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कबीर जी के सलोक
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- कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥ जैसे बचरहि कूंज मन माइआ ममता रे ॥123॥
- कबीर अंबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥
- कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥
- कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥
- कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥
- कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥
- कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥
- कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥
- कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥
- कबीरा रामु न चेतिओ जरा पहूंचिओ आइ ॥
- कबीर कारनु सो भइओ जो कीनो करतारि ॥
- कबीर फल लागे फलनि पाकनि लागे आंब ॥
- कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले मनहठि तीरथ जाहि ॥
- कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ पूजै सभु संसारु ॥
- कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥
- कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥
- कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ जैसी धोई लाख ॥
- कबीर मेरी बुधि कउ जमु न करै तिसकार ॥
- कबीरु कसतूरी भइआ भवर भए सभ दास ॥
· सलोक
कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥ जैसे बचरहि कूंज मन माइआ ममता रे ॥123॥
कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥ जैसे बचरहि कूंज मन माइआ ममता रे ॥123॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! कूँज चोगा चुगती है और अपने बच्चों को भी चेता करती है। फिर चुगती है। चोगा भी चुगती है और बच्चों को भी याद करती है। जैसे कूँज की सुरति हर वक्त अपने बच्चों में रहती है, वैसे ही, हे भाई! ('हरि का सिमरनु छाडि कै') मनुष्य का मन माया की मल्कियत की तमन्ना में टिका रहता है। 123।
· सलोक
कबीर अंबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥
कबीर अंबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥
चात्रिक जिउ तरसत रहै तिन को कउनु हवालु ॥124॥
चात्रिक जिउ तरसत रहै तिन को कउनु हवालु ॥124॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (वर्षा ऋतु में) बादल आकाश में (चारों तरफ) बिछ जाता है। बरखा कर के (छोटे बड़े सारे) सरोवर तालाब भर देता है (पर, पपीहा फिर भी बरखा की बूँद को तरसता और कूकता रहता है)। (परमात्मा सारी सृष्टी में व्यापक है। पर माया की ममता में फसे हुए जीव उसका दर्शन नहीं कर सकते) ('हरि का सिमरनु छाडि कै') वह पपीहे की तरह तरले लेते हैं। और उनका सदा बुरा हाल ही रहता है। 124।
· सलोक
कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥
कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥
जो नर बिछुरे राम सिउ ना दिन मिले न राति ॥125॥
जो नर बिछुरे राम सिउ ना दिन मिले न राति ॥125॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! चकवी जब रात को (अपने चकवे से) विछुड़ती है और सुबह होती ही दोबारा आ के मिलती है (रात का अंधेरा इनके मेल के रास्ते में रुकावट बना रहता है। वैसे ये अंधकार उनको ज्यादा से ज्यादा चार पहर ही विछोड़ सकता है। पर माया की ममता का अंधेरा ऐसा नहीं जो जल्दी खत्म हो सके। यह तो जन्म-जन्मांतरों तक खलासी नहीं करता; इस अंधेरे के कारण) जो मनुष्य प्रभू से विछुड़ते हैं। वे ना दिन में मिल सकते हैं ना रात को। 125।
· सलोक
कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥
कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥
देवल देवल धाहड़ी देसहि उगवत सूर ॥126॥
देवल देवल धाहड़ी देसहि उगवत सूर ॥126॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (कहें:) समुंद्र से विछुड़े हुए हे शंख! समुंद्र में ही टिके रहें। नहीं तो हर रोज चढ़ते सूरज के साथ हरेक मन्दिर में डरावनी आवाज मारेंगे (दहाड़ेंगे)। 126।
· सलोक
कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥
कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥
जा का बासा गोर महि सो किउ सोवै सुख ॥127॥
जा का बासा गोर महि सो किउ सोवै सुख ॥127॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (माया के मोह में) सोए हुए (मस्त हुए) क्या कर रहे हैं (क्यों व्यर्थ में उम्र गँवा रहे हैं।) प्रभू की याद में होशियार हों और (इस याद की बरकति से उन सांसारिक) सहमों और कलेशों से खलासी हासिल करें (जो प्रभू-चरनों से विछुड़ने पर आ घेरते हैं। आप समझते हैं कि मोह की नींद मीठी नींद है। पर इस मोह से पैदा हुए दुखों-कलेशों और सहमों के तले दबे रहना कब्र में पड़ने के समान है। ये दुखों-कलेशों-सहमों भरा जीवन सुखी जीवन नहीं है)। जिस मनुष्य का वास सदा (ऐसी) कब्र में रहे। वह कभी सुखी जीवन जीता हुआ नहीं कहा जा सकता। 127।
· सलोक
कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥
कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥
इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि ॥128॥
इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि ॥128॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! माया के मोह में मस्त हो के क्यों उम्र व्यर्थ गवा रहा है। इस मोह की नींद में से होशियार हो के क्यों परमात्मा का सिमरन नहीं करता। एक दिन ऐसा बे-बस हो के सोना पड़ेगा कि दोबारा उठा ही नहीं जा सकेगा (एक दिन सदा की नींद सोना पड़ेगा)। 128।
· सलोक
कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥
कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥
जा के संग ते बीछुरा ता ही के संगि लागु ॥129॥
जा के संग ते बीछुरा ता ही के संगि लागु ॥129॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! माया के मोह में मस्त हो के क्यों उम्र व्यर्थ गवा रहे हैं। होशियार हों। ममता की नींद के हुलारे से सचेत रहें। जिस प्रभू की याद से विछुड़े हुए हैं (और ये सहम और कलेश बर्दाश्त कर रहे हैं) उसी प्रभू के चरनों में जुड़े रहें। 129।
· सलोक
कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥
कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥
पेखत ही पुंनीत होइ भेटत जपीऐ नाउ ॥130॥
पेखत ही पुंनीत होइ भेटत जपीऐ नाउ ॥130॥
हिन्दी अर्थ: (पर) हे कबीर! (अगर 'जा के संग ते बीछुरा। ताही के संग लागु' वाला उद्यम करना है तो) वह रास्ता ना छोड़ें जिस पर संत गुरमुखि चलते हैं। उनके रास्ते पर चलते चलना चाहिए। संतों-गुरमुखों का दर्शन करने से मन पवित्र हो जाता है। उनके पास बैठने से परमात्मा का सिमरना शुरू हो जाता है (सिमरन का शौक पड़ जाता है)। 130।
· सलोक
कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥
कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥
बासनु कारो परसीऐ तउ कछु लागै दागु ॥131॥
बासनु कारो परसीऐ तउ कछु लागै दागु ॥131॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (अगर 'जा के संग ते बीछुरा। ताही के संग लागु' वाला उद्यम करना है तो) रॅब से टूटे हुए बंदे की सोहबति नहीं करनी चाहिए। उससे दूर ही हट जाना चाहिए। (देखें।) यदि किसी काले बर्तन को छूएं, तो थोड़ा-बहुत दाग़ लग ही जाता है। 131।
· सलोक
कबीरा रामु न चेतिओ जरा पहूंचिओ आइ ॥
कबीरा रामु न चेतिओ जरा पहूंचिओ आइ ॥
लागी मंदिर दुआर ते अब किआ काढिआ जाइ ॥132॥
लागी मंदिर दुआर ते अब किआ काढिआ जाइ ॥132॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (अगर 'जा के संग ते बीछुरा। ताही के संग लागु' वाला उद्यम करना है तो ये समय-सिर ही हो सकता है। साधारण तौर पर बुढ़ापे से पहले-पहले ही ये उद्यम करना चाहिए; पर अगर जवानी में परमात्मा का भजन ना किया (ऊपर से) बुढ़ापा आ पहुँचा। इस उम्र तक माया के मोह में फंसे रहने से बेअंत बुरे संस्कार अंदर जमा होते गए। अब ये कैसे सिमरन की तरफ पलटने देंगे।) अगर किसी घर को दरवाजे की तरफ से आग लग जाए, तो उस वक्त (घर में से) बहुत कुछ (जलने से) नहीं बचाया जा सकता (इसी तरह अगर) जवानी विकारों में गल जाए, तो बुढ़ापे में उम्र के गिनती के दिन होने के कारण जीवन बहुत सँवारा नहीं जा सकता। 132।
· सलोक
कबीर कारनु सो भइओ जो कीनो करतारि ॥
कबीर कारनु सो भइओ जो कीनो करतारि ॥
तिसु बिनु दूसरु को नही एकै सिरजनहारु ॥133॥
तिसु बिनु दूसरु को नही एकै सिरजनहारु ॥133॥
हिन्दी अर्थ: (पर) हे कबीर! (यदि सिमरन से वंचित ही जवानी गुजर गई है ओर बुढ़ापा आ जाने पर अब समझ आई है, तो भी निराश होने की आवश्यक्ता नहीं। सिमरन प्रभू की अपनी बख्शिश हैजब दे तब ही जीव सिमरन कर सकता है। जवानी हो चाहे बुढ़ापा। सिमरन करने का) सबब वही बनाता है जो करतार स्वयं बनाए; (ये दाति किसी भी जीव के हाथ में नहीं। ये सबब बनाने वाला) उस परमात्मा के बिना और कोई नहीं। सिर्फ सृष्टि का रचनहार स्वयं ही सबब बनाने-योग्य है। 133।
· सलोक
कबीर फल लागे फलनि पाकनि लागे आंब ॥
कबीर फल लागे फलनि पाकनि लागे आंब ॥
जाइ पहूचहि खसम कउ जउ बीचि न खाही कांब ॥134॥
जाइ पहूचहि खसम कउ जउ बीचि न खाही कांब ॥134॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! आम के पेड़ों को (पहले) फल लगते हैं। और (सहजे-सहजे फिर वह) पकने शुरू होते हैं; पकने से पहले अगर ये आम (अंधेरी आदि के कारण टहनी से) हिल ना जाए तो ही मालिक तक पहुँचते हैं। 134।
· सलोक
कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले मनहठि तीरथ जाहि ॥
कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले मनहठि तीरथ जाहि ॥
देखा देखी स्वांगु धरि भूले भटका खाहि ॥135॥
देखा देखी स्वांगु धरि भूले भटका खाहि ॥135॥
हिन्दी अर्थ: (ष्) हे कबीर! जो लोग ठाकुर (की मूर्ति) मूल्य में लेकर (उसकी) पूजा करते हें। और मन के हठ से तीर्थों पर जाते हैं। (दरअसल वे लोग) एक-दूसरे को (ये काम करते हुए) देख के स्वांग बनाए जाते हैं (एक-दूसरे की नकल करते हैं) (इसमें सच्चाई कोई नहीं होती। सब कुछ लोगों में भला कहलवाने के लिए ही किया जाता है। हृदय में परमात्मा के प्यार का कोई हिलोरा नहीं होता) सही राह से टूटे हुए ये लोग भटकते हैं। 135।
· सलोक
कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ पूजै सभु संसारु ॥
कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ पूजै सभु संसारु ॥
इस भरवासे जो रहे बूडे काली धार ॥136॥
इस भरवासे जो रहे बूडे काली धार ॥136॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (पंडितों के पीछे लगा हुआ ये) सारा जगत पत्थर (की मूर्ति) को परमेश्वर समझ रहा है और इसकी पूजा कर रहा है। जिन लोगों का ये ख्याल बना हुआ है कि पत्थर को पूज के वे परमात्मा की भगती कर रहे हैं। वे गहरे पानियों में डूबे हुए समझें (जहाँ उनका कोई खुरा-खोज ही नहीं मिलना)। 136।
· सलोक
कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥
कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥
पाहन बोरी पिरथमी पंडित पाड़ी बाट ॥137॥
पाहन बोरी पिरथमी पंडित पाड़ी बाट ॥137॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (इन पंडितों के) शास्त्र। जैसे कैद खाने हैं। (इन शास्त्रों में) स्याही से लिखी हुई कर्म-काण्डों की मर्यादा। जैसे, उस कैद खाने के बंद दरवाजे हैं। (इस कैद खाने में रखी हुई) पत्थर की मूर्तियों ने धरती के लोगों को (संसार-समुंद्र में) डुबो दिया है। पंडित लोग डाके मार रहे हैं (भाव, सादा-दिल लोगों को भोले-भाले लोगों को शास्त्रों की कर्म-काण्ड की मर्यादा और मूर्ति-पूजा में लगा के दक्षिणा-दान आदि के नाम पर लूट रहे हैं)। 137।
· सलोक
कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥
कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥
पाछै कछू न होइगा जउ सिर परि आवै कालु ॥138॥
पाछै कछू न होइगा जउ सिर परि आवै कालु ॥138॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (परमात्मा का सिमरन करने में कभी आलस ना करें) कल (सिमरन करूँगा। ये सलाह) करता अभी ही (सिमरन) करें (कल सिमरन शुरू करने की जगह अभी ही शुरू कर दें। नहीं तो कल-कल करते हुए) जब मौत सिर पर आ जाती है उस वक्त समय बीत जाने पर कुछ नहीं हो सकता। 138।
· सलोक
कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ जैसी धोई लाख ॥
कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ जैसी धोई लाख ॥
दीसै चंचलु बहु गुना मति हीना नापाक ॥139॥
दीसै चंचलु बहु गुना मति हीना नापाक ॥139॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मैंने एक ऐसा मनुष्य देखा (जिसने कभी परमात्मा का सिमरन नहीं था किया) वह (बाहर से देखने को) धोई हुई चमकती लाख जैसा था। प्रभू की याद से टूटा हुआ मनुष्य चाहे बहुत ही चुस्त-चालाक दिखता हैं। पर वह असल में बुद्धिहीन होता है क्योंकि प्रभू से विछुड़ के उसका जीवन गंदा होता है। 139।
· सलोक
कबीर मेरी बुधि कउ जमु न करै तिसकार ॥
कबीर मेरी बुधि कउ जमु न करै तिसकार ॥
जिनि इहु जमूआ सिरजिआ सु जपिआ परविदगार ॥140॥
जिनि इहु जमूआ सिरजिआ सु जपिआ परविदगार ॥140॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (प्रभू की याद से भूला हुआ मनुष्य बड़ा चुस्त-चालाक होता हुआ भी बुद्धि-हीन और तिरस्कारयोग्य होता है क्योंकि उसका जीवन नीच रह जाता है। पर मेरे ऊपर प्रभू की मेहर हुई है। दुनिया के लोग तो कहां रहे) मेरी बुद्धि को तो जमराज भी नहीं धिक्कार सकता। क्योंकि मैंने उस पालनहार प्रभू को सिमरा है जिसने इस बेचारे जम को पैदा किया है। 140।
· सलोक
कबीरु कसतूरी भइआ भवर भए सभ दास ॥
कबीरु कसतूरी भइआ भवर भए सभ दास ॥
हिन्दी अर्थ: (भगती करने वालों को) परमात्मा (ऐसा प्रतीत होता है जैसे) कस्तूरी है। सारे भगत उसके भौरे बन जाते हैं (जैसे भौरे फूल की सुगन्धि में मस्त हो जाते हैं और किसी गंदी बदबू वाली जगह की तरफ नहीं जाते, वैसे ही भगत परमात्मा के प्यार की सुगन्धि में लीन रहते हैं और मायावी पदार्थों की तरफ नहीं पलटते)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1371 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।