इस पृष्ठ पर
अंग
1382
फ़रीद जी के सलोक
अंग बदलें या अंश चुनें · 20 अंश
- देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ ॥78॥
- फरीदा पंख पराहुणी दुनी सुहावा बागु ॥
- फरीदा राति कथूरी वंडीऐ सुतिआ मिलै न भाउ ॥
- फरीदा मै जानिआ दुखु मुझ कू दुखु सबाइऐ जगि ॥
- फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बाग ॥
- फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
- कंधी वहण न ढाहि तउ भी लेखा देवणा ॥
- फरीदा डुखा सेती दिहु गइआ सूलां सेती राति ॥
- लंमी लंमी नदी वहै कंधी केरै हेति ॥
- फरीदा गलंी सु सजण वीह इकु ढूंढेदी न लहां ॥
- फरीदा इहु तनु भउकणा नित नित दुखीऐ कउणु ॥
- फरीदा रब खजूरी पकीआं माखिअ नई वहंनि॑ ॥
- फरीदा तनु सुका पिंजरु थीआ तलीआं खूंडहि काग ॥
- कागा करंग ढंढोलिआ सगला खाइआ मासु ॥
- कागा चूंडि न पिंजरा बसै त उडरि जाहि ॥
- फरीदा गोर निमाणी सडु करे निघरिआ घरि आउ ॥
- एनी लोइणी देखदिआ केती चलि गई ॥
- आपु सवारहि मै मिलहि मै मिलिआ सुखु होइ ॥
- कंधी उतै रुखड़ा किचरकु बंनै धीरु ॥
- फरीदा महल निसखण रहि गए वासा आइआ तलि ॥
· सलोक
देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ ॥78॥
देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ ॥78॥
हिन्दी अर्थ: (इस तरह) शरीर को कोई रोग नहीं लगता और हरेक पदार्थ (भाव: अच्छा गुण) सँभला रहता है। 78।
· सलोक
फरीदा पंख पराहुणी दुनी सुहावा बागु ॥
फरीदा पंख पराहुणी दुनी सुहावा बागु ॥
नउबति वजी सुबह सिउ चलण का करि साजु ॥79॥
नउबति वजी सुबह सिउ चलण का करि साजु ॥79॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! ये दुनिया (एक) सुंदर बाग़ है (यहाँ कयों मन में 'टोए-टिबे बनाए हुए हैं। यहाँ तो सारे जीव-रूपी) पंछियों की डार मेहमान है। जब सुबह का धौंसा (डंका) बजा (सबने जिंदगी की रात काट के चले जाना है)। (हे फरीद! ये 'टोए-टिबे दूर करें। और आप भी) चलने की तैयारी करें। 79।
· सलोक
फरीदा राति कथूरी वंडीऐ सुतिआ मिलै न भाउ ॥
फरीदा राति कथूरी वंडीऐ सुतिआ मिलै न भाउ ॥
जिंन॑ा नैण नंीद्रावले तिंन॑ा मिलणु कुआउ ॥80॥
जिंन॑ा नैण नंीद्रावले तिंन॑ा मिलणु कुआउ ॥80॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (वह तैयारी रात को ही हो सकती है) रात (की एकांत) में कस्तूरी बाँटी जाती है (भाव, रात के एकांत के समय भजन की सुगंधि पैदा होती है)। जो सोए रहें उनको (इसमें से) हिस्सा नहीं मिलता। जिनकी आँखें (सारी रात) नींद में बनी रहें। उनको (नाम की कस्तूरी की) प्राप्ति कैसे हो। 80।
· सलोक
फरीदा मै जानिआ दुखु मुझ कू दुखु सबाइऐ जगि ॥
फरीदा मै जानिआ दुखु मुझ कू दुखु सबाइऐ जगि ॥
ऊचे चड़ि कै देखिआ तां घरि घरि एहा अगि ॥81॥
ऊचे चड़ि कै देखिआ तां घरि घरि एहा अगि ॥81॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! मैंने (पहले मन के 'टोए-टिबों' से पैदा हुए दुख में घबरा के यह) समझा कि दुख (सिर्फ) मुझे (ही) है (सिर्फ मैं ही दुखी हूँ)। (पर असल में यह) दुख तो सारे (ही) जगत में (घटित हो रहा। फैला हुआ) है। जब मैंने (अपने दुख से) ऊँचा हो के (ध्यान मारा) तब मैंने देखा कि हरेक घर में यही आग (जल) रही है (भाव, हरेक जीव दुखी है)। 81।
· सलोक
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बाग ॥
महला 5 ॥
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बाग ॥
जो जन पीरि निवाजिआ तिंन॑ा अंच न लाग ॥82॥
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बाग ॥
जो जन पीरि निवाजिआ तिंन॑ा अंच न लाग ॥82॥
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे फरीद! (ये) धरती (तो) सुहावनी है। (पर, मनुष्य के मन के 'टोए-टिबों' के कारण इस) में विषौला बाग (लगा हुआ) है (जिसमें दुखों की आग जल रही है)। जिन मनुष्यों को सतिगुरू ने ऊँचा किया है। उनको (दुख-अग्नि का) सेक नहीं लगता। 82।
· सलोक
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
महला 5 ॥
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
विरले केई पाईअनि जिंन॑ा पिआरे नेह ॥83॥
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
विरले केई पाईअनि जिंन॑ा पिआरे नेह ॥83॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद! (उन लोगों की) जिंदगी आसान है और शरीर भी सुंदर रंग वाला (भाव, रोग-रहित) है। जिनका प्यार प्यारे परमात्मा के साथ है। ('विषौला बाग़' और 'दुख-अग्नि' उनको नहीं छूते। पर ऐसे लोग) कोई विरले ही मिलते हैं। 83।
· सलोक
कंधी वहण न ढाहि तउ भी लेखा देवणा ॥
कंधी वहण न ढाहि तउ भी लेखा देवणा ॥
जिधरि रब रजाइ वहणु तिदाऊ गंउ करे ॥84॥
जिधरि रब रजाइ वहणु तिदाऊ गंउ करे ॥84॥
हिन्दी अर्थ: दुखों के तले दबा हुआ जीव 'दुख' के आगे तरले ले के कहता है: हे (दुखों के) प्रवाह! (मुझे) नदी के किनारे (के लगे हुए पेड़) को मत गिराएँ (भाव, मुझे दुखी ना करें)। आपको भी (अपने किए का) हिसाब देना पड़ेगा। (दुखी मनुष्य को यह समझ नहीं रहती कि) दुखों की बाढ़ उसी तरफ को ढाह लगाती है। जिस तरफ रब की मर्जी होती है (भाव, रब की रजा के अनुसार रब से विछुड़े हुए बँदों के अपने द्वारा किए हुए बुरे-कर्मों के तहत दुखों की बाढ़ उनको आ बहाती है)। 84।
· सलोक
फरीदा डुखा सेती दिहु गइआ सूलां सेती राति ॥
फरीदा डुखा सेती दिहु गइआ सूलां सेती राति ॥
खड़ा पुकारे पातणी बेड़ा कपर वाति ॥85॥
खड़ा पुकारे पातणी बेड़ा कपर वाति ॥85॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (मन में बने 'टोए-टिबे' के कारण दुखों की नदी में बहते जाते जीवों का) दिन दुखों में गुजरता है। रात भी (चिंता की) चुभन में बीतती है। (किनारे पे) खड़ा हुआ (गुरू-) मल्लाह इनको ऊँचा-ऊँचा कह रहा है (कि आपकी जिंदगी का) बेड़ा (दुखों की) लहरों के मुँह में (आ गिरने लगा) है। 85।
· सलोक
लंमी लंमी नदी वहै कंधी केरै हेति ॥
लंमी लंमी नदी वहै कंधी केरै हेति ॥
बेड़े नो कपरु किआ करे जे पातण रहै सुचेति ॥86॥
बेड़े नो कपरु किआ करे जे पातण रहै सुचेति ॥86॥
हिन्दी अर्थ: (संसारी लोगों-रूप) किनारे के (कमजोर पेड़ों) को गिराने के लिए (भाव, दुखी करने के लिए) (ये पेड़ों की) बेअंत लंबी नदी बह रही है। (पर इस नदी का) बवंडर घुमंण-घेर (उस जिंदगी-रूप) बेड़े का कोई नुक्सान नहीं कर सकता। जो (सतिगुरू) मललाह के चेते में रहे (भाव, जिस मनुष्य पर गुरू मेहर की नजर रखे। उसको दुख-अग्नि नहीं छूती)। 86।
· सलोक
फरीदा गलंी सु सजण वीह इकु ढूंढेदी न लहां ॥
फरीदा गलंी सु सजण वीह इकु ढूंढेदी न लहां ॥
धुखां जिउ मांलीह कारणि तिंन॑ा मा पिरी ॥87॥
धुखां जिउ मांलीह कारणि तिंन॑ा मा पिरी ॥87॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! बातों से पतियाने वाले तो बीसों मित्र (मिल जाते) हैं; पर खोज करने के वक्त असल सच्चा मित्र नहीं मिलता (जो मेरी जिंदगी के बेड़े को दुखों की नदी में से पार लंघाए)। मैं तो ऐसे (सत्संगी) सज्जनों के (ना मिलने) के कारण धुखते सूखे गोबर की तरह अंदर दुखी हो रहा हूँ। 87।
· सलोक
फरीदा इहु तनु भउकणा नित नित दुखीऐ कउणु ॥
फरीदा इहु तनु भउकणा नित नित दुखीऐ कउणु ॥
कंनी बुजे दे रहां किती वगै पउणु ॥88॥
कंनी बुजे दे रहां किती वगै पउणु ॥88॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! यह (मेरा) शरीर तो भौंकने वाला हो गया है (भाव, हर वक्त नित्य नए पदार्थ माँगता रहता है। इसकी नित्य की माँगें पूरी करने की खातिर) कौन रोज परेशान होता रहे। (भाव, मुझे ये नहीं अच्छा लगता कि रोज कठिनाईयां उठाता रहूँ)। मैं तो कानों में बुजे (रूई आदि के) दिए रखूँगा जितनी जी चाहे हवा झूलती रहे। (भाव, जितना जी चाहे ये शरीर माँगें माँगने का शोर मचाए रखे। मैं इसकी एक नहीं सुनूँगा)। 88।
· सलोक
फरीदा रब खजूरी पकीआं माखिअ नई वहंनि॑ ॥
फरीदा रब खजूरी पकीआं माखिअ नई वहंनि॑ ॥
जो जो वंञैं डीहड़ा सो उमर हथ पवंनि ॥89॥
जो जो वंञैं डीहड़ा सो उमर हथ पवंनि ॥89॥
हिन्दी अर्थ: (पर, ये शरीर बेचारा भी क्या करे। इसको लोभाने के लिए चार-चुफेरे जगत में) हे फरीद! परमात्मा की पकी हुई खजूरें (दिख रही हैं)। और शहद की नदियां बह रही हैं (भाव, हर तरफ सुंदर-सुंदर। स्वादिष्ट और मन-मोहक पदार्थ और विषौ-विकार मौजूद हैं)। (वैसे यह भी ठीक है कि इन पदार्थों को भोगने में मनुष्य का) जो-जो दिन बीतता है। वह इसकी उम्र को ही हाथ डाल रहे हैं (भाव, व्यर्थ में गवा रहे हैं)। 89।
· सलोक
फरीदा तनु सुका पिंजरु थीआ तलीआं खूंडहि काग ॥
फरीदा तनु सुका पिंजरु थीआ तलीआं खूंडहि काग ॥
अजै सु रबु न बाहुड़िओ देखु बंदे के भाग ॥90॥
अजै सु रबु न बाहुड़िओ देखु बंदे के भाग ॥90॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! यह (भौंका) शरीर (विषौ-विकारों में पड़ कर) बहुत जर्जर हो गया है। पिंजर बन के रह गया है। (फिर भी, ये) कौए इसकी तलियों पर ठूँगे मारे जा रहे हैं (भाव, दुनियावी पदार्थों के चस्के और विषौ-विकार इसके मन को चुभोएं लगाए जा रहे हैं)। देखिए। (विकारों में पड़े) मनुष्य की किस्मत भी अजीब है कि अभी भी (जबकि इसका शरीर दुनिया के विषौ भोग भोग के अपनी सक्ता भी गवा बैठा है) रॅब इस पर प्रसन्न नहीं हुआ (भाव, इसकी झाक खत्म नहीं हुई)। 90।
· सलोक
कागा करंग ढंढोलिआ सगला खाइआ मासु ॥
कागा करंग ढंढोलिआ सगला खाइआ मासु ॥
ए दुइ नैना मति छुहउ पिर देखन की आस ॥91॥
ए दुइ नैना मति छुहउ पिर देखन की आस ॥91॥
हिन्दी अर्थ: कौओं ने पिंजर भी फरोल मारा है। और सारा मास खा लिया है (भाव, दुनियावी पदार्थों के चस्के और विषौ-विकार इस अति-कमजोर हुए शरीर को भी चुभन लगाए जा रहे हैं। इस भौंके शरीर की सारी ताकत इन्होंने खींच ली है)। रॅब कर के कोई विकार (मेरी) इन दोनों आँखों को ना छेड़े। इनमें तो प्यारे प्रभू को देखने की चाहत टिकी रहे। 91।
· सलोक
कागा चूंडि न पिंजरा बसै त उडरि जाहि ॥
कागा चूंडि न पिंजरा बसै त उडरि जाहि ॥
जितु पिंजरै मेरा सहु वसै मासु न तिदू खाहि ॥92॥
जितु पिंजरै मेरा सहु वसै मासु न तिदू खाहि ॥92॥
हिन्दी अर्थ: हे कौए! मेरे पिंजर में ठूँगे ना मारें। अगर आपके वश में (ये बात) है तो (यहाँ से) उड़ जाएँ। जिस शरीर में मेरा पति-प्रभू बस रहा है। इसमें से मास ना खाएँ (भाव, हे विषयों के चस्के! मेरे इस शरीर को चोंच मारनी छोड़ दें। तरस करें। और जाएँ। खलासी करें। इस शरीर में तो पति-प्रभू का प्यार बस रहा है। आप इसको विषौ-भोगों की तरफ प्रेरने का यतन ना करें)। 92।
· सलोक
फरीदा गोर निमाणी सडु करे निघरिआ घरि आउ ॥
फरीदा गोर निमाणी सडु करे निघरिआ घरि आउ ॥
सरपर मैथै आवणा मरणहु न डरिआहु ॥93॥
सरपर मैथै आवणा मरणहु न डरिआहु ॥93॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! कब्र बेचारी (बँदे को) आवाजें मार रही है (और कहती है:) हे बे-घरे जीव! (अपने) घर में आइए। आखिर को (आपने) मेरे पास ही आना है (और फिर) मौत से (इतना) ना डरें। 93।
· सलोक
एनी लोइणी देखदिआ केती चलि गई ॥
एनी लोइणी देखदिआ केती चलि गई ॥
फरीदा लोकां आपो आपणी मै आपणी पई ॥94॥
फरीदा लोकां आपो आपणी मै आपणी पई ॥94॥
हिन्दी अर्थ: इन आँखों से देखते हुए (भाव, मेरी आँखों के सामने) कितनी ही ख़लकति चली गई है (मौत का शिकार हो गई है)। हे फरीद! (ख़लकति चलती जाती देख के भी) हरेक को अपने-अपने स्वार्थों का ही ख्याल है (भाव, हरेक जीव दुनिया वाली धुन में ही है)। मुझे भी अपना ही फिक्र पड़ा हुआ है। 94।
· सलोक
आपु सवारहि मै मिलहि मै मिलिआ सुखु होइ ॥
आपु सवारहि मै मिलहि मै मिलिआ सुखु होइ ॥
फरीदा जे तू मेरा होइ रहहि सभु जगु तेरा होइ ॥95॥
फरीदा जे तू मेरा होइ रहहि सभु जगु तेरा होइ ॥95॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! यदि आप अपने आप को सँवार लें, तो आप मुझे मिल जाएँगे। और मेरे में जुड़ने से ही आपको सुख होंगे (दुनिया के पदार्थों में नहीं)। अगर आप मेरे बन जाएँ। (भाव, दुनिया वाला प्यार छोड़ के मेरे साथ प्यार करने लग जाएँ, तो) सारा जगत आपका बन जाएगा (भाव, माया आपके पीछे-पीछे दौड़ेगी)। 95।
· सलोक
कंधी उतै रुखड़ा किचरकु बंनै धीरु ॥
कंधी उतै रुखड़ा किचरकु बंनै धीरु ॥
फरीदा कचै भांडै रखीऐ किचरु ताई नीरु ॥96॥
फरीदा कचै भांडै रखीऐ किचरु ताई नीरु ॥96॥
हिन्दी अर्थ: (दरिया के) किनारे पर (उगा हुआ) बेचारा वृक्ष कब तक धीरज रखेगा। हे फरीद! कच्चे बर्तन में कब तक पानी रखा जा सकता है। (इसी तरह मनुष्य मौत की नदी के किनारे पर खड़ा हुआ है। इस शरीर में से साँसे खत्म होती जा रही हैं)। 96।
· सलोक
फरीदा महल निसखण रहि गए वासा आइआ तलि ॥
फरीदा महल निसखण रहि गए वासा आइआ तलि ॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (मौत आने पर) महल-माढ़ियां सूनी रह जाती हैं। धरती के तले (कब्र में) डेरा लगाना पड़ता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; शेख़ फ़रीद जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1382 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।