कामि करोधि न मोहीऐ बिनसै लोभु सुआनु ॥ सचै मारगि चलदिआ उसतति करे जहानु ॥ अठसठि तीरथ सगल पुंन जीअ दइआ परवानु ॥ जिस नो देवै दइआ करि सोई पुरखु सुजानु ॥ जिना मिलिआ प्रभु आपणा नानक तिन कुरबानु ॥ माघि सुचे से कांढीअहि जिन पूरा गुरु मिहरवानु ॥12॥ फलगुणि अनंद उपारजना हरि सजण प्रगटे आइ ॥ संत सहाई राम के करि किरपा दीआ मिलाइ ॥ सेज सुहावी सरब सुख हुणि दुखा नाही जाइ ॥ इछ पुनी वडभागणी वरु पाइआ हरि राइ ॥ मिलि सहीआ मंगलु गावही गीत गोविंद अलाइ ॥ हरि जेहा अवरु न दिसई कोई दूजा लवै न लाइ ॥ हलतु पलतु सवारिओनु निहचल दितीअनु जाइ ॥ संसार सागर ते रखिअनु बहुड़ि न जनमै धाइ ॥ जिहवा एक अनेक गुण तरे नानक चरणी पाइ ॥ फलगुणि नित सलाहीऐ जिस नो तिलु न तमाइ ॥13॥ जिनि जिनि नामु धिआइआ तिन के काज सरे ॥ हरि गुरु पूरा आराधिआ दरगह सचि खरे ॥ सरब सुखा निधि चरण हरि भउजलु बिखमु तरे ॥ प्रेम भगति तिन पाईआ बिखिआ नाहि जरे ॥ कूड़ गए दुबिधा नसी पूरन सचि भरे ॥ पारब्रहमु प्रभु सेवदे मन अंदरि एकु धरे ॥ माह दिवस मूरत भले जिस कउ नदरि करे ॥ नानकु मंगै दरस दानु किरपा करहु हरे ॥14॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (सिमरन की बरकति से) काम-क्रोध में नहीं फसते। लोभ रूपी कुत्ता भी खत्म हो जाता है (लोभ, जिसके असर तले मनुष्य कुत्ते की तरह दर दर भटकता है)। इस सच्चे रास्ते पर चलने से जगत भी शोभा (उस्तति) करता है। अढ़सठ तीर्थों का स्नान, सारे पुंन्य कर्म, जीवों पे दया करनी जो धार्मिक कर्म माने गए हैं (ये सब कुछ सिमरन में ही आ जाता है)। परमात्मा कृपा करके जिस मनुष्य को (सिमरन की दाति) देता है, वह मनुष्य (जिंदगी के सही रास्ते की पहचान वाला) बुद्धिमान हो जाता है। हे नानक ! (कह) जिन्हें प्यारा प्रभू मिल गया है, मैं उनसे सदके जाता हूँ। माघ महीने में सिर्फ वही स्वच्छ लोग कहे जाते हैं, जिन पर पूरा सतिगुरू दयावान होता है, और जिनको सिमरन की दाति देता है। 12। (सर्दी की ऋतु की कड़ाके की सर्दी के बाद बहार फिरने पे फागुन के महीने में लोग होली के रंग तमाशों के साथ खुशियां मनाते हैं, पर) फागुन में (उन जीव सि्त्रयों के अंदर) आत्मिक आनंद पैदा होता है, जिनके हृदय में सज्जन हरी प्रत्यक्ष आ बसता है। परमात्मा के साथ मिलने में सहायता करने वाले संत जन मेहर करके उन्हें प्रभू के साथ जोड़ देते हैं। उनकी हृदय सेज सुंदर बन जाती है। उन्हें सारे ही सुख प्राप्त हो जाते हैं। फिर दुखों के लिए (उनके हृदय में) कहीं रत्ती भर जगह भी नहीं रह जाती। उन भाग्यशाली जीव सि्त्रयों की मनोकामना पूरी हो जाती है। उन्हें हरी प्रभू पति मिल जाता है। वह सत्संगी सहेलियों के साथ मिल के गोबिंद की सिफत सालाह के गीत अलाप के आत्मिक आनंद पैदा करने वाली गुरबाणी गाती हैं। परमात्मा जैसा कोई और, उसकी बराबरी कर सकने वाला कोई दूसरा उन्हें कहीं दिखता ही नहीं। उस परमात्मा ने (उन सत्संगियों का) लोक परलोक संवार दिया है, उन्हें (अपने चरणों में लिव लीनता वाली) ऐसी जगह बख्शी है, जो कभी डोलती नहीं। प्रभू ने संसार समुंद्र से उन्हें (हाथ दे के) रख लिया है, जन्मों के चक्र में दुबारा उनकी दौड़ भाग नहीं होती। हे नानक ! (कह) हमारी एक जीभ है, प्रभू के अनेकों ही गुण हैं (हम उन्हें बयान करने के लायक नहीं हैं, पर) जो जीव उसकी चरणों में पड़ते हैं (उसका आसरा ताकते हैं) वह (संसार समुंद्र से) तैर जाते है। फागुन के महीने में (होली आदि में से आनंद ढूँढने की बजाए) सदा उस परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए, जिसे (अपनी उपमा कराने का) रत्ती भर भी लालच नहीं है (इसमें हमारा ही भला है)। 13। जिस जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है, उनके सारे कारज सफल हो जाते हैं। जिन्होंने प्रभू को पूरे गुरू को आराधा है, वह सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की हजूरी में सुर्खरू रहते हैं। प्रभू के चरण ही सारे सुखों का खजाना है, (जो जीव चरणों में लगते हैं, वह) मुश्किल संसार समुंद्र से (सही सलामत) पार हो जाते हैं। उन्हें प्रभू का प्यार, प्रभू की भक्ति प्राप्त होती है। माया की तृष्णा की आग में वे नहीं जलते। उनके व्यर्थ झूठे लालच खत्म हो जाते हैं। उनके मन से भटकना दूर हो जाती है। वे मुकम्मल तौर पर सदा स्थिर हरी में टिके रहते हैं। वे अपने मन में एक परम जोति परमात्मा को बसा के सदा उसको सिमरते है। जिनपे प्रभू मेहर की नजर करता है (अपने नाम की दाति देता है) उनके वास्ते सारे महीने, सारे दिन, सारे महूरत बढ़िया हैं (संगरांद आदि की पवित्रता के भरम भुलेखे उन्हें नहीं पड़ते)। हे हरी ! मिहर कर, मैं नानक (आपके दर से आपके) दीदार की दाति माँगता हूँ। 14।
माझ महला 5 दिन रैणि ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सेवी सतिगुरु आपणा हरि सिमरी दिन सभि रैण ॥ आपु तिआगि सरणी पवां मुखि बोली मिठड़े वैण ॥ जनम जनम का विछुड़िआ हरि मेलहु सजणु सैण ॥ जो जीअ हरि ते विछुड़े से सुखि न वसनि भैण ॥ हरि पिर बिनु चैनु न पाईऐ खोजि डिठे सभि गैण ॥ आप कमाणै विछुड़ी दोसु न काहू देण ॥ करि किरपा प्रभ राखि लेहु होरु नाही करण करेण ॥ हरि तुधु विणु खाकू रूलणा कहीऐ किथै वैण ॥ नानक की बेनंतीआ हरि सुरजनु देखा नैण ॥1॥ जीअ की बिरथा सो सुणे हरि संम्रिथ पुरखु अपारु ॥ मरणि जीवणि आराधणा सभना का आधारु ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 दिन रैणि ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे बहिन ! प्रभू मेहर करे) मैं अपने गुरू की शरण पड़ूँ, और मैं अपनी जिंदगी के सारे दिन व सारी रातें परमात्मा का सिमरन करती रहूँ। स्वै भाव त्याग के (अहंकार छोड़ के) मैं गुरू की शरण पड़ूं और मुंह से (उसके आगे ये) मीठे बोल बोलूँ (कि हे सतिगुरू !) मुझे सज्जन प्रभू मिला दे। मेरा मन कई जन्मों का उससे विछुड़ा हुआ है। हे बहिन ! जो जीव परमात्मा से विछुड़े रहते हैं वे सुख से नहीं बस सकते। मैंने सारे (धरती) आकाश खोज के देख लिए हैं कि प्रभू पति के मिलाप के बिना आत्मिक सुख नहीं मिल सकता। (हे बहिन !) मैं अपने किए कर्मों के अनुसार (प्रभू पति से) विछुड़ी हुई हूँ। (इस बारे) मैं किसी और को दोष नहीं दे सकती। हे प्रभू ! मेहर कर, मेरी रक्षा कर, आपके बगैर और कोई कुछ करने कराने की स्मर्था नहीं रखता। हे हरी ! आपके मिलाप के बिना मिट्टी में मिल जाते हैं। (इस दुख की) तड़प और किसे बताएं? (हे बहिन !) नानक की ये विनती है कि मैं किसी तरह अपनी आँखों से उस उक्तम पुरुष परमात्मा के दर्शन करूँ। 1। परमात्मा सब ताकतों का मालिक है, सब में व्यापक है और बेअंत है, वही जिंद का दुख दर्द सुनता है। सारी ही उम्र उसकी आराधना करनी चाहिए, वह सब जीवों का आसरा उम्मीद है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(सिमरन की बरकति से) काम-क्रोध में नहीं फसते।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।