राग: Salok Fareed Jee · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
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देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ ॥78॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (इस तरह) शरीर को कोई रोग नहीं लगता और हरेक पदार्थ (भाव। अच्छे गुण) संभाले रहते हैं।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! ये दुनिया (एक) सुंदर बाग़ है (यहाँ कयों मन में ‘टोए-टिबे बनाए हुए हैं। यहाँ तो सारे जीव-रूपी) पंछियों की डार मेहमान है। जब सुबह का धौंसा (डंका) बजा (सबने जिंदगी की रात काट के चले जाना है)। (हे फरीद ! ये ‘टोए-टिबे दूर कर। और आप भी) चलने की तैयारी कर। 79।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (वह तैयारी रात को ही हो सकती है) रात (की एकांत) में कस्तूरी बाँटी जाती है (भाव। रात के एकांत के समय भजन की सुगंधि पैदा होती है)। जो सोए रहें उनको (इसमें से) हिस्सा नहीं मिलता। जिनकी आँखें (सारी रात) नींद में बनी रहें। उनको (नाम की कस्तूरी की) प्राप्ति कैसे हो। 80।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! मैंने (पहले मन के ‘टोए-टिबों’ से पैदा हुए दुख में घबरा के यह) समझा कि दुख (सिर्फ) मुझे (ही) है (सिर्फ मैं ही दुखी हूँ)। (पर असल में यह) दुख तो सारे (ही) जगत में (घटित हो रहा। फैला हुआ) है। जब मैंने (अपने दुख से) ऊँचा हो के (ध्यान मारा) तब मैंने देखा कि हरेक घर में यही आग (जल) रही है (भाव। हरेक जीव दुखी है)। 81।
महला 5 ॥ फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बाग ॥ जो जन पीरि निवाजिआ तिंन॑ा अंच न लाग ॥82॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे फरीद ! (ये) धरती (तो) सुहावनी है। (पर। मनुष्य के मन के ‘टोए-टिबों’ के कारण इस) में विषौला बाग (लगा हुआ) है (जिसमें दुखों की आग जल रही है)। जिन मनुष्यों को सतिगुरू ने ऊँचा किया है। उनको (दुख-अग्नि का) सेक नहीं लगता। 82।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद ! (उन लोगों की) जिंदगी आसान है और शरीर भी सुंदर रंग वाला (भाव। रोग-रहित) है। जिनका प्यार प्यारे परमात्मा के साथ है। (‘विषौला बाग़’ और ‘दुख-अग्नि’ उनको नहीं छूते। पर ऐसे लोग) कोई विरले ही मिलते हैं। 83।
कंधी वहण न ढाहि तउ भी लेखा देवणा ॥ जिधरि रब रजाइ वहणु तिदाऊ गंउ करे ॥84॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: दुखों के तले दबा हुआ जीव ‘दुख’ के आगे तरले ले के कहता है- हे (दुखों के) प्रवाह ! (मुझे) नदी के किनारे (के लगे हुए पेड़) को मत गिरा (भाव। मुझे दुखी ना कर)। आपको भी (अपने किए का) हिसाब देना पड़ेगा। (दुखी मनुष्य को यह समझ नहीं रहती कि) दुखों की बाढ़ उसी तरफ को ढाह लगाती है। जिस तरफ रब की मर्जी होती है (भाव। रब की रजा के अनुसार रब से विछुड़े हुए बँदों के अपने द्वारा किए हुए बुरे-कर्मों के तहत दुखों की बाढ़ उनको आ बहाती है)। 84।
फरीदा डुखा सेती दिहु गइआ सूलां सेती राति ॥ खड़ा पुकारे पातणी बेड़ा कपर वाति ॥85॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (मन में बने ‘टोए-टिबे’ के कारण दुखों की नदी में बहते जाते जीवों का) दिन दुखों में गुजरता है। रात भी (चिंता की) चुभन में बीतती है। (किनारे पे) खड़ा हुआ (गुरू-) मल्लाह इनको ऊँचा-ऊँचा कह रहा है (कि आपका जिंदगी का) बेड़ा (दुखों की) लहरों के मुँह में (आ गिरने लगा) है। 85।
लंमी लंमी नदी वहै कंधी केरै हेति ॥ बेड़े नो कपरु किआ करे जे पातण रहै सुचेति ॥86॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (संसारी लोगों-रूप) किनारे के (कमजोर पेड़ों) को गिराने के लिए (भाव। दुखी करने के लिए) (ये पेड़ों की) बेअंत लंबी नदी बह रही है। (पर इस नदी का) बवंडर घुमंण-घेर (उस जिंदगी-रूप) बेड़े का कोई नुक्सान नहीं कर सकता। जो (सतिगुरू) मललाह के चेते में रहे (भाव। जिस मनुष्य पर गुरू मेहर की नजर रखे। उसको दुख-अग्नि नहीं छूती)। 86।
फरीदा गलंी सु सजण वीह इकु ढूंढेदी न लहां ॥ धुखां जिउ मांलीह कारणि तिंन॑ा मा पिरी ॥87॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! बातों से पतियाने वाले तो बीसों मित्र (मिल जाते) हैं; पर खोज करने के वक्त असल सच्चा मित्र नहीं मिलता (जो मेरी जिंदगी के बेड़े को दुखों की नदी में से पार लंघाए)। मैं तो ऐसे (सत्संगी) सज्जनों के (ना मिलने) के कारण धुखते सूखे गोबर की तरह अंदर दुखी हो रहा हूँ। 87।
फरीदा इहु तनु भउकणा नित नित दुखीऐ कउणु ॥ कंनी बुजे दे रहां किती वगै पउणु ॥88॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! यह (मेरा) शरीर तो भौंकने वाला हो गया है (भाव। हर वक्त नित्य नए पदार्थ माँगता रहता है। इसकी नित्य की माँगें पूरी करने की खातिर) कौन रोज परेशान होता रहे। (भाव। मुझे ये नहीं अच्छा लगता कि रोज कठिनाईयां उठाता रहूँ)। मैं तो कानों में बुजे (रूई आदि के) दिए रखूँगा जितनी जी चाहे हवा झूलती रहे। (भाव। जितना जी चाहे ये शरीर माँगें माँगने का शोर मचाए रखे। मैं इसकी एक नहीं सुनूँगा)। 88।
फरीदा रब खजूरी पकीआं माखिअ नई वहंनि॑ ॥ जो जो वंञैं डीहड़ा सो उमर हथ पवंनि ॥89॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: (पर। ये शरीर बेचारा भी क्या करे। इसको लोभाने के लिए चार-चुफेरे जगत में) हे फरीद ! परमात्मा की पकी हुई खजूरें (दिख रही हैं)। और शहद की नदियां बह रही हैं (भाव। हर तरफ सुंदर-सुंदर। स्वादिष्ट और मन-मोहक पदार्थ और विषौ-विकार मौजूद हैं)। (वैसे यह भी ठीक है कि इन पदार्थों को भोगने में मनुष्य का) जो-जो दिन बीतता है। वह इसकी उम्र को ही हाथ डाल रहे हैं (भाव। व्यर्थ में गवा रहे हें)। 89।
फरीदा तनु सुका पिंजरु थीआ तलीआं खूंडहि काग ॥ अजै सु रबु न बाहुड़िओ देखु बंदे के भाग ॥90॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! यह (भौंका) शरीर (विषौ-विकारों में पड़ कर) बहुत जर्जर हो गया है। पिंजर बन के रह गया है। (फिर भी। ये) कौए इसकी तलियों पर ठूँगे मारे जा रहे हैं (भाव। दुनियावी पदार्थों के चस्के और विषौ-विकार इसके मन को चुभोएं लगाए जा रहे हैं)। देखो। (विकारों में पड़े) मनुष्य की किस्मत भी अजीब है कि अभी भी (जबकि इसका शरीर दुनिया के विषौ भोग भोग के अपनी सक्ता भी गवा बैठा है) रॅब इस पर प्रसन्न नहीं हुआ (भाव। इसकी झाक खत्म नहीं हुई)। 90।
कागा करंग ढंढोलिआ सगला खाइआ मासु ॥ ए दुइ नैना मति छुहउ पिर देखन की आस ॥91॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: कौओं ने पिंजर भी फरोल मारा है। और सारा मास खा लिया है (भाव। दुनियावी पदार्थों के चस्के और विषौ-विकार इस अति-कमजोर हुए शरीर को भी चुभन लगाए जा रहे हैं। इस भौंके शरीर की सारी ताकत इन्होंने खींच ली है)। रॅब कर के कोई विकार (मेरी) इन दोनों आँखों को ना छेड़े। इनमें तो प्यारे प्रभू को देखने की चाहत टिकी रहे। 91।
कागा चूंडि न पिंजरा बसै त उडरि जाहि ॥ जितु पिंजरै मेरा सहु वसै मासु न तिदू खाहि ॥92॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: हे कौए ! मेरा पिंजर में ठूँगे ना मार। अगर आपके वश में (ये बात) है तो (यहाँ से) उड़ जा। जिस शरीर में मेरा पति-प्रभू बस रहा है। इसमें से मास ना खा (भाव। हे विषयों के चस्के ! मेरे इस शरीर को चोंच मारनी छोड़ दे। तरस कर। और जा। खलासी कर। इस शरीर में तो पति-प्रभू का प्यार बस रहा है। आप इसको विषौ-भोगों की तरफ प्रेरने का यतन ना कर)। 92।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! कब्र बेचारी (बँदे को) आवाजें मार रही है (और कहती है-) हे बे-घरे जीव ! (अपने) घर में आ। आखिर को (तूने) मेरे पास ही आना है (और फिर) मौत से (इतना) ना डर। 93।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: इन आँखों से देखते हुए (भाव। मेरी आँखों के सामने) कितनी ही ख़लकति चली गई है (मौत का शिकार हो गई है)। हे फरीद ! (ख़लकति चलती जाती देख के भी) हरेक को अपने-अपने स्वार्थों का ही ख्याल है (भाव। हरेक जीव दुनिया वाली धुन में ही है)। मुझे भी अपना ही फिक्र पड़ा हुआ है। 94।
आपु सवारहि मै मिलहि मै मिलिआ सुखु होइ ॥ फरीदा जे तू मेरा होइ रहहि सभु जगु तेरा होइ ॥95॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! यदि आप अपने आप को सँवार ले। तो आप मुझे मिल जाएगा। और मेरे में जुड़ने से ही आपको सुख होंगे (दुनिया के पदार्थों में नहीं)। अगर आप मेरा बन जाए। (भाव। दुनिया वाला प्यार छोड़ के मेरे साथ प्यार करने लग जाए। तो) सारा जगत आपका बन जाएगा (भाव। माया आपके पीछे-पीछे दौड़ेगी)। 95।
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।
हिन्दी अर्थ: (दरिया के) किनारे पर (उगा हुआ) बेचारा वृक्ष कब तक धीरज रखेगा। हे फरीद ! कच्चे बर्तन में कब तक पानी रखा जा सकता है। (इसी तरह मनुष्य मौत की नदी के किनारे पर खड़ा हुआ है। इस शरीर में से साँसे खत्म होती जा रही हैं)। 96।
फरीदा महल निसखण रहि गए वासा आइआ तलि ॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (मौत आने पर) महल-माढ़ियां सूनी रह जाती हैं। धरती के तले (कब्र में) डेरा लगाना पड़ता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है। चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।
इस अंग पर 20 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस तरह) शरीर को कोई रोग नहीं लगता और हरेक पदार्थ (भाव।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।