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1373
कबीर जी के सलोक
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- तासु पटंतर न पुजै हरि जन की पनिहारि ॥159॥
- कबीर न्रिप नारी किउ निंदीऐ किउ हरि चेरी कउ मानु ॥
- कबीर थूनी पाई थिति भई सतिगुर बंधी धीर ॥
- कबीर हरि हीरा जन जउहरी ले कै मांडै हाट ॥
- कबीर काम परे हरि सिमरीऐ ऐसा सिमरहु नित ॥
- कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु ॥
- कबीर जिह मारगि पंडित गए पाछै परी बहीर ॥
- कबीर दुनीआ के दोखे मूआ चालत कुल की कानि ॥
- कबीर डूबहिगो रे बापुरे बहु लोगन की कानि ॥
- कबीर भली मधूकरी नाना बिधि को नाजु ॥
- कबीर दावै दाझनु होतु है निरदावै रहै निसंक ॥
- कबीर पालि समुहा सरवरु भरा पी न सकै कोई नीरु ॥
- कबीर परभाते तारे खिसहि तिउ इहु खिसै सरीरु ॥
- कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥
- कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥
- कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥
- कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥
- कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥
- कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गइंी सभ भुलि ॥
· सलोक
तासु पटंतर न पुजै हरि जन की पनिहारि ॥159॥
तासु पटंतर न पुजै हरि जन की पनिहारि ॥159॥
हिन्दी अर्थ: जो स्त्री परमात्मा का भजन करने के लिए गुरमुखों का पानी भरने की सेवा करती है (वह चाहे कितनी गरीब भी हो) 159।
· सलोक
कबीर न्रिप नारी किउ निंदीऐ किउ हरि चेरी कउ मानु ॥
कबीर न्रिप नारी किउ निंदीऐ किउ हरि चेरी कउ मानु ॥
ओह मांग सवारै बिखै कउ ओह सिमरै हरि नामु ॥160॥
ओह मांग सवारै बिखै कउ ओह सिमरै हरि नामु ॥160॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! हम उस रानी को बुरा क्यों कहते हैं और संत-जनों की सेवा करने वाली को आदर क्यों देते हैं। (इसका कारण ये है कि) नृप-नारी तो सदा काम-वासना की खातिर श्रंृगार करती रहती है। पर संत-जनों की दासी (संतों की संगति में रह के) परमात्मा का नाम सिमरती है। 160।
· सलोक
कबीर थूनी पाई थिति भई सतिगुर बंधी धीर ॥
कबीर थूनी पाई थिति भई सतिगुर बंधी धीर ॥
कबीर हीरा बनजिआ मान सरोवर तीर ॥161॥
कबीर हीरा बनजिआ मान सरोवर तीर ॥161॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जिस मनुष्य को सतिगुरू के शबद का सहारा मिल जाता है, जिसको गुरू ('ऊच भवन कनकामनी' 'है गै बाहन' आदि की ओर) भटकने से बचा लेता है, उसका मन प्रभू-चरनों में टिक जाता है। (अपना मन सतिगुरू के हवाले करके) वह मनुष्य सत्संग में परमात्मा का अमूल्य नाम खरीदता है। 161।
· सलोक
कबीर हरि हीरा जन जउहरी ले कै मांडै हाट ॥
कबीर हरि हीरा जन जउहरी ले कै मांडै हाट ॥
जब ही पाईअहि पारखू तब हीरन की साट ॥162॥
जब ही पाईअहि पारखू तब हीरन की साट ॥162॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! परमात्मा का नाम। मानो, हीरा है। परमात्मा का सेवक उस हीरे का व्यापारी है; ये हीरा हासिल करके वह (अपने) हृदय को सुंदरता से सजाता है। जब (नाम हीरे की) कद्र जानने वाले (परख रखने वाले) ये सेवक (सत्संग में) मिलते हैं, तब परमात्मा के गुणों की सांझ बनाते हैं (भाव, मिल के प्रभू की) सिफत सालाह करते हैं। 162।
· सलोक
कबीर काम परे हरि सिमरीऐ ऐसा सिमरहु नित ॥
कबीर काम परे हरि सिमरीऐ ऐसा सिमरहु नित ॥
अमरा पुर बासा करहु हरि गइआ बहोरै बित ॥163॥
अमरा पुर बासा करहु हरि गइआ बहोरै बित ॥163॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! कोई गरज़ पड़ने पर जिस तरह (भाव, जिस आर्कषण और प्यार से) परमात्मा को याद किया जाता है। यदि उसी कसक-प्यार से उसको सदा ही याद करें, तो उस जगह पर टिक जाएँ जहाँ अमरत्व मिल जाता है (जहाँ आत्मिक मौत छू नहीं सकती); और, जो सुंदर गुण मायावी पदार्थों के पीछे दौड़-दौड़ के गुम हो चुके होते हैं। वह गुण प्रभू दोबारा (सिमरन करने वाले के हृदय में) पैदा कर देता है। 163।
· सलोक
कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु ॥
कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु ॥
रामु जु दाता मुकति को संतु जपावै नामु ॥164॥
रामु जु दाता मुकति को संतु जपावै नामु ॥164॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! एक संत और एक परमात्मा, (मुक्ति और प्रभू-मिलाप की खातिर) इन दोनों की ही सेवा-पूजा करनी चाहिए। मायावी बँधनों से खलासी देने वाला परमात्मा स्वयं है। और संत-गुरमुखि उस परमात्मा के नाम-सिमरन की ओर प्रेरित करता है 164।
· सलोक
कबीर जिह मारगि पंडित गए पाछै परी बहीर ॥
कबीर जिह मारगि पंडित गए पाछै परी बहीर ॥
इक अवघट घाटी राम की तिह चड़ि रहिओ कबीर ॥165॥
इक अवघट घाटी राम की तिह चड़ि रहिओ कबीर ॥165॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (तीर्थ-व्रत आदि के) जिस रास्ते पर पंडित लोग चल रहे हैं (यह रास्ता चुँकि आसान है) भीड़ उनके पीछे लगी हुई है; पर परमात्मा के सिमरन का रास्ता। मानो, एक कठिन पहाड़ी रास्ता है। कबीर (इन पंडितों लोगों को छोड़ के) चढ़ाई वाला रास्ता तय कर रहा है। 165।
· सलोक
कबीर दुनीआ के दोखे मूआ चालत कुल की कानि ॥
कबीर दुनीआ के दोखे मूआ चालत कुल की कानि ॥
तब कुलु किस का लाजसी जब ले धरहि मसानि ॥166॥
तब कुलु किस का लाजसी जब ले धरहि मसानि ॥166॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मनुष्य आम तौर पर कुल-रीति के अनुसार ही चलता है। इस ख्याल से कि दुनिया क्या कहेगी (लोकाचार को छोड़ के भगती-सत्संग वाले रास्ते की ओर नहीं आता। इस तरह) आत्मिक मौत मर जाता है। (यह नहीं सोचता कि) जब मौत आ गई (तब यह कुलरीति तो खुद-ब-खुद ही छूट जानी है; सिमरन-भगती से वंचित रह के जो तकलीफ मोल ले ली। उसके कारण) किसके कुल में नामोशी आएगी। 166।
· सलोक
कबीर डूबहिगो रे बापुरे बहु लोगन की कानि ॥
कबीर डूबहिगो रे बापुरे बहु लोगन की कानि ॥
पारोसी के जो हूआ तू अपने भी जानु ॥167॥
पारोसी के जो हूआ तू अपने भी जानु ॥167॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (लोक-लाज में फस के भगती से वंचित रहने वाले व्यक्ति को कहें-) हे अभागे मनुष्य! बहुत लोक-लाज में रहने से (लोक-लाज में ही) डूब जाएँगे (आत्मिक मौत मर जाएँगे)। (यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) अगर मौत किसी पड़ोसी पर आ रही है, तो याद रखें कि वह आप पर भी आनी है। 167।
· सलोक
कबीर भली मधूकरी नाना बिधि को नाजु ॥
कबीर भली मधूकरी नाना बिधि को नाजु ॥
दावा काहू को नही बडा देसु बड राजु ॥168॥
दावा काहू को नही बडा देसु बड राजु ॥168॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (जायदादों के कब्जे करने से मँगता बन के) घर-घर से माँगी हुई रोटी खा लेनी अच्छी है जिसमें (घर-घर से माँगने के कारण) कई किस्म का अन्न होता है। (मँगता) किसी जायदाद पर मल्कियत का हक नहीं बाँधता। सारा देश उसका अपना देश है। सारा राज उसका अपना राज है। 168।
· सलोक
कबीर दावै दाझनु होतु है निरदावै रहै निसंक ॥
कबीर दावै दाझनु होतु है निरदावै रहै निसंक ॥
जो जनु निरदावै रहै सो गनै इंद्र सो रंक ॥169॥
जो जनु निरदावै रहै सो गनै इंद्र सो रंक ॥169॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मल्कियतें बनाने से मनुष्य के अंदर खिझ-सड़न पैदा होती है। जो मनुष्य कोई मल्कियत नहीं बनाता उसको कोई चिंता-फिक्र नहीं रहती। जो मनुष्य जायदादों की मल्कियतें नहीं बनाता। वह इन्द्र देवते जैसे को भी कंगाल समझता है (भाव, वह किसी धनाढ आदि की खुशामद नहीं करता फिरता)। 169।
· सलोक
कबीर पालि समुहा सरवरु भरा पी न सकै कोई नीरु ॥
कबीर पालि समुहा सरवरु भरा पी न सकै कोई नीरु ॥
भाग बडे तै पाइओ तूं भरि भरि पीउ कबीर ॥170॥
भाग बडे तै पाइओ तूं भरि भरि पीउ कबीर ॥170॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! सरोवर किनारों तक नाको-नाक (पानी से) भरा हुआ है। (पर, 'दावै दाझनु' के कारण यह पानी किसी को दिखाई नहीं देता। इसलिए) कोई मनुष्य यह पानी नहीं पी सकता। हे कबीर! (आप इस 'दाझन' से बच गए) सौभाग्य से आपको यह पानी दिखाई दे गया है। आप अब (प्याले) भर-भर के पिएँ (मौज से श्वास-श्वास नाम जपें)। 170।
· सलोक
कबीर परभाते तारे खिसहि तिउ इहु खिसै सरीरु ॥
कबीर परभाते तारे खिसहि तिउ इहु खिसै सरीरु ॥
ए दुइ अखर ना खिसहि सो गहि रहिओ कबीरु ॥171॥
ए दुइ अखर ना खिसहि सो गहि रहिओ कबीरु ॥171॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (जैसे सूर्य के तेज-प्रताप के कारण) प्रभात के वकत तारे (जो रात की ठहरी हुई शांति में चमक रहे होते हैं) मध्यम पड़ते जाते हैं; वैसे ही (दुनियावी पदार्थों के) मालकानों से पैदा हुई तपश के कारण ज्ञान-इन्द्रियों में से प्रभू के प्रति लौअ कम होती जाती है। सिर्फ एक प्रभू का नाम ही है जो मल्कियतों की तपश के असर से परे रहता है। कबीर (दुनियावी मल्कियतों की जगह) उस नाम को संभाले बैठा है। 171।
· सलोक
कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥
कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥
पंडित पंडित जलि मूए मूरख उबरे भागि ॥172॥
पंडित पंडित जलि मूए मूरख उबरे भागि ॥172॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! यह जगत, मानो, लकड़ी का मकान है जिसको हर तरफ से (कब्जा करने की) आग लगी हुई है; (जो मनुष्य अपनी ओर से) समझदार (बन के इस आग में ही बैठे रहते हैं वे) जल मरते हैं। (जो इन समझदार लोगों के हिसाब से) मूर्ख (हैं वे) इस आग से दूर परे भाग के (जलने से) बच जाते हैं। 172।
· सलोक
कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥
कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥
बावन अखर सोधि कै हरि चरनी चितु लाइ ॥173॥
बावन अखर सोधि कै हरि चरनी चितु लाइ ॥173॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! विद्या के द्वारा विचारवान बन के प्रभू-चरनों में चित्त जोड़ें (भाव, हे भाई! यदि आपको विद्या हासिल करने का मौका मिला है तो उसके द्वारा दुनिया की मल्कियतों में खिझने की जगह विचारवान बनें और परमात्मा का सिमरन करें)। (इस प्रभू-याद की बरकति से) दुनिया वाले संशय-दाझन दूर करें। चिंता वाले सारे लेखे ही भगती के प्रवाह में बहा दें। 173।
· सलोक
कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥
कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥
मलिआगरु भुयंगम बेढिओ त सीतलता न तजंत ॥174॥
मलिआगरु भुयंगम बेढिओ त सीतलता न तजंत ॥174॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (हरी-चरनों में चित्त लगाने की ही यह बरकति है कि) संत अपना शांत-स्वभाव नहीं छोड़ता। भले ही उसका करोड़ों बुरे लोगों से पाला पड़ता रहे। चँदन का पौधा साँपों से घिरा रहता है। पर वह अपनी अंदरूनी ठंडक नहीं त्यागता। 174।
· सलोक
कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥
कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥
जिनि जुआला जगु जारिआ सु जन के उदक समानि ॥175॥
जिनि जुआला जगु जारिआ सु जन के उदक समानि ॥175॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जब मनुष्य परमात्मा से (सिमरन के द्वारा) जान-पहचान बना लेता है तब (दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी) उसका मन ठंडा-ठार रहता है। जिस (माया की मल्कियत की) आग ने सारा संसार जला दिया है। बँदगी करने वाले मनुष्य के लिए वह पानी (जैसी ठंडी) रहती है। 175।
· सलोक
कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥
कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥
कै जानै आपन धनी कै दासु दीवानी होइ ॥176॥
कै जानै आपन धनी कै दासु दीवानी होइ ॥176॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! ये बात हरेक व्यक्ति नहीं जानता कि यह माया-रूपी आग, जो सारे संसार को जला रही है, परमात्मा ने स्वयं बनाई है। इस भेद को प्रभू स्वयं जानता है या वह भगत जानता है जो सदा उसके चरणों में जुड़ा रहे (सो, हजूरी में रहने वाले को पता होता है कि माया की जलन से बचने के लिए माया को बनाने वाले के चरणों में जुड़े रहना ही सही तरीका है)। 176।
· सलोक
कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गइंी सभ भुलि ॥
कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गइंी सभ भुलि ॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जब मनुष्य के अंदर (यह) डर पैदा होता है (कि परमात्मा को बिसार के माया के पीछे भटकते हुए कई ठोकरें खानी पड़ती हैं) तो (इसके) मन की हालत अच्छी हो जाती है। इसको (परमात्मा की ओट के बिना और) सारी दिशाएं भूल जाती हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1373 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।