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कबीर जी के सलोक
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- हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि ॥213॥
- कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
- कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥
- कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥
- कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥
- कबीर कोठे मंडप हेतु करि काहे मरहु सवारि ॥
- कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥
- चिंता भि आपि कराइसी अचिंतु भि आपे देइ ॥
- कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥
- कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥
- कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥
- कबीर काइआ कजली बनु भइआ मनु कुंचरु मय मंतु ॥
- कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥
- कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुटंबु ॥
- कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥
- कबीर तरवर रूपी रामु है फल रूपी बैरागु ॥
- कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥
- कबीर दाता तरवरु दया फलु उपकारी जीवंत ॥
- कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥
· सलोक
हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि ॥213॥
हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि ॥213॥
हिन्दी अर्थ: हाथ-पैर का इस्तेमाल कर के सारा काम-काज करें। और अपना चित्त माया-रहित परमात्मा से जोड़ें। 213।
· सलोक
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
महला 5 ॥
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥214॥
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥214॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर! ना कोई हमारा सदा का साथी है और ना ही हम किसी के सदा के लिए साथी बन सकते हैं (बेड़ी के पूर का मेला है)। जिस परमात्मा ने ये रचना रची है। हम तो उसी की याद में टिके रहते हैं। 214।
· सलोक
कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥
कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥
पीसत पीसत चाबिआ सोई निबहिआ साथ ॥215॥
पीसत पीसत चाबिआ सोई निबहिआ साथ ॥215॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (कोई औरत जो किसी के घर से आटा पीस के लाई, अपने घर आते हुए रास्ते में ही वह) आटा कीचड़ में गिर गया। उस (बेचारी) के हाथ-पल्ले कुछ ना पड़ा। चक्की पीसते-पीसते जितने दाने उसने चबा लिए, बस! वही उसके काम आए। 215।
· सलोक
कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥
कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥
काहे की कुसलात हाथि दीपु कूए परै ॥216॥
काहे की कुसलात हाथि दीपु कूए परै ॥216॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (जो मनुष्य हर रोज़ धर्म-स्थान पर जा के भजन भगती करने के बाद सारा दिन ठॅगी-फरेब की किरत-कमाई करता है। वह इस बात से नावाकिफ नहीं कि ये बुरी बात है। उसका) मन सब कुछ जानता है। पर वह जानता हुआ भी (ठॅगी की कमाई वाला) पाप करता जाता है। (परमात्मा की भगती तो एक जलता हुआ दीपक है जिसने जिंदगी के अंधेरे भरे सफर में मनुष्य को रास्ता दिखाना है। विकारों के कूएँ में गिरने से बचाना है। पर) उस दीए का क्या सुख अगर उस दीए के हमारे हाथ में होते हुए भी हम कूँएं में गिर जाएँ। 216।
· सलोक
कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥
कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥
ता सिउ टूटी किउ बनै जा के जीअ परान ॥217॥
ता सिउ टूटी किउ बनै जा के जीअ परान ॥217॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (अगर आप 'चीतु निरंजन नालि' जोड़ के रखते हैं तो यह याद रखें कि यह) मूर्ख जगत (भाव, साक-संबन्धियों का मोह और ठॅगी की किरत-कार) घट-घट के जानने वाले परमात्मा के साथ बनी प्रीति के रास्ते में रुकावट डालता है; (और इस धोखे में आने पर घाटा ही घाटा है। क्योंकि) जिस परमात्मा की दी हुई यह जिंद-जान है उससे विछुड़ी हुई (किसी हालत में भी) यह सुंदर नहीं लग सकती (आसान नहीं रह सकती)। 217।
· सलोक
कबीर कोठे मंडप हेतु करि काहे मरहु सवारि ॥
कबीर कोठे मंडप हेतु करि काहे मरहु सवारि ॥
कारजु साढे तीनि हथ घनी त पउने चारि ॥218॥
कारजु साढे तीनि हथ घनी त पउने चारि ॥218॥
हिन्दी अर्थ: इसलिए (प्राण-दाते प्रभू से विछुड़ी जीवात्मा सुखी नहीं रह सकती। 'ता सिउ टूटी किउ बनै'; इसलिए) हे कबीर! (उस प्राण-दाते को भुला के) घर महल-माढ़ियां बड़े शौक से सजा-सजा के क्यों आत्मिक मौत मर रहे हैं। आपकी अपनी जरूरत तो साढ़े तीन हाथ जमीन से पूरी हो रही है (क्योंकि हर रोज सोने के लिए अपने कद के अनुसार आप इतनी ही जगह बरतते हैं)। पर अगर (आपका कद कुछ लंबा है। अगर) आपको कुछ ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ती है तो पौने चार हाथ बरत लेते होंगे। 218।
· सलोक
कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥
कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥
अपना चितविआ हरि करै जो मेरे चिति न होइ ॥219॥
अपना चितविआ हरि करै जो मेरे चिति न होइ ॥219॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! चित्त माया-रहित परमात्मा से जोड़ने की जगह आप सारा दिन माया की ही सोच में पड़े रहते हैं। पर आपके और मेरे सोचते रहने से कुछ नहीं बनता। परमात्मा वह नहीं करता जो मैं सोचता हूँ (अर्थात जो हम सोचते रहते हैं)। प्रभु वही करता है जो वह स्वयं सोचता है। और जो कुछ परमात्मा सोचता है, वह हमारे ध्यान में भी नहीं होता। 219।
· सलोक
चिंता भि आपि कराइसी अचिंतु भि आपे देइ ॥
मः 3 ॥
चिंता भि आपि कराइसी अचिंतु भि आपे देइ ॥
नानक सो सालाहीऐ जि सभना सार करेइ ॥220॥
चिंता भि आपि कराइसी अचिंतु भि आपे देइ ॥
नानक सो सालाहीऐ जि सभना सार करेइ ॥220॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे कबीर! जीवों के वश में क्या है? प्रभु स्वयं ही जीवों के मन में दुनिया की चिंताएँ पैदा करता है। वही उस अवस्था की दात भी देता है जब मनुष्य इन चिंताओं से मुक्त हो जाता है। हे नानक! जो प्रभु सब जीवों की सँभाल करता है, उसी के गुण गाने चाहिए। अर्थात प्रभु के आगे ही अरदास करके दुनिया की चिंताओं से बचे रहने की दात माँगें। 220।
· सलोक
कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥
मः 5 ॥
कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥
पाप करंता मरि गइआ अउध पुनी खिन माहि ॥221॥
कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥
पाप करंता मरि गइआ अउध पुनी खिन माहि ॥221॥
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे कबीर! जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन नहीं करता (सिमरन ना करने का नतीजा ही ये निकलता है कि वह दुनिया की सोचें सोचता है। और दुनिया के) लालच में भटकता फिरता है। पाप करते-करते वह (भाग्य-हीन) आत्मिक मौत मर जाता है (उसके अंदर से ऊँचा आत्मिक जीवन खत्म हो जाता है)। और विकार करते-करते उसका मन भरता ही नहीं पर अचानक उम्र खत्म हो जाती है। 221।
· सलोक
कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥
कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥
साबतु रखहि त राम भजु नाहि त बिनठी बात ॥222॥
साबतु रखहि त राम भजु नाहि त बिनठी बात ॥222॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! ये शरीर कच्चा लोटा (समझ लें)। इसकी अस्लियत निरोल कच्ची मिट्टी (मिथ लें)। अगर आप इसको (बाहरी बुरे असरों से) पवित्र रखना चाहते हैं तो परमात्मा का नाम सिमरें। नहीं तो (मनुष्य जन्म की यह) खेल बिगड़ी ही जान लें (भाव, हर हाल में बिगड़ जाएगी)। 222।
· सलोक
कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥
कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥
राति दिवस के कूकने कबहू के सुनै पुकार ॥223॥
राति दिवस के कूकने कबहू के सुनै पुकार ॥223॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (अगर इस शरीर को विकारों से 'साबतु रखहि त') हर वक्त परमात्मा का नाम याद करते रहें। किसी भी वक्त विकारों से बेपरवाह ना होएं। यदि दिन-रात (हर वक्त) परमात्मा को सिमरते रहें तो किसी ना किसी वक्त वह प्रभू जीव की अरदास सुन ही लेता है (और इसको आत्मिक मौत मरने से बचा लेता है)। 223।
· सलोक
कबीर काइआ कजली बनु भइआ मनु कुंचरु मय मंतु ॥
कबीर काइआ कजली बनु भइआ मनु कुंचरु मय मंतु ॥
अंकसु ग्यानु रतनु है खेवटु बिरला संतु ॥224॥
अंकसु ग्यानु रतनु है खेवटु बिरला संतु ॥224॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (यदि केशव-केशव ना पुकारें ना कूकें। अगर परमात्मा का सिमरन ना करें तो अनेकों विकार हो जाने के कारण) यह मनुष्य का शरीर। मानो, 'कजली बनु' बन जाता है जिसमें मन हाथी अपने मद में मस्ताया हुआ फिरता है। इस हाथी को काबू रखने के लिए गुरू का श्रेष्ठ ज्ञान ही कुंडा बन सकता है। कोई भाग्यशाली गुरमुखि (इस ज्ञान-कुंडे को बरत के मन-हाथी को) चलाने के योग्य होता है। 224।
· सलोक
कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥
कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥
कोई आइ मिलैगो गाहकी लेगो महगे मोलि ॥225॥
कोई आइ मिलैगो गाहकी लेगो महगे मोलि ॥225॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! परमात्मा का नाम (दुनिया में) सबसे कीमती पदार्थ है। (इस पदार्थ को संभाल के रखने के लिए) अपने मुँह को गुत्थी बना के इस रत्न की कद्र-कीमत जानने वाले किसी (जौहरी) गुरमुखि के आगे ही मुँह खोलें (भाव, सत्संग में प्रभू-नाम की सिफतसालाह करें)। जब नाम-रतन की कद्र जानने वाला कोई गाहक सत्संग में आ पहुँचता है तो वह अपना मन गुरू के हवाले कर के नाम-रतन को खरीदता है। 225।
· सलोक
कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुटंबु ॥
कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुटंबु ॥
धंधे ही महि मरि गइओ बाहरि भई न बंब ॥226॥
धंधे ही महि मरि गइओ बाहरि भई न बंब ॥226॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम-रतन की कद्र नहीं पड़ती। वह (नाम-रतन को बिसार के सारी उम्र) ज्यादा परिवार ही पालता रहता है; दुनिया के धंधों में ही खप-खप के वह मनुष्य आत्मिक मौत मर जाता है। इन झंझटों में से निकल के कभी उसके मुँह से राम-नाम की आवाज़ नहीं निकलती (ना ही इन झंझटों में से उसे कभी वक्त मिलता है। और ना वह कभी परमात्मा के नाम को मुँह से उचारता है)। 226।
· सलोक
कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥
कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥
मनु जंजालु न छोडई जम दीआ दमामा आइ ॥227॥
मनु जंजालु न छोडई जम दीआ दमामा आइ ॥227॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (उस बद्नसीब का हाल देखिए जो प्रभू-नाम की कद्र-कीमत ना जानता हुआ सारी उम्र कुटंब पालने में ही गुजारता है और कभी भी प्रभू-नाम मुँह से नहीं उचारता! थोड़ी-थोड़ी करके पता ही नहीं चलता कब) उसकी उम्र आँखों के झपकने जितने समय और पल-पल करके बीत जाती है; फिर भी उसका मन (परिवार का) जंजाल नहीं छोड़ता। आखिर। जम मौत का नगारा आ बजाते हैं। 227।
· सलोक
कबीर तरवर रूपी रामु है फल रूपी बैरागु ॥
कबीर तरवर रूपी रामु है फल रूपी बैरागु ॥
छाइआ रूपी साधु है जिनि तजिआ बादु बिबादु ॥228॥
छाइआ रूपी साधु है जिनि तजिआ बादु बिबादु ॥228॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (विकारों की तपश से तप रहे इस संसार में) प्रभू का नाम एक सुंदर वृक्ष है। (जो भाग्यशाली व्यक्ति उस तपश से बचने के लिए इस छाया का आसरा लेता है उसको) वैराग-रूप फल (हासिल होता) है। जिस मनुष्य ने (अपने अंदर से इन विकारों का) झगड़ा खत्म कर दिया है वह गुरमुखि इस वृक्ष की। मानो, छाया है। 228।
· सलोक
कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥
कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥
सीतल छाइआ गहिर फल पंखी केल करंत ॥229॥
सीतल छाइआ गहिर फल पंखी केल करंत ॥229॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! ('जिनि तजिआ बादु बिबादु' उस 'साध' की संगति में रह के आप भी अपने हृदय की धरती में परमात्मा के नाम का) एक ऐसा बीज बोइए जो सदा ही फल देता रहता है; उसका असर लें तो अंदर ठंड पड़ती है। फल मिलता है कि दुनिया के 'बाद बिबाद' से मन ठहर जाता है। और सारी ज्ञानेन्द्रियां (जो पहले पक्षियों की तरह जगह-जगह पर चोग के लिए भटकती थीं। अब प्रभू के नाम का) आनंद लेती हैं। 229।
· सलोक
कबीर दाता तरवरु दया फलु उपकारी जीवंत ॥
कबीर दाता तरवरु दया फलु उपकारी जीवंत ॥
पंखी चले दिसावरी बिरखा सुफल फलंत ॥230॥
पंखी चले दिसावरी बिरखा सुफल फलंत ॥230॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! ('जिनि तजिआ बादु बिबादु') वह 'साधू' अपनी सारी उम्र परोपकार में ही गुजारता है; प्रभू के नाम की दाति देने वाला वह 'साधू' विकारों में तपते सारे इस संसार के लिए। मानो, एक सुंदर वृक्ष है। उससे 'जीव दया' की दाति प्राप्त होती है। संसारी जीव तो और-और धंधों में व्यस्त रहते हैं। पर गुरमुखि 'साध' सदा यही शिक्षा देता रहता है कि सबके साथ दया-प्यार करें। 230।
· सलोक
कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥
कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! 'जिनि तजिआ बादु बिबादु' उस साधु-गुरमुखि की संगति उस मनुष्य को प्राप्त होती है जिसके बहुत अच्छे भाग्य हों।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1376 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।