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कबीर जी के सलोक
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- कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥
- कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥
- कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥
- कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥
- कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥
- कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥
- कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठउरु ॥
- कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥
- कबीर जग महि चेतिओ जानि कै जग महि रहिओ समाइ ॥
- कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥
- कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥
- कबीर कारनु बपुरा किआ करै जउ रामु न करै सहाइ ॥
- कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥
- कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥
- कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥
- कबीर मनु मूंडिआ नही केस मुंडाए कांइ ॥
- कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥
- कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥
- कबीर माइ मूंडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥
· सलोक
कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥
कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥
जो जैसी संगति मिलै सो तैसो फलु खाइ ॥86॥
जो जैसी संगति मिलै सो तैसो फलु खाइ ॥86॥
हिन्दी अर्थ: (हे कबीर! ये जानते हुए भी कि प्रभू के सिफतसालाह विकारों को जला के प्रभू-चरनों में जोड़ती है) मनुष्य का मन पंछी बन जाता है (एक प्रभू का आसरा छोड़ के) भटक-भटक के (मायावी पदार्थों के पीछे) दसों दिशाओं में जोड़ता है (और यह कुदरति का नीयम ही है कि) जो मनुष्य जैसी संगति में बैठता है वैसा ही उसको फल मिलता है। 86।
· सलोक
कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥
कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥
सोई फिरि कै तू भइआ जा कउ कहता अउरु ॥87॥
सोई फिरि कै तू भइआ जा कउ कहता अउरु ॥87॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (प्रभू की सिफतसालाह करने से। प्रभू के गुण गाने से। गुणों का अंत नहीं पड़ सकता; पर सिफतसालाह की सहायता से) मैं (प्रभू के चरन रूप) जो जगह तलाश कर रहा था। वही जगह मुझे मिल गई है। हे कबीर! जिस (प्रभू) को आप पहले 'कोई और' कहते थे (जिसको आप पहले अपने आप से अलग समझते थे) आप (सिफतसालाह की बरकति से) बदल के उसी का ही रूप बन गए हैं। (उसी में ही लीन हो गए हैं। उसी के साथ एक-मेक हो गए हैं)। 87।
· सलोक
कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥
कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥
उह झूलै उह चीरीऐ साकत संगु न हेरि ॥88॥
उह झूलै उह चीरीऐ साकत संगु न हेरि ॥88॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (यदि आपने परमात्मा की सिफतसालाह छोड़ दी, तो सहज ही आप उनका साथ करेंगे जो प्रभू से टूटे हुए हैं; पर देखिए) ईश्वर से टूटे हुए लोगों का साथ कभी भी ना करें। केले के नजदीक बेर का पेड़ उगा हुआ हो। बेरी हवा से झूलती है। केला (बेरी के काँटों से) चीरा जाता है; वैसे ही (हे कबीर!) बुरी सोहबत में बैठने से विकारों के असर तले आपकी जीवात्मा आत्मिक मौत मर जाएगी। 88।
· सलोक
कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥
कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥
अपने भारहि ना डरै आगै अउघट घाट ॥89॥
अपने भारहि ना डरै आगै अउघट घाट ॥89॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (कुसंग के कारण) इसके सिर पर पराई (निंदा) का भार चढ़ता जाता है (भार भी चढ़ता जाता है। फिर भी मनुष्य इस निंदा के) राह पर ही चलना पसंद करता है; मनुष्य के सामने एक बहुत ही मुश्किल रास्ता है। पर और अपने (किए और बुरे कर्मों के) भार का तो इसको चेता ही नहीं आता। 89।
· सलोक
कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥
कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥
मति बसि परउ लुहार के जारै दूजी बार ॥90॥
मति बसि परउ लुहार के जारै दूजी बार ॥90॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (अगर आप ध्यान से सुन के समझें तो) जंगल की कोयला बनी हुई लकड़ी भी साफ तौर पर पुकार करती (सुनी जा सकती है) कि मैं कहीं लोहार के वश ना पड़ जाऊँ। वह तो मुझे दूसरी बार जलाएगा। 90।
· सलोक
कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥
कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥
चारि मरंतह छह मूए चारि पुरख दुइ नारि ॥91॥
चारि मरंतह छह मूए चारि पुरख दुइ नारि ॥91॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (प्रभू के गुण गाने से उसके गुणों का अंत नहीं पड़ सकता। पर इस सिफतसालाह की बरकति से 'मन' मर जाता है 'मन' विकारों से हट जाता है) इस एक मन के मरने से एक और भी मरा जाति अभिमान। और कुल दो मर गए, मन और जाति अभिमान। फिर दो और मरे-देह अध्यास और तृष्णा; कुल चार हो गए। दो और मरे, कुसंग और निंदा; और ये सारे मिल के छे हो गए। चार पुलिंग ('पुरख') और दो स्त्री-लिंग ('नारि')। 91।
· सलोक
कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठउरु ॥
कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठउरु ॥
जिनि हरि का नामु न चेतिओ कहा भुलाने अउर ॥92॥
जिनि हरि का नामु न चेतिओ कहा भुलाने अउर ॥92॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मैंने बड़ी मेहनत से सारा जगत ढूँढ के देखा है। कहीं भी ऐसी जगह नहीं मिली जहाँ मन भटकने से हट जाए। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा (उसको कहीं भी मन की शांति की जगह नहीं मिल सकी; प्रभू का नाम ही। जो सत्संग में मिलता है। भटकने से बचाता है)। (सिफतसालाह छोड़ के) क्यों और-और जगहों पर भटकते फिरते हैं। 92।
· सलोक
कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥
कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥
साकत संगु न कीजीऐ जा ते होइ बिनाहु ॥93॥
साकत संगु न कीजीऐ जा ते होइ बिनाहु ॥93॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (मन की शांति के लिए एक ही 'ठौर' है। वह है साध-संगति। सो) साध-संगति में जुड़ना चाहिए। साध-संगति वाला साथ आखिर तक निभता है; ईश्वर से टूटे हुए लोगों की संगति नहीं करनी चाहिए। इससे आत्मिक मौत (होने का डर) है। 93।
· सलोक
कबीर जग महि चेतिओ जानि कै जग महि रहिओ समाइ ॥
कबीर जग महि चेतिओ जानि कै जग महि रहिओ समाइ ॥
जिन हरि का नामु न चेतिओ बादहि जनमें आइ ॥94॥
जिन हरि का नामु न चेतिओ बादहि जनमें आइ ॥94॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (मन के लिए शांति की 'ठौर' प्रभू का नाम ही है। सो) जिन्होंने जगत में जनम ले के उस प्रभू को। ऐसे पहचान के कि वह सारे जगत में व्यापक है। सिमरा है (उनको ही जगत में जन्मा हुआ समझिए। उनका ही पैदा होना सफल है। वही हैं साध। और उनकी संगति ही साध-संगति है)। जिन्होंने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। वे व्यर्थ ही पैदा हुए। 94।
· सलोक
कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥
कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥
नरकि परहि ते मानई जो हरि नाम उदास ॥95॥
नरकि परहि ते मानई जो हरि नाम उदास ॥95॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (अगर मन के लिए शांति की 'ठौर' चाहिए तो 'साध-संगति' में जुड़ के) एक परमात्मा पर डोरी रखनी चाहिए। और आशाएं छोड़ देनी चाहिए। जो मनुष्य परमात्मा की याद से मुँह मोड़ लेते हैं वे नर्क में पड़े रहते हैं (सदा दुखी रहते हैं)। 95।
· सलोक
कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥
कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥
चाले थे हरि मिलन कउ बीचै अटकिओ चीतु ॥96॥
चाले थे हरि मिलन कउ बीचै अटकिओ चीतु ॥96॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जिन्होंने परमात्मा को मित्र नहीं बनाया (परमात्मा के साथ सांझ नहीं बनाई। और) कई चेले-चाटड़े बना लिए। (उन्होंने पहले तो भले ही) उद्यम किया था। पर उनका मन राह में ही अटक गया (चेले-चाटड़ों से सेवा-पूजा कराने में वे व्यस्त हो गए। प्रभू का सिमरन भुला बैठे ओर मन की शांति की 'ठौर' नसीब नहीं हुई)। 96।
· सलोक
कबीर कारनु बपुरा किआ करै जउ रामु न करै सहाइ ॥
कबीर कारनु बपुरा किआ करै जउ रामु न करै सहाइ ॥
जिह जिह डाली पगु धरउ सोई मुरि मुरि जाइ ॥97॥
जिह जिह डाली पगु धरउ सोई मुरि मुरि जाइ ॥97॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (ये तो ठीक है कि मन की शांति का 'ठौर' साध-संगति ही है। प्रभू के चरनों में टिके रहने के लिए 'संगति करीअै साध की' साध-संगति ही एक-मात्र वसीला है; पर) यदि परमात्मा स्वयं सहायता ना करे (अगर 'साध' के अंदर परमात्मा स्वयं ना आ बसे। अगर 'साध' खुद प्रभू-चरनों में ना जुड़ा हुआ हो) तो ये वसीला कमजोर हो जाने के कारण कोई लाभ नहीं पहुँचाता। (इन्सानी उच्च जीवन-रूप वृक्ष की चोटी पर पहुँचाने के लिए 'साध' मानो, डालियां हैं। पर भेखी और चेले-चाटड़े ही बनाने वाले 'साध' कमजोर टहनियां हैं) मैं तो (ऐसी) जिस-जिस डाली पर पैर रखता हूँ वह (वह स्वार्थ में कमजोर होने के कारण) टूटती जा रही है। 97।
· सलोक
कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥
कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥
रासि बिरानी राखते खाया घर का खेतु ॥98॥
रासि बिरानी राखते खाया घर का खेतु ॥98॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जो ('साध' सिर्फ) औरों को ही शिक्षा उपदेश देते हैं। पर उनके अपने अंदर कोई रस नहीं आता। ऐसे ('साध') औरों की राशि-पूँजी की तो रखवाली करने का यतन करते हैं। पर अपने पिछले सारे गुण समाप्त कर लेते हैं (ऐसे 'साध' भी कमजोर डालियां हैं। मानवता की चोटी पर ये भी पहुँचवा नहीं सकते)। 98।
· सलोक
कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥
कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥
होनहारु सो होइहै साकत संगि न जाउ ॥99॥
होनहारु सो होइहै साकत संगि न जाउ ॥99॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (कहें: मेरी तो ये तमन्ना है कि) मैं गुरमुखों की संगति में टिका रहूँ (चाहे मेरा कामकाज बहुत ही कम हो जाए) और मैं जौ के छिलके खा के गुजारा करूँ। (साध-संगति में समय देने के कारण गरीबी आदि) अगर कष्ट भी आए तो आए। पर, मैं रॅब से टूटे हुए लोगों की संगति में ना जाऊँ। 99।
· सलोक
कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥
कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥
साकत कारी कांबरी धोए होइ न सेतु ॥100॥
साकत कारी कांबरी धोए होइ न सेतु ॥100॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! गुरमुखों की संगति में रहने से दिन-ब-दिन परमात्मा के साथ प्यार बढ़ता ही बढ़ता है। पर रॅब से टूटा हुआ मनुष्य। जैसे, काली कंबली है जो धोने पर भी कभी सफेद नहीं होती। उसकी सोहबति में टिकने से मन की पवित्रता नहीं मिल सकती। 100।
· सलोक
कबीर मनु मूंडिआ नही केस मुंडाए कांइ ॥
कबीर मनु मूंडिआ नही केस मुंडाए कांइ ॥
जो किछु कीआ सो मन कीआ मूंडा मूंडु अजांइ ॥101॥
जो किछु कीआ सो मन कीआ मूंडा मूंडु अजांइ ॥101॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (ये जो सिर मुना के अपने आप को 'साध' समझता फिरता है। इसने) अपना मन नहीं मुनाया (मन में से विकारों की मैल दूर नहीं की) सिर के केस मुनाने से तो यह 'साधू' नहीं बन गया। जिस भी बुरे कर्म की प्रेरना करता है मन ही करता है (यदि 'साधू' बनने की खातिर ही सिर मुंडाया है तो) सिर मुनवाना बेकार है। 101।
· सलोक
कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥
कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥
चरन कमल चितु बेधिआ रामहि नामि समाउ ॥102॥
चरन कमल चितु बेधिआ रामहि नामि समाउ ॥102॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! परमात्मा का नाम कभी ना भुलाएं। (अगर नाम सिमरने से हमारा) शरीर और धन नाश होने लगे तो बेशक नाश हो जाए। पर हमारा चित्त प्रभू के सुंदर चरनों में अवश्य भेदा रहे। परमात्मा के नाम में जरूर समाया रहे। 102।
· सलोक
कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥
कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥
जंतु बिचारा किआ करै चले बजावनहार ॥103॥
जंतु बिचारा किआ करै चले बजावनहार ॥103॥
हिन्दी अर्थ: ('तनु धन' जाने पर भी यदि मेरा मन 'रामहि नामि' में समाया रहे, तो यह सौदा बड़ा सस्ता है। क्योंकि) हे कबीर! (परमात्मा के नाम से टूट के) शारीरिक मोह का जो बाजा मैं सदा बजाता रहता था (अब नाम-सिमरन की बरकति से) उसकी (मोह की) सारी तारें टूट गई हैं। (देह अध्यास का ये) बेचारा बाजा (अब) क्या कर सकता है। भाव, नाम की बरकति से शारीरिक मोह मात खा गया है। (शारीरिक मोह तो कहीं रहा) वह मन ही नहीं रहा जो शारीरिक मोह का बाजा बजा रहा था। 103।
· सलोक
कबीर माइ मूंडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥
कबीर माइ मूंडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥
हिन्दी अर्थ: (ये पंडित मुझे परमात्मा के नाम में जुड़ने से रोकता है और अपने वेद आदिक कर्म पुस्तकों के कर्म-काण्ड का ढोल बजा के मेरा गुरू-परोहित बनना चाहता है; पर) हे कबीर! मैं ऐसे गुरू की माँ का सिर मुंन दूँ। इस राह पर चलने से (शारीरिक मोह की) भटकना दूर नहीं हो सकती।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1369 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।