कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: जो स्त्री परमात्मा का भजन करने के लिए गुरमुखों का पानी भरने की सेवा करती है (वह चाहे कितनी गरीब भी हो) 159।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! हम उस रानी को बुरा क्यों कहते हैं और संत-जनों की सेवा करने वाली को आदर क्यों देते हैं। (इसका कारण ये है कि) नृप-नारी तो सदा काम-वासना की खातिर श्रंृगार करती रहती है। पर संत-जनों की दासी (संतों की संगति में रह के) परमात्मा का नाम सिमरती है। 160।
कबीर थूनी पाई थिति भई सतिगुर बंधी धीर ॥ कबीर हीरा बनजिआ मान सरोवर तीर ॥161॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिस मनुष्य को सतिगुरू के शबद का सहारा मिल जाता है जिसको गुरू (‘ऊच भवन कनकामनी’ ‘है गै बाहन’ आदि की ओर) भटकने से बच जाता है उसका मन प्रभू-चरनों में टिक जाता है। (अपना मन सतिगुरू के हवाले करके) वह मनुष्य सत्संग में परमात्मा का अमूल्य नाम खरीदता है। 161।
कबीर हरि हीरा जन जउहरी ले कै मांडै हाट ॥ जब ही पाईअहि पारखू तब हीरन की साट ॥162॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! परमात्मा का नाम। मानो। हीरा है। परमात्मा का सेवक उस हीरे का व्यापारी है; ये हीरा हासिल करके वह (अपने) हृदय को सुंदरता से सजाता है। जब (नाम हीरे की) कद्र जानने वाले (परख रखने वाले) ये सेवक (सत्संग में) मिलते हैं। तब परमात्मा के गुणों की सांझ बनाते हैं (भाव। मिल के प्रभू की) सिफत सालाह करते हैं। 162।
कबीर काम परे हरि सिमरीऐ ऐसा सिमरहु नित ॥ अमरा पुर बासा करहु हरि गइआ बहोरै बित ॥163॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! कोई गरज़ पड़ने पर जिस तरह (भाव। जिस आर्कषण और प्यार से) परमात्मा को याद किया जाता है। यदि उसी कसक-प्यार से उसको सदा ही याद करो। तो उस जगह पर टिक जाएँ जहाँ अमरत्व मिल जाता है (जहाँ आत्मिक मौत छू नहीं सकती); और। जो सुंदर गुण मायावी पदार्थों के पीछे दौड़-दौड़ के गुम हो चुके होते हैं। वह गुण प्रभू दोबारा (सिमरन करने वाले के हृदय में) पैदा कर देता है। 163।
कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु ॥ रामु जु दाता मुकति को संतु जपावै नामु ॥164॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! एक संत और एक परमात्मा- (मुक्ति और प्रभू-मिलाप की खातिर) इन दोनों की ही सेवा-पूजा करनी चाहिए। मायावी बँधनों से खलासी देने वाला परमात्मा स्वयं है। और संत-गुरमुखि उस परमात्मा के नाम-सिमरन की ओर प्रेरित करता है 164।
कबीर जिह मारगि पंडित गए पाछै परी बहीर ॥ इक अवघट घाटी राम की तिह चड़ि रहिओ कबीर ॥165॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (तीर्थ-व्रत आदि के) जिस रास्ते पर पंडित लोग चल रहे हैं (यह रास्ता चुँकि आसान है) भीड़ उनके पीछे लगी हुई है; पर परमात्मा के सिमरन का रास्ता। मानो। एक कठिन पहाड़ी रास्ता है। कबीर (इन पंडितों लोगों को छोड़ के) चढ़ाई वाला रास्ता तय कर रहा है। 165।
कबीर दुनीआ के दोखे मूआ चालत कुल की कानि ॥ तब कुलु किस का लाजसी जब ले धरहि मसानि ॥166॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मनुष्य आम तौर पर कुल-रीति के अनुसार ही चलता है। इस ख्याल से कि दुनिया क्या कहेगी (लोकाचार को छोड़ के भगती-सत्संग वाले रास्ते की ओर नहीं आता। इस तरह) आत्मिक मौत मर जाता है। (यह नहीं सोचता कि) जब मौत आ गई (तब यह कुलरीति तो खुद-ब-खुद ही छूट जानी है; सिमरन-भगती से वंचित रह के जो तकलीफ मोल ले ली। उसके कारण) किसके कुल में नामोशी आएगी। 166।
कबीर डूबहिगो रे बापुरे बहु लोगन की कानि ॥ पारोसी के जो हूआ तू अपने भी जानु ॥167॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (लोक-लाज में फस के भगती से वंचित रहने वाले व्यक्ति को कह-) हे अभागे मनुष्य ! बहुत लोक-लाज में रहने से (लोक-लाज में ही) डूब जाएगा (आत्मिक मौत मर जाएगा)। (यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) अगर मौत किसी पड़ोसी पर आ रही है। तो याद रख कि वह आपके पर भी आनी है। 167।
कबीर भली मधूकरी नाना बिधि को नाजु ॥ दावा काहू को नही बडा देसु बड राजु ॥168॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जायदादों के कब्जे करने से मँगता बन के) घर-घर से माँगी हुई रोटी खा लेनी अच्छी है जिसमें (घर-घर से माँगने के कारण) कई किस्म का अन्न होता है। (मँगता) किसी जायदाद पर मल्कियत का हक नहीं बाँधता। सारा देश उसका अपना देश है। सारा राज उसका अपना राज है। 168।
कबीर दावै दाझनु होतु है निरदावै रहै निसंक ॥ जो जनु निरदावै रहै सो गनै इंद्र सो रंक ॥169॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मल्कियतें बनाने से मनुष्य के अंदर खिझ-सड़न पैदा होती है। जो मनुष्य कोई मल्कियत नहीं बनाता उसको कोई चिंता-फिक्र नहीं रहती। जो मनुष्य जायदादों की मल्कियतें नहीं बनाता। वह इन्द्र देवते जैसे को भी कंगाल समझता है (भाव। वह किसी धनाढ आदि की खुशामद नहीं करता फिरता)। 169।
कबीर पालि समुहा सरवरु भरा पी न सकै कोई नीरु ॥ भाग बडे तै पाइओ तूं भरि भरि पीउ कबीर ॥170॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! सरोवर किनारों तक नाको-नाक (पानी से) भरा हुआ है। (पर। ‘दावै दाझनु’ के कारण यह पानी किसी को दिखाई नहीं देता। इसलिए) कोई मनुष्य यह पानी नहीं पी सकता। हे कबीर ! (आप इस ‘दाझन’ से बच गया) सौभाग्य से आपको यह पानी दिखाई दे गया है। आप अब (प्याले) भर-भर के पी (मौज से श्वास-श्वास नाम जप)। 170।
कबीर परभाते तारे खिसहि तिउ इहु खिसै सरीरु ॥ ए दुइ अखर ना खिसहि सो गहि रहिओ कबीरु ॥171॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जैसे सूर्य के तेज-प्रताप के कारण) प्रभात के वकत तारे (जो रात की ठहरी हुई शांति में चमक रहे होते हैं) मध्यम पड़ते जाते हैं; वैसे ही (दुनियावी पदार्थों के) मालकानों से पैदा हुई तपश के कारण ज्ञान-इन्द्रियों में से प्रभू के प्रति लौअ कम होती जाती है। सिर्फ एक प्रभू का नाम ही है जो मल्कियतों की तपश के असर से परे रहता है। कबीर (दुनियावी मल्कियतों की जगह) उस नाम को संभाले बैठा है। 171।
कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥ पंडित पंडित जलि मूए मूरख उबरे भागि ॥172॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! यह जगत। मानो। लकड़ी का मकान है जिसको हर तरफ से (कब्जा करने की) आग लगी हुई है; (जो मनुष्य अपनी ओर से) समझदार (बन के इस आग में ही बैठे रहते हैं वे) जल मरते हैं। (जो इन समझदार लोगों के हिसाब से) मूर्ख (हैं वे) इस आग से दूर परे भाग के (जलने से) बच जाते हैं। 172।
कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥ बावन अखर सोधि कै हरि चरनी चितु लाइ ॥173॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! विद्या के द्वारा विचारवान बन के प्रभू-चरनों में चित्त जोड़ (भाव। हे भाई ! यदि आपको विद्या हासिल करने का मौका मिला है तो उसके द्वारा दुनिया की मल्कियतों में खिझने की जगह विचारवान बन और परमात्मा का सिमरन कर)। (इस प्रभू-याद की बरकति से) दुनिया वाले संशय-दाझन दूर कर। चिंता वाले सारे लेखे ही भगती के प्रवाह में बहा दे। 173।
कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥ मलिआगरु भुयंगम बेढिओ त सीतलता न तजंत ॥174॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (हरी-चरनों में चित्त लगाने की ही यह बरकति है कि) संत अपना शांत-स्वभाव नहीं छोड़ता। भले ही उसका करोड़ों बुरे लोगों से पाला पड़ता रहे। चँदन का पौधा साँपों से घिरा रहता है। पर वह अपनी अंदरूनी ठंडक नहीं त्यागता। 174।
कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥ जिनि जुआला जगु जारिआ सु जन के उदक समानि ॥175॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जब मनुष्य परमात्मा से (सिमरन के द्वारा) जान-पहचान बना लेता है तब (दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी) उसका मन ठंडा-ठार रहता है। जिस (माया की मल्कियत की) आग ने सारा संसार जला दिया है। बँदगी करने वाले मनुष्य के लिए वह पानी (जैसी ठंडी) रहती है। 175।
कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥ कै जानै आपन धनी कै दासु दीवानी होइ ॥176॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ये बात हरेक व्यक्ति नहीं जानता कि यह (माया-रूपी आग सारे संसार को जला रही है) परमात्मा ने स्वयं बनाई है। इस भेद को प्रभू स्वयं जानता है या वह भगत जानता है जो सदा उसके चरणों में जुड़ा रहे (सो। हजूरी में रहने वाले को पता होता है कि माया की जलन से बचने के लिए माया को बनाने वाले के चरणों में जुड़े रहना ही सही तरीका है)। 176।
कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गइंी सभ भुलि ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जब मनुष्य के अंदर (यह) डर पैदा होता है (कि परमात्मा को बिसार के माया के पीछे भटकते हुए कई ठोकरें खानी पड़ती हैं) तो (इसके) मन की हालत अच्छी हो जाती है। इसको (परमात्मा की ओट के बिना और) सारी दिशाएं भूल जाती हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो स्त्री परमात्मा का भजन करने के लिए गुरमुखों का पानी भरने की सेवा करती है (वह चाहे कितनी गरीब भी हो) 159।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।