कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: ज्यों-ज्यों वे परमात्मा की भगती करते हैं। त्यों-त्यों उनके हृदय में परमात्मा का निवास होता जाता है (ऐसे मनुष्यों की अकल को कौन धिक्कार सकता है।)। 141।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो मनुष्य परिवार के दलदल में ही फसा रहता है। परमात्मा (का भजन उसके हृदय से) अलग ही रह जाता है। इस शोर-शराबे में फसे हुए के पास धर्मराज के भेजे हुए दूत आ पहुँचते हैं (‘रामु न चेतिओ। जरा पहूँचिओ आइ’)। 142।
कबीर साकत ते सूकर भला राखै आछा गाउ ॥ उहु साकतु बपुरा मरि गइआ कोइ न लैहै नाउ ॥143॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (परिवार के दलदल में पड़ के परमात्मा को बिसार देने वाले) साकत से बेहतर तो सूअर जानो (जो गाँव के आस-पास की गंदगी खा के) गाँव को साफ-सुथरा रखता है। जब वह अभागा साकत मर जाता है किसी को उसकी याद भी नहीं रह जाती (चाहे वह जीते जी कितना ही बड़ा बन-बन के बैठता हो)। 143।
कबीर कउडी कउडी जोरि कै जोरे लाख करोरि ॥ चलती बार न कछु मिलिओ लई लंगोटी तोरि ॥144॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू से टूट के सिर्फ माया जोड़ने का भी क्या लाभ।) जिस मनुष्य ने तरले कर-कर के लाखों-करोड़ों रुपए भी इकट्ठे कर लिए हों (और इस जोड़े हुए धन का इतना ख्याल रखता हैं कि वांसली में डाल के कमर से बाँधे फिरता हैं। उसको भी) मरने के वक्त कुछ प्राप्त नहीं होता। (उसके सन्बंधी) उसकी वांसली भी तोड़ के उतार लेते हैं। 144।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू का सिमरन छोड़ के सिर्फ धन कमाने के लिए लोग उम्र व्यर्थ गवाते हैं क्योंकि धन यहीं पड़ा रहता है। पर निरे भेख को ही भगती-मार्ग समझने वाले भी कुछ नहीं कमा रहे) अगर किसी मनुष्य ने तिलक चक्र लगा के और चार माला डाल के अपने आप को वैश्णव भगत कहलवा लिया। उसने भी कुछ नहीं कमाया। (इस धार्मिक भेष के कारण) बाहर से देखने पर चाहे शुद्ध सोना दिखे। पर उसके अंदर खोट ही खोट है। 145।
कबीर रोड़ा होइ रहु बाट का तजि मन का अभिमानु ॥ ऐसा कोई दासु होइ ताहि मिलै भगवानु ॥146॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (अगर ‘जा के संग ते बीछुरा। ताही के संग’ मिलने की तमन्ना है तो) अहंकार छोड़ के राह में पड़े हुए रोड़े जैसा हो जा (और हरेक राही के ठेडे सह) ! जो कोई मनुष्य ऐसा सेवक बन जाता है। उसको परमात्मा मिल जाता है। 146।
कबीर रोड़ा हूआ त किआ भइआ पंथी कउ दुखु देइ ॥ ऐसा तेरा दासु है जिउ धरनी महि खेह ॥147॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! रोड़ा बन के भी अभी पूरी कामयाबी नहीं होती। क्योंकि (रोड़ा। ठोकरें तो सहता है। पर नंगे पैरों से चलने वाले) राहियों के पैरों में चुभता भी है (तूने किसी को दुख नहीं देना)। हे प्रभू ! आपका भगत तो ऐसा (नर्म-दिल) बन जाता है जैसे राह की बारीक धूल। 147।
कबीर खेह हूई तउ किआ भइआ जउ उडि लागै अंग ॥ हरि जनु ऐसा चाहीऐ जिउ पानी सरबंग ॥148॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! धूल (खेह) (की तरह) बनने पर भी अभी कसर रह जाती है। धूल (पैरों से) उड़ के (राहियों के) अंगों पर पड़ती है। परमात्मा का भगत ऐसा चाहिए जैसे पानी हरेक शकल के बर्तन में समाया रहता है। 148।
कबीर पानी हूआ त किआ भइआ सीरा ताता होइ ॥ हरि जनु ऐसा चाहीऐ जैसा हरि ही होइ ॥149॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! पानी की तरह सबके साथ मेल रखने पर (भी) अभी संपूर्णता नसीब नहीं होती। पानी कभी ठंडा और कभी गर्म हो जाता है। भगत तो ऐसा होना चाहिए (कि दुनिया से व्यवहार करता हुआ अपने स्वभाव को इतना अडोल रखे) कि इसमें और परमात्मा में कोई फर्क नहीं रह जाए। 149।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: ऊँची महल-माढ़ियां हों। बड़ा धन-पदार्थ हो। सुंदर स्त्री हो। महल की चोटी पर झण्डा झूलता हैं (पर अगर प्रभू के नाम से शून्य हो) – इस सारे राज-भाग से बेहतर है माँग के लाई हुई भिक्षा। अगर मनुष्य संतों की संगति में रह के परमात्मा की सिफतसालाह करता हैं। 150।
कबीर पाटन ते ऊजरु भला राम भगत जिह ठाइ ॥ राम सनेही बाहरा जम पुरु मेरे भांइ ॥151॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! शहर से बेहतर वही उजड़ी हुई जगह है जहाँ प्रभू के भगत (प्रभू के गुण गाते) हों। जो जगह परमात्मा से प्यार करने वाले लोगों से सूना है। मुझे तो वह नरक लगता है। 151।
कबीर गंग जमुन के अंतरे सहज सुंन के घाट ॥ तहा कबीरै मटु कीआ खोजत मुनि जन बाट ॥152॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (ज्यों-ज्यों मैं ‘जपिआ परविदगार’। रोड़े आदि की तरह मैंने अभिमान छोड़ा और ‘जैसा हरि ही होइ’ वाली मेरी अवस्था बनी। तो) मैंने कबीर के मन ने उस पक्तन पर ठिकाना किया जहाँ सहज अवस्था मायावी पदार्थों के फुरनों से शून्य है। जहाँ। मानो। गंगा-जमुना के पानियों का मिलाप है (अलग-अलग नदियों के पानी का वेग कम हो के अब गंभीरता और शांति है)। इस अवस्था में पहुँचने का रास्ता सारे ऋषि लोग ढूँढते रहते हैं। 152।
कबीर जैसी उपजी पेड ते जउ तैसी निबहै ओड़ि ॥ हीरा किस का बापुरा पुजहि न रतन करोड़ि ॥153॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिस प्रकार की कोमलता नए उगे हुए पौधे की होती है। यदि ऐसी कोमलता (मनुष्य के हृदय में) सदा बनी रहे (‘ऊच भवन कनकामनी’ और ‘सिखरि धजा’ उस कोमलता को दूर ना कर सकें। मनुष्य ‘सहज सुंन के घाट’ पर सदा आसन लगाए रखे। तो उस मनुष्य का जीवन इतना ऊँचा हो जाता है कि) एक हीरा क्या। करोड़ों रत्न भी उसकी कीमत नहीं पा सकते। 153।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जगत में) मैंने एक आश्चर्य (मूर्खताभरा) तमाशा देखा है। हीरा दुकान-दुकान पर बिक रहा है। चुँकि किसी को इसकी कद्र-पहचान नहीं। ये कौड़ियों के भाव जा रहा है (व्यर्थ जा रहा है)। 154।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जनम-मनोरथ के पूरा करने की फर्ज-अदायगी सिर्फ वहीं हो सकती है जहाँ ये समझ हो कि हीरा-जनम किसलिए मिला है। पर जिस मनुष्य के अंदर झूठ और लोभ (का जोर) हो। वहाँ (धर्म की जगह) पाप और आत्मिक मौत ही हो सकती है (वह जीवन ‘कउडी बदलै’ ही जाना हुआ)। परमात्मा का निवास सिर्फ उसी दिल में होता है जहाँ शांति है। 155।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘ऊच भवन कनकामनी’ आदि) माया त्याग दी तो भी कुछ नहीं सँवारता। अगर अहंकार नहीं त्यागा जाता। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि (त्याग के) इस मान-अहंकार में गल जाते हैं। (ये अहंकार किसी का लिहाज नहीं करता) अहंकार हरेक को खा जाता है (जो भी प्राणी अहंकार करता है उसका आत्मिक जीवन खत्म हो जाता है)। 156।
कबीर साचा सतिगुरु मै मिलिआ सबदु जु बाहिआ एकु ॥ लागत ही भुइ मिलि गइआ परिआ कलेजे छेकु ॥157॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (हीरा-जनम बचाने के लिए मुझे गृहस्त त्यागने की आवश्यक्ता नही पड़ी) मुझे पूरा गुरू मिल गया। उसने एक शबद सुनाया जो मुझे तीर की तरह लगा। मेरा हृदय गुरू-चरनों में परोया गया। और मेरा अहंकार मिट्टी में मिल गया। 157। पर।
कबीर साचा सतिगुरु किआ करै जउ सिखा महि चूक ॥ अंधे एक न लागई जिउ बांसु बजाईऐ फूक ॥158॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अगर सिखों में कमी हो। तो सतिगुरू भी कुछ सँवार नहीं सकता (इस हीरे-जनम को ‘कउडी बदलै’ जाते को बचा नहीं सकता)। जो मनुष्य अहंकार में अंधा हुआ रहे। गुरू की शिक्षा की कोई भी बात उसको असर नहीं कर सकती। जैसे फूक मारने से बाँस (बाँसुरी) बजने लग जाती है (पर फूक एक सिरे से गुजर के दूसरे सिरे से बाहर निकल जाती है। वैसे ही अहंकारी के एक कान से दूसरे कान द्वारा वह शिक्षा बिना असर किए ही निकल जाती है। हाँ। चोंच-ज्ञानी वह भले ही बन जाए।)। 158।
कबीर है गै बाहन सघन घन छत्रपती की नारि ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! उसकी बराबरी उस छत्रपति राजे की रानी भी नहीं कर सकती जिसके पास सवारी के लिए बेअंत घोड़े-हाथी हों।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ज्यों-ज्यों वे परमात्मा की भगती करते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।