राग: Salok Fareed Jee · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गोरां से निमाणीआ बहसनि रूहां मलि ॥ आखीं सेखा बंदगी चलणु अजु कि कलि ॥97॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: उन कब्रों में जिनसे नफ़रत की जाती है रूहें सदा के लिए जा बैठेंगी। हे शेख (फरीद) ! (रॅब की) बँदगी कर (इन महल-माढ़ियों से) आज या कल कूच करना होंगे। 97।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! जैसे दरिया का किनारा है (जो पानी के वेग से ढह रहा होता है) इसी तरह मौत (-रूप) नदी का किनारा है (जिसमें बेअंत जीव उम्र भोग के गिरते जा रहे हैं)। (मौत) के आगे (विकारियों के लिए) तपे हुए नर्क सुने जाते हैं। वहाँ उनकी हाहाकार और शोर पड़ रहा है। कई (भाग्यशालियों) को तो सारी समझ आ गई है (कि यहाँ कैसे जिंदगी गुजारनी है। पर) कई बेपरवाह फिर रहे हैं। जो अमल यहाँ दुनिया में किए जाते हैं। वह रॅब की दरगाह में (मनुष्य की जिंदगी के) गवाह बनते हैं। 98।
फरीदा दरीआवै कंन॑ै बगुला बैठा केल करे ॥ केल करेदे हंझ नो अचिंते बाज पए ॥ बाज पए तिसु रब दे केलां विसरीआं ॥ जो मनि चिति न चेते सनि सो गाली रब कीआं ॥99॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (बंदा जगत के रंग-तमाशों में मस्त है। जैसे) दरिया के किनारे पर बैठा हुआ बगुला कलोल करता है (जैसे उस) हँस (जैसे सफेद बगले) कलोल करते को अचानक बाज़ आ पड़ते हें। (वैसे ही बंदे को मौत के दूत आ दबोचते हैं)। जब उसको बाज़ आ के दबोचते हैं। तो उसे सारे कलोल भूल जाते हैं (अपनी जान की पड़ जाती है। यही हाल मौत आने पर बंदे का होता है)। जो बातें (मनुष्य के कभी) मन में चिक्त-चेते नहीं थीं। रॅब ने वह कर दीं। 99।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (मनुष्य का यह) साढ़े तीन मन का पला हुआ शरीर (इसको) पानी और अन्न के जोर पर काम दे रहा है। बँदा जगत में कोई सुंदर सी आशा बाँध के आया है (पर। आशा पूरी नहीं होती)। जब मौत का फरिश्ता (शरीर के) सारे दरवाजे तोड़ के (भाव। सारी इन्द्रियों को नकारा कर के) आ जाता है। (मनुष्य के) वह प्यारे वीर (मौत के फरिश्ते के) आगे बाँध के चला देते हैं। देखो ! बँदा चार लोगों के कांधों पर चल पड़ा है। हे फरीद ! (परमात्मा की) दरगाह में वही (भले) काम सहाई होते हैं जो दुनिया में (रह के) किए जाते हैं। 100।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! मैं उन पक्षियों से सदके हूँ जिनका वासा जंगल में है। कंकड़ चुगते हैं। जमीन पर बसते हैं। (पर) रॅब का आसरा नहीं छोड़ते (भाव। महलों में रहने वाले पले हुए शरीर वाले पर रॅब को भुला देने वाले लोगों से बेहतर तो वे पक्षी ही हैं जो पेड़ों पर घोंसले बना लेते हैं। कंकड़ चुग के गुजारा कर लेते हैं। पर रॅब को याद रखते हैं)। 101।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! मौसम बदल गया है। जंगल (का बूटा-बूटा) हिल गया है। पत्ते झड़ रहे हैं। (जगत की) चारों दिशाएं ढूँढ के देख ली हैं। स्थिरता कहीं भी नहीं है (ना ही ऋतु एक जैसी रह सकती है। ना ही वृक्ष और वृक्षों के पत्ते सदा टिके रह सकते हैं। भाव। समय गुजरने पर इस मनुष्य पर बुढ़ापा आ जाता है। सारे अंग कमजोर पड़ जाते हैं। आखिर जगत से चल पड़ता है)। 102।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! पॅट का कपड़ा फाड़ के लीर कर दॅूँ। और बेकार सी कंबली पहन लूँ। मैं वही वेश कर लूँ। जिन वेशों से (मेरा) पति परमात्मा मिल जाए। 103। महला 3॥ (पति-परमात्मा को मिलने के लिए जीव-स्त्री) सिर पर पॅट का कपड़ा क्यों फाड़े और बेकार सी कंबली क्यों पहने। हे नानक ! घर बैठे ही पति (-परमात्मा) मिल जाता है। अगर (जीव-स्त्री अपनी) नीयत साफ कर ले (यदि मन पवित्र कर ले)। 104।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे फरीद ! जिन लोगों को दुनियावी इज्जत का अहंकार (रहा)। बेअंत धन के कारण अथवा जवानी के कारण (कोई) माण रहा। वे (जगत में से) मालिक (की मेहर) से वंचित ही चले गए। जैसे टिबे (ऊँची जगहें) बरसात (वर्षा होने) के बाद (सूखे ही रह जाते हैं)। 105। हे फरीद ! जिन लोगों ने परमात्मा का नाम भुलाया हुआ है। उनके मुँह डरावने लगते हैं (उनको देखने से ही डर लगता है। चाहे वे रेशमी कपड़े पहनने वाले हों। धन वाले हों। जवानी वाले हों अथवा आदर सत्कार वाले हों)। (जब तक) वे यहाँ (जीते हैं। उनको) कई दुख होते हैं। और आगे भी उनको कोई ठौर-ठिकाना नहीं मिलता (भाव। धक्के ही पड़ते हैं)। 106
फरीदा पिछल राति न जागिओहि जीवदड़ो मुइओहि ॥ जे तै रबु विसारिआ त रबि न विसरिओहि ॥107॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! अगर आप अमृत बेला में नहीं जागा तो (यह कोझा जीवन) जीता हुआ ही आप मरा हुआ है। अगर तूने रॅब को भुला दिया है। तो रॅब ने आपको नहीं भुलाया (भाव। परमात्मा हर वक्त आपके अमलों को देख रहा है)। 107।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद ! पति (परमात्मा) सुंदर है और बहुत बेमुहताज है। (अमृत बेला में उठ के) अगर रॅब के साथ रंगे जाएं तो (मनुष्य को भी) रॅब वाला यह (सुंदर और बेमुथाजी वाला) रूप मिल जाता है (भाव। मनुष्य का मन सुंदर हो जाता है। और इसको किसी की मुथाजी नहीं रहती)। 108।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे फरीद ! (अमृत बेला में उठ के रॅबी याद के अभ्यास से जीवन में घटित होते) दुख और सुख को एक समान जान। तब आपको (परमात्मा की) दरगाह की प्राप्ति होगी। 109।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद ! दुनिया के लोग (बाजे हैं जो माया के) बजाए हुए बज रहे हैं। आप भी उनके साथ ही बज रहा है। (भाव। माया का नचाया नाच रहा है)। वही (भाग्यशाली) जीव (माया का बजाया हुआ) नहीं बजता। जिसकी (संभाल) रखवाली परमात्मा खुद करता है (सो। अमृत बेला में उठ के उसकी याद में जुड़। ताकि आपकी भी संभाल। रखवाली हैं सके)। 110।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद ! (अमृत बेला में उठना ही काफी नहीं; उस उठने का भी क्या लाभ अगर उस वक्त भी) दिल दुनिया (के पदार्थों) के साथ ही रंगा रहा। दुनिया (आखिरी वक्त पर) किसी काम नहीं आती।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। आज पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है, और हर साल हज़ारों लोग वहाँ जाते हैं।
इस अंग पर 13 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उन कब्रों में जिनसे नफ़रत की जाती है रूहें सदा के लिए जा बैठेंगी।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।