुए कमजोरों की तरह जीए (भाव। किसी के ऊपर जोर जबरदस्ती ना करे)। जब कुछ भी देने के लायक ना हो। तब अपना आप (भाव। अपना हिस्सा) बाँट दे। किसी ऐसे मनुष्य को (ही) भगत कहना चाहिए। 128।
इकु फिका न गालाइ सभना मै सचा धणी ॥ हिआउ न कैही ठाहि माणक सभ अमोलवे ॥129॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: एक भी फीका वचन ना बोल (क्योंकि) सबमें सच्चा मालिक (बस रहा है)। किसी का भी दिल ना दुखा (क्योंकि) यह सारे (जीव) अमूल्य मोती हैं। 129।
सभना मन माणिक ठाहणु मूलि मचांगवा ॥ जे तउ पिरीआ दी सिक हिआउ न ठाहे कही दा ॥130॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: सारे जीवों के मन मोती हैं। (किसी को भी) दुखाना बिल्कुल ठीक नहीं। अगर आपको प्यारे प्रभू से मिलने की तमन्ना है। तो किसी का दिल ना दुखा। 130।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है। चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।