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अंग 1370 · कबीर जी के सलोक

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अंग
1370
कबीर जी के सलोक
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  1. आप डुबे चहु बेद महि चेले दीए बहाइ ॥104॥
  2. कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥
  3. कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुटंबु ॥
  4. कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥
  5. कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥
  6. कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥
  7. कबीर सोुई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥
  8. कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥
  9. कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥
  10. कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढाइ ॥
  11. मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥
  12. बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥
  13. कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥
  14. कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥
  15. कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥
  16. कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥
  17. कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥
  18. कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥
  19. कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥

भगत कबीर जी · सलोक

आप डुबे चहु बेद महि चेले दीए बहाइ ॥104॥

अंग 1369 से चला आ रहा अंश

आप डुबे चहु बेद महि चेले दीए बहाइ ॥104॥

हिन्दी अर्थ: ये लोग खुद भी चारों वेदों (के कर्म-काण्ड) में पड़ कर (देह-अध्यास के गहरे पानियों में) डूबे हुए हैं। जो-जो लोग इनके पीछे लगते हैं उनको भी इन्होंने उसी मोह में बहा डाला है। 104।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥

कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥
परगट भए निदान सभ जब पूछे धरम राइ ॥105॥

हिन्दी अर्थ: (परमात्मा की याद भुलाने पर मनुष्य शारीरिक मोह के बहाव में पड़ कर विकारों के राह पर पड़ जाता है; तिलक, माला, पूजा। धोती आदि धार्मिक भेष से लोग शायद पतीज जाएं कि ये भगत हैं; पर प्रभू के नाम से टूट के) हे कबीर! जो-जो पाप किए जाते हैं (भले ही वे पाप) अपने अंदर छुपा के रखे जाते हैं। फिर भी जब धर्मराज पूछता है वे पाप सारे उघड़ आते हैं (भाव, वेद आदि का कर्म-काण्ड विकारों से नहीं बचा सकता। बाहरी धर्म-भेष दिखावे से लोग तो भले ही पतीज जाएं। पर अंदरूनी पाप परमात्मा से छुपे नहीं रह सकते)। 105।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुटंबु ॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुटंबु ॥
धंधा करता रहि गइआ भाई रहिआ न बंधु ॥106॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! परमात्मा का सिमरन छोड़ने का नतीजा ये हैं कि मनुष्य सारी उम्र सिर्फ परिवार ही पालता रहता है। (परिवार की खातिर) जगत के धंधे करता (और, जिंद के साथी परमात्मा से विछुड़ा हुआ रह के) आखिर आत्मिक मौत मर जाता है (इस आत्मिक मौत से) कोई रिश्तेदार बचाने के काबिल नहीं होता। 106।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥
सरपनि होइ कै अउतरै जाए अपुने खाइ ॥107॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! परमात्मा के सिमरन से वंचित रहके ही (कोई औतरी जाहिल औरत) रात को मसाण जगाने के लिए (मसाण-भुमि में) जाती है। (पर बुरे काम से सुख कहाँ। ऐसी औरत मनुष्य-जन्म हाथ से गवाने के बाद) सँपनी बन के पैदा होती है। और अपने ही बच्चे खाती है। 107।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥
गदही होइ कै अउतरै भारु सहै मन चारि ॥108॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! ('रामु न छोडीअै। तनु धनु जाइ त जाउ' नहीं तो) राम-नाम छोड़ने का ही ये नतीजा है कि (मूर्ख) स्त्री सीतला के व्रत रखती फिरती है। (और अगर सीतला उससे बड़ा प्यार करेगी तो उसको हर वक्त अपने साथ रखने के लिए अपनी सवारी गधी बना लेगी) सो। वह मूर्ख स्त्री गदही की जून पड़ती है और (अन्य गधे-गधियों की तरह) चार मन वज़न ढोती है। 108।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥

कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥
सूरी ऊपरि खेलना गिरै त ठाहर नाहि ॥109॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (दुनिया के सहम। वहम-भरम से बचने के लिए) सबसे बड़ी समझदारी यही है कि परमात्मा का नाम हृदय में याद करें। (पर) ये सिमरन करना कोई आसान काम नहीं है; (जाति-अभिमान, निंदा, कुसंग, चस्के, व्रत आदि भरम छोड़ने पड़ते हैं; सो) प्रभू का सिमरन सूली पर चढ़ने के समान है। इस सूली से गिरने पर भी (भाव, सिमरन का इस अत्यंत-मुश्किल काम को छोड़ने पर भी) बात नहीं बनती। क्योंकि सिमरन के बिना (दुनिया के दुख-कलेशों और सहमों से बचने के लिए) और कोई आसरा भी नहीं। 109।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर सोुई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥

कबीर सोुई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥
देही किस की बापुरी पवित्रु होइगो ग्रामु ॥110॥

हिन्दी अर्थ: (इसलिए) हे कबीर! वही मुँह भाग्यशाली है जिस मुँह से राम का नाम उचारा जाता है। उस शरीर बेचारे की क्या बात है। (उस शरीर का पवित्र होना तो एक छोटी सी बात है। सिर्फ वह शरीर तो कहाँ रहा।) वह सारा गाँव ही पवित्र हो जाता है। जहाँ पर रहता हुआ मनुष्य नाम सिमरता है। 110।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥

कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥
जिह कुल दासु न ऊपजै सो कुल ढाकु पलासु ॥111॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जिस कुल में परमात्मा का सिमरन करने वाला भगत प्रकट हो जाए। वही कुल सुलक्ष्णी है। जिस कुल में प्रभू की भगती करने वाला बंदा नहीं प्रकट होता। वह कुल ढाक पलाह (आदि निकम्मे पेड़ों जैसी निष्फल जानें)। 111।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥

कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥
इआ सुख ते भिख्या भली जउ हरि सिमरत दिन जाहि ॥112॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! अगर सवारी करने के लिए बेअंत घोड़े-हाथी हों। अगर (महलों पर) लाखों झण्डे झूलते हों (इतना तेज-प्रताप भी हो। पर परमात्मा के नाम से टूटे रह के ये राज-भाग किसी काम के नहीं हैं)। यदि परमात्मा का सिमरन करते हुए (जिंदगी के) दिन गुज़रें तो उस (सिमरन-हीन राज-भाग के) सुख से वह टुकड़ा बेहतर है जो लोगों के दर से माँग के मँगते फकीर खाते हैं। 112।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढाइ ॥

कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढाइ ॥
कोई काहू को नही सभ देखी ठोकि बजाइ ॥113॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! कंधों पर ढोल रख के मैं (बजाता फिरा हूँ और) सारा जगत गाह मारा है (मैं पूछता फिरा कि बताएँ। भाई! इस राज-भाग, महल-माढ़ियां। साक-संबन्धी में से कोई आखिर तक साथ निभाने वाले साथी को भी किसी ने देखा है। पर किसी ने हामी नहीं भरी; सो) सारी सृष्टि मैंने अच्छी तरह परख के देख ली है कोई भी किसी का (आखिर तक साथ निभाने वाला साथी) नहीं है (असल साथी सिर्फ परमात्मा का नाम ही है। इसलिए 'रामु न छोडीअै तनु धनु जाइ त जाउ')। 113।

भगत कबीर जी · सलोक

मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥

मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥
जोति बिना जगदीस की जगतु उलंघे जाइ ॥114॥

हिन्दी अर्थ: (परमात्मा के गुण। मानो) मोती (हैं जो इन्सानी जिंदगी के सफर के) रास्ते में बिखरे हुए हैं (भाव, ये मोती लेने के लिए कोई धन-पदार्थ नहीं खर्चना पड़ता; पर यहाँ ज्ञान-हीन) अंधा मनुष्य आ पहुँचा है। परमात्मा की बख्शी हुई (ज्ञान की) जोति के बिना जगत इन मोतियों को पैरों तले लिताड़ता चला जा रहा है (मनुष्य को परमात्मा की सिफतसालाह करने की कद्र नहीं पड़ती। प्रभू स्वयं ही मेहर करे तो ये जीव गुण गा सकता है)। 114।

भगत कबीर जी · सलोक

बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥

बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥
हरि का सिमरनु छाडि कै घरि ले आया मालु ॥115॥

हिन्दी अर्थ: ('है गइ बाहन सघन घन' और 'लाख धजा' में से 'कोई काहू को नहीं' -ये बात मैंने देखी 'डिठी ठोकि बजाइ'। फिर भी) मैं कबीर का सारा ही परिवार (आँख, नाक, कान आदि बारे सारी ज्ञानेन्द्रियां का टोला विकारों में अवश्य) डूब गया जानें। अगर मेरा मूख मन ऐसी (नीची) अवस्था में आ पहुँचा है कि परमात्मा का सिमरन छोड़ के अपने अंदर माया का मोह बसा रहा है 115।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥

कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥
पाछै पाउ न दीजीऐ आगै होइ सु होइ ॥116॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! ('रामु न छोडीअै। तनु धनु जाइ त जाउ'; पर प्रभू का नाम सिर्फ उनसे ही मिलता है जिन्होंने अपने मन को साध के रखा हुआ है। जो आप 'साधू' हैं; सो। 'साधू' की संगति करनी चाहिए; पर) अगर किसी साधू गुरमुखि के दर्शन करने जाएं, तो किसी को अपने साथ नहीं ले के जाना चाहिए (किसी साथ का इन्तजार नहीं करना चाहिए। जाने के लिए कोई आसरा नहीं ढूंढना चाहिए। कि कहीं ममता में बँधा हुआ साथी टाल-मटोल ही करा दे)। किसी गुरमुखि का दीदार करने जाने पर कभी पैर पीछे ना धरें (भाव, कभी आलस ना करें); बल्कि उधर को जाते को कोई मुश्किल भी आए तो आती रहे (परवाह ना करें)। 116।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥

कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥
जैहहि आटा लोन जिउ सोन समानि सरीरु ॥117॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! माया-मोह की जिस रस्सी से जगत (का हरेक जीव) बँधा हुआ है। उस रससी से अपने आप को बँधने ना देना। ये सोने जैसा (कीमती) मनुष्य-शरीर (मिला) है। (अगर आप मोह की रस्सी में बँध के गुरमुखों की संगति से परे रह के, परमात्मा का सिमरन छोड़ बैठा, तो) सस्ते भाव में बेकार ही तबाह हो जाएगा। 117।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥

कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥
अजहू जीउ न छोडई रंकाई नैनाह ॥118॥

हिन्दी अर्थ: (ये ममता की जंजीर कोई साधारण सा बँधन नहीं होता) हे कबीर! (परमात्मा के सिमरन से टूट के माया-मोह की रस्सी में बँधे हुओं का हाल अगर आपने समझना है तो देखें कि मौत सिर पर आ पहुँचती है) जीवात्मा (शरीर में से) निकलने पर होता है। शरीर (आत्मा के विछुड़ने पर) (शिथिर और) गिरने वाला होता है। फिर भी मोह की जंजीर का बँधा हुआ जीव सैनतों के साथ ही (पिछले संबन्धियों को) समझाता है। (उस वक्त भी प्रभू याद नहीं आता)। अभी भी जीव आँखों की कंगालता नहीं छोड़ता। 118।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥

कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥
बैन उचरउ तुअ नाम जी चरन कमल रिद ठाउ ॥119॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (प्रभू-दर पर अरदास करें और कहें: हे प्रभू! आपको बिसार के जिस मोह-जंजीर से जगत बँधा हुआ है और मरने के वक्त तक भी आँखों की कंगालता नहीं छोड़ता; मेहर करें। उस जेवरी से बचने के लिए) मैं अपनी आँखों से (हर तरफ) आपका ही दीदार करता रहूँ। आपका ही नाम मैं अपने कानों से सुनता रहूँ। (जीभ से) वचनों द्वारा मैं आपका नाम ही उचारता रहूँ। और आपके सुंदर चरनों को अपने हृदय में जगह दिए रखूँ। 119।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥

कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥
चरन कमल की मउज महि रहउ अंति अरु आदि ॥120॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! अपने सतिगुरू की कृपा से मैं स्वर्ग (की लालसा) और नर्क (के डर) से बच गया हूँ। मैं तो सदा ही परमात्मा के सुंदर चरणों (की याद) के हुलारे में रहता हूं; 120।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥

कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥
कहिबे कउ सोभा नही देखा ही परवानु ॥121॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! प्रभू के सुंदर चरणों में टिके रहने के हुलारे का अंदाजा कैसे कोई बता सकता है। (जीभ से) उस मौज का बयान करना फबता ही नहीं है; वह कितना (और कैसा) हुलारा है। ये तो हुलारा ले के ही पता चलता है। 121।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥

कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥
हरि जैसा तैसा उही रहउ हरखि गुन गाइ ॥122॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! उस प्रभू के दीदार करके मैं बता भी कुछ नहीं सकता। और बताने पर किसी को तसल्ली भी नहीं हो सकती (क्योंकि जगत में कोई चीज ऐसी नहीं है जिस तरफ इशारा कर के कहा जा सके कि परमात्मा इस जैसा है)। परमात्मा अपने जैसा स्वयं ही है; (मैं तो सिर्फ यह कह सकता हूं कि) उसके गुण गा-गा के मैं मौज में टिका रहता हूँ। 122।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1370 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।