कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥ जो जैसी संगति मिलै सो तैसो फलु खाइ ॥86॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: (हे कबीर ! ये जानते हुए भी कि प्रभू के सिफतसालाह विकारों को जला के प्रभू-चरनों में जोड़ती है) मनुष्य का मन पंछी बन जाता है (एक प्रभू का आसरा छोड़ के) भटक-भटक के (मायावी पदार्थों के पीछे) दसों दिशाओं में जोड़ता है (और यह कुदरति का नीयम ही है कि) जो मनुष्य जैसी संगति में बैठता है वैसा ही उसको फल मिलता है। 86।
कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥ सोई फिरि कै तू भइआ जा कउ कहता अउरु ॥87॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू की सिफतसालाह करने से। प्रभू के गुण गाने से। गुणों का अंत नहीं पड़ सकता; पर सिफतसालाह की सहायता से) मैं (प्रभू के चरन रूप) जो जगह तलाश कर रहा था। वही जगह मुझे मिल गई है। हे कबीर ! जिस (प्रभू) को आप पहले ‘कोई और’ कहता था (जिसको आप पहले अपने आप से अलग समझता था) आप (सिफतसालाह की बरकति से) बदल के उसी का ही रूप बन गया है। (उसी में ही लीन हैं गया है। उसी के साथ एक-मेक हो गया है)। 87।
कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥ उह झूलै उह चीरीऐ साकत संगु न हेरि ॥88॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (यदि तूने परमात्मा की सिफतसालाह छोड़ दी। तो सहज ही आप उनका साथ करेगा जो प्रभू से टूटे हुए हैं; पर देख) ईश्वर से टूटे हुए लोगों का साथ कभी भी ना करना। केले के नजदीक बेर का पेड़ उगा हुआ हो। बेरी हवा से झूलती है। केला (बेरी के काँटों से) चीरा जाता है; वैसे ही (हे कबीर !) बुरी सोहबत में बैठने से विकारों के असर तले आपकी जीवात्मा आत्मिक मौत मर जाएगी। 88।
कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥ अपने भारहि ना डरै आगै अउघट घाट ॥89॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कुसंग के कारण) इसके सिर पर पराई (निंदा) का भार चढ़ता जाता है (भार भी चढ़ता जाता है। फिर भी मनुष्य इस निंदा के) राह पर ही चलना पसंद करता है; मनुष्य के सामने एक बहुत ही मुश्किल रास्ता है। पर और अपने (किए और बुरे कर्मों के) भार का तो इसको चेता ही नहीं आता। 89।
कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥ मति बसि परउ लुहार के जारै दूजी बार ॥90॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (अगर आप ध्यान से सुन के समझे तो) जंगल की कोयला बनी हुई लकड़ी भी साफ तौर पर पुकार करती (सुनी जा सकती है) कि मैं कहीं लोहार के वश ना पड़ जाऊँ। वह तो मुझे दूसरी बार जलाएगा। 90।
कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥ चारि मरंतह छह मूए चारि पुरख दुइ नारि ॥91॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू के गुण गाने से उसके गुणों का अंत नहीं पड़ सकता। पर इस सिफतसालाह की बरकति से ‘मन’ मर जाता है ‘मन’ विकारों से हट जाता है) इस एक मन के मरने से एक और भी मरा जाति अभिमान। और कुल दो मर गए- मन और जाति अभिमान। फिर दो और मरे-देह अध्यास और तृष्णा; कुल चार हो गए। दो और मरे- कुसंग और निंदा; और ये सारे मिल के छे हो गए। चार पुलिंग (‘पुरख’) और दो स्त्री-लिंग (‘नारि’)। 91।
कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठउरु ॥ जिनि हरि का नामु न चेतिओ कहा भुलाने अउर ॥92॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मैंने बड़ी मेहनत से सारा जगत ढूँढ के देखा है। कहीं भी ऐसी जगह नहीं मिली जहाँ मन भटकने से हट जाएं जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा (उसको कहीं भी मन की शांति की जगह नहीं मिल सकी; प्रभू का नाम ही। जो सत्संग में मिलता है। भटकने से बचाता है)। (सिफतसालाह छोड़ के) क्यों और-और जगहों पर भटकते फिरते हैं। 92।
कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥ साकत संगु न कीजीऐ जा ते होइ बिनाहु ॥93॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (मन की शांति के लिए एक ही ‘ठौर’ है। वह है साध-संगति। सो) साध-संगति में जुड़ना चाहिए। साध-संगति वाला साथ आखिर तक निभता है; ईश्वर से टूटे हुए लोगों की संगति नहीं करनी चाहिए। इससे आत्मिक मौत (होने का डर) है। 93।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (मन के लिए शांति की ‘ठौर’ प्रभू का नाम ही है। सो) जिन्होंने जगत में जनम ले के उस प्रभू को। ऐसे पहचान के कि वह सारे जगत में व्यापक है। सिमरा है (उनको ही जगत में जन्मा हुआ समझो। उनका ही पैदा होना सफल है। वही हैं साध। और उनकी संगति ही साध-संगति है)। जिन्होंने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। वे व्यर्थ ही पैदा हुए। 94।
कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥ नरकि परहि ते मानई जो हरि नाम उदास ॥95॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (अगर मन के लिए शांति की ‘ठौर’ चाहिए तो ‘साध-संगति’ में जुड़ के) एक परमात्मा पर डोरी रखनी चाहिए। और आशाएं छोड़ देनी चाहिए। जो मनुष्य परमात्मा की याद से मुँह मोड़ लेते हैं वे नर्क में पड़े रहते हैं (सदा दुखी रहते हैं)। 95।
कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥ चाले थे हरि मिलन कउ बीचै अटकिओ चीतु ॥96॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिन्होंने परमात्मा को मित्र नहीं बनाया (परमात्मा के साथ सांझ नहीं बनाई। और) कई चेले-चाटड़े बना लिए। (उन्होंने पहले तो भले ही) उद्यम किया था। पर उनका मन राह में ही अटक गया (चेले-चाटड़ों से सेवा-पूजा कराने में वे व्यस्त हो गए। प्रभू का सिमरन भुला बैठे ओर मन की शांति की ‘ठौर’ नसीब नहीं हुई)। 96।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (ये तो ठीक है कि मन की शांति का ‘ठौर’ साध-संगति ही है। प्रभू के चरनों में टिके रहने के लिए ‘संगति करीअै साध की’ साध-संगति ही एक-मात्र वसीला है; पर) यदि परमात्मा स्वयं सहायता ना करे (अगर ‘साध’ के अंदर परमात्मा स्वयं ना आ बसे। अगर ‘साध’ खुद प्रभू-चरनों में ना जुड़ा हुआ हो) तो ये वसीला कमजोर हो जाने के कारण कोई लाभ नहीं पहुँचाता। (इन्सानी उच्च जीवन-रूप वृक्ष की चोटी पर पहुँचाने के लिए ‘साध’ मानो। डालियां हैं। पर भेखी और चेले-चाटड़े ही बनाने वाले ‘साध’ कमजोर टहनियां हैं) मैं तो (ऐसी) जिस-जिस डाली पर पैर रखता हूँ वह (वह स्वार्थ में कमजोर होने के कारण) टूटती जा रही है। 97।
कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥ रासि बिरानी राखते खाया घर का खेतु ॥98॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो (‘साध’ सिर्फ) औरों को ही शिक्षा उपदेश देते हैं। पर उनके अपने अंदर कोई रस नहीं आता। ऐसे (‘साध’) औरों की राशि-पूँजी की तो रखवाली करने का यतन करते हें। पर अपने पिछले सारे गुण समाप्त कर लेते हैं (ऐसे ‘साध’ भी कमजोर डालियां हैं। मानवता की चोटी पर ये भी पहुँचवा नहीं सकते)। 98।
कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥ होनहारु सो होइहै साकत संगि न जाउ ॥99॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कह- मेरी तो ये तमन्ना है कि) मैं गुरमुखों की संगति में टिका रहूँ (चाहे मेरा कामकाज बहुत ही कम हो जाए) और मैं जौ के छिलके खा के गुजारा करूँ। (साध-संगति में समय देने के कारण गरीबी आदि) अगर कष्ट भी आए तो आए। पर। मैं रॅब से टूटे हुए लोगों की संगति में ना जाऊँ। 99।
कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥ साकत कारी कांबरी धोए होइ न सेतु ॥100॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! गुरमुखों की संगति में रहने से दिन-ब-दिन परमात्मा के साथ प्यार बढ़ता ही बढ़ता है। पर रॅब से टूटा हुआ मनुष्य। जैसे। काली कंबली है जो धोने पर भी कभी सफेद नहीं होती। उसकी सोहबति में टिकने से मन की पवित्रता नहीं मिल सकती। 100।
कबीर मनु मूंडिआ नही केस मुंडाए कांइ ॥ जो किछु कीआ सो मन कीआ मूंडा मूंडु अजांइ ॥101॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (ये जो सिर मुना के अपने आप को ‘साध’ समझता फिरता है। इसने) अपना मन नहीं मुनाया (मन में से विकारों की मैल दूर नहीं की) सिर के केस मुनाने से तो यह ‘साधू’ नहीं बन गया। जिस भी बुरे कर्म की प्रेरना करता है मन ही करता है (यदि ‘साधू’ बनने की खातिर ही सिर मुंडाया है तो) सिर मुनवाना बेकार है। 101।
कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥ चरन कमल चितु बेधिआ रामहि नामि समाउ ॥102॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! परमात्मा का नाम कभी ना भुलाएं। (अगर नाम सिमरने से हमारा) शरीर और धन नाश होने लगे तो बेशक नाश हो जाए। पर हमारा चित्त प्रभू के सुंदर चरनों में अवश्य भेदा रहे। परमात्मा के नाम में जरूर समाया रहे। 102।
कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥ जंतु बिचारा किआ करै चले बजावनहार ॥103॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (‘तनु धन’ जाने पर भी यदि मेरा मन ‘रामहि नामि’ में समाया रहे। तो यह सौदा बड़ा सस्ता है। क्योंकि) हे कबीर ! (परमात्मा के नाम से टूट के) शारीरिक मोह का जो बाजा मैं सदा बजाता रहता था (अब नाम-सिमरन की बरकति से) उसकी (मोह की) सारी तारें टूट गई हैं। (देह अध्यास का ये) बेचारा बाजा (अब) क्या कर सकता है। भाव। नाम की बरकति से शारीरिक मोह मात खा गया है। (शारीरिक मोह तो कहीं रहा) वह मन ही नहीं रहा जो शारीरिक मोह का बाजा बजा रहा था। 103।
कबीर माइ मूंडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: (ये पंडित मुझे परमात्मा के नाम में जुड़ने से रोकता है और अपने वेद आदिक कर्म पुस्तकों के कर्म-काण्ड का ढोल बजा के मेरा गुरू-परोहित बनना चाहता है; पर) हे कबीर ! मैं ऐसे गुरू की माँ का सिर मुंन दूँ। इस राह पर चलने से (शारीरिक मोह की) भटकना दूर नहीं हो सकती।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे कबीर ! ये जानते हुए भी कि प्रभू के सिफतसालाह विकारों को जला के प्रभू-चरनों में जोड़ती है) मनुष्य का मन पंछी बन जाता है (एक प्रभू का आसरा छोड़ के) भटक-भटक के (मायावी पदार्थों के।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।