कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हाथ-पैर का इस्तेमाल कर के सारा काम-काज कर। और अपना चित्त माया-रहित परमात्मा से जोड़। 213।
महला 5 ॥ कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥ जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥214॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर ! ना कोई हमारा सदा का साथी है और ना ही हम किसी के सदा के लिए साथी बन सकते हैं (बेड़ी के पूर का मेला है)। जिस परमात्मा ने ये रचना रची है। हम तो उसी की याद में टिके रहते हैं। 214।
कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥ पीसत पीसत चाबिआ सोई निबहिआ साथ ॥215॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कोई औरत जो किसी के घर से आटा पीस के लाई। अपने घर आते हुए रास्ते में ही वह) आटा कीचड़ में गिर गया। उस (बेचारी) के हाथ-पल्ले कुछ ना पड़ा। चक्की पीसते-पीसते जितने दाने उसने चबा लिए। बस ! वही उसके काम आया।
कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥ काहे की कुसलात हाथि दीपु कूए परै ॥216॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जो मनुष्य हर रोज़ धर्म-स्थान पर जा के भजन भगती करने के बाद सारा दिन ठॅगी-फरेब की किरत-कमाई करता है। वह इस बात से नावाकिफ नहीं कि ये बुरी बात है। उसका) मन सब कुछ जानता है। पर वह जानता हुआ भी (ठॅगी की कमाई वाला) पाप करता जाता है। (परमात्मा की भगती तो एक जलता हुआ दीपक है जिसने जिंदगी के अंधेरे भरे सफर में मनुष्य को रास्ता दिखाना है। विकारों के कूएँ में गिरने से बचाना है। पर) उस दीए का क्या सुख अगर उस दीए के हमारे हाथ में होते हुए भी हम कूँएं में गिर जाए। 216।
कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥ ता सिउ टूटी किउ बनै जा के जीअ परान ॥217॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (अगर आप ‘चीतु निरंजन नालि’ जोड़ के रखता है तो यह याद रख कि यह) मूर्ख जगत (भाव। साक-संबन्धियों का मोह और ठॅगी की किरत-कार) घट-घट के जानने वाले परमात्मा के साथ बनी प्रीति के रास्ते में रुकावट डालता है; (और इस धोखे में आने पर घाटा ही घाटा है। क्योंकि) जिस परमात्मा की दी हुई यह जिंद-जान है उससे विछुड़ी हुई (किसी हालत में भी) यह सुंदर नहीं लग सकती (आसान नहीं रह सकती)। 217।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: इसलिए (प्राण-दाते प्रभू से विछुड़ी जीवात्मा सुखी नहीं रह सकती। ‘ता सिउ टूटी किउ बनै’; इसलिए) हे कबीर ! (उस प्राण-दाते को भुला के) घर महल-माढ़ियां बड़े शौक से सजा-सजा के क्यों आत्मिक मौत मर रहे हैं। आपकी अपनी जरूरत तो साढ़े तीन हाथ जमीन से पूरी हैं रही है (क्योंकि हर रोज सोने के लिए अपने कद के अनुसार आप इतनी ही जगह बरतते हो)। पर अगर (आपका कद कुछ लंबा है। अगर) आपको कुछ ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ती है तो पौने चार हाथ बरत लेते होवोगे। 218।
कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥ अपना चितविआ हरि करै जो मेरे चिति न होइ ॥219॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: पर आपके) मेरे सोचें सोचने से कुछ नहीं बनता; परमात्मा वह कुछ नहीं करता जो मैं सोचता हूँ (भाव। जो हम सोचते रहते हैं)। प्रभू वह कुछ करता है जो वह खुद सोचता है। और जो कुछ परमात्मा सोचता है वह हमारे चिक्त-चेते भी नहीं होता। 219।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे कबीर ! (जीवों के क्या वश।) प्रभू स्वयं ही जीवों के मन में दुनिया के फिकर-सोचों से रहित हो जाता है। हे नानक ! जो प्रभू सब जीवों की संभाल करता है उसी के गुण गाने चाहिए (भाव। प्रभू के आगे ही अरदास करके दुनिया की फिकर-सोचों से बचे रहने की दाति माँगें)। 220।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे कबीर ! जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन नहीं करता (सिमरन ना करने का नतीजा ही ये निकलता है कि वह दुनिया की सोचें सोचता है। और दुनिया के) लालच में भटकता फिरता है। पाप करते-करते वह (भाग्य-हीन) आत्मिक मौत मर जाता है (उसके अंदर से ऊँचा आत्मिक जीवन खत्म हो जाता है)। और विकार करते-करते उसका मन भरता ही नहीं पर अचानक उम्र खत्म हो जाती है। 221।
कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥ साबतु रखहि त राम भजु नाहि त बिनठी बात ॥222॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ये शरीर कच्चा लोटा (समझ ले)। इसकी अस्लियत निरोल कच्ची मिट्टी (मिथ ले)। अगर आप इसको (बाहरी बुरे असरों से) पवित्र रखना चाहता है तो परमात्मा का नाम सिमर। नहीं तो (मनुष्य जन्म की यह) खेल बिगड़ी ही जान ले (भाव। हर हाल में बिगड़ जाएगी)। 222।
कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥ राति दिवस के कूकने कबहू के सुनै पुकार ॥223॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (अगर इस शरीर को विकारों से ‘साबतु रखहि त’) हर वक्त परमात्मा का नाम याद करते रहें। किसी भी वक्त विकारों से बेपरवाह ना होएं। यदि दिन-रात (हर वक्त) परमात्मा को सिमरते रहें तो किसी ना किसी वक्त वह प्रभू जीव की अरदास सुन ही लेता है (और इसको आत्मिक मौत मरने से बचा लेता है)। 223।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (यदि केशव-केशव ना पुकारें ना कूकें। अगर परमात्मा का सिमरन ना करें तो अनेकों विकार हो जाने के कारण) यह मनुष्य का शरीर। मानो। ‘कजली बनु’ बन जाता है जिसमें मन हाथी अपने मद में मस्ताया हुआ फिरता है। इस हाथी को काबू रखने के लिए गुरू का श्रेष्ठ ज्ञान ही कुंडा बन सकता है। कोई भाग्यशाली गुरमुखि (इस ज्ञान-कुंडे को बरत के मन-हाथी को) चलाने के योग्य होता है। 224।
कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥ कोई आइ मिलैगो गाहकी लेगो महगे मोलि ॥225॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! परमात्मा का नाम (दुनिया में) सबसे कीमती पदार्थ है। (इस पदार्थ को संभाल के रखने के लिए) अपने मुँह को गुत्थी बना के इस रत्न की कद्र-कीमत जानने वाले किसी (जौहरी) गुरमुखि के आगे ही मुँह खोलना (भाव। सत्संग में प्रभू-नाम की सिफतसालाह कर)। जब नाम-रतन की कद्र जानने वाला कोई गाहक सत्संग में आ पहुँचता है तो वह अपना मन गुरू के हवाले कर के नाम-रतन को खरीदता है। 225।
कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुटंबु ॥ धंधे ही महि मरि गइओ बाहरि भई न बंब ॥226॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम-रतन की कद्र नहीं पड़ती। वह (नाम-रतन को बिसार के सारी उम्र) ज्यादा परिवार ही पालता रहता है; दुनिया के धंधों में ही खप-खप के वह मनुष्य आत्मिक मौत मर जाता है। इन झंझटों में से निकल के कभी उसके मुँह से राम-नाम की आवाज़ नहीं निकलती (ना ही इन झंझटों में से उसे कभी वक्त मिलता है। और ना वह कभी परमात्मा के नाम को मुँह से उचारता है)। 226।
कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥ मनु जंजालु न छोडई जम दीआ दमामा आइ ॥227॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (उस बद्नसीब का हाल देख जो प्रभू-नाम की कद्र-कीमत ना जानता हुआ सारी उम्र कुटंब पालने में ही गुजारता है और कभी भी प्रभू-नाम मुँह से नहीं उचारता ! थोड़ी-थोड़ी करके पता ही नहीं चलता कब) उसकी उम्र आँखों के झपकने जितने समय और पल-पल करके बीत जाती है; फिर भी उसका मन (परिवार का) जंजाल नहीं छोड़ता। आखिर। जम मौत का नगारा आ बजाते हैं। 227।
कबीर तरवर रूपी रामु है फल रूपी बैरागु ॥ छाइआ रूपी साधु है जिनि तजिआ बादु बिबादु ॥228॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (विकारों की तपश से तप रहे इस संसार में) प्रभू का नाम एक सुंदर वृक्ष है। (जो भाग्यशाली व्यक्ति उस तपश से बचने के लिए इस छाया का आसरा लेता है उसको) वैराग-रूप फल (हासिल होता) है। जिस मनुष्य ने (अपने अंदर से इन विकारों का) झगड़ा खत्म कर दिया है वह गुरमुखि इस वृक्ष की। मानो। छाया है। 228।
कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥ सीतल छाइआ गहिर फल पंखी केल करंत ॥229॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘जिनि तजिआ बादु बिबादु’ उस ‘साध’ की संगति में रह के आप भी अपने हृदय की धरती में परमात्मा के नाम का) एक ऐसा बीज बो जो सदा ही फल देता रहता है; उसका असर लें तो अंदर ठंड पड़ती है। फल मिलता है कि दुनिया के ‘बाद बिबाद’ से मन ठहर जाता है। और सारी ज्ञानेन्द्रियां (जो पहले पक्षियों की तरह जगह-जगह पर चोग के लिए भटकती थीं। अब प्रभू के नाम का) आनंद लेती हैं। 229।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘जिनि तजिआ बादु बिबादु’) वह ‘साधू’ अपनी सारी उम्र परोपकार में ही गुजारता है; प्रभू के नाम की दाति देने वाला वह ‘साधू’ विकारों में तपते सारे इस संसार के लिए। मानो। एक सुंदर वृक्ष है। उससे ‘जीव दया’ की दाति प्राप्त होती है। संसारी जीव तो और-और धंधों में व्यस्त रहते हैं। पर गुरमुखि ‘साध’ सदा यही शिक्षा देता रहता है कि सबके साथ दया-प्यार करो। 230।
कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ‘जिनि तजिआ बादु बिबादु’ उस साधु-गुरमुखि की संगति उस मनुष्य को प्राप्त होती है जिसके बहुत अच्छे भाग्य हों।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हाथ-पैर का इस्तेमाल कर के सारा काम-काज कर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।