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अंग 1375

अंग
1375
राग Salok Kabeer Jee
राग: Salok Kabeer Jee · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिनु संगति इउ मांनई होइ गई भठ छार ॥195॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: बल्कि खुद भी) वह। मानो। (जलती हुई) भट्ठी की राख हो गई। यही हाल संगति के बिना मनुष्य का होता है (परम पवित्र परमात्मा की अंश जीव जनम ले के अगर कुसंग में फस गया तो सृष्टि की कोई सेवा करने की बजाय खुद भी विकारों में जल मरा)। 195।
कबीर निरमल बूंद अकास की लीनी भूमि मिलाइ ॥
अनिक सिआने पचि गए ना निरवारी जाइ ॥196॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (वर्षा के वक्त) आकाश (से बरसात) की जिस साफ बूँद को (समझदार जमींदार ने हल आदि से जोत कर) सँवारी हुई अपनी ज़मीन में (हद-बन्ना ठीक करके) मिला लिया। वह बूँद ज़मीन से हटाई नहीं जा सकती। चाहे अनेकों समझदार कोशिश करके थक-टूट जाएं । 196।
कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥
सांई मुझ सिउ लरि परिआ तुझै किनि॑ फुरमाई गाइ ॥197॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मैं काबे का हॅज करने के लिए जा रहा था। वहाँ जाते को आगे से खुदा मिल गया ! वह मेरा साई (खुदा खुश होने की बजाय कि मैंउसके घर का दीदार करने आया हूँ।बल्कि) मेरे पर गुस्से हो गया (और कहने लगा) कि मैंने तो यह हुकम नहीं दिया जो मेरे नाम पर आप गाय (आदि) की कुर्बानी दे (और। मैं आपके गुनाह बख्श दूँगा)। 197।
कबीर हज काबै होइ होइ गइआ केती बार कबीर ॥
सांई मुझ महि किआ खता मुखहु न बोलै पीर ॥198॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मैं कई बार। हे साई ! (आपके घर-) काबे के दीदार करने के लिए गया हूँ। पर। हे ख़ुदा ! आप मेरे साथ बात ही नहीं करता। मेरे में आप कौन-कौन सी गलतियां देख रहा है। (जो हॅज और कुर्बानी से भी बख्शे नहीं गए) । (भाव। हज और कुर्बानी से खुदा खुश नहीं होता)। 198।
कबीर जीअ जु मारहि जोरु करि कहते हहि जु हलालु ॥
दफतरु दई जब काढि है होइगा कउनु हवालु ॥199॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो लोग जबरदस्ती करके (गाय आदि) जीवों को मारते हैं; पर कहते हैं कि (यह ज़बह किया हुआ मास) खुदा के नाम पर कुर्बानी के काबिल हो गया है। जब सब जीवों से प्यार करने वाला खुदा (इन लोगों से- कर्मों का लेखा माँगेगा। तब इनका क्या हाल होंगे।) (भाव। कुबांनी देने से गुनाह बख्शे नहीं जाते)। 199।
कबीर जोरु कीआ सो जुलमु है लेइ जबाबु खुदाइ ॥
दफतरि लेखा नीकसै मार मुहै मुहि खाइ ॥200॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो भी मनुष्य किसी पर जबरदस्ती करता है और जुल्म करता है; (और जुल्म का) लेखा खुदा माँगता है। जिस किसी की भी लेखे की बाकी निकलती है वह बड़ी सजा भुगतता है। 200।
कबीर लेखा देना सुहेला जउ दिल सूची होइ ॥
उसु साचे दीबान महि पला न पकरै कोइ ॥201॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (वह रॅब मनुष्य से सिर्फ दिल की पाकीज़गी की कुर्बानी माँगता है) अगर मनुष्य के दिल की पवित्रता कायम हो तो अपने किए अमलों का लेखा देना आसान हो जाता है; (इस पवित्रता की बरकति से) उस सच्ची कचहरी में कोई रोक-टोक नहीं करता। 201।
कबीर धरती अरु आकास महि दुइ तूं बरी अबध ॥
खट दरसन संसे परे अरु चउरासीह सिध ॥202॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कह-) है द्वैत ! सारी सृष्टि में ही (आप बहुत बली है) आपको बहुत मुश्किल से मारा जा सकता है। (हॅज करने और कुर्बानी देने वाले मुल्ला। या ठाकुर-पूजा करने वाले ब्राहमण तो कहीं रहे) छे भेषों के त्यागी और (योग साधना में सिद्धहस्त हुए) चौरासी सिद्ध भी। हे द्वैत ! आपसे सहमे हुए हैं।
कबीर मेरा मुझ महि किछु नही जो किछु है सो तेरा ॥
तेरा तुझ कउ सउपते किआ लागै मेरा ॥203॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (इस ‘दुइ’ को मिटाने के लिए ना हॅज। कुर्बानियां। ना ठाकुर-पूजा ना ब्राहमण की सेवा। ना त्याग और ना ही योग साधना- ये कोई भी सहायता नहीं करते। सिर्फ एक ही तरीका है वह यह कि अपना आप प्रभू के हवाले किया जाए। इसी का नाम ‘दिल-साबति’ है। सो। प्रभू के दर पे अरदास कर और कह-) हे प्रभू जो कुछ मेरे पास है (यह तन मन धन)। इसमें कोई चीज़ ऐसी नहीं जिसको मैं अपनी कह सकूँ; जो कुछ मेरे पास है सब आपका ही दिया हुआ है। (यदि आपकी मेहर हैं तो) आपका बख्शा हुआ (यह तन मन धन) मैं आपकी भेट करता हूँ। इसमें मेरे पल्ले से कुछ भी खर्च नहीं होता।
कबीर तूं तूं करता तू हूआ मुझ महि रहा न हूं ॥
जब आपा पर का मिटि गइआ जत देखउ तत तू ॥204॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू के दर पर यूँ कह- हे प्रभू ! आपकी मेहर से) हर वक्त आपका सिमरन करते हुए मैं आपके में लीन हैं गया हूं। मेरे अंदर ‘मैं मैं’ का विचार रह ही नहीं गया है। (आपका सिमरन करते हुए अब) जब (मेरे अंदर से) अपने-पराए वाला भेदभाव मिट गया है (‘दुइ’ मिट गई है)। मैं जिधर देखता हूँ मुझे (हर जगह) आप ही दिख रहा है। 204।
कबीर बिकारह चितवते झूठे करते आस ॥
मनोरथु कोइ न पूरिओ चाले ऊठि निरास ॥205॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जो मनुष्य ‘दुइ’ में फसे रह के प्रभू का सिमरन नहीं करते) जो सदा बुरे काम करने की सोचे सोचते रहते हैं। जो सदा इन नाशवंत पदार्थों की ही तमन्नाएं पालते रहते हैं। वे मनुष्य दिल की आशाएं साथ ले के ही (यहाँ से) चल पड़ते हैं। उनके मन की कोई दौड़-भाग पूरी नहीं होती (भाव। किसी भी पदार्थ के मिलने से उनके मन की दौड़-भाग खत्म नहीं होतीं। आशाएं और-और बढ़ती जाती हैं)। 205।
कबीर हरि का सिमरनु जो करै सो सुखीआ संसारि ॥
इत उत कतहि न डोलई जिस राखै सिरजनहार ॥206॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो मनुष्य परमात्मा की याद हृदय में बसाता है। वह इस जगत में सुखी जीवन व्यतीत करता है; वह मनुष्य इस लोक में परलोक में कहीं भी (इन आशाओं ओर विकारों के कारण) भटकता नहीं। क्योंकि परमातमा सवयं उसको इनसे बचाता है। 206।
कबीर घाणी पीड़ते सतिगुर लीए छडाइ ॥
परा पूरबली भावनी परगटु होई आइ ॥207॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (दुनिया के जीव विकारों और दुनियावी आशाओं की) घाणी में (इस तरह) पीढ़े जा रहे हैं। (जैसे कोल्हू में तिल पीढ़े जाते हैं;) (पर जो जो ‘हरि का सिमरन करै’) उनको सतिगुरू (इस घाणी में से) बचा लेता है। (प्रभू-चरनों से उनका) प्यार जो धुर से चला आ रहा था (पर जो इन विकारों और आशाओं के तले दब गया था। वह सिमरन की बरकति और सतिगुरू की मेहर से) दोबारा हृदय में चमक उठता है। 207।
कबीर टालै टोलै दिनु गइआ बिआजु बढंतउ जाइ ॥
ना हरि भजिओ न खतु फटिओ कालु पहूंचो आइ ॥208॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जो मनुष्य गुरू की शरण नहीं आते। उनके किए विकारों और बनाई हुई आशाओं के कारण सिमरन की ओर से) आजकल उनकी उम्र का वक्त गुज़रता जाता है। (विकारों और आशाओं का) ब्याज बढ़ता जाता है। ना ही वे परमात्मा का सिमरन करते हें। ना ही उनका (विकारों और आशाओं का यह) लेखा खत्म होता है। (बस ! इन विकारों और आशाओं में फसे हुओं के सिर पर) मौत आ पहुँचती है। 208।
महला 5 ॥
कबीर कूकरु भउकना करंग पिछै उठि धाइ ॥
करमी सतिगुरु पाइआ जिनि हउ लीआ छडाइ ॥209॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: महला 5 ॥ हे कबीर ! भौंकने वाला (भाव लालच का मारा हुआ) कुक्ता सदा मुरदे की तरफ ही दौड़ता है (इसी तरह विकारों और आशाओं में फसा मनुष्य सदा विकारों और आशाओं की ओर ही दौड़ता है। तभी ये सिमरन से टाल-मटोले करता है)। मुझे परमातमा की मेहर से सतिगुरू मिल गया है। उसने मुझे (इन विकारों और आशाओं के पँजे से) छुड़ा लिया है। 209।
महला 5 ॥
कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥
धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥210॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर ! अगर विकारी मनुष्य (सौभाग्यों से) और आशाएं छोड़ के (और दरवाजे छोड़ के) सतिगुरू की संगति में आ बैठें। तो विकारियों का असर उस संगति पर नहीं पड़ता। हाँ। विकारी लोगों को अवश्य लाभ पहुँचता है। वह विकारी लोग जरूर फायदा उठाते हैं। 210।
महला 5 ॥
कबीर चावल कारने तुख कउ मुहली लाइ ॥
संगि कुसंगी बैसते तब पूछै धरम राइ ॥211॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर ! (छिल्कों से) चावल (अलग करने) की खातिर (छड़ने के वक्त) तोहों को मुसली (की चोट) लगती है। इसी तरह जो मनुष्य विकारियों की सोहबति में बैठता है (वह भी विकारों की चोट खाता है। विकार करने लग जाता है) उससे धर्मराज लेखा माँगता है। 211।
नामा माइआ मोहिआ कहै तिलोचनु मीत ॥
काहे छीपहु छाइलै राम न लावहु चीतु ॥212॥
नामा कहै तिलोचना मुख ते रामु संम॑ालि ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: त्रिलोचन कहता है- हे मित्र नामदेव ! आप तो माया में फसा हुआ लगता है। ये अंबरे क्यों ठेक रहा है। (रजाईयां चादरें धो-धो के बिछाए जा रहा है। धोबी वाले काम कर रहा है) परमात्मा के (चरनों) से चित्त क्यों नहीं जोड़ता। 212। नामदेव (आगे से) उक्तर देता है- हे त्रिलोचन ! मुँह से परमात्मा का नाम ले;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 18 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।