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1374
कबीर जी के सलोक
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- ओरा गरि पानी भइआ जाइ मिलिओ ढलि कूलि ॥177॥
- कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बांधी देह ॥
- कबीर सूरज चांद कै उदै भई सभ देह ॥
- जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥
- कबीर जिनहु किछू जानिआ नही तिन सुख नीद बिहाइ ॥
- कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥
- कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥
- कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
- सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥
- कबीर अलह की करि बंदगी जिह सिमरत दुखु जाइ ॥
- कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥
- कबीर खूबु खाना खीचरी जा महि अंम्रितु लोनु ॥
- कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥
- कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥
- कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥
- कबीर जा घर साध न सेवीअहि हरि की सेवा नाहि ॥
- कबीर गूंगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान ॥
- कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥
- कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भूमि बिकार ॥
· सलोक
ओरा गरि पानी भइआ जाइ मिलिओ ढलि कूलि ॥177॥
ओरा गरि पानी भइआ जाइ मिलिओ ढलि कूलि ॥177॥
हिन्दी अर्थ: (परमात्मा का डर मनुष्य के कठोर हुए मन के लिए। मानो, सेक का काम देता है; जैसे सेक लगने से तापमान बढ़ने से) ओला पिघल के फिर पानी बन जाता है। और बह के नदी में जा मिलता है। 177।
· सलोक
कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बांधी देह ॥
कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बांधी देह ॥
दिवस चारि को पेखना अंति खेह की खेह ॥178॥
दिवस चारि को पेखना अंति खेह की खेह ॥178॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (जैसे) मिट्टी इकट्ठी करके एक नगरी बसाई जाती है वैसे ही (पाँच तत्व इकट्ठे कर के परमात्मा ने) यह शरीर रचा है। देखने को चार दिन सुंदर लगता है। पर आखिर में जिस मिट्टी से बना है उसी मिट्टी में ही मिल जाता है। 178।
· सलोक
कबीर सूरज चांद कै उदै भई सभ देह ॥
कबीर सूरज चांद कै उदै भई सभ देह ॥
गुर गोबिंद के बिनु मिले पलटि भई सभ खेह ॥179॥
गुर गोबिंद के बिनु मिले पलटि भई सभ खेह ॥179॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (पाँच-तत्वों से यह) शरीर-रचना इस वास्ते हुई है कि इसमें सूरज और चँद्रमा का उदय हो (भाव, नर्म-दिली और शीतलता पैदा हों। पर ये गुण तभी पैदा हो सकते हैं अगर गुरू मिले ओर गुरू के द्वारा गोबिंद के चरनों में जुड़ें)। गुरू परमात्मा के मेल के बिना ये शरीर दोबारा मिट्टी का मिट्टी ही हो जाता है (भाव, यह मनुष्य-शरीर बिल्कुल व्यर्थ ही चला जाता है)। 179।
· सलोक
जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥
जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥
कहिओ कबीर बिचारि कै संत सुनहु मन माहि ॥180॥
कहिओ कबीर बिचारि कै संत सुनहु मन माहि ॥180॥
हिन्दी अर्थ: हे संत जनो! ध्यान लगा के सुनिए। मैं कबीर ये बात विचार के कह रहा हूँ: जिस हृदय में जिंदगी के सही रास्ते की समझ पैदा हो जाती है, वहाँ (जलन, संशय, कठोरता आदि) कोई खतरा नहीं रह जाता। पर जिस हृदय में अभी (शांत जीवन को भुला देने के लिए खीझ, सहम, बेरहमी आदि कोई) डर मौजूद है, वहाँ परमात्मा का निवास नहीं हुआ। 180।
· सलोक
कबीर जिनहु किछू जानिआ नही तिन सुख नीद बिहाइ ॥
कबीर जिनहु किछू जानिआ नही तिन सुख नीद बिहाइ ॥
हमहु जु बूझा बूझना पूरी परी बलाइ ॥181॥
हमहु जु बूझा बूझना पूरी परी बलाइ ॥181॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जिन लोगों ने जीवन के इस भेद को रत्ती भर भी नहीं समझा, वे जलन, संशय और कठोरता आदि में व्याकुल होते हुए भी बेपरवाही से उम्र गुजार रहे हैं। पर गुरु और परमात्मा की कृपा से मैंने यह बात समझ ली है कि 'जह अनभउ तह भै नही। जह भउ तह हरि नाहि'; मुझे यह बात किसी भी समय नहीं भूलती। 181।
· सलोक
कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥
कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥
लागी चोट मरंम की रहिओ कबीरा ठउर ॥182॥
लागी चोट मरंम की रहिओ कबीरा ठउर ॥182॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जिस मनुष्य को ('दाझन संसे' आदि की) मार पड़ती है। वह बहुत हाहाकार करता है। ज्यों-ज्यों वह पीड़ा उठती है त्यों-त्यों और दुखी होता है (पर फिर भी माया का पीछा नहीं छोड़ता)। मुझे कबीर को गुरू के शबद की चोट लगी है जिसने मेरा दिल भेद लिया है। अब मैं एक जगह पर (भाव, प्रभू-चरनों में) टिक गया हूँ। (मुझे यह दाझन संसा आदि दुखी कर ही नहीं सकते)। 182।
· सलोक
कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥
कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥
चोट सहारै सबद की तासु गुरू मै दास ॥183॥
चोट सहारै सबद की तासु गुरू मै दास ॥183॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! गुरू के शबद-रूप नेज़े की चोट है भी सुखदाई। जिस मनुष्य को ये चोट लगती है (बिरही नारी की तरह उसके अंदर) पति-प्रभू को मिलने की तीव्र इच्छा पैदा हो जाती है। जो (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू-शबद की चोट खाता रहता है। उस पूजनीय मनुष्य का मैं (हर समय) दास (बनने को तैयार) हूँ। 183।
· सलोक
कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥184॥
जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥184॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (कहें:) हे मुल्ला्! मस्जिद की मीनार पर चढ़ने का आपको खुद ही कोई लाभ नहीं हो रहा। जिस (रॅब की नमाज़) की खातिर आप बांग दे रहे हैं। उसको अपने दिल में देखें (आपके अंदर ही बसता है। यदि आपके अपने अंदर शांती नहीं। सिर्फ लोगों को ही बुला रहे हैं। तो) खुदा बहरा नहीं (वह आपके दिल की हालत भी जानता है। उसको ठगा नहीं जा सकता)। 184।
· सलोक
सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥
सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥
कबीर जा की दिल साबति नही ता कउ कहां खुदाइ ॥185॥
कबीर जा की दिल साबति नही ता कउ कहां खुदाइ ॥185॥
हिन्दी अर्थ: हे शेख! अगर आपके अपने अंदर संतोष नहीं, तो काबे का हॅज करने जाने का भी कोई लाभ नहीं है; क्योंकि। हे कबीर! जिस मनुष्य के अपने दिल में शांति नहीं आई। उसकी बाबत रॅब कहीं भी नहीं। 185।
· सलोक
कबीर अलह की करि बंदगी जिह सिमरत दुखु जाइ ॥
कबीर अलह की करि बंदगी जिह सिमरत दुखु जाइ ॥
दिल महि सांई परगटै बुझै बलंती नांइ ॥186॥
दिल महि सांई परगटै बुझै बलंती नांइ ॥186॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! रॅब की बँदगी करें। बँदगी करने से ही दिल का विकार दूर होता है। दिल में रॅब का ज़हूर होता है। और इस बँदगी की बरकति से लालच की जलती हुई आ्रग दिल में से बुझ जाती है। 186।
· सलोक
कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥
कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥
दफतरि लेखा मांगीऐ तब होइगो कउनु हवालु ॥187॥
दफतरि लेखा मांगीऐ तब होइगो कउनु हवालु ॥187॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (मुल्लां को बताएँ कि) किसी पर जबरदस्ती करना जुल्म है। (आप जानवर को पकड़ कर बिसमिल्ला कह के ज़बह करते हैं और) आप कहते हैं कि यह (ज़बह किया हुआ जानवर) रॅब के नाम पर कुर्बानी देने के लायक हो गया है (और इस कुर्बानी से खुदा आप पर खुश हो गया है); (पर, ये मास आप खुद ही खा लेते हैं। इस तरह पाप बख्शे नहीं जाते। कभी सोचिए कि) जब रॅब की दरगाह में आपके अमलों का हिसाब होगा तो आपका क्या हाल होगा। 187।
· सलोक
कबीर खूबु खाना खीचरी जा महि अंम्रितु लोनु ॥
कबीर खूबु खाना खीचरी जा महि अंम्रितु लोनु ॥
हेरा रोटी कारने गला कटावै कउनु ॥188॥
हेरा रोटी कारने गला कटावै कउनु ॥188॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (मुललां को बेशक कहें कि कुर्बानी के बहाने मास खाने से) खिचड़ी खा लेनी अच्छी है जिसमें सिर्फ स्वाद का नमक ही डाला गया है। मैं तो इस बात के लिए तैयार नहीं हूँ कि मास रोटी खाने की नीयत मेरी अपनी हो पर (कुर्बानी बहाना बना के किसी पशू को) ज़बह करता फिरूँ। 188।
· सलोक
कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥
कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥
हरख सोग दाझै नही तब हरि आपहि आपि ॥189॥
हरख सोग दाझै नही तब हरि आपहि आपि ॥189॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (जनेऊ आदि पहन के हिन्दू समझता है कि मैंने फलाणे ब्राहमण को अपना गुरू धार लिया है; पर) तभी समझिए कि गुरू मिल गया है जब (गुरू धारण करने वाले मनुष्य के दिल में से) माया का मोह दूर हो जाए। जब शरीर को जलाने वाले कलेश मिट जाएं। जब हरख-सोग कोई भी चित्त को ना जलाए। ऐसी हालत में पहुँचने पर हर जगह परमात्मा ही दिखाई देता है। 189।
· सलोक
कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥
कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥
सोई रामु सभै कहहि सोई कउतकहार ॥190॥
सोई रामु सभै कहहि सोई कउतकहार ॥190॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (जनेऊ दे के ब्राहमण राम की पूजा-पाठ का उपदेश भी करता है; पर) राम-राम कहने में भी फर्क पड़ जाता है। इसमें भी एक बात समझने वाली है। एक राम तो वह है जिसको हरेक जीव सिमरता है (ये है सर्व-व्यापी राम। इसका सिमरन करना मनुष्य-मात्र का फर्ज है)। पर यही राम नाम रासधारिए भी (रासों में स्वांग बना-बना के) लेते हैं (यह राम अवतारी राम है और राजा दशरथ का पुत्र है। यही मूर्ति-पूजा व्यर्थ है)। 190।
· सलोक
कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥
कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥
एकु अनेकहि मिलि गइआ एक समाना एक ॥191॥
एकु अनेकहि मिलि गइआ एक समाना एक ॥191॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! सदा राम का नाम जपें। पर जपने के वक्त ये बात याद रखें कि एक राम तो अनेकों जीवों में व्यापक है (इसका नाम जपना हरेक मनुष्य का धर्म है)। पर एक राम (दशरथ का पुत्र) सिर्फ एक शरीर में ही आया (अवतार बना; इसका जाप कोई गुण नहीं दे सकता)। 191।
· सलोक
कबीर जा घर साध न सेवीअहि हरि की सेवा नाहि ॥
कबीर जा घर साध न सेवीअहि हरि की सेवा नाहि ॥
ते घर मरहट सारखे भूत बसहि तिन माहि ॥192॥
ते घर मरहट सारखे भूत बसहि तिन माहि ॥192॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (ठाकुरों की पूजा के हरेक दिन-दिहार के समय ब्राहमण की सेवा, बस! यह है शिक्षा जो ब्राहमण अपने श्रद्धालुओं को दे रहा है। श्रद्धालू बेचारे भी ठाकुर-पूजा और ब्राहमण सेवा करके अपने आप को सदाचारी और उत्तम हिन्दू समझ लेते हैं; पर असल बात यह है कि) जिन घरों में नेक बंदों की सेवा नहीं होती। और परमात्मा की भगती नहीं की जाती। वह घर (भले ही कितने ही पवित्र और साफ रखे जाते हों) मसानों जैसे हैं। उन घरों में (मनुष्य नहीं) भूतने बसते हैं। 192।
· सलोक
कबीर गूंगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान ॥
कबीर गूंगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान ॥
पावहु ते पिंगुल भइआ मारिआ सतिगुर बान ॥193॥
पावहु ते पिंगुल भइआ मारिआ सतिगुर बान ॥193॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (जनेऊ पहन के ब्राहमण को गुरू धार के, ठाकुर-पूजा और हरेक दिन-त्यौहार के समय ब्राहमण की ही सेवा-पूजा करके गुरू वाला नहीं बना जा सकता; जिसको सचमुच पूरा गुरू मिलता है उसका सारा जीवन ही बदल जाता है) जिस मनुष्य के हृदय में सतिगुरू अपने शबद का तीर मारता है। वह (दुनिया के लिए) गूँगा, कमला, बहरा और लूला हो जाता है (क्योंकि वह मनुष्य मुँह से बुरे बोल नहीं बोलता। उसको किसी की मुथाजी नहीं होती। कानो से निंदा नहीं सनता। और पैरों से बुरी तरफ चल के नहीं जाता)। 193।
· सलोक
कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥
कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥
लागत ही भुइ गिरि परिआ परा करेजे छेकु ॥194॥
लागत ही भुइ गिरि परिआ परा करेजे छेकु ॥194॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जिस मनुष्य को सूरमा सतिगुरू अपने शबद का एक तीर मारता। तीर बजते ही वह मनुष्य अहंकार-हीन हो जाता है। उसका हृदय प्रभू-चरनों में परोया जाता है। 194।
· सलोक
कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भूमि बिकार ॥
कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भूमि बिकार ॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (वर्षा के समय) आकाश (से बरसात) की जो साफ बॅूँद नकारा धरती पर गिर पड़ी। (वह किसी का कुछ सँवार नहीं सकी।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1374 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।