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अंग 1383 · फ़रीद जी के सलोक

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अंग
1383
फ़रीद जी के सलोक
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  1. गोरां से निमाणीआ बहसनि रूहां मलि ॥
  2. फरीदा मउतै दा बंना एवै दिसै जिउ दरीआवै ढाहा ॥
  3. फरीदा दरीआवै कंन॑ै बगुला बैठा केल करे ॥
  4. साढे त्रै मण देहुरी चलै पाणी अंनि ॥
  5. फरीदा हउ बलिहारी तिन॑ पंखीआ जंगलि जिंन॑ा वासु ॥
  6. फरीदा रुति फिरी वणु कंबिआ पत झड़े झड़ि पाहि ॥
  7. फरीदा पाड़ि पटोला धज करी कंबलड़ी पहिरेउ ॥
  8. काइ पटोला पाड़ती कंबलड़ी पहिरेइ ॥
  9. फरीदा गरबु जिन॑ा वडिआईआ धनि जोबनि आगाह ॥
  10. फरीदा पिछल राति न जागिओहि जीवदड़ो मुइओहि ॥
  11. फरीदा कंतु रंगावला वडा वेमुहताजु ॥
  12. फरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु ॥
  13. फरीदा दुनी वजाई वजदी तूं भी वजहि नालि ॥
  14. फरीदा दिलु रता इसु दुनी सिउ दुनी न कितै कंमि ॥

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

गोरां से निमाणीआ बहसनि रूहां मलि ॥

अंग 1382 से चला आ रहा अंश

गोरां से निमाणीआ बहसनि रूहां मलि ॥
आखीं सेखा बंदगी चलणु अजु कि कलि ॥97॥

हिन्दी अर्थ: उन कब्रों में जिनसे नफ़रत की जाती है रूहें सदा के लिए जा बैठेंगी। हे शेख (फरीद)! (रॅब की) बँदगी करें (इन महल-माढ़ियों से) आज या कल कूच करना होंगे। 97।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा मउतै दा बंना एवै दिसै जिउ दरीआवै ढाहा ॥

फरीदा मउतै दा बंना एवै दिसै जिउ दरीआवै ढाहा ॥
अगै दोजकु तपिआ सुणीऐ हूल पवै काहाहा ॥
इकना नो सभ सोझी आई इकि फिरदे वेपरवाहा ॥
अमल जि कीतिआ दुनी विचि से दरगह ओगाहा ॥98॥

हिन्दी अर्थ: हे फरीद! जैसे दरिया का किनारा है (जो पानी के वेग से ढह रहा होता है) इसी तरह मौत (-रूप) नदी का किनारा है (जिसमें बेअंत जीव उम्र भोग के गिरते जा रहे हैं)। (मौत) के आगे (विकारियों के लिए) तपे हुए नर्क सुने जाते हैं। वहाँ उनकी हाहाकार और शोर पड़ रहा है। कई (भाग्यशालियों) को तो सारी समझ आ गई है (कि यहाँ कैसे जिंदगी गुजारनी है। पर) कई बेपरवाह फिर रहे हैं। जो अमल यहाँ दुनिया में किए जाते हैं। वह रॅब की दरगाह में (मनुष्य की जिंदगी के) गवाह बनते हैं। 98।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा दरीआवै कंन॑ै बगुला बैठा केल करे ॥

फरीदा दरीआवै कंन॑ै बगुला बैठा केल करे ॥
केल करेदे हंझ नो अचिंते बाज पए ॥
बाज पए तिसु रब दे केलां विसरीआं ॥
जो मनि चिति न चेते सनि सो गाली रब कीआं ॥99॥

हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (बंदा जगत के रंग-तमाशों में मस्त है। जैसे) दरिया के किनारे पर बैठा हुआ बगुला कलोल करता है (जैसे उस) हँस (जैसे सफेद बगले) कलोल करते को अचानक बाज़ आ पड़ते हें, (वैसे ही बंदे को मौत के दूत आ दबोचते हैं)। जब उसको बाज़ आ के दबोचते हैं, तो उसे सारे कलोल भूल जाते हैं (अपनी जान की पड़ जाती है। यही हाल मौत आने पर बंदे का होता है)। जो बातें (मनुष्य के कभी) मन में चित्त-चेते नहीं थीं। रॅब ने वह कर दीं। 99।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

साढे त्रै मण देहुरी चलै पाणी अंनि ॥

साढे त्रै मण देहुरी चलै पाणी अंनि ॥
आइओ बंदा दुनी विचि वति आसूणी बंनि॑ ॥
मलकल मउत जां आवसी सभ दरवाजे भंनि ॥
तिन॑ा पिआरिआ भाईआं अगै दिता बंनि॑ ॥
वेखहु बंदा चलिआ चहु जणिआ दै कंनि॑ ॥
फरीदा अमल जि कीते दुनी विचि दरगह आए कंमि ॥100॥

हिन्दी अर्थ: (मनुष्य का यह) साढ़े तीन मन का पला हुआ शरीर (इसको) पानी और अन्न के जोर पर काम दे रहा है। बँदा जगत में कोई सुंदर सी आशा बाँध के आया है (पर, आशा पूरी नहीं होती)। जब मौत का फरिश्ता (शरीर के) सारे दरवाजे तोड़ के (भाव, सारी इन्द्रियों को नकारा कर के) आ जाता है। (मनुष्य के) वह प्यारे वीर (मौत के फरिश्ते के) आगे बाँध के चला देते हैं। देखें! बँदा चार लोगों के कांधों पर चल पड़ा है। हे फरीद! (परमात्मा की) दरगाह में वही (भले) काम सहाई होते हैं जो दुनिया में (रह के) किए जाते हैं। 100।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा हउ बलिहारी तिन॑ पंखीआ जंगलि जिंन॑ा वासु ॥

फरीदा हउ बलिहारी तिन॑ पंखीआ जंगलि जिंन॑ा वासु ॥
ककरु चुगनि थलि वसनि रब न छोडनि पासु ॥101॥

हिन्दी अर्थ: हे फरीद! मैं उन पक्षियों से सदके हूँ जिनका वासा जंगल में है। कंकड़ चुगते हैं। जमीन पर बसते हैं। (पर) रॅब का आसरा नहीं छोड़ते (भाव, महलों में रहने वाले पले हुए शरीर वाले पर रॅब को भुला देने वाले लोगों से बेहतर तो वे पक्षी ही हैं जो पेड़ों पर घोंसले बना लेते हैं। कंकड़ चुग के गुजारा कर लेते हैं। पर रॅब को याद रखते हैं)। 101।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा रुति फिरी वणु कंबिआ पत झड़े झड़ि पाहि ॥

फरीदा रुति फिरी वणु कंबिआ पत झड़े झड़ि पाहि ॥
चारे कुंडा ढूंढीआं रहणु किथाऊ नाहि ॥102॥

हिन्दी अर्थ: हे फरीद! मौसम बदल गया है। जंगल (का बूटा-बूटा) हिल गया है। पत्ते झड़ रहे हैं। (जगत की) चारों दिशाएं ढूँढ के देख ली हैं। स्थिरता कहीं भी नहीं है (ना ही ऋतु एक जैसी रह सकती है। ना ही वृक्ष और वृक्षों के पत्ते सदा टिके रह सकते हैं। भाव, समय गुजरने पर इस मनुष्य पर बुढ़ापा आ जाता है। सारे अंग कमजोर पड़ जाते हैं। आखिर जगत से चल पड़ता है)। 102।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा पाड़ि पटोला धज करी कंबलड़ी पहिरेउ ॥

फरीदा पाड़ि पटोला धज करी कंबलड़ी पहिरेउ ॥
जिन॑ी वेसी सहु मिलै सेई वेस करेउ ॥103॥

हिन्दी अर्थ: हे फरीद! पॅट का कपड़ा फाड़ के लीर कर दॅूँ। और बेकार सी कंबली पहन लूँ। मैं वही वेश कर लूँ। जिन वेशों से (मेरा) पति परमात्मा मिल जाए। 103।

गुरु अमर दास जी · सलोक

काइ पटोला पाड़ती कंबलड़ी पहिरेइ ॥

मः 3 ॥
काइ पटोला पाड़ती कंबलड़ी पहिरेइ ॥
नानक घर ही बैठिआ सहु मिलै जे नीअति रासि करेइ ॥104॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (पति-परमात्मा को मिलने के लिए जीव-स्त्री) सिर पर पॅट का कपड़ा क्यों फाड़े और बेकार सी कंबली क्यों पहने। हे नानक! घर बैठे ही पति (-परमात्मा) मिल जाता है। अगर (जीव-स्त्री अपनी) नीयत साफ कर ले (यदि मन पवित्र कर ले)। 104।

गुरु अर्जन देव जी और शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा गरबु जिन॑ा वडिआईआ धनि जोबनि आगाह ॥

मः 5 ॥
फरीदा गरबु जिन॑ा वडिआईआ धनि जोबनि आगाह ॥
खाली चले धणी सिउ टिबे जिउ मीहाहु ॥105॥
फरीदा तिना मुख डरावणे जिना विसारिओनु नाउ ॥
ऐथै दुख घणेरिआ अगै ठउर न ठाउ ॥106॥

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे फरीद! जिन लोगों को दुनियावी इज्जत का अहंकार (रहा)। बेअंत धन के कारण अथवा जवानी के कारण (कोई) माण रहा, वे (जगत में से) मालिक (की मेहर) से वंचित ही चले गए। जैसे टिबे (ऊँची जगहें) बरसात (वर्षा होने) के बाद (सूखे ही रह जाते हैं)। 105। हे फरीद! जिन लोगों ने परमात्मा का नाम भुलाया हुआ है। उनके मुँह डरावने लगते हैं (उनको देखने से ही डर लगता है। चाहे वे रेशमी कपड़े पहनने वाले हों। धन वाले हों। जवानी वाले हों अथवा आदर सत्कार वाले हों)। (जब तक) वे यहाँ (जीते हैं। उनको) कई दुख होते हैं। और आगे भी उनको कोई ठौर-ठिकाना नहीं मिलता (भाव, धक्के ही पड़ते हैं)। 106

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा पिछल राति न जागिओहि जीवदड़ो मुइओहि ॥

फरीदा पिछल राति न जागिओहि जीवदड़ो मुइओहि ॥
जे तै रबु विसारिआ त रबि न विसरिओहि ॥107॥

हिन्दी अर्थ: हे फरीद! अगर आप अमृत बेला में नहीं जागे तो (यह कोझा जीवन) जीते हुए ही आप मरे हुए हैं। अगर आपने रॅब को भुला दिया है, तो रॅब ने आपको नहीं भुलाया (भाव, परमात्मा हर वक्त आपके अमलों को देख रहा है)। 107।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक

फरीदा कंतु रंगावला वडा वेमुहताजु ॥

मः 5 ॥
फरीदा कंतु रंगावला वडा वेमुहताजु ॥
अलह सेती रतिआ एहु सचावां साजु ॥108॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद! पति (परमात्मा) सुंदर है और बहुत बेमुहताज है। (अमृत बेला में उठ के) अगर रॅब के साथ रंगे जाएं तो (मनुष्य को भी) रॅब वाला यह (सुंदर और बेमुथाजी वाला) रूप मिल जाता है (भाव, मनुष्य का मन सुंदर हो जाता है। और इसको किसी की मुथाजी नहीं रहती)। 108।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक

फरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु ॥

मः 5 ॥
फरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु ॥
अलह भावै सो भला तां लभी दरबारु ॥109॥

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे फरीद! (अमृत बेला में उठ के रॅबी याद के अभ्यास से जीवन में घटित होते) दुख और सुख को एक समान जानें। तब आपको (परमात्मा की) दरगाह की प्राप्ति होगी। 109।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक

फरीदा दुनी वजाई वजदी तूं भी वजहि नालि ॥

मः 5 ॥
फरीदा दुनी वजाई वजदी तूं भी वजहि नालि ॥
सोई जीउ न वजदा जिसु अलहु करदा सार ॥110॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद! दुनिया के लोग (बाजे हैं जो माया के) बजाए हुए बज रहे हैं। आप भी उनके साथ ही बज रहे हैं। (भाव, माया के नचाए नाच रहे हैं)। वही (भाग्यशाली) जीव (माया का बजाया हुआ) नहीं बजता। जिसकी (संभाल) रखवाली परमात्मा खुद करता है (सो, अमृत बेला में उठ के उसकी याद में जुड़ें। ताकि आपकी भी संभाल। रखवाली हो सके)। 110।

गुरु अर्जन देव जी · सलोक

फरीदा दिलु रता इसु दुनी सिउ दुनी न कितै कंमि ॥

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मः 5 ॥
फरीदा दिलु रता इसु दुनी सिउ दुनी न कितै कंमि ॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद! (अमृत बेला में उठना ही काफी नहीं; उस उठने का भी क्या लाभ अगर उस वक्त भी) दिल दुनिया (के पदार्थों) के साथ ही रंगा रहा। दुनिया (आखिरी वक्त पर) किसी काम नहीं आती।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी; शेख़ फ़रीद जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1383 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।