Lulla Family

अंग 1371

अंग
1371
राग Salok Kabeer Jee
राग: Salok Kabeer Jee · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥ जैसे बचरहि कूंज मन माइआ ममता रे ॥123॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! कूँज चोगा चुगती है और अपने बच्चों को भी चेता करती है। फिर चुगती है। चोगा भी चुगती है और बच्चों को भी याद करती है। जैसे कूँज की सुरति हर वक्त अपने बच्चों में रहती है। वैसे ही। हे भाई ! (‘हरि का सिमरनु छाडि कै’) मनुष्य का मन माया की मल्कियत की तमन्ना में टिका रहता है। 123।
कबीर अंबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥
चात्रिक जिउ तरसत रहै तिन को कउनु हवालु ॥124॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (वर्षा ऋतु में) बादल आकाश में (चारों तरफ) बिछ जाता है। बरखा कर के (छोटे बड़े सारे) सरोवर तालाब भर देता है (पर। पपीहा फिर भी बरखा की बूँद को तरसता और कूकता रहता है)। (परमात्मा सारी सृष्टी में व्यापक है। पर माया की ममता में फसे हुए जीव उसका दर्शन नहीं कर सकते) (‘हरि का सिमरनु छाडि कै’) वह पपीहे की तरह तरले लेते हैं। और उनका सदा बुरा हाल ही रहता है। 124।
कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥
जो नर बिछुरे राम सिउ ना दिन मिले न राति ॥125॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! चकवी जब रात को (अपने चकवे से) विछुड़ती है और सुबह होती ही दोबारा आ के मिलती है (रात का अंधेरा इनके मेल के रास्ते में रुकावट बना रहता है। वैसे ये अंधकार उनको ज्यादा से ज्यादा चार पहर ही विछोड़ सकता है। पर माया की ममता का अंधेरा ऐसा नहीं जो जल्दी खत्म हो सके। यह तो जन्म-जन्मांतरों तक खलासी नहीं करता; इस अंधेरे के कारण) जो मनुष्य प्रभू से विछुड़ते हैं। वे ना दिन में मिल सकते हैं ना रात को। 125।
कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥
देवल देवल धाहड़ी देसहि उगवत सूर ॥126॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कह-) समुंद्र से विछुड़े हुए हे शंख ! समुंद्र में ही टिका रह। नहीं तो हर रोज चढ़ते सूरज के साथ हरेक मन्दिर में डरावनी आवाज मारेगा (दहाड़ेगा)। 126।
कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥
जा का बासा गोर महि सो किउ सोवै सुख ॥127॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (माया के मोह में) सोया हुआ (मस्त हुआ) क्या कर रहा है (क्यों व्यर्थ में उम्र गवा रहा है।) प्रभू की याद में होशियार हो और (इस याद की बरकति से उन सांसारिक) सहमों और कलेशों से खलासी हासिल कर (जो प्रभू-चरनों से विछुड़ने पर आ घेरते हैं। आप समझता है कि मोह की नींद मीठी नींद है। पर इस मोह से पैदा हुए दुखों-कलेशों और सहमों के तले दबे रहना कब्र में पड़ने के समान है। ये दुखों-कलेशों-सहमों भरा जीवन सुखी जीवन नहीं है)। जिस मनुष्य का वास सदा (ऐसी) कब्र में रहे। वह कभी सुखी जीवन जीता हुआ नहीं कहा जा सकता। 128।
कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥
इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि ॥128॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! माया के मोह में मस्त हो के क्यों उम्र व्यर्थ गवा रहा है। इस मोह की नींद में से होशियार हो के क्यों परमात्मा का सिमरन नहीं करता। एक दिन ऐसा बे-बस हो के सोना पड़ेगा कि दोबारा उठा ही नहीं जा सकेगा (एक दिन सदा की नींद सोना पड़ेगा)। 128।
कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥
जा के संग ते बीछुरा ता ही के संगि लागु ॥129॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! माया के मोह में मस्त हो के क्यों उम्र व्यर्थ गवा रहा है। होशियार हो। ममता की नींद के हुलारे से सचेत रह। जिस प्रभू की याद से विछुड़ा हुआ है (और ये सहम और कलेश बर्दाश्त कर रहा है) उसी प्रभू के चरनों में जुड़ा रह। 129।
कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥
पेखत ही पुंनीत होइ भेटत जपीऐ नाउ ॥130॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: (पर) हे कबीर ! (अगर ‘जा के संग ते बीछुरा। ताही के संग लागु’ वाला उद्यम करना है तो) वह रास्ता ना छोड़ें जिस पर संत गुरमुखि चलते हैं। उनके रास्ते पर चलते चलना चाहिए। संतों-गुरमुखों का दर्शन करने से मन पवित्र हो जाता है। उनके पास बैठने से परमात्मा का सिमरना शुरू हो जाता है (सिमरन का शौक पड़ जाता है)। 130।
कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥
बासनु कारो परसीऐ तउ कछु लागै दागु ॥131॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (अगर ‘जा के संग ते बीछुरा। ताही के संग लागु’ वाला उद्यम करना है तो) रॅब से टूटे हुए बंदे की सोहबति नहीं करनी चाहिए। उससे दूर ही हट जाना चाहिए। (देख।) यदि किसी काले बर्तन को छूएं। तो थोड़ा-बहुत दाग़ लग ही जाता है। 132।
कबीरा रामु न चेतिओ जरा पहूंचिओ आइ ॥
लागी मंदिर दुआर ते अब किआ काढिआ जाइ ॥132॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (अगर ‘जा के संग ते बीछुरा। ताही के संग लागु’ वाला उद्यम करना है तो ये समय-सिर ही हो सकता है। साधारण तौर पर बुढ़ापे से पहले-पहले ही ये उद्यम करना चाहिए; पर अगर जवानी में परमात्मा का भजन ना किया (ऊपर से) बुढ़ापा आ पहुँचा। इस उम्र तक माया के मोह में फंसे रहने से बेअंत बुरे संस्कार अंदर जमा होते गए। अब ये कैसे सिमरन की तरफ पलटने देंगे।) अगर किसी घर को दरवाजे की तरफ से आग लग जाए। तो उस वक्त (घर में से) बहुत कुछ (जलने से) नहीं बचाया जा सकता (इसी तरह अगर) जवानी विकारों में गल जाए। तो बुढ़ापे में उम्र के गिनती के दिन होने के कारण जीवन बहुत सँवारा नहीं जा सकता। 132।
कबीर कारनु सो भइओ जो कीनो करतारि ॥
तिसु बिनु दूसरु को नही एकै सिरजनहारु ॥133॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: (पर) हे कबीर ! (यदि सिमरन से वंचित ही जवानी गुजर गई है ओर बुढ़ापा आ जाने पर अब समझ आई है। तो भी निराश होने की आवश्यक्ता नहीं। सिमरन प्रभू की अपनी बख्शिश हैजब दे तब ही जीव सिमरन कर सकता है। जवानी हो चाहे बुढ़ापा। सिमरन करने का) सबब वही बनाता है जो करतार स्वयं बनाए; (ये दाति किसी भी जीव के हाथ में नहीं। ये सबब बनाने वाला) उस परमात्मा के बिना और कोई नहीं। सिर्फ सृष्टि का रचनहार स्वयं ही सबब बनाने-योग्य है। 133।
कबीर फल लागे फलनि पाकनि लागे आंब ॥
जाइ पहूचहि खसम कउ जउ बीचि न खाही कांब ॥134॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! आम के पेड़ों को (पहले) फल लगते हैं। और (सहजे-सहजे फिर वह) पकने शुरू होते हैं; पकने से पहले अगर ये आम (अंधेरी आदि के कारण टहनी से) हिल ना जाए तो ही मालिक तक पहुँचते हैं। 134।
कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले मनहठि तीरथ जाहि ॥
देखा देखी स्वांगु धरि भूले भटका खाहि ॥135॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: (ष्) हे कबीर ! जो लोग ठाकुर (की मूर्ति) मूल्य में लेकर (उसकी) पूजा करते हें। और मन के हठ से तीर्थों पर जाते हैं। (दरअसल वे लोग) एक-दूसरे को (ये काम करते हुए) देख के स्वांग बनाए जाते हैं (एक-दूसरे की नकल करते हैं) (इसमें सच्चाई कोई नहीं होती। सब कुछ लोगों में भला कहलवाने के लिए ही किया जाता है। हृदय में परमात्मा के प्यार का कोई हिलोरा नहीं होता) सही राह से टूटे हुए ये लोग भटकते हैं। 135।
कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ पूजै सभु संसारु ॥
इस भरवासे जो रहे बूडे काली धार ॥136॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (पंडितों के पीछे लगा हुआ ये) सारा जगत पत्थर (की मूर्ति) को परमेश्वर समझ रहा है और इसकी पूजा कर रहा है। जिन लोगों का ये ख्याल बना हुआ है कि पत्थर को पूज के वे परमात्मा की भगती कर रहे हैं। वे गहरे पानियों में डूबे हुए समझो (जहाँ उनका कोई खुरा-खोज ही नहीं मिलना)। 136।
कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥
पाहन बोरी पिरथमी पंडित पाड़ी बाट ॥137॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (इन पंडितों के) शास्त्र। जैसे कैद खाने हैं। (इन शास्त्रों में) स्याही से लिखी हुई कर्म-काण्डों की मर्यादा। जैसे। उस कैद खाने के बंद दरवाजे हैं। (इस कैद खाने में रखी हुई) पत्थर की मूर्तियों ने धरती के लोगों को (संसार-समुंद्र में) डुबो दिया है। पंडित लोग डाके मार रहे हैं (भाव। सादा-दिल लोगों को भोले-भाले लोगों को शास्त्रों की कर्म-काण्ड की मर्यादा और मूर्ति-पूजा में लगा के दक्षिणा-दान आदि के नाम पर लूट रहे हैं)। 137।
कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥
पाछै कछू न होइगा जउ सिर परि आवै कालु ॥138॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (परमात्मा का सिमरन करने में कभी आलस ना कर) कल (सिमरन करूँगा। ये सलाह) करता अभी ही (सिमरन) कर (कल सिमरन शुरू करने की जगह अभी ही शुरू कर दे। नहीं तो कल-कल करते हुए) जब मौत सिर पर आ जाती है उस वक्त समय बीत जाने पर कुछ नहीं हो सकता। 138।
कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ जैसी धोई लाख ॥
दीसै चंचलु बहु गुना मति हीना नापाक ॥139॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मैंने एक ऐसा मनुष्य देखा (जिसने कभी परमात्मा का सिमरन नहीं था किया) वह (बाहर से देखने को) धोई हुई चमकती लाख जैसा था। प्रभू की याद से टूटा हुआ मनुष्य चाहे बहुत ही चुस्त-चालाक दिखता हैं। पर वह असल में बुद्धिहीन होता है क्योंकि प्रभू से विछुड़ के उसका जीवन गंदा होता है। 139।
कबीर मेरी बुधि कउ जमु न करै तिसकार ॥
जिनि इहु जमूआ सिरजिआ सु जपिआ परविदगार ॥140॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू की याद से भूला हुआ मनुष्य बड़ा चुस्त-चालाक होता हुआ भी बुद्धि-हीन और तिरस्कारयोग्य होता है क्योंकि उसका जीवन नीच रह जाता है। पर मेरे ऊपर प्रभू की मेहर हुई है। दुनिया के लोग तो कहां रहे) मेरी बुद्धि को तो जमराज भी नहीं धिक्कार सकता। क्योंकि मैंने उस पालनहार प्रभू को सिमरा है जिसने इस बेचारे जम को पैदा किया है। 140।
कबीरु कसतूरी भइआ भवर भए सभ दास ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: (भगती करने वालों को) परमात्मा (ऐसा प्रतीत होता है जैसे) कस्तूरी है। सारे भगत उसके भौरे बन जाते हैं (जैसे भौरे फूल की सुगन्धि में मस्त हो जाते हैं और किसी गंदी बदबू वाली जगह की तरफ नहीं जाते। वैसे ही भगत परमात्मा के प्यार की सुगन्धि में लीन रहते हैं और मायावी पदार्थों की तरफ नहीं पलटते)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे कबीर ! कूँज चोगा चुगती है और अपने बच्चों को भी चेता करती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।