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1384
फ़रीद जी के सलोक
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- मिसल फकीरां गाखड़ी सु पाईऐ पूर करंमि ॥111॥
- पहिलै पहरै फुलड़ा फलु भी पछा राति ॥
- दाती साहिब संदीआ किआ चलै तिसु नालि ॥
- ढूढेदीए सुहाग कू तउ तनि काई कोर ॥
- सबर मंझ कमाण ए सबरु का नीहणो ॥
- सबर अंदरि साबरी तनु एवै जालेनि॑ ॥
- सबरु एहु सुआउ जे तूं बंदा दिड़ु करहि ॥
- फरीदा दरवेसी गाखड़ी चोपड़ी परीति ॥
- तनु तपै तनूर जिउ बालणु हड बलंनि॑ ॥
- तनु न तपाइ तनूर जिउ बालणु हड न बालि ॥
- हउ ढूढेदी सजणा सजणु मैडे नालि ॥
- हंसा देखि तरंदिआ बगा आइआ चाउ ॥
- मै जाणिआ वड हंसु है तां मै कीता संगु ॥
- किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि धरे ॥
- सरवर पंखी हेकड़ो फाहीवाल पचास ॥
- कवणु सु अखरु कवणु गुणु कवणु सु मणीआ मंतु ॥
- मति होदी होइ इआणा ॥
- इकु फिका न गालाइ सभना मै सचा धणी ॥
- सभना मन माणिक ठाहणु मूलि मचांगवा ॥
· सलोक
मिसल फकीरां गाखड़ी सु पाईऐ पूर करंमि ॥111॥
मिसल फकीरां गाखड़ी सु पाईऐ पूर करंमि ॥111॥
हिन्दी अर्थ: (उठ के रॅब को याद करें। ये) फकीरों वाली रहणी बहुत मुश्किल है। और मिलती है बहुत बड़े भाग्यों से। 111।
· सलोक
पहिलै पहरै फुलड़ा फलु भी पछा राति ॥
पहिलै पहरै फुलड़ा फलु भी पछा राति ॥
जो जागंनि॑ लहंनि से साई कंनो दाति ॥112॥
जो जागंनि॑ लहंनि से साई कंनो दाति ॥112॥
हिन्दी अर्थ: (रात के) पहले पहर की बँदगी (जैसे) एक सुंदर सा फूल है। फल अमृत बेला की बँदगी ही हो सकती है। जो लोग (अमृत बेला में) जागते हैं वे परमात्मा से बख्शिशें हासिल करते हैं। 112।
· सलोक
दाती साहिब संदीआ किआ चलै तिसु नालि ॥
दाती साहिब संदीआ किआ चलै तिसु नालि ॥
इकि जागंदे ना लहनि॑ इकन॑ा सुतिआ देइ उठालि ॥113॥
इकि जागंदे ना लहनि॑ इकन॑ा सुतिआ देइ उठालि ॥113॥
हिन्दी अर्थ: बख्शिशें। मालिक की (अपनी) हैं। उस मालिक के साथ (किसी का) क्या जोर चल सकता है। कई (अमृत बेला में) जागते हुए भी (ये बख्शिशें) नहीं ले सकते। कई (भाग्यशालियों को) सोए हुओं को (वह खुद) जगा देता है (भाव, कई अमृत बेला में जागते हुए भी किसी अहंकार आदि रूप माया में सोए रह जाते हैं। और कई गाफिलों को मेहर कर के खुद सूझ दे देता है)। 113।
· सलोक
ढूढेदीए सुहाग कू तउ तनि काई कोर ॥
ढूढेदीए सुहाग कू तउ तनि काई कोर ॥
जिन॑ा नाउ सुहागणी तिन॑ा झाक न होर ॥114॥
जिन॑ा नाउ सुहागणी तिन॑ा झाक न होर ॥114॥
हिन्दी अर्थ: सुहाग (-परमात्मा) को तलाशने वाली (हे जीव-सि्त्रए!) (आप अमृत बेला में उठ के पति-परमात्मा को मिलने के लिए बँदगी करती हैं पर आपको अभी भी नहीं मिला) आपके अपने अंदर ही कोई कसर है। जिनका नाम 'सोहगनें' है उनके अंदर और कोई टेक नहीं होती (भाव, पति-मिलाप की 'दाति' उनको ही मिलती है जो अमृत वेला में उठने का कोई 'हक' नहीं जमातीं)। 114।
· सलोक
सबर मंझ कमाण ए सबरु का नीहणो ॥
सबर मंझ कमाण ए सबरु का नीहणो ॥
सबर संदा बाणु खालकु खता न करी ॥115॥
सबर संदा बाणु खालकु खता न करी ॥115॥
हिन्दी अर्थ: यदि मन में इस सब्र की कमान हो। और सब्र की कमान का चिल्ला हो। सब्र का ही तीर हो। तो परमात्मा (इसका निशाना) हाथ से जाने नहीं देगा। 115।
· सलोक
सबर अंदरि साबरी तनु एवै जालेनि॑ ॥
सबर अंदरि साबरी तनु एवै जालेनि॑ ॥
होनि नजीकि खुदाइ दै भेतु न किसै देनि ॥116॥
होनि नजीकि खुदाइ दै भेतु न किसै देनि ॥116॥
हिन्दी अर्थ: सब्र वाले बँदे सब्र में रह के इसी तरह (सदा सब्र में ही) बँदगी की घाल घालते (मेहनत करते) हैं (इस तरह वे) रॅब के नजदीक होते जाते हैं। और किसी को अपने दिल का भेद नहीं देते। 116।
· सलोक
सबरु एहु सुआउ जे तूं बंदा दिड़ु करहि ॥
सबरु एहु सुआउ जे तूं बंदा दिड़ु करहि ॥
वधि थीवहि दरीआउ टुटि न थीवहि वाहड़ा ॥117॥
वधि थीवहि दरीआउ टुटि न थीवहि वाहड़ा ॥117॥
हिन्दी अर्थ: हे बँदे! यह सब्र ही जिंदगी का असल निशाना है। अगर आप (सब्र को हृदय में) पक्का कर लें, तो आप बढ़ के दरिया हो जाएँगे। (पर) कम हो के छोटा सा बहाव नहीं बनेंगे (भाव, सब्र वाला जीवन बनाने से आपका दिल बढ़ के दरिया हो जाएगा। आपके दिल में सारे जगत के लिए प्यार पैदा हो जाएगा। आपके अंदर तंग-दिली नहीं रह जाएगी)। 117।
· सलोक
फरीदा दरवेसी गाखड़ी चोपड़ी परीति ॥
फरीदा दरवेसी गाखड़ी चोपड़ी परीति ॥
इकनि किनै चालीऐ दरवेसावी रीति ॥118॥
इकनि किनै चालीऐ दरवेसावी रीति ॥118॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (ये सब्र वाला जीवन असल) फकीरी (है। और यह) कठिन (काम) है। पर (हे फरीद! रॅब से आपकी) प्रीति तो ऊपर-ऊपर से है। फकीरों का (यह सब्र वाला) काम किसी विरले बँदे ने कमाया है। 118।
· सलोक
तनु तपै तनूर जिउ बालणु हड बलंनि॑ ॥
तनु तपै तनूर जिउ बालणु हड बलंनि॑ ॥
पैरी थकां सिरि जुलां जे मूं पिरी मिलंनि॑ ॥119॥
पैरी थकां सिरि जुलां जे मूं पिरी मिलंनि॑ ॥119॥
हिन्दी अर्थ: मेरा शरीर (बेशक) तंदूर की तरह तपे। मेरी हड्डियाँ (चाहे इस तरह) जलें जैसे ईधन (जलता) है। (प्यारे रॅब को मिलने की राह में अगर मैं) पैरों से (चलता-चलता) थक जाऊँ, तो मैं सिर भार चलने लग पड़ूँ। (मैं ये सारी मुश्किलें सहने को तैयार हूँ) अगर मुझे प्यारे रॅब जी मिल जाएं (भाव, रॅब को मिलने के लिए यह जरूरी हो कि शरीर को धूणियां तपा-तपा के दुखी किया जाए, तो मैं ये कष्ट सहने को भी तैयार हूँ)। 119।
· सलोक
तनु न तपाइ तनूर जिउ बालणु हड न बालि ॥
तनु न तपाइ तनूर जिउ बालणु हड न बालि ॥
सिरि पैरी किआ फेड़िआ अंदरि पिरी निहालि ॥120॥
सिरि पैरी किआ फेड़िआ अंदरि पिरी निहालि ॥120॥
हिन्दी अर्थ: शरीर को (धूणियों से) तंदूर की तरह ना जलाएँ; और हड्डियों को इस तरह ना जलाएँ जैसे यह ईधन है। सिर ने और पैरों ने कुछ नहीं बिगाड़ा है। (इस वास्ते इनको दुखी ना करें) परमात्मा को अपने अंदर देखिए। 120।
· सलोक
हउ ढूढेदी सजणा सजणु मैडे नालि ॥
हउ ढूढेदी सजणा सजणु मैडे नालि ॥
नानक अलखु न लखीऐ गुरमुखि देइ दिखालि ॥121॥
नानक अलखु न लखीऐ गुरमुखि देइ दिखालि ॥121॥
हिन्दी अर्थ: मैं (जीव-स्त्री) सज्जन (-प्रभू) को (बाहर) तलाश रही हूँ। (पर वह) सज्जन (तो) मेरे हृदय में बस रहा है। हे नानक! उस (सज्जन) का कोई लक्षण नहीं। (अपने उद्यम से जीव से) वह पहचाना नहीं जा सकता। सतिगुरू दिखा देता है। 121।
· सलोक
हंसा देखि तरंदिआ बगा आइआ चाउ ॥
हंसा देखि तरंदिआ बगा आइआ चाउ ॥
डुबि मुए बग बपुड़े सिरु तलि उपरि पाउ ॥122॥
डुबि मुए बग बपुड़े सिरु तलि उपरि पाउ ॥122॥
हिन्दी अर्थ: हंसों को तैरता हुआ देख के बगुलों को भी चाव चढ़ गया। पर बेचारे बगुले (ये उद्यम करने के चक्कर में) सिर तले और पैर ऊपर (हो के) डूब के मर गए। 122।
· सलोक
मै जाणिआ वड हंसु है तां मै कीता संगु ॥
मै जाणिआ वड हंसु है तां मै कीता संगु ॥
जे जाणा बगु बपुड़ा जनमि न भेड़ी अंगु ॥123॥
जे जाणा बगु बपुड़ा जनमि न भेड़ी अंगु ॥123॥
हिन्दी अर्थ: मैंने समझा कि ये कोई बड़ा हँस है। इसीलिए मैंने उसकी संगति की। पर अगर मुझे पता होता कि ये नाकारा बगुला है, तो मैं कभी उसके नजदीक ना फटकती। 123।
· सलोक
किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि धरे ॥
किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि धरे ॥
जे तिसु भावै नानका कागहु हंसु करे ॥124॥
जे तिसु भावै नानका कागहु हंसु करे ॥124॥
हिन्दी अर्थ: जिस पर (प्रभू) कृपा की नजर करे (उसको अपना बना लेता है; सो किसी से नफरत क्यों।) हे नानक! अगर परमात्मा को ठीक लगे तो (बगुला तो एक तरफ रहा। वह) कौए से (भी) हँस बना देता है (भाव, बड़े से बड़े विकारी को भी सुधार लेता है)। 124।
· सलोक
सरवर पंखी हेकड़ो फाहीवाल पचास ॥
सरवर पंखी हेकड़ो फाहीवाल पचास ॥
इहु तनु लहरी गडु थिआ सचे तेरी आस ॥125॥
इहु तनु लहरी गडु थिआ सचे तेरी आस ॥125॥
हिन्दी अर्थ: (जगत रूप) तालाब में (ये जीव-रूपी) पंछी अकेला ही है। फसाने वाले (कामादिक) पचास हैं। (मेरा) यह शरीर (संसार-रूप तालाब की विकार-रूप) लहरों में फस गया है। हे सच्चे (प्रभू)! (इनसे बचने के लिए) एक आपकी (सहायता की ही) आस है (इस वास्ते आपको मिलने के लिए अगर तप तपाने पड़ें, तो भी सौदा सस्ता है)। 125।
· सलोक
कवणु सु अखरु कवणु गुणु कवणु सु मणीआ मंतु ॥
कवणु सु अखरु कवणु गुणु कवणु सु मणीआ मंतु ॥
कवणु सु वेसो हउ करी जितु वसि आवै कंतु ॥126॥
निवणु सु अखरु खवणु गुणु जिहबा मणीआ मंतु ॥
ए त्रै भैणे वेस करि तां वसि आवी कंतु ॥127॥
कवणु सु वेसो हउ करी जितु वसि आवै कंतु ॥126॥
निवणु सु अखरु खवणु गुणु जिहबा मणीआ मंतु ॥
ए त्रै भैणे वेस करि तां वसि आवी कंतु ॥127॥
हिन्दी अर्थ: (हे बहन!) वह कौन सा अक्षर है? वह कौन सा गुण है? वह कौन सा शिरोमणि मंत्र है? वह कौन सा भेष मैं करूँ जिससे (मेरा) पति-प्रभु (मेरे) वश में आ जाए? 126। हे बहन! झुकना अक्षर है। सहना गुण है। मीठा बोलना शिरोमणि मंत्र है। अगर ये तीन वेश (भेष) कर लें तो पति-प्रभु आपके वश में आ जाएँगे। 127।
· सलोक
मति होदी होइ इआणा ॥
मति होदी होइ इआणा ॥
ताण होदे होइ निताणा ॥
अणहोदे आपु वंडाए ॥
को ऐसा भगतु सदाए ॥128॥
ताण होदे होइ निताणा ॥
अणहोदे आपु वंडाए ॥
को ऐसा भगतु सदाए ॥128॥
हिन्दी अर्थ: (जो मनुष्य) अक्ल के होते हुए भी अंजान बना रहे (भाव, अकल के ताण से ताकत से दूसरों पर कोई दबाव ना डाले)। जोर होते हुए कमजोरों की तरह जीए (भाव, किसी के ऊपर जोर जबरदस्ती ना करे)। जब कुछ भी देने के लायक ना हो, तब अपना आप (भाव, अपना हिस्सा) बाँट दे। किसी ऐसे मनुष्य को (ही) भगत कहना चाहिए। 128।
· सलोक
इकु फिका न गालाइ सभना मै सचा धणी ॥
इकु फिका न गालाइ सभना मै सचा धणी ॥
हिआउ न कैही ठाहि माणक सभ अमोलवे ॥129॥
हिआउ न कैही ठाहि माणक सभ अमोलवे ॥129॥
हिन्दी अर्थ: एक भी फीका वचन ना बोलें (क्योंकि) सबमें सच्चा मालिक (बस रहा है)। किसी का भी दिल ना दुखाएँ (क्योंकि) यह सारे (जीव) अमूल्य मोती हैं। 129।
· सलोक
सभना मन माणिक ठाहणु मूलि मचांगवा ॥
सभना मन माणिक ठाहणु मूलि मचांगवा ॥
जे तउ पिरीआ दी सिक हिआउ न ठाहे कही दा ॥130॥
जे तउ पिरीआ दी सिक हिआउ न ठाहे कही दा ॥130॥
हिन्दी अर्थ: सारे जीवों के मन मोती हैं। (किसी को भी) दुखाना बिल्कुल ठीक नहीं। अगर आपको प्यारे प्रभू से मिलने की तमन्ना है, तो किसी का दिल ना दुखाएँ। 130।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; शेख़ फ़रीद जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1384 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।