कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (परमात्मा का डर मनुष्य के कठोर हुए मन के लिए। मानो। सेक का काम देता है; जैसे सेक लगने से तापमान बढ़ने से) ओला पिघल के फिर पानी बन जाता है। और बह के नदी में जा मिलता है। 172।
कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बांधी देह ॥ दिवस चारि को पेखना अंति खेह की खेह ॥178॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जैसे) मिट्टी इकट्ठी करके एक नगरी बसाई जाती है वैसे ही (पाँच तत्व इकट्ठे कर के परमात्मा ने) यह शरीर रचा है। देखने को चार दिन सुंदर लगता है। पर आखिर में जिस मिट्टी से बना है उसी मिट्टी में ही मिल जाता है। 178।
कबीर सूरज चांद कै उदै भई सभ देह ॥ गुर गोबिंद के बिनु मिले पलटि भई सभ खेह ॥179॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (पाँच-तत्वों से यह) शरीर-रचना इस वास्ते हुई है कि इसमें सूरज और चँद्रमा का उदय हो (भाव। नर्म-दिली और शीतलता पैदा हों। पर ये गुण तभी पैदा हो सकते हैं अगर गुरू मिले ओर गुरू के द्वारा गोबिंद के चरनों में जुड़ें)। गुरू परमात्मा के मेल के बिना ये शरीर दोबारा मिट्टी का मिट्टी ही हो जाता है (भाव। यह मनुष्य-शरीर बिल्कुल व्यर्थ ही चला जाता है)। 179।
जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥ कहिओ कबीर बिचारि कै संत सुनहु मन माहि ॥180॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! ध्यान लगा के सुनो। मैं कबीर ये बात विचार के कह रहा हूँ- जिस हृदय में जिंदगी के सही रास्ते की समझ पैदा हो जाती है। वहाँ (दाझन। संशय। कठोरता आदि) कोई खतरा नहीं रह जाता। पर। जिस हृदय में अभी (शांत जीवन को भुला देने के लिए खिझ। सहम। बेरहमी आदि कोई) डर मौजूद है। वहाँ परमात्मा का निवास नहीं हुआ। 180।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिन लोगों ने (जीवन के इस भेद को) रक्ती भर भी नहीं समझा वह (इस दाझन। संशय। पर (‘गुर गोबिंद’ की मेहर से) मैंने ये बात कठोरता आदि में बिलकते हुए भी) बेपरवाही से उम्र गुजार रहे हैं;समझ ली है कि ‘जह अनभउ तह भै नही। जह भउ तह हरि नाहि’; मुझे ये बात किसी भी वक्त नहीं बिसरती। 181।
कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥ लागी चोट मरंम की रहिओ कबीरा ठउर ॥182॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिस मनुष्य को (‘दाझन संसे’ आदि की) मार पड़ती है। वह बहुत हाहाकार करता है। ज्यों-ज्यों वह पीड़ा उठती है त्यों-त्यों और दुखी होता है (पर फिर भी माया का पीछा नहीं छोड़ता)। मुझे कबीर को गुरू के शबद की चोट लगी है जिसने मेरा दिल भेद लिया है। अब मैं एक जगह पर (भाव। प्रभू-चरनों में) टिक गया हूँ। (मुझे यह दाझन संसा आदि दुखी कर ही नहीं सकते)। 182।
कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥ चोट सहारै सबद की तासु गुरू मै दास ॥183॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! गुरू के शबद-रूप नेज़े की चोट है भी सुखदाई। जिस मनुष्य को ये चोट लगती है (बिरही नारी की तरह उसके अंदर) पति-प्रभू को मिलने की तीव्र इच्छा पैदा हो जाती है। जो (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू-शबद की चोट खाता रहता है। उस पूजनीय मनुष्य का मैं (हर समय) दास (बनने को तैयार) हूँ। 183।
कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥ जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥184॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कह-) हे मुल्ला् ! मस्जिद की मीनार पर चढ़ने का आपको खुद ही कोई लाभ नहीं हैं रहा। जिस (रॅब की नमाज़) की खातिर आप बांग दे रहा है। उसको अपने दिल में देख (आपके अंदर ही बसता है। यदि आपके अपने अंदर शांती नहीं। सिर्फ लोगों को ही बुला रहा है। तो) खुदा बहरा नहीं (वह आपके दिल की हालत भी जानता है। उसको ठगा नहीं जा सकता)। 184।
सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥ कबीर जा की दिल साबति नही ता कउ कहां खुदाइ ॥185॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे शेख ! अगर आपके अपने अंदर संतोष नहीं। तो काबे का हॅज करने जाने का भी कोई लाभ नहीं है; क्योंकि। हे कबीर ! जिस मनुष्य के अपने दिल में शांति नहीं आई। उसकी बाबत रॅब कहीं भी नहीं। 185।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! रॅब की बँदगी कर। बँदगी करने से ही दिल का विकार दूर होता है। दिल में रॅब का ज़हूर होता है। और इस बँदगी की बरकति से लालच की जलती हुई आ्रग दिल में से बुझ जाती है। 186।
कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥ दफतरि लेखा मांगीऐ तब होइगो कउनु हवालु ॥187॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (मुल्लां को बता कि) किसी पर जबरदस्ती करना जुल्म है। (आप जानवर को पकड़ कर बिसमिल्ला कह के ज़बह करता है और) आप कहता है कि यह (ज़बह किया हुआ जानवर) रॅब के नाम पर कुर्बानी देने के लायक हैं गया है (और इस कुर्बानी से खुदा आपके पर खुश हैं गया है); (पर। ये मास आप खुद ही खा लेता है। इस तरह पाप बख्शे नहीं जाते। कभी सोच कि) जब रॅब की दरगाह में आपके अमलों का हिसाब होंगे तो आपका क्या हाल होंगे। 187।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (मुललां को बेशक कह कि कुर्बानी के बहाने मास खाने से) खिचड़ी खा लेनी अच्छी है जिसमें सिर्फ स्वाद का नमक ही डाला गया है। मैं तो इस बात के लिए तैयार नहीं हूँ कि मास रोटी खाने की नीयत मेरी अपनी हो पर (कुर्बानी बहाना बना के किसी पशू को) ज़बह करता फिरूँ। 188।
कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥ हरख सोग दाझै नही तब हरि आपहि आपि ॥189॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जनेऊ आदि पहन के हिन्दू समझता है कि मैंने फलाणे ब्राहमण को अपना गुरू धार लिया है; पर) तभी समझो कि गुरू मिल गया है जब (गुरू धारण करने वाले मनुष्य के दिल में से) माया का मोह दूर हो जाए। जब शरीर को जलाने वाले कलेश मिट जाएं। जब हरख-सोग कोई भी चित्त को ना जलाए। ऐसी हालत में पहुँचने पर हर जगह परमात्मा ही दिखाई देता है। 189।
कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥ सोई रामु सभै कहहि सोई कउतकहार ॥190॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जनेऊ दे के ब्राहमण राम की पूजा-पाठ का उपदेश भी करता है; पर) राम-राम कहने में भी फर्क पड़ जाता है। इसमें भी एक बात समझने वाली है। एक राम तो वह है जिसको हरेक जीव सिमरता है (ये है सर्व-व्यापी राम। इसका सिमरन करना मनुष्य-मात्र का फर्ज है)। पर यही राम नाम रासधारिए भी (रासों में स्वांग बना-बना के) लेते हैं (यह राम अवतारी राम है और राजा दशरथ का पुत्र है। यही मूर्ति-पूजा व्यर्थ है)। 190।
कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥ एकु अनेकहि मिलि गइआ एक समाना एक ॥191॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! सदा राम का नाम जप। पर जपने के वक्त ये बात याद रखनी कि एक राम तो अनेकों जीवों में व्यापक है (इसका नाम जपना हरेक मनुष्य का धर्म है)। पर एक राम (दशरथ का पुत्र) सिर्फ एक शरीर में ही आया (अवतार बना; इसका जाप कोई गुण नहीं दे सकता)। 191।
कबीर जा घर साध न सेवीअहि हरि की सेवा नाहि ॥ ते घर मरहट सारखे भूत बसहि तिन माहि ॥192॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (ठाकुरों की पूजा के हरेक दिन-दिहार के समय ब्राहमण की सेवा- बस ! यह है शिक्षा जो ब्राहमण अपने श्रद्धालुओं को दे रहा है। श्रद्धालू बेचारे भी ठाकुर-पूजा और ब्राहमण सेवा करके अपने आप को सदाचारी और उक्तम हिन्दू समझ लेते हैं; पर असल बात यह है कि) जिन घरों में नेक बंदों की सेवा नहीं होती। और परमात्मा की भगती नहीं की जाती। वह घर (भले ही कितने ही पवित्र और साफ रखे जाते हों) मसानों जैसे हैं। उन घरों में (मनुष्य नहीं) भूतने बसते हैं। 192।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जनेऊ पहन के ब्राहमण को गुरू धार के। ठाकुर-पूजा और हरेक दिन-त्यौहार के समय ब्राहमण की ही सेवा-पूजा करके गुरू वाला नहीं बना जा सकता; जिसको सचमुच पूरा गुरू मिलता है उसका सारा जीवन ही बदल जाता है) जिस मनुष्य के हृदय में सतिगुरू अपने शबद का तीर मारता है। वह (दुनिया के लिए) गूँगा। कमला। बहरा और लूला हो जाता है (क्योंकि वह मनुष्य मुँह से बुरे बोल नहीं बोलता। उसको किसी की मुथाजी नहीं होती। कानो से निंदा नहीं सनता। और पैरों से बुरी तरफ चल के नहीं जाता)। 193।
कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥ लागत ही भुइ गिरि परिआ परा करेजे छेकु ॥194॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिस मनुष्य को सूरमा सतिगुरू अपने शबद का एक तीर मारता। तीर बजते ही वह मनुष्य अहंकार-हीन हो जाता है। उसका हृदय प्रभू-चरनों में परोया जाता है । 194।
कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भूमि बिकार ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (वर्षा के समय) आकाश (से बरसात) की जो साफ बॅूँद नकारा धरती पर गिर पड़ी। (वह किसी का कुछ सँवार नहीं सकी।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(परमात्मा का डर मनुष्य के कठोर हुए मन के लिए।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।