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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1385 · सवैये

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अंग
1385
सवैये
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  1. आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥
  2. अंम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥
  3. सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥

ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सवये स्री मुखबाक्य महला 5 ॥
आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥
सरब रहिओ भरपूरि सगल घट रहिओ बिआपे ॥
ब्यापतु देखीऐ जगति जानै कउनु तेरी गति सरब की रख्या करै आपे हरि पति ॥
अबिनासी अबिगत आपे आपि उतपति ॥
एकै तूही एकै अन नाही तुम भति ॥
हरि अंतु नाही पारावारु कउनु है करै बीचारु जगत पिता है स्रब प्रान को अधारु ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: परमात्मा एक हैं। उनका नाम ‘सत्’ है, यानी सदा अस्तित्व में रहने वाला। वे सृष्टि के रचयिता हैं और सबमें व्याप्त हैं। वे भय और वैर से रहित हैं। उनका स्वरूप काल से परे है। वे जन्म नहीं लेते और स्वयं प्रकाशमान हैं। उन्हें सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। सवये स्री मुखबाक्य महला 5 ॥ हे आदि पुरख! हे करतार! आप खुद ही सारी सृष्टि का मूल हैं। आप सब जगह भरपूर हैं; (भाव, कोई जगह ऐसी नहीं। जहाँ आप ना हों)। आप सब शरीरों में मौजूद हैं। हे (सबके) मालिक अकाल पुरख! आप सारे जगत में पसरे हुए दिखाई दे रहे हैं। कौन जानता है कि आप किस तरह के हैं। आप स्वयं ही सब (जीवों) की रक्षा करते हैं। (हे आदि पुरख!) आप कभी नाश होने वाले नहीं। आप इन आँखों से नहीं दिखते; आपकी उत्पक्ति आपके अपने आप से ही है। आप केवल एक ही एक हैं। आपके जैसा और कोई नहीं। (हे भाई!) हरी का अंत और हदबंदी नहीं (पायी जा सकती)। कौन (मनुष्य) है जो (उसकी हदबंदी को ढूँढने के लिए) विचार कर सकता है। हरी सारे जगत का पिता है और सारे जीवों का आसरा है। (हरी का) भगत सेवक (गुरू) नानक (हरी के) दर पर परवान (हुआ है) और हरी जैसा है। (मेरी) एक जीभ (उस गुरू नानक के) क्या (गुण) कथन कर सकती है। मैं (गुरू नानक से) सदके हूँ, सदके हूँ। सदा सदके हूँ। 1।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

अंम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥

अंम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥
आपुनो भावनु करि मंत्रि न दूसरो धरि ओपति परलौ एकै निमख तु घरि ॥
आन नाही समसरि उजीआरो निरमरि कोटि पराछत जाहि नाम लीए हरि हरि ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: (हे अकाल पुरख!) (आपसे) अमृत के प्रवाह चल रहे हैं। आपके ना तुल सकने वाले खजाने भरे पड़े हैं; आप परे से परे हैं और बेअंत हैं। आप अपनी मर्जी करते हैं; किसी और को अपनी सलाह में नहीं लाते। (भाव, आप किसी और से सलाह नहीं करते) आपके घेरे में (भाव, आपके हुकम में) जगत की पैदायश और अंत आँख झपकने जितने समय में हो जाते हैं। कोई और हरी जैसा नहीं है; उसका निर्मल प्रकाश है; उस हरी का नाम लेने से करोड़ों पाप दूर हो जाते हैं। हरी का भगत दास (गुरू) नानक (हरी के) दर पर प्रवान (हुआ है) और हरी जैसा ही है। (मेरी) एक जीभ (उस गुरू नानक के) क्या (गुण) कह सकती है। मैं (गुरू नानक से) सदके हूँ, सदके हूँ। सदा सदके हूँ। 2।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥

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सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥
हरि गुन नाही अंत पारे जीअ जंत सभि थारे सगल को दाता एकै अलख मुरारे ॥

हिन्दी अर्थ: उस हरी ने सारे लोक बनाए हैं; एक अपने आप से ही (यह संसार का) विस्तार किया है; खुद ही सब में व्यापक है (और फिर) है (भी) निर्लिप। हे बेअंत हरी! आपके गुणों का अंत और पार नहीं (पड़ सकता)। सारे जीव-जंतु आपके ही हैं। आप एक खुद ही सबके दाता हैं। आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1385 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।