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1380
फ़रीद जी के सलोक
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- बुढा होआ सेख फरीदु कंबणि लगी देह ॥
- फरीदा बारि पराइऐ बैसणा सांई मुझै न देहि ॥
- कंधि कुहाड़ा सिरि घड़ा वणि कै सरु लोहारु ॥
- फरीदा इकना आटा अगला इकना नाही लोणु ॥
- पासि दमामे छतु सिरि भेरी सडो रड ॥
- फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ उसारेदे भी गए ॥
- फरीदा खिंथड़ि मेखा अगलीआ जिंदु न काई मेख ॥
- फरीदा दुहु दीवी बलंदिआ मलकु बहिठा आइ ॥
- फरीदा वेखु कपाहै जि थीआ जि सिरि थीआ तिलाह ॥
- फरीदा कंनि मुसला सूफु गलि दिलि काती गुड़ु वाति ॥
- फरीदा रती रतु न निकलै जे तनु चीरै कोइ ॥
- इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥
- फरीदा सोई सरवरु ढूढि लहु जिथहु लभी वथु ॥
- फरीदा नंढी कंतु न राविओ वडी थी मुईआसु ॥
- फरीदा सिरु पलिआ दाड़ी पली मुछां भी पलीआं ॥
- फरीदा कोठे धुकणु केतड़ा पिर नीदड़ी निवारि ॥
- फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ एतु न लाए चितु ॥
- फरीदा मंडप मालु न लाइ मरग सताणी चिति धरि ॥
· सलोक
बुढा होआ सेख फरीदु कंबणि लगी देह ॥
बुढा होआ सेख फरीदु कंबणि लगी देह ॥
जे सउ वरि॑आ जीवणा भी तनु होसी खेह ॥41॥
जे सउ वरि॑आ जीवणा भी तनु होसी खेह ॥41॥
हिन्दी अर्थ: ('विसु गंदलों' के पीछे दौड़-दौड़ के ही) शेख फरीद (अब) बुढा हो गया है। शरीर काँपने लग गया है। अगर सौ बरस भी जीवन मिल जाए, तो भी (आखिर को) शरीर मिट्टी हो जाएगा (और इन 'विसु गंदलों' से साथ टूट जाएगा)। 41।
· सलोक
फरीदा बारि पराइऐ बैसणा सांई मुझै न देहि ॥
फरीदा बारि पराइऐ बैसणा सांई मुझै न देहि ॥
जे तू एवै रखसी जीउ सरीरहु लेहि ॥42॥
जे तू एवै रखसी जीउ सरीरहु लेहि ॥42॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (कहें:) हे साई! (इन दुनिया के पदार्थों की खातिर) मुझे पराऐ दरवाजे पर ना बैठाना। पर, अगर आपने ऐसे ही रखना है (भाव, अगर आपने मुझे दूसरों का मुथाज बनाना है) तो मेरे शरीर में से प्राण निकाल ले। 42।
· सलोक
कंधि कुहाड़ा सिरि घड़ा वणि कै सरु लोहारु ॥
कंधि कुहाड़ा सिरि घड़ा वणि कै सरु लोहारु ॥
फरीदा हउ लोड़ी सहु आपणा तू लोड़हि अंगिआर ॥43॥
फरीदा हउ लोड़ी सहु आपणा तू लोड़हि अंगिआर ॥43॥
हिन्दी अर्थ: कंधे पर कोहाड़ा और सिर पर घड़ा (रख के) लोहार जंगल में बादशाह (बना होता) है (क्योंकि जिस पेड़ पर चाहे कुहाड़ा चला सकता है) (इसी तरह मनुष्य जगत-रूप जंगल में सरदार है)। हे फरीद! (कहें:) मैं तो (इस जगत रूप जंगल में) अपने मालिक-प्रभू को तलाश रहा हूँ। और, आप, हे जीव! लोहार की तरह कोयले ढूँढ रहे हैं (लोहार लकड़ी से कोयला बनाता है) (भाव, 'विसु गंदल'-रूपी कोयले ढूंढता है)। 43।
· सलोक
फरीदा इकना आटा अगला इकना नाही लोणु ॥
फरीदा इकना आटा अगला इकना नाही लोणु ॥
अगै गए सिंञापसनि चोटां खासी कउणु ॥44॥
अगै गए सिंञापसनि चोटां खासी कउणु ॥44॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! कई लोगों के पास आटा बहुत है ('विसु गंदलें' बहुत हैं। दुनिया के पदार्थ बहुत हैं)। एक के पास (इतना भी) नहीं जितना (आटे में) नमक (डाला जाता) है। (मनुष्य के जीवन की सफलता का पैमाना यह 'विसु गंदलें' नहीं)। आगे जा के (कर्मों पर) पहचान होगी कि मार किस को पड़ती है। 44।
· सलोक
पासि दमामे छतु सिरि भेरी सडो रड ॥
पासि दमामे छतु सिरि भेरी सडो रड ॥
जाइ सुते जीराण महि थीए अतीमा गड ॥45॥
जाइ सुते जीराण महि थीए अतीमा गड ॥45॥
हिन्दी अर्थ: (इन 'विसु गंदलों' का क्या माण।) (जिन लोगों के) पास धौंसे (बजते थे)। सिर पर छत्र (झूलते थे)। तूतीआं (बजती थीं) उस्तति के छंद (गाए जाते हैं)। वह भी आखिर मसाणों में जा के सो गए। और यतीमों के साथ जा मिले (भाव, यतीमों जैसे ही हो गए)। 45।
· सलोक
फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ उसारेदे भी गए ॥
फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ उसारेदे भी गए ॥
कूड़ा सउदा करि गए गोरी आइ पए ॥46॥
कूड़ा सउदा करि गए गोरी आइ पए ॥46॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! ('विसु गंदलों' के व्यापारियों की ओर देखें) घर महल-माड़ियां उसारने वाले भी (इनको छोड़ के) चले गए। वही सौदा किया। जो साथ नहीं निभा और (आखिर में खाली हाथ) कब्रों में जा पड़े। वे दुनिया में झूठा सौदा करते हुए कब्र-श्मशानों में जा पड़े ॥46॥
· सलोक
फरीदा खिंथड़ि मेखा अगलीआ जिंदु न काई मेख ॥
फरीदा खिंथड़ि मेखा अगलीआ जिंदु न काई मेख ॥
वारी आपो आपणी चले मसाइक सेख ॥47॥
वारी आपो आपणी चले मसाइक सेख ॥47॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! ये 'विसु गंदलें' तो कहां रहीं। इस अपनी जिंद की भी कोई पायां नहीं (इससे तो नकारी गोदड़ी का ही ज्यादा ऐतबार हो सकता है। क्योंकि) गोदड़ी को कई टांके लगे हुए हैं। पर जिंद को एक भी टाँका नहीं (क्या पता। किस वक्त शरीर से अलग हो जाए।) बड़े-बड़े कहलवाने वाले शेख आदि सब अपनी-अपनी बारी में यहाँ से चले गए। 47।
· सलोक
फरीदा दुहु दीवी बलंदिआ मलकु बहिठा आइ ॥
फरीदा दुहु दीवी बलंदिआ मलकु बहिठा आइ ॥
गड़ु लीता घटु लुटिआ दीवड़े गइआ बुझाइ ॥48॥
गड़ु लीता घटु लुटिआ दीवड़े गइआ बुझाइ ॥48॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! इन दोनों आँखों के सामने (इन दोनों दीयों के जलते ही) मौत का फरिश्ता (जिस भी व्यक्ति के पास) आ बैठा। उसने उसके शरीर-रूप किले पर कब्जा कर लिया। अतंहकरण लेट लिया (भाव, जिंद काबू कर ली) और (इन आँखों के) दीए बुझा गया। 48।
· सलोक
फरीदा वेखु कपाहै जि थीआ जि सिरि थीआ तिलाह ॥
फरीदा वेखु कपाहै जि थीआ जि सिरि थीआ तिलाह ॥
कमादै अरु कागदै कुंने कोइलिआह ॥
मंदे अमल करेदिआ एह सजाइ तिनाह ॥49॥
कमादै अरु कागदै कुंने कोइलिआह ॥
मंदे अमल करेदिआ एह सजाइ तिनाह ॥49॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! देखें! जो हालत कपास की होती है (भाव, बेलने में बेली जाती है)। जो तिलों के सिर पर बीतती है (कोल्हू में पीढ़े जाते हैं)। जो कमाद, कागज़, मिट्टी की हांडी और कोयलों के साथ बरतती है। यह सज़ा उन लोगों को मिलती है जो (इन 'विसु गंदलों' की खातिर) बुरे काम करते हैं (भाव, ज्यों-ज्यों दुनियावी पदार्थों की खातिर बुरे काम करते हैं। त्यों त्यों बहुत दुखी होते हैं)। 49।
· सलोक
फरीदा कंनि मुसला सूफु गलि दिलि काती गुड़ु वाति ॥
फरीदा कंनि मुसला सूफु गलि दिलि काती गुड़ु वाति ॥
बाहरि दिसै चानणा दिलि अंधिआरी राति ॥50॥
बाहरि दिसै चानणा दिलि अंधिआरी राति ॥50॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (आपके) कांधे पर मुसला है। (आपने) गले में काली खफनी (डाली हुई है)। (आपके) मुँह में गुड़ है; (पर) दिल में कैंची है (भाव, बाहर लोगों को दिखाने के लिए फकीरी भेष है। मुँह से भी लोगों के साथ मीठा बोलता है। पर दिल से 'विसु गंदलों' की खातिर खोटा है सो) बाहर तो रौशनी दिख रही है (पर) दिल में अंधेरी रात (बनी हुई) है। 50।
· सलोक
फरीदा रती रतु न निकलै जे तनु चीरै कोइ ॥
फरीदा रती रतु न निकलै जे तनु चीरै कोइ ॥
जो तन रते रब सिउ तिन तनि रतु न होइ ॥51॥
जो तन रते रब सिउ तिन तनि रतु न होइ ॥51॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! जो लोग रॅब के साथ रंगे होते हैं (भाव, रॅब के प्यार में रंगे होते हैं)। उनके शरीर में ('विसु गंदलों' का मोह रूप) लहू नहीं होता। अगर कोई (उनका) शरीर चीरे (तो उसमें से) रक्ती जितना भी लहू नहीं निकलता (पर, हे फरीद! आपने तो मुसले और खफनी आदि से निरा बाहर का ही ख्याल रखा हुआ है)। 51।
· सलोक
इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥
मः 3 ॥
इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥
जो सह रते आपणे तितु तनि लोभु रतु न होइ ॥
भै पइऐ तनु खीणु होइ लोभु रतु विचहु जाइ ॥
जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥
नानक ते जन सोहणे जि रते हरि रंगु लाइ ॥52॥
इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥
जो सह रते आपणे तितु तनि लोभु रतु न होइ ॥
भै पइऐ तनु खीणु होइ लोभु रतु विचहु जाइ ॥
जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥
नानक ते जन सोहणे जि रते हरि रंगु लाइ ॥52॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ यह सारा शरीर लहू है (भाव, सारे शरीर में खून मौजूद है)। लहू के बिना शरीर रह नहीं सकता (फिर, शरीर को चीरने से। भाव, शरीर की पड़ताल करने से। कौन सा लहू नहीं निकलता।) जो लोग अपने पति (प्रभू के प्यार) में रंगे हुए हें (उनके) इस शरीर में लालच-रूप लहू नहीं होता। अगर (परमात्मा के) डर में जीएं, तो शरीर (इस तरह) कमजोर हो जाता है (कि) इसमें से लोभ रूपी लहू निकल जाता है। जैसे आग में (डालने से सोना आदि) धातु साफ हो जाती है; इसी तरह परमात्मा का डर (मनुष्य की) बुरी मति-रूपी मैल को काट देता है। हे नानक! वे लोग सोहणे हैं जो परमात्मा के साथ नेहु लगा के (उसके नेहु में) रंगे हुए हैं। 52।
· सलोक
फरीदा सोई सरवरु ढूढि लहु जिथहु लभी वथु ॥
फरीदा सोई सरवरु ढूढि लहु जिथहु लभी वथु ॥
छपड़ि ढूढै किआ होवै चिकड़ि डुबै हथु ॥53॥
छपड़ि ढूढै किआ होवै चिकड़ि डुबै हथु ॥53॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! वही सुंदर तालाब ढूँढें। जिसमें से (असल) चीज़ (नाम-रूप मोती) मिल जाए। छप्पड़ तलाशे कुछ नहीं मिलता। (वहाँ से तो) कीचड़ में (ही) हाथ डूबता है। 53।
· सलोक
फरीदा नंढी कंतु न राविओ वडी थी मुईआसु ॥
फरीदा नंढी कंतु न राविओ वडी थी मुईआसु ॥
धन कूकेंदी गोर में तै सह ना मिलीआसु ॥54॥
धन कूकेंदी गोर में तै सह ना मिलीआसु ॥54॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! जिस जवान (जीव-) स्त्री ने (परमात्मा-) पति को नहीं पाया (भाव, जिस जीव ने जवानी के वक्त रॅब को ना सिमरा)। वह (जीव-) स्त्री जब बुढी हो के मर गई तो (फिर) कब्र में तरले लेती है (भाव, मरने के बाद जीव पछताता है) कि हे (प्रभू-) पति! मैं आपको (समय सिर) ना मिली। 54।
· सलोक
फरीदा सिरु पलिआ दाड़ी पली मुछां भी पलीआं ॥
फरीदा सिरु पलिआ दाड़ी पली मुछां भी पलीआं ॥
रे मन गहिले बावले माणहि किआ रलीआं ॥55॥
रे मन गहिले बावले माणहि किआ रलीआं ॥55॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! सिर सफेद हो गया है। दाढ़ी सफेद हो गई है। मूछें भी सफेद हो गई हैं। हे गाफिल और कमले मन! (अभी आप दुनिया की ही) मौजें क्यों ले रहे हैं। 55।
· सलोक
फरीदा कोठे धुकणु केतड़ा पिर नीदड़ी निवारि ॥
फरीदा कोठे धुकणु केतड़ा पिर नीदड़ी निवारि ॥
जो दिह लधे गाणवे गए विलाड़ि विलाड़ि ॥56॥
जो दिह लधे गाणवे गए विलाड़ि विलाड़ि ॥56॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! कोठे की दौड़ कहाँ तक (भाव, कोठे पर दौड़ लंबी नहीं हो सकती। इसी तरह रॅब से गाफिल कब तक रहेगा। उम्र आखिर खत्म हो जाएगी। इसलिए) रॅब (के प्रति) ये कोझी (गफ़लत की) नींद दूर कर दें। (उम्र के) जो गिनती के दिन मिले हुए हैं वह छलांगे मार-मार के खत्म होते जा रहे हैं। 56।
· सलोक
फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ एतु न लाए चितु ॥
फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ एतु न लाए चितु ॥
मिटी पई अतोलवी कोइ न होसी मितु ॥57॥
मिटी पई अतोलवी कोइ न होसी मितु ॥57॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (यह जो आपके) घर और महल-माढ़ियां (हैं। इनके) इस (सिलसिले) में चित्त ना जोड़ें। (मरने पर जब कब्र में आपके ऊपर) मनों भार मिट्टी पड़ेगी तब (इनमें से) कोई भी आपका साथी नहीं बनेगा। 57।
· सलोक
फरीदा मंडप मालु न लाइ मरग सताणी चिति धरि ॥
फरीदा मंडप मालु न लाइ मरग सताणी चिति धरि ॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (सिर्फ) महल-माड़ियों और धन को चित्त में ना टिकाए रखें। (सबसे) बलवान मौत को चित्त में रखें (याद रखें)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; शेख़ फ़रीद जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1380 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।