अंग
137
माझ
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ससुरै पेईऐ तिसु कंत की वडा जिसु परवारु ॥
ससुरै पेईऐ तिसु कंत की वडा जिसु परवारु ॥
ऊचा अगम अगाधि बोध किछु अंतु न पारावारु ॥
सेवा सा तिसु भावसी संता की होइ छारु ॥
दीना नाथ दैआल देव पतित उधारणहारु ॥
आदि जुगादी रखदा सचु नामु करतारु ॥
कीमति कोइ न जाणई को नाही तोलणहारु ॥
मन तन अंतरि वसि रहे नानक नही सुमारु ॥
दिनु रैणि जि प्रभ कंउ सेवदे तिन कै सद बलिहार ॥2॥
संत अराधनि सद सदा सभना का बखसिंदु ॥
जीउ पिंडु जिनि साजिआ करि किरपा दितीनु जिंदु ॥
गुर सबदी आराधीऐ जपीऐ निरमल मंतु ॥
कीमति कहणु न जाईऐ परमेसुरु बेअंतु ॥
जिसु मनि वसै नराइणो सो कहीऐ भगवंतु ॥
जीअ की लोचा पूरीऐ मिलै सुआमी कंतु ॥
नानकु जीवै जपि हरी दोख सभे ही हंतु ॥
दिनु रैणि जिसु न विसरै सो हरिआ होवै जंतु ॥3॥
सरब कला प्रभ पूरणो मंञु निमाणी थाउ ॥
हरि ओट गही मन अंदरे जपि जपि जीवां नाउ ॥
करि किरपा प्रभ आपणी जन धूड़ी संगि समाउ ॥
जिउ तूं राखहि तिउ रहा तेरा दिता पैना खाउ ॥
उदमु सोई कराइ प्रभ मिलि साधू गुण गाउ ॥
दूजी जाइ न सुझई किथै कूकण जाउ ॥
अगिआन बिनासन तम हरण ऊचे अगम अमाउ ॥
मनु विछुड़िआ हरि मेलीऐ नानक एहु सुआउ ॥
सरब कलिआणा तितु दिनि हरि परसी गुर के पाउ ॥4॥1॥
ऊचा अगम अगाधि बोध किछु अंतु न पारावारु ॥
सेवा सा तिसु भावसी संता की होइ छारु ॥
दीना नाथ दैआल देव पतित उधारणहारु ॥
आदि जुगादी रखदा सचु नामु करतारु ॥
कीमति कोइ न जाणई को नाही तोलणहारु ॥
मन तन अंतरि वसि रहे नानक नही सुमारु ॥
दिनु रैणि जि प्रभ कंउ सेवदे तिन कै सद बलिहार ॥2॥
संत अराधनि सद सदा सभना का बखसिंदु ॥
जीउ पिंडु जिनि साजिआ करि किरपा दितीनु जिंदु ॥
गुर सबदी आराधीऐ जपीऐ निरमल मंतु ॥
कीमति कहणु न जाईऐ परमेसुरु बेअंतु ॥
जिसु मनि वसै नराइणो सो कहीऐ भगवंतु ॥
जीअ की लोचा पूरीऐ मिलै सुआमी कंतु ॥
नानकु जीवै जपि हरी दोख सभे ही हंतु ॥
दिनु रैणि जिसु न विसरै सो हरिआ होवै जंतु ॥3॥
सरब कला प्रभ पूरणो मंञु निमाणी थाउ ॥
हरि ओट गही मन अंदरे जपि जपि जीवां नाउ ॥
करि किरपा प्रभ आपणी जन धूड़ी संगि समाउ ॥
जिउ तूं राखहि तिउ रहा तेरा दिता पैना खाउ ॥
उदमु सोई कराइ प्रभ मिलि साधू गुण गाउ ॥
दूजी जाइ न सुझई किथै कूकण जाउ ॥
अगिआन बिनासन तम हरण ऊचे अगम अमाउ ॥
मनु विछुड़िआ हरि मेलीऐ नानक एहु सुआउ ॥
सरब कलिआणा तितु दिनि हरि परसी गुर के पाउ ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: (सृष्टि के बेअंत ही जीव) जिस प्रभू पति का (बेअंत) बड़ा परिवार है, जीव स्त्री लोक परलोक में उसके आसरे ही रहि सकती है। वह परमात्मा (आत्मा उड़ानों में) सब से ऊँचा है, अपहुँच है, अथाह ज्ञान का मालिक है, उसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, इस पार उस पार का छोर नहीं ढूँढा जा सकता। वही सेवा उस प्रभू को पसंद आती है, जो उसके संत जनों के चरणों की धूड़ बन के की जाए। वह गरीबों का खसम सहारा है। वह विकारों में डूबे जीवों को बचाने वाला है। वह करतार शुरू से ही (जीवों की) रक्षा करता , उसका नाम सदा कायम रहने वाला है। कोई जीव उसका मूल्य नहीं पा सकता। कोई जीव उसकी हस्ती का अंदाजा नहीं लगा सकता। हे नानक ! वह प्रभू जी हरेक जीव के मन में तन में मौजूद है। उस प्रभू के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। मैं उन लोगों से सदा कुर्बान जाता हूँ जो दिन रात प्रभू का सिमरन करते रहते हैं। 2। जो सब जीवों पर बख्शिश करने वाला है, जिसको संत जन सदा ही आराधते हैं, जिस (परमात्मा) ने (सब जीवों की) जिंद (जीवात्मा) बनाई है, (सबका) शरीर पैदा किया है। मेहर करके सबको जिंद दी है। गुरू के शबद के द्वारा उसका सिमरन करना चाहिए, उसका पवित्र नाम जपना चाहिए। वह परमात्मा सबसे बड़ा मालिक (ईश्वर) है, उसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, उसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। जिस मनुष्य के मन में परमात्मा आ बसता है उसे भाग्यशाली कहना चाहिए। जिसे मालिक पति प्रभू मिल जाता है उसकी जीवात्मा की हरेक तमन्ना पूरी हो जाती है। नानक (भी) उस हरी का जाप जप के आत्मिक जीवन हासिल कर रहा है। जिस मनुष्य को ना दिन ना रात, किसी भी वक्त परमात्मा नहीं भूलता उसके सारे पाप नाश हो जाते हैं, वह मनुष्य आत्मिक जीवन वाला हो जाता है (जैसे पानी के बगैर सूख रहा पेड़ पानी से हरा हो जाता है)। 3। हे प्रभू ! आप सारी शक्तियों से भरपूर हैं। मैं निमाणी का आप आसरा हैं। हे हरी ! मैंने अपने मन में आपकी ओट ली है, आपका नाम जपके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। हे प्रभू ! अपनी मेहर कर मैं आपके संत जनों की चरण धूड़ में समाया रहूँ। जिस हाल में आप मुझे रखते हैं मैं (खुशी से) उसी हाल में रहता हूँ। जो कुछ आप मुझे देते हैं वही मैं पहनता हूँ, वही मैं खाता हूँ। हे प्रभू ! मुझसे वही उद्यम करा (जिसकी बरकति से) मैं गुरू को मिल केआपके गुण गाता रहूँ। (आपके बिना) मुझे और कोई जगह नहीं सूझती। आपके बिना मैं और किस के आगे फरियाद करूँ? हे अज्ञानता का नाश करने वाले हरी ! हे (मोह का) अंधकार दूर करने वाले हरी ! हे (सब से) ऊँचे ! हे अपहुँच ! हे अमित हरी ! नानक का ये मनोरथ है कि (नानक के) विछुड़े हुए मन को (अपने चरणों में) मिला हे। हे हरी ! (मुझ नानक को) उस दिन सारे ही सुख (प्राप्त हो जाते हैं) जब मैं गुरू के चरण छूता हूँ। 4। 1।
गुरु दाता गुरु हिवै घरु गुरु दीपकु तिह लोइ ॥
वार माझ की तथा सलोक महला 1 मलक मुरीद तथा चंद्रहड़ा सोहीआ की धुनी गावणी ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 1 ॥
गुरु दाता गुरु हिवै घरु गुरु दीपकु तिह लोइ ॥
अमर पदारथु नानका मनि मानिऐ सुखु होइ ॥1॥
ੴ सति नामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 1 ॥
गुरु दाता गुरु हिवै घरु गुरु दीपकु तिह लोइ ॥
अमर पदारथु नानका मनि मानिऐ सुखु होइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: मुरीद खान और चंद्रहड़ा, दो राजपूत सरदार हुए हैं अकबर के दरबार में। पहले की जाति थी ‘मलिक’ तथा दूसरे की ‘सोही’। दोनों की आपस में लगती थी। एक बार बादशाह ने मुरीद खान को काबुल की मुहिम पे भेजा, उसने वैरी को जीत तो लिया, पर राज प्रबंध में कुछ देर लग गई। चंद्रहड़े ने अकबर के पास चुगली लगा दी कि मुरीद खान आकी हो के बैठा है। सो, मलिक के विरुद्ध फौज दे के इसे भेजा गया। दोनों जंग में आपस में लड़के मारे गए। ढाढियों ने इस जंग की ‘वार’ लिखी, देश में प्रचलित हुई। गुरू अरजन साहिब ने ऊपर लिखे शीर्षक में हिदायत की है कि गुरू नानक देव जी की ये माझ की वार उस धुनि (सुर) में गानी है जिसमें मुरीद खान वाली गाई जाती है।मुरीद खान वाली वार का नमूना;“काबल विच मुरीद खां फड़िआ वड जोर।” सति नामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥ अर्थ: राग माझ की ये वार और इसके साथ दिए हुए शलोक गुरू नानक देव जी के उचारे हुए हैं। पर, इसका ये भाव नहीं कि इस ‘वार’ की पउड़ियां और शलोक गुरू नानक देव जी ने इकट्ठे ही उचारे थे। ‘वार’ सिर्फ ‘पउड़ियों’ का संग्रह है। ‘वार’ का असल रूप केवल ‘पउड़ियां’ हैं। गुरू ग्रंथ साहिब की बीड़ तैयार करने के समय ये शलोक गुरू अरजन देव जी ने मिला दिए थे। ‘वारों’ के साथ दर्ज करने के बाद जो शलोक ज्यादा बच रहे, वह उन्होंने आखिर में इकट्ठे लिख दिए और शीर्षक लिखा ‘सलोक वारां ते वधीक’। इस ‘वार’ की सारी बनावट को थोड़ा गौर से देखने से ये बात स्पष्ट दिखाई देने लगती है कि पहिले सिर्फ ‘पउड़ियां’ थीं। ‘बनावट’ में निम्नलिखित बातें ध्यान रखने योग्य है; (1) कुल 27 पउड़ियां हैं और हरेक पउड़ी की आठ आठ तुकें हैं। (2) 27 पउड़ियों में से सिर्फ 14 ऐसी हैं, जिनके साथ शलोक सिर्फ गुरू नानक देव जी के हैं। (3) पर, इन शलोकों की गिनती हरेक पउड़ी के साथ एक जैसी नहीं। 10 पउड़ियों के साथ दो दो शलोक हैं और निम्नलिखित 4 पउड़ियों के शलोक इस प्रकार हैं;पउड़ी नं: 1 के साथ 3 श्लोकपउड़ी नं: 7 के साथ 3 श्लोकपउड़ी नं: 9 के साथ 4 श्लोकपउड़ी नं: 13 के साथ 7 श्लोक (4) पउड़ी नं: 3, 18, 22 और 25 के साथ कोई भी श्लोक गुरू नानक देव जी का नहीं। (5) बाकी रह गई 9 पउड़ियां; इनके साथ एक एक श्लोक गुरू नानक देव जी का है, एक एक व अन्य गुरू साहिबानों का। हरेक ‘पउड़ी’ में तुकों की गिनती एक जैसी होने के कारण ये स्पष्ट प्रतीत होता है कि गुरू नानक देव जी ने ये ‘वार’ लिखते वक्त ‘काव्य’ सहजता का भी ख्याल रखा है। पर जिस कवि गुरू ने पउड़ियों की संरचना पर इतना ध्यान दिया है, उस संबंधी ये नहीं कहा जा सकता कि श्लोक लिखने के समय कहीं दो दो लिख दिये, कहीं 3, कहीं 4 कहीं7 लिख दिए और कई पउड़ियां खाली ही रहने दीं। असल बात ये है कि ‘वार’ का पहला स्वरूप सिर्फ ,पउड़ियां हैं। श्लोक गुरू अरजन देव जी ने दर्ज किए हैं। सतिगुरू (नाम की दाति) देने वाला है। गुरू ठण्ड का श्रोत है। गुरू (ही) त्रिलोकी में प्रकाश करने वाला है। हे नानक ! कभी ना समाप्त होने वाला (नाम रूपी) पदार्थ (गुरू से मिलता है)। जिसका मन गुरू में पतीज जाए, वह सुखी हो जाता है। 1।
पहिलै पिआरि लगा थण दुधि ॥
मः 1 ॥
पहिलै पिआरि लगा थण दुधि ॥
दूजै माइ बाप की सुधि ॥
तीजै भया भाभी बेब ॥
चउथै पिआरि उपंनी खेड ॥
पंजवै खाण पीअण की धातु ॥
छिवै कामु न पुछै जाति ॥
सतवै संजि कीआ घर वासु ॥
अठवै क्रोधु होआ तन नासु ॥
नावै धउले उभे साह ॥
दसवै दधा होआ सुआह ॥
गए सिगीत पुकारी धाह ॥
उडिआ हंसु दसाए राह ॥
पहिलै पिआरि लगा थण दुधि ॥
दूजै माइ बाप की सुधि ॥
तीजै भया भाभी बेब ॥
चउथै पिआरि उपंनी खेड ॥
पंजवै खाण पीअण की धातु ॥
छिवै कामु न पुछै जाति ॥
सतवै संजि कीआ घर वासु ॥
अठवै क्रोधु होआ तन नासु ॥
नावै धउले उभे साह ॥
दसवै दधा होआ सुआह ॥
गए सिगीत पुकारी धाह ॥
उडिआ हंसु दसाए राह ॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (अगर मनुष्य की सारी उम्र को दस हिस्सों में बाँट दें, तो इसकी सारी उम्र के किए उद्यमों की तसवीर कुछ इस तरह बनती है:) पहली अवस्था में (जीव) प्यार से (माँ के) थनों के दूध से व्यस्त होता है; दूसरी अवस्था में (भाव, जब थोड़ा सा बड़ा होता है) (इसे) माँ और पिता की समझ हो जाती है। तीसरी अवस्था में (पहुँचे हुए जीव को) भाई व बहिन की पहचान हो जाती है। चौथी अवस्था में खेलों में प्यार के कारण (जीवों में खेल खेलने की रुची) उपतजी है। पाँचवीं अवस्था में खाने पीने की लालसा बनती है। छेवीं अवस्था में (पहुँच के जीव के अंदर) काम (जागता है जो) जाति कुजाति नहीं देखता। सातवीं अवस्था में (जीव पदार्थ) इकट्ठे करके (अपना) घर का बसेरा बनाता है। आठवीं अवस्था में (जीव के अंदर) गुस्सा (पैदा होता है जो) शरीर का नाश करता है। (उम्र के) नौवें हिस्से में केस सफेद हो जाते हैं और साँस खींच के आते हैं (भाव, दम चढ़ने लग जाता है); दसवें दर्जे पे जा के जल के राख हो जाता है। जो साथी (शमशान तक साथ) जाते हैं, वे ढाहें मार के रोते हैं। जीवात्मा (शरीर में से) निकल के (आगे के) राह पूछता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १३७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।