Lulla Family

अंग 1381

अंग
1381
राग Salok Fareed Jee
राग: Salok Fareed Jee · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
साई जाइ सम॑ालि जिथै ही तउ वंञणा ॥58॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: वह जगह भी याद रख आखिर तूने जाना है। 58।
फरीदा जिन॑ी कंमी नाहि गुण ते कंमड़े विसारि ॥
मतु सरमिंदा थीवही सांई दै दरबारि ॥59॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! वह कोझे काम छोड़ दे। जिन कामों में (जिंद के लिए कोई) लाभ नहीं। कहीं ऐसा ना हो पति (परमात्मा) के दरबार में शरमिंदा होना पड़े। 59।
फरीदा साहिब दी करि चाकरी दिल दी लाहि भरांदि ॥
दरवेसां नो लोड़ीऐ रुखां दी जीरांदि ॥60॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (इन ‘विसु गंदलों’ की खातिर अपने) दिल की भटकना दूर करके मालिक (-प्रभू) की बँदगी कर। फकीरों को (तो) पेड़ों जैसा जिगरा करना चाहिए। 60।
फरीदा काले मैडे कपड़े काला मैडा वेसु ॥
गुनही भरिआ मै फिरा लोकु कहै दरवेसु ॥61॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (मेरे अंदर पेड़ों वाला धीरज नहीं है जो फकीरों के अंदर चाहिए थी फकीरों की तरह) मेरे कपड़े (तो) काले हैं। मेरा भेष काला है (पर ‘विसु गंदलों’की खातिर ‘भरांदि’ अथवा भ्रम के कारण) मैं गुनाहों से भरा हुआ फिरता हूँ और जगत फकीर कहता है। 61।
तती तोइ न पलवै जे जलि टुबी देइ ॥
फरीदा जो डोहागणि रब दी झूरेदी झूरेइ ॥62॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: पानी में जली हुई (खेती फिर) हरी नहीं होती। भले ही (उस खेती को) पानी में (कोई) डुबोए रखे। हे फरीद ! (इस तरह जो जीव-स्त्री अपनी ओर से रॅब के राह पर चलती हुई भी) रॅब से विछुड़ी हुई है। वह सदा ही दुखी होती है। (भाव। फकीरी लिबास होते हुए भी अगर मन गुनाहों से भरा रहा। दरवेश बन के भी अगर ‘विसु गंदलों’ की खातिर मन में ‘भरांदि’ अथवा भटकना बनी रही। सत्संग में रह के भी अगर मन शंकाओं में रहा। तो भाग्यों में सदा झुरना ही झुरना (चिंता-फिकर) है)। 62।
जां कुआरी ता चाउ वीवाही तां मामले ॥
फरीदा एहो पछोताउ वति कुआरी न थीऐ ॥63॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: जब (लड़की) कँवारी होती है तब (उसको विवाह का) चाव होता है (पर जब) ब्याही जाती है तो जंजाल पड़ जाते हैं। हे फरीद ! (उस वक्त) यही पछतावा होता है कि वह दोबारा क्वारी नहीं हो सकती (भाव। उसके पहले वाला चाव उसके मन में पैदा नहीं हो सकता)। 63।
कलर केरी छपड़ी आइ उलथे हंझ ॥
चिंजू बोड़नि॑ ना पीवहि उडण संदी डंझ ॥64॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: कॅलर की छपरी में हँस आ उतरते हैं। (वे हँस छपड़ी में अपनी) चोंच डुबोते हैं। (पर। वे मैला पानी) नहीं पीते। उनको वहाँ से उड़ जाने की चाहत बनी रहती है। 64।
हंसु उडरि कोध्रै पइआ लोकु विडारणि जाइ ॥
गहिला लोकु न जाणदा हंसु न कोध्रा खाइ ॥65॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हँस उड़ के कोधरे के खेत में जा बैठा तो दुनिया के लोग उसको उड़ाने जाते हैं कमली दुनिया ये नहीं जानती कि हँस कोधरा नहीं खाता। 65।
चलि चलि गईआं पंखीआं जिन॑ी वसाए तल ॥
फरीदा सरु भरिआ भी चलसी थके कवल इकल ॥66॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! जिन (जीव-) पंछियों की डारों ने इस (संसार-) तालाब को सुहावना बनाया हुआ है। वह अपनी-अपनी बारी (इसको छोड़ के) चलते जा रहे हैं। (यह जगत-) सरोवर भी सूख जाएगा और पीछे रहने वाले अकेले कमल फूल भी कुम्हला जाएंगे (भाव। सृष्टि के ये सुंदर पदार्थ सब नाश हो जाएंगे)। 66।
फरीदा इट सिराणे भुइ सवणु कीड़ा लड़िओ मासि ॥
केतड़िआ जुग वापरे इकतु पइआ पासि ॥67॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (जीव-पंछियों की चलती जा रही डारों की तरह जब आपकी बारी आई। आपके भी) सिर तले ईट होगी। धरती में (भाव। आप कब्र में) सोया पड़ा होंगे। (और आपके) शरीर पर कीड़े चलते होंगे। (इस तरह) एक ही तरफ पड़ा ढेर लंबा समय गुजर जाएगा (तब आपको किसी ने जगाना नहीं। अब तो गाफिल हैं के ना सो)। 67।
फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टुटी नागर लजु ॥
अजराईलु फरेसता कै घरि नाठी अजु ॥68॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (देख। आपके पड़ोस में किस बंदे का शरीर-रूप) सुंदर रंग वाला बर्तन टूट गया है (और श्वासों की) सुंदर रस्सी टूट गई है। (देख।) आज किस के घर (मौत का) फरिश्ता इज़राइल मेहमान है। (भाव। अगर जीव-पंछियों की डारों में नित्य आपके सामने किसी ना किसी की यहाँ से चलने की बारी आई रहती है)। तो आप क्यों गाफिल हैं के सोया पड़ा हुआ है। 68।
फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टूटी नागर लजु ॥
जो सजण भुइ भारु थे से किउ आवहि अजु ॥69॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (देख। किस का शरीर-रूप) सुंदर रंग वाला बर्तन टूट गया है (और श्वास-रूप) सुंदर रस्सी टूट गई है। जो भाई (नमाज़ से गाफिल हो के) धरती पर (निरा) भार ही बने रहे। उनको मानस-जन्म वाला ये समय फिर नहीं मिलेगा। 69।
फरीदा बे निवाजा कुतिआ एह न भली रीति ॥
कबही चलि न आइआ पंजे वखत मसीति ॥70॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! जो लोग नमाज़ नहीं पढ़ते (भाव। जो बँदगी नहीं करते) जो कभी भी उद्यम कर के पाँचों वक्त मस्जिद नहीं आते (भाव। जो कभी भी कम से कम पाँच वक्त रब को नहीं याद करते) वे कुक्तों (के समान) हैं। उनका जीने का ये तरीका ठीक नहीं कहा जा सकता। 70।
उठु फरीदा उजू साजि सुबह निवाज गुजारि ॥
जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु कपि उतारि ॥71॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! उठ। मुँह-हाथ धो। और सवेरे की नमाज़ पढ़। जो सिर मालिक रब के आगे नहीं झुकता। वह सिर काट के उतार दे (भाव। बँदगी-हीन बंदे का जीना किस अर्थ का।)। 71।
जो सिरु साई ना निवै सो सिरु कीजै कांइ ॥
कुंने हेठि जलाईऐ बालण संदै थाइ ॥72॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: जो सिर (बँदगी में) मालिक-रब के आगे नहीं झुकता। उस सिर का कोई लाभ नहीं। उस सिर को हांडी तले ईधन की तरह जला देना चाहिए (भाव। उस अकड़े हुए सिर को सूखी हुई लकड़ी ही समझो)। 72।
फरीदा किथै तैडे मापिआ जिन॑ी तू जणिओहि ॥
तै पासहु ओइ लदि गए तूं अजै न पतीणोहि ॥73॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (जीव-पंछियों की चलती जा रही डारों का अगर आपको ख्याल नहीं आया। तो यही देख कि) आपके (अपने) माता-पिता कहाँ हैं। जिन्होंने आपको पैदा किया था। वह आपके माता-पिता आपके पास से कब के चले गए हैं। आपको अभी भी यकीन नहीं आया (कि तूने तो यहाँ से चले जाना है। इसी लिए रॅब की बंदगी से गाफिल होया हुआ है)। 73।
फरीदा मनु मैदानु करि टोए टिबे लाहि ॥
अगै मूलि न आवसी दोजक संदी भाहि ॥74॥
महला 5 ॥
फरीदा खालकु खलक महि खलक वसै रब माहि ॥
मंदा किस नो आखीऐ जां तिसु बिनु कोई नाहि ॥75॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! मन को समतल मैदान बना दे (और इसके) ऊँची-नीची जगह दूर कर दे। (अगर आप कर सके। तो) आपके जीवन-सफर में दोज़क की आग बिल्कुल नहीं आएगी। (भाव। मन में टोए-टिबे बने रहने के कारण जो कलेश मनुष्य को बने रहते हैं। इनके दूर होने पर वे कलेश मिट जाएंगे)। 74। महला 5 ॥ हे फरीद ! (ख़लकत पैदा करने वाला) परमात्मा (सारी) ख़लकत में मौजूद है। और ख़लकत परमात्मा में बस रही है। जब (कहीं भी) उस परमात्मा के बिना और दूसरा नहीं। तो किस जीव को बुरा कहा जाए। (भाव। किसी मनुष्य को बुरा नहीं कहा जा सकता)।
फरीदा जि दिहि नाला कपिआ जे गलु कपहि चुख ॥
पवनि न इती मामले सहां न इती दुख ॥76॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (कह-) (हे दाई !) जिस दिन मेरी नाड़ि काटी थी। अगर थोड़ा सा मेरा गला भी काट देती। तो (मन के टोयों-टिबों के कारण) ना इतने झमेले पड़ने थे और ना ही मुझे इतना दुख सहना पड़ना था। 76।
चबण चलण रतंन से सुणीअर बहि गए ॥
हेड़े मुती धाह से जानी चलि गए ॥77॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: (किस गुमान पर दूसरों को बुरा कहना हुआ। किस गुमान पर मन में ये टोए-टिबे बनाए हुए।) वह दाँत। लातें। आँखें और कान (जिन पर गुमान करके ये टोए-टिबे बने थे) काम करने से ही रह गए हैं। (इस) शरीर ने ढाह मारी है (अर्थात। ये अपना ही शरीर अब दुखी हो रहा है। कि मेरे) वे मित्र चले गए हैं (भाव। काम के नहीं रहे। जिन पर मुझे गुमान था)। 77।
फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढाइ ॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! बुराई करने वाले के साथ भी भलाई कर। गुस्सा मन में ना आने दे।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। आज पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है, और हर साल हज़ारों लोग वहाँ जाते हैं।

इस अंग पर 20 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह जगह भी याद रख आखिर तूने जाना है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।