Lulla Family

अंग 1380

अंग
1380
राग Salok Fareed Jee
राग: Salok Fareed Jee · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बुढा होआ सेख फरीदु कंबणि लगी देह ॥
जे सउ वरि॑आ जीवणा भी तनु होसी खेह ॥41॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: (‘विसु गंदलों’ के पीछे दौड़-दौड़ के ही) शेख फरीद (अब) बुढा हो गया है। शरीर काँपने लग गया है। अगर सौ बरस भी जीवन मिल जाए। तो भी (आखिर को) शरीर मिट्टी हो जाएगा (और इन ‘विसु गंदलों’ से साथ टूट जाएगा)। 41।
फरीदा बारि पराइऐ बैसणा सांई मुझै न देहि ॥
जे तू एवै रखसी जीउ सरीरहु लेहि ॥42॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (कह-) हे साई ! (इन दुनिया के पदार्थों की खातिर) मुझे पराऐ दरवाजे पर ना बैठाना। पर। अगर तूने ऐसे ही रखना है (भाव। अगर तूने मुझे दूसरों का मुथाज बनाना है) तो मेरे शरीर में से प्राण निकाल ले। 42।
कंधि कुहाड़ा सिरि घड़ा वणि कै सरु लोहारु ॥
फरीदा हउ लोड़ी सहु आपणा तू लोड़हि अंगिआर ॥43॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: कंधे पर कोहाड़ा और सिर पर घड़ा (रख के) लोहार जंगल में बादशाह (बना होता) है (क्योंकि जिस पेड़ पर चाहे कुहाड़ा चला सकता है) (इसी तरह मनुष्य जगत-रूप जंगल में सरदार है)। हे फरीद ! (कह-) मैं तो (इस जगत रूप जंगल में) अपने मालिक-प्रभू को तलाश रहा हूँ। और। तू। (हे जीव ! लोहार की तरह) कोयले (लोहार लकड़ी से कोयला बनाता है) ढूँढ रहा है (भाव। ‘विसु गंदल’-रूपी कोयले ढूंढता है)। 43।
फरीदा इकना आटा अगला इकना नाही लोणु ॥
अगै गए सिंञापसनि चोटां खासी कउणु ॥44॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! कई लोगों के पास आटा बहुत है (‘विसु गंदलें’ बहुत हैं। दुनिया के पदार्थ बहुत हैं)। एक के पास (इतना भी) नहीं जितना (आटे में) नमक (डाला जाता) है। (मनुष्य के जीवन की सफलता का पैमाना यह ‘विसु गंदलें’ नहीं)। आगे जा के (कर्मों पर) पहचान होगी कि मार किस को पड़ती है। 44।
पासि दमामे छतु सिरि भेरी सडो रड ॥
जाइ सुते जीराण महि थीए अतीमा गड ॥45॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: (इन ‘विसु गंदलों’ का क्या माण।) (जिन लोगों के) पास धौंसे (बजते थे)। सिर पर छत्र (झूलते थे)। तूतीआं (बजती थीं) उस्तति के छंद (गाए जाते हैं)। वह भी आखिर मसाणों में जा के सो गए। और यतीमों के साथ जा मिले (भाव। यतीमों जैसे ही हो गए)। 45।
फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ उसारेदे भी गए ॥
कूड़ा सउदा करि गए गोरी आइ पए ॥46॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (‘विसु गंदलों’ के व्यापारियों की ओर देखो) घर महल-माड़ियां उसारने वाले भी (इनको छोड़ के) चले गए। वही सौदा किया। जो साथ नहीं निभा और (आखिर में खाली हाथ) कब्रों में जा पड़े। वे दुनिया में झूठा सौदा करते हुए कब्र-श्मशानों में जा पड़े ॥46॥
फरीदा खिंथड़ि मेखा अगलीआ जिंदु न काई मेख ॥
वारी आपो आपणी चले मसाइक सेख ॥47॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! ये ‘विसु गंदलें’ तो कहां रहीं। इस अपनी जिंद की भी कोई पायां नहीं (इससे तो नकारी गोदड़ी का ही ज्यादा ऐतबार हो सकता है। क्योंकि) गोदड़ी को कई टांके लगे हुए हैं। पर जिंद को एक भी टाँका नहीं (क्या पता। किस वक्त शरीर से अलग हो जाए।) बड़े-बड़े कहलवाने वाले शेख आदि सब अपनी-अपनी बारी में यहाँ से चले गए। 47।
फरीदा दुहु दीवी बलंदिआ मलकु बहिठा आइ ॥
गड़ु लीता घटु लुटिआ दीवड़े गइआ बुझाइ ॥48॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! इन दोनों आँखों के सामने (इन दोनों दीयों के जलते ही) मौत का फरिश्ता (जिस भी व्यक्ति के पास) आ बैठा। उसने उसके शरीर-रूप किले पर कब्जा कर लिया। अतंहकरण लेट लिया (भाव। जिंद काबू कर ली) और (इन आँखों के) दीए बुझा गया। 48।
फरीदा वेखु कपाहै जि थीआ जि सिरि थीआ तिलाह ॥
कमादै अरु कागदै कुंने कोइलिआह ॥
मंदे अमल करेदिआ एह सजाइ तिनाह ॥49॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! देख ! जो हालत कपास की होती है (भाव। बेलने में बेली जाती है)। जो तिलों के सिर पर बीतती है (कोल्हू में पीढ़े जाते हैं)। जो कमाद। कागज़। मिट्टी की हांडी और कोयलों के साथ बरतती है। यह सज़ा उन लोगों को मिलती है जो (इन ‘विसु गंदलों’ की खातिर) बुरे काम करते हैं (भाव। ज्यों-ज्यों दुनियावी पदार्थों की खातिर बुरे काम करते हैं। त्यों त्यों बहुत दुखी होते हैं)। 49।
फरीदा कंनि मुसला सूफु गलि दिलि काती गुड़ु वाति ॥
बाहरि दिसै चानणा दिलि अंधिआरी राति ॥50॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (आपके) कांधे पर मुसला है। (तूने) गले में काली खफनी (डाली हुई है)। (आपके) मुँह में गुड़ है; (पर) दिल में कैंची है (भाव। बाहर लोगों को दिखाने के लिए फकीरी भेष है। मुँह से भी लोगों के साथ मीठा बोलता है। पर दिल से ‘विसु गंदलों’ की खातिर खोटा है सो) बाहर तो रौशनी दिख रही है (पर) दिल में अंधेरी रात (बनी हुई) है। 50।
फरीदा रती रतु न निकलै जे तनु चीरै कोइ ॥
जो तन रते रब सिउ तिन तनि रतु न होइ ॥51॥
मः 3 ॥
इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥
जो सह रते आपणे तितु तनि लोभु रतु न होइ ॥
भै पइऐ तनु खीणु होइ लोभु रतु विचहु जाइ ॥
जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥
नानक ते जन सोहणे जि रते हरि रंगु लाइ ॥52॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! जो लोग रॅब के साथ रंगे होते हैं (भाव। रॅब के प्यार में रंगे होते हैं)। उनके शरीर में (‘विसु गंदलों’ का मोह रूप) लहू नहीं होता। अगर कोई (उनका) शरीर चीरे (तो उसमें से) रक्ती जितना भी लहू नहीं निकलता (पर। हे फरीद ! तूने तो मुसले और खफनी आदि से निरा बाहर का ही ख्याल रखा हुआ है)। 51। महला 3॥ यह सारा शरीर लहू है (भाव। सारे शरीर में खून मौजूद है)। लहू के बिना शरीर रह नहीं सकता (फिर। शरीर को चीरने से। भाव। शरीर की पड़ताल करने से। कौन सा लहू नहीं निकलता।) जो लोग अपने पति (प्रभू के प्यार) में रंगे हुए हें (उनके) इस शरीर में लालच-रूप लहू नहीं होता। अगर (परमात्मा के) डर में जीएं। तो शरीर (इस तरह) कमजोर हो जाता है (कि) इसमें से लोभ रूपी लहू निकल जाता है। जैसे आग में (डालने से सोना आदि) धातु साफ हो जाती है; इसी तरह परमात्मा का डर (मनुष्य की) बुरी मति-रूपी मैल को काट देता है। हे नानक ! वे लोग सोहणे हैं जो परमात्मा के साथ नेहु लगा के (उसके नेहु में) रंगे हुए हैं। 52।
फरीदा सोई सरवरु ढूढि लहु जिथहु लभी वथु ॥
छपड़ि ढूढै किआ होवै चिकड़ि डुबै हथु ॥53॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! वही सुंदर तालाब ढूँढ। जिसमें से (असल) चीज़ (नाम-रूप मोती) मिल जाए। छप्पड़ तलाशे कुछ नहीं मिलता। (वहाँ से तो) कीचड़ में (ही) हाथ डूबता है। 53।
फरीदा नंढी कंतु न राविओ वडी थी मुईआसु ॥
धन कूकेंदी गोर में तै सह ना मिलीआसु ॥54॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! जिस जवान (जीव-) स्त्री ने (परमात्मा-) पति को नहीं पाया (भाव। जिस जीव ने जवानी के वक्त रॅब को ना सिमरा)। वह (जीव-) स्त्री जब बुढी हो के मर गई तो (फिर) कब्र में तरले लेती है (भाव। मरने के बाद जीव पछताता है) कि हे (प्रभू-) पति ! मैं आपको (समय सिर) ना मिली। 54।
फरीदा सिरु पलिआ दाड़ी पली मुछां भी पलीआं ॥
रे मन गहिले बावले माणहि किआ रलीआं ॥55॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! सिर सफेद हो गया है। दाढ़ी सफेद हो गई है। मूछें भी सफेद हो गई हैं। हे गाफिल और कमले मन ! (अभी आप दुनिया की ही) मौजें क्यों ले रहा है। 55।
फरीदा कोठे धुकणु केतड़ा पिर नीदड़ी निवारि ॥
जो दिह लधे गाणवे गए विलाड़ि विलाड़ि ॥56॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! कोठे की दौड़ कहाँ तक (भाव। कोठे पर दौड़ लंबी नहीं हो सकती। इसी तरह रॅब से गाफिल कब तक रहेगा। उम्र आखिर खत्म हो जाएगी। इसलिए) रॅब (के प्रति) ये कोझी (गफ़लत की) नींद दूर कर दे। (उम्र के) जो गिनती के दिन मिले हुए हैं वह छलांगे मार-मार के खत्म होते जा रहे हैं। 56।
फरीदा कोठे मंडप माड़ीआ एतु न लाए चितु ॥
मिटी पई अतोलवी कोइ न होसी मितु ॥57॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (यह जो आपके) घर और महल-माढ़ियां (हैं। इनके) इस (सिलसिले) में चित्त ना जोड़। (मरने पर जब कब्र में आपके ऊपर) मनों भार मिट्टी पड़ेगी तब (इनमें से) कोई भी आपका साथी नहीं बनेगा। 57।
फरीदा मंडप मालु न लाइ मरग सताणी चिति धरि ॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (सिर्फ) महल-माड़ियों और धन को चित्त में ना टिकाए रख। (सबसे) बलवान मौत को चित्त में रख (याद रख)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है। चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

इस अंग पर 17 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(‘विसु गंदलों’ के पीछे दौड़-दौड़ के ही) शेख फरीद (अब) बुढा हो गया है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।