इस पृष्ठ पर
अंग
1381
फ़रीद जी के सलोक
अंग बदलें या अंश चुनें · 21 अंश
- साई जाइ सम॑ालि जिथै ही तउ वंञणा ॥58॥
- फरीदा जिन॑ी कंमी नाहि गुण ते कंमड़े विसारि ॥
- फरीदा साहिब दी करि चाकरी दिल दी लाहि भरांदि ॥
- फरीदा काले मैडे कपड़े काला मैडा वेसु ॥
- तती तोइ न पलवै जे जलि टुबी देइ ॥
- जां कुआरी ता चाउ वीवाही तां मामले ॥
- कलर केरी छपड़ी आइ उलथे हंझ ॥
- हंसु उडरि कोध्रै पइआ लोकु विडारणि जाइ ॥
- चलि चलि गईआं पंखीआं जिन॑ी वसाए तल ॥
- फरीदा इट सिराणे भुइ सवणु कीड़ा लड़िओ मासि ॥
- फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टुटी नागर लजु ॥
- फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टूटी नागर लजु ॥
- फरीदा बे निवाजा कुतिआ एह न भली रीति ॥
- उठु फरीदा उजू साजि सुबह निवाज गुजारि ॥
- जो सिरु साई ना निवै सो सिरु कीजै कांइ ॥
- फरीदा किथै तैडे मापिआ जिन॑ी तू जणिओहि ॥
- फरीदा मनु मैदानु करि टोए टिबे लाहि ॥
- फरीदा खालकु खलक महि खलक वसै रब माहि ॥
- फरीदा जि दिहि नाला कपिआ जे गलु कपहि चुख ॥
- चबण चलण रतंन से सुणीअर बहि गए ॥
- फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढाइ ॥
· सलोक
साई जाइ सम॑ालि जिथै ही तउ वंञणा ॥58॥
साई जाइ सम॑ालि जिथै ही तउ वंञणा ॥58॥
हिन्दी अर्थ: वह जगह भी याद रखें जहाँ आखिर आपको जाना है। 58।
· सलोक
फरीदा जिन॑ी कंमी नाहि गुण ते कंमड़े विसारि ॥
फरीदा जिन॑ी कंमी नाहि गुण ते कंमड़े विसारि ॥
मतु सरमिंदा थीवही सांई दै दरबारि ॥59॥
मतु सरमिंदा थीवही सांई दै दरबारि ॥59॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! वह कोझे काम छोड़ दें। जिन कामों में (जिंद के लिए कोई) लाभ नहीं। कहीं ऐसा ना हो पति (परमात्मा) के दरबार में शरमिंदा होना पड़े। 59।
· सलोक
फरीदा साहिब दी करि चाकरी दिल दी लाहि भरांदि ॥
फरीदा साहिब दी करि चाकरी दिल दी लाहि भरांदि ॥
दरवेसां नो लोड़ीऐ रुखां दी जीरांदि ॥60॥
दरवेसां नो लोड़ीऐ रुखां दी जीरांदि ॥60॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (इन 'विसु गंदलों' की खातिर अपने) दिल की भटकना दूर करके मालिक (-प्रभू) की बँदगी करें। फकीरों को (तो) पेड़ों जैसा जिगरा करना चाहिए। 60।
· सलोक
फरीदा काले मैडे कपड़े काला मैडा वेसु ॥
फरीदा काले मैडे कपड़े काला मैडा वेसु ॥
गुनही भरिआ मै फिरा लोकु कहै दरवेसु ॥61॥
गुनही भरिआ मै फिरा लोकु कहै दरवेसु ॥61॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (मेरे अंदर पेड़ों वाला धीरज नहीं है जो फकीरों के अंदर चाहिए था, फकीरों की तरह) मेरे कपड़े (तो) काले हैं। मेरा भेष काला है (पर 'विसु गंदलों'की खातिर 'भरांदि' अथवा भ्रम के कारण) मैं गुनाहों से भरा हुआ फिरता हूँ और जगत फकीर कहता है। 61।
· सलोक
तती तोइ न पलवै जे जलि टुबी देइ ॥
तती तोइ न पलवै जे जलि टुबी देइ ॥
फरीदा जो डोहागणि रब दी झूरेदी झूरेइ ॥62॥
फरीदा जो डोहागणि रब दी झूरेदी झूरेइ ॥62॥
हिन्दी अर्थ: पानी में जली हुई (खेती फिर) हरी नहीं होती। भले ही (उस खेती को) पानी में (कोई) डुबोए रखे। हे फरीद! (इस तरह जो जीव-स्त्री अपनी ओर से रॅब के राह पर चलती हुई भी) रॅब से विछुड़ी हुई है। वह सदा ही दुखी होती है। (भाव, फकीरी लिबास होते हुए भी अगर मन गुनाहों से भरा रहा। दरवेश बन के भी अगर 'विसु गंदलों' की खातिर मन में 'भरांदि' अथवा भटकना बनी रही। सत्संग में रह के भी अगर मन शंकाओं में रहा, तो भाग्यों में सदा झुरना ही झुरना (चिंता-फिकर) है)। 62।
· सलोक
जां कुआरी ता चाउ वीवाही तां मामले ॥
जां कुआरी ता चाउ वीवाही तां मामले ॥
फरीदा एहो पछोताउ वति कुआरी न थीऐ ॥63॥
फरीदा एहो पछोताउ वति कुआरी न थीऐ ॥63॥
हिन्दी अर्थ: जब (लड़की) कँवारी होती है तब (उसको विवाह का) चाव होता है (पर जब) ब्याही जाती है तो जंजाल पड़ जाते हैं। हे फरीद! (उस वक्त) यही पछतावा होता है कि वह दोबारा क्वारी नहीं हो सकती (भाव, उसके पहले वाला चाव उसके मन में पैदा नहीं हो सकता)। 63।
· सलोक
कलर केरी छपड़ी आइ उलथे हंझ ॥
कलर केरी छपड़ी आइ उलथे हंझ ॥
चिंजू बोड़नि॑ ना पीवहि उडण संदी डंझ ॥64॥
चिंजू बोड़नि॑ ना पीवहि उडण संदी डंझ ॥64॥
हिन्दी अर्थ: कॅलर की छपरी में हँस आ उतरते हैं। (वे हँस छपड़ी में अपनी) चोंच डुबोते हैं। (पर, वे मैला पानी) नहीं पीते। उनको वहाँ से उड़ जाने की चाहत बनी रहती है। 64।
· सलोक
हंसु उडरि कोध्रै पइआ लोकु विडारणि जाइ ॥
हंसु उडरि कोध्रै पइआ लोकु विडारणि जाइ ॥
गहिला लोकु न जाणदा हंसु न कोध्रा खाइ ॥65॥
गहिला लोकु न जाणदा हंसु न कोध्रा खाइ ॥65॥
हिन्दी अर्थ: हँस उड़ के कोधरे के खेत में जा बैठा तो दुनिया के लोग उसको उड़ाने जाते हैं कमली दुनिया ये नहीं जानती कि हँस कोधरा नहीं खाता। 65।
· सलोक
चलि चलि गईआं पंखीआं जिन॑ी वसाए तल ॥
चलि चलि गईआं पंखीआं जिन॑ी वसाए तल ॥
फरीदा सरु भरिआ भी चलसी थके कवल इकल ॥66॥
फरीदा सरु भरिआ भी चलसी थके कवल इकल ॥66॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! जिन (जीव-) पंछियों की डारों ने इस (संसार-) तालाब को सुहावना बनाया हुआ है। वह अपनी-अपनी बारी (इसको छोड़ के) चलते जा रहे हैं। (यह जगत-) सरोवर भी सूख जाएगा और पीछे रहने वाले अकेले कमल फूल भी कुम्हला जाएंगे (भाव, सृष्टि के ये सुंदर पदार्थ सब नाश हो जाएंगे)। 66।
· सलोक
फरीदा इट सिराणे भुइ सवणु कीड़ा लड़िओ मासि ॥
फरीदा इट सिराणे भुइ सवणु कीड़ा लड़िओ मासि ॥
केतड़िआ जुग वापरे इकतु पइआ पासि ॥67॥
केतड़िआ जुग वापरे इकतु पइआ पासि ॥67॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (जीव-पंछियों की चलती जा रही डारों की तरह जब आपकी बारी आई। आपके भी) सिर तले ईट होगी। धरती में (भाव, आप कब्र में) सोए पड़े होंगे। (और आपके) शरीर पर कीड़े चलते होंगे। (इस तरह) एक ही तरफ पड़े-पड़े बहुत लंबा समय गुजर जाएगा (तब आपको किसी ने जगाना नहीं। अब तो गाफिल हो के ना सोएँ)। 67।
· सलोक
फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टुटी नागर लजु ॥
फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टुटी नागर लजु ॥
अजराईलु फरेसता कै घरि नाठी अजु ॥68॥
अजराईलु फरेसता कै घरि नाठी अजु ॥68॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (देखिए। आपके पड़ोस में किस बंदे का शरीर-रूप) सुंदर रंग वाला बर्तन टूट गया है (और श्वासों की) सुंदर रस्सी टूट गई है। (देखिए।) आज किस के घर (मौत का) फरिश्ता इज़राइल मेहमान है। (भाव, अगर जीव-पंछियों की डारों में नित्य आपके सामने किसी ना किसी की यहाँ से चलने की बारी आई रहती है), तो आप क्यों गाफिल हो के सोए पड़े हुए हैं। 68।
· सलोक
फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टूटी नागर लजु ॥
फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी टूटी नागर लजु ॥
जो सजण भुइ भारु थे से किउ आवहि अजु ॥69॥
जो सजण भुइ भारु थे से किउ आवहि अजु ॥69॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (देखिए। किस का शरीर-रूप) सुंदर रंग वाला बर्तन टूट गया है (और श्वास-रूप) सुंदर रस्सी टूट गई है। जो भाई (नमाज़ से गाफिल हो के) धरती पर (निरा) भार ही बने रहे। उनको मानस-जन्म वाला ये समय फिर नहीं मिलेगा। 69।
· सलोक
फरीदा बे निवाजा कुतिआ एह न भली रीति ॥
फरीदा बे निवाजा कुतिआ एह न भली रीति ॥
कबही चलि न आइआ पंजे वखत मसीति ॥70॥
कबही चलि न आइआ पंजे वखत मसीति ॥70॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! जो लोग नमाज़ नहीं पढ़ते (भाव, जो बँदगी नहीं करते) जो कभी भी उद्यम कर के पाँचों वक्त मस्जिद नहीं आते (भाव, जो कभी भी कम से कम पाँच वक्त रब को नहीं याद करते) वे कुक्तों (के समान) हैं। उनका जीने का ये तरीका ठीक नहीं कहा जा सकता। 70।
· सलोक
उठु फरीदा उजू साजि सुबह निवाज गुजारि ॥
उठु फरीदा उजू साजि सुबह निवाज गुजारि ॥
जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु कपि उतारि ॥71॥
जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु कपि उतारि ॥71॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! उठिए, मुँह-हाथ धोइए। और सवेरे की नमाज़ पढ़िए। जो सिर मालिक रब के आगे नहीं झुकता। वह सिर काट के उतार दें (भाव, बँदगी-हीन बंदे का जीना किस अर्थ का।)। 71।
· सलोक
जो सिरु साई ना निवै सो सिरु कीजै कांइ ॥
जो सिरु साई ना निवै सो सिरु कीजै कांइ ॥
कुंने हेठि जलाईऐ बालण संदै थाइ ॥72॥
कुंने हेठि जलाईऐ बालण संदै थाइ ॥72॥
हिन्दी अर्थ: जो सिर (बँदगी में) मालिक-रब के आगे नहीं झुकता। उस सिर का कोई लाभ नहीं। उस सिर को हांडी तले ईधन की तरह जला देना चाहिए (भाव, उस अकड़े हुए सिर को सूखी हुई लकड़ी ही समझिए)। 72।
· सलोक
फरीदा किथै तैडे मापिआ जिन॑ी तू जणिओहि ॥
फरीदा किथै तैडे मापिआ जिन॑ी तू जणिओहि ॥
तै पासहु ओइ लदि गए तूं अजै न पतीणोहि ॥73॥
तै पासहु ओइ लदि गए तूं अजै न पतीणोहि ॥73॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (जीव-पंछियों की चलती जा रही डारों का अगर आपको ख्याल नहीं आया, तो यही देखिए कि) आपके (अपने) माता-पिता कहाँ हैं। जिन्होंने आपको पैदा किया था। वह आपके माता-पिता आपके पास से कब के चले गए हैं। आपको अभी भी यकीन नहीं आया (कि आपने तो यहाँ से चले जाना है। इसी लिए रॅब की बंदगी से गाफिल हुए हैं)। 73।
· सलोक
फरीदा मनु मैदानु करि टोए टिबे लाहि ॥
फरीदा मनु मैदानु करि टोए टिबे लाहि ॥
अगै मूलि न आवसी दोजक संदी भाहि ॥74॥
अगै मूलि न आवसी दोजक संदी भाहि ॥74॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! मन को समतल मैदान बना दें (और इसकी) ऊँची-नीची जगहें दूर कर दें। (अगर आप कर सकें, तो) आपके जीवन-सफर में दोज़क की आग बिल्कुल नहीं आएगी। (भाव: मन में ऊँची-नीची जगहें बनी रहने के कारण मनुष्य को जो कलेश होते रहते हैं, इनके दूर होने पर वे कलेश भी मिट जाएँगे)। 74।
· सलोक
फरीदा खालकु खलक महि खलक वसै रब माहि ॥
महला 5 ॥
फरीदा खालकु खलक महि खलक वसै रब माहि ॥
मंदा किस नो आखीऐ जां तिसु बिनु कोई नाहि ॥75॥
फरीदा खालकु खलक महि खलक वसै रब माहि ॥
मंदा किस नो आखीऐ जां तिसु बिनु कोई नाहि ॥75॥
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे फरीद! (ख़लकत पैदा करने वाला) परमात्मा (सारी) ख़लकत में मौजूद है। और ख़लकत परमात्मा में बस रही है। जब (कहीं भी) उस परमात्मा के बिना और दूसरा नहीं है, तो किस जीव को बुरा कहा जाए? (भाव: किसी मनुष्य को बुरा नहीं कहा जा सकता)। 75।
· सलोक
फरीदा जि दिहि नाला कपिआ जे गलु कपहि चुख ॥
फरीदा जि दिहि नाला कपिआ जे गलु कपहि चुख ॥
पवनि न इती मामले सहां न इती दुख ॥76॥
पवनि न इती मामले सहां न इती दुख ॥76॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (कहें:) (हे दाई!) जिस दिन मेरी नाड़ि काटी थी। अगर थोड़ा सा मेरा गला भी काट देतीं, तो (मन के टोयों-टिबों के कारण) ना इतने झमेले पड़ने थे और ना ही मुझे इतना दुख सहना पड़ना था। 76।
· सलोक
चबण चलण रतंन से सुणीअर बहि गए ॥
चबण चलण रतंन से सुणीअर बहि गए ॥
हेड़े मुती धाह से जानी चलि गए ॥77॥
हेड़े मुती धाह से जानी चलि गए ॥77॥
हिन्दी अर्थ: (किस गुमान पर दूसरों को बुरा कहना हुआ। किस गुमान पर मन में ये टोए-टिबे बनाए हुए।) वह दाँत, लातें। आँखें और कान (जिन पर गुमान करके ये टोए-टिबे बने थे) काम करने से ही रह गए हैं। (इस) शरीर ने ढाह मारी है (अर्थात, ये अपना ही शरीर अब दुखी हो रहा है। कि मेरे) वे मित्र चले गए हैं (भाव, काम के नहीं रहे। जिन पर मुझे गुमान था)। 77।
· सलोक
फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढाइ ॥
फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढाइ ॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! बुराई करने वाले के साथ भी भलाई करें। गुस्सा मन में ना आने दें।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; शेख़ फ़रीद जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1381 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।