अंग 1385

अंग
1385
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सवये स्री मुखबाक्य महला ५ ॥
आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥
सरब रहिओ भरपूरि सगल घट रहिओ बिआपे ॥
ब्यापतु देखीऐ जगति जानै कउनु तेरी गति सरब की रख्या करै आपे हरि पति ॥
अबिनासी अबिगत आपे आपि उतपति ॥
एकै तूही एकै अन नाही तुम भति ॥
हरि अंतु नाही पारावारु कउनु है करै बीचारु जगत पिता है स्रब प्रान को अधारु ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥१॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वह अद्वितीय ईश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, उसका नाम सत्य है। वह आदिपुरुष देवी-देवताओं, जीवों सहित सम्पूर्ण संसार को बनाने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, वह निर्वेर (प्रेम की मूर्ति) है, वह कालातीत (अतीत, वर्तमान, भविष्य से परे) ब्रह्ममूर्ति शाश्वत-स्वरूप, अमर है, वह जन्म-मरण से मुक्त है, वह स्वजन्मा है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है। सवये स्री मुखबाक्य महला ५ ॥ हे आदि पुरख ! हे करतार ! आप खुद ही सारी सृष्टि का मूल है। आप सब जगह भरपूर है; (भाव। कोई जगह ऐसी नहीं। जहाँ आप ना हो)। आप सब शरीरों में मौजूद है। हे (सबके) मालिक अकाल पुरख ! आप सारे जगत में पसरा हुआ दिखाई दे रहा है। कौन जानता है कि आप किस तरह का है। आप स्वयं ही सब (जीवों) की रक्षा करता है। (हे आदि पुरख !) आप कभी नाश होने वाला नहीं। आप इन आँखों से नहीं दिखता; आपकी उत्पक्ति आपके अपने आप से ही है। आप केवल एक ही एक है। आपके जैसा और कोई नहीं। (हे भाई !) हरी का अंत और हदबंदी नहीं (पायी जा सकती)। कौन (मनुष्य) है जो (उसकी हदबंदी को ढूँढने के लिए) विचार कर सकता है। हरी सारे जगत का पिता है और सारे जीवों का आसरा है। (हरी का) भगत सेवक (गुरू) नानक (हरी के) दर पर परवान (हुआ है) और हरी जैसा है। (मेरी) एक जीभ (उस गुरू नानक के) क्या (गुण) कथन कर सकती है। मैं (गुरू नानक से) सदके हूँ। सदके हूँ। सदा सदके हूँ। 1।
अंम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥
आपुनो भावनु करि मंत्रि न दूसरो धरि ओपति परलौ एकै निमख तु घरि ॥
आन नाही समसरि उजीआरो निरमरि कोटि पराछत जाहि नाम लीए हरि हरि ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥२॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे अकाल पुरख !) (आपसे) अमृत के प्रवाह चल रहे हैं। आपके ना तुल सकने वाले खजाने भरे पड़े हैं; आप परे से परे हैं और बेअंत है। आप अपनी मर्जी करता है; किसी और को अपनी सलाह में नहीं लाता। (भाव। आप किसी और से सलाह नहीं करता) आपके घेरे में (भाव। आपके हुकम में) जगत की पैदायश और अंत आँख झपकने जितने समय में हैं जाते हैं। कोई और हरी जैसा नहीं है; उसका निर्मल प्रकाश है; उस हरी का नाम लेने से करोड़ों पाप दूर हो जाते हैं। हरी का भगत दास (गुरू) नानक (हरी के) दर पर प्रवान (हुआ है) और हरी जैसा ही है। (मेरी) एक जीभ (उस गुरू नानक के) क्या (गुण) कह सकती है। मैं (गुरू नानक से) सदके हूँ। सदके हूँ। सदा सदके हूँ। 2।
सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥
हरि गुन नाही अंत पारे जीअ जंत सभि थारे सगल को दाता एकै अलख मुरारे ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: उस हरी ने सारे लोक बनाए हैं; एक अपने आप से ही (यह संसार का) विस्तार किया है; खुद ही सब में व्यापक है (और फिर) है (भी) निर्लिप। हे बेअंत हरी ! आपके गुणों का अंत और पार नहीं (पड़ सकता)। सारे जीव-जंतु आपके ही हैं। आप एक खुद ही सबका दाता है। आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह अद्वितीय ईश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, उसका नाम सत्य है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।