कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (पहले मोह में मस्त था। अब आँखें खुल गई) उस वक्त मैंने देखा (कि जिस शारीरिक मोह के बेड़े में मैं सवार हूँ) थोड़ा-बहुत पुराना होया हुआ है (विकारों से छेद-छेद होया हुआ है)। मैं छलांग लगा के (उस ममता वाले बेड़े में से) उतर गया (मैंने अपनत्व। शारीरिक मोह छोड़ दिया। पर यह सब कुछ इसी कारण था कि मैंने वह ‘दर’ नही छोड़ा जिस दर पर टिकने से ‘हटकै नाही कोइ’)। 67।
कबीर पापी भगति न भावई हरि पूजा न सुहाइ ॥ माखी चंदनु परहरै जह बिगंध तह जाइ ॥68॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (चाहे प्रभू के दर पर टिके रहने में प्रभू की सिफतसालाह करने में ये बरकति है कि संसार-समुंद्र में डूबने से बच जाया जाता है। पर) विकारी व्यक्ति को परमात्मा की भगती अच्छी नहीं लगती। परमात्मा की पूजा नहीं सोहाती (सुखद नहीं लगती)। (विकारी व्यक्ति का स्वभाव मक्खी की तरह हो जाता है) मक्खी (सुंदर खुशबू वाले) चँदन को त्याग देती है। जहाँ बदबू हो वहाँ जाती है। 68।
कबीर बैदु मूआ रोगी मूआ मूआ सभु संसारु ॥ एकु कबीरा ना मूआ जिह नाही रोवनहारु ॥69॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (मायावी भोगों की खातिर खप-खप के) सारा जगत (संसार-समुंद्र में डूब के। मायावी मोह में डूब के। आत्मिक मौत) मर रहा है। चाहे कोई रोगी है चाहे कोई हकीम है (भाव। एक तो वे लोग हैं जो अंजान और मूढ़ होने के कारण जीवन का राह जानते ही नहीं। और विकारों में फसे पड़े हैं। दूसरे वो हैं जो विद्वान पंडित हैं और मूर्ख लोगों को उपदेश करते हैं। पर हालत दोनों की ये है कि इनकी सारी दौड़-भाग मायावी भोगों के लिए ही है। इनकी ज्ञानेन्द्रियां अपने-अपने विषौ-भोगों में खप रही हैं। भोगों को रो रही हैं। एक भगती से वंचित रहने के कारण ये सब आत्मिक मौत मरे पड़े हैं)। सिर्फ वह मनुष्य (आत्मिक मौत) नहीं मरता जिसका कोई (संगी-साथी। ज्ञान-इन्द्रियां) (मायावी भोगों की खातिर) रो नहीं रहा (खप नहीं रहा और। ऐसा मनुष्य सिर्फ वही हो सकता है जो प्रभू-दर नहीं छोड़ता। क्योंकि प्रभू-दर पर रहने से ‘हटकै नाही कोइ’)। 69।
कबीर रामु न धिआइओ मोटी लागी खोरि ॥ काइआ हांडी काठ की ना ओह चर्है बहोरि ॥70॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिस-जिस मनुष्य ने परमात्मा का सिमरन नहीं किया। उसको अंदर-अंदर से विकार खोखला किए जाते हैं (और वह सहजे-सहजे आत्मिक मौत मरता जाता है)। जैसे लकड़ी की हांडी (चूल्हे पर एक बार जल के) दोबारा (चूल्हे पर) नहीं चढ़ सकती। वैसे ही (विकारों की आग में जल मरे मनुष्य का) ये शरीर है (जो इस को दूसरी बार नहीं मिलता)। 70।
कबीर ऐसी होइ परी मन को भावतु कीनु ॥ मरने ते किआ डरपना जब हाथि सिधउरा लीन ॥71॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को प्रभू मन- भाती (भगती की) दाति बख्शता हे। जिस पर अजीब मेहर होती है। वह मनुष्य खुशी-खुशी स्वै-भाग स्वै-भाव त्यागता है। हे कबीर ! जब कोई स्त्री (अपने पति के मरने पर) हाथ में संदूर लगा नारियल पकड़ती है तब वह मरने से नहीं डरती।
कबीर रस को गांडो चूसीऐ गुन कउ मरीऐ रोइ ॥ अवगुनीआरे मानसै भलो न कहिहै कोइ ॥72॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! रस से भरा हुआ गंना (बेलने में) पीढ़ा जाता है (भाव। रस की दाति के बदले में उसको ये मूल्य देना पड़ता है कि वह मशीन में पीढ़ा जाए) सो गुणों के बदले अवगुण को छोड़ के स्वैभाव के प्रति मरना ही पड़ता है। (जो मनुष्य स्वै भाव नहीं त्यागता। और विकारों की तरफ ही रुचि रखता है। उस) विकारी मनुष्य को (जगत में) कोई व्यक्ति अच्छा नहीं कहता (भाव। भगती की दाति से वंचित रहता है। और। जगत में बदनामी भी कमाता है)। 72।
कबीर गागरि जल भरी आजु कालि॑ जैहै फूटि ॥ गुरु जु न चेतहि आपनो अध माझि लीजहिगे लूटि ॥73॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मिट्टी का कच्चा घड़ा पानी से भरा हुआ हो। वह जल्दी ही टूट जाता है (इस शरीर की भी यही पायां है। सदा कायम नहीं रह सकता। मनुष्य-जन्म का मनोरथ प्राप्त करने के लिए इस शरीर का मोह इसके नाश होने से पहले ही त्यागना है। अपनी मर्जी त्याग के गुरू के बताए हुए राह पर चलना है; पर) जो मनुष्य अपने गुरू को याद नहीं रखते (शारीरिक मोह में फस के गुरू को भुला बैठते हैं। गुरू के बताए हुए रास्ते को बिसार देते हैं) वह मनुष्य जिंदगी के सफर के अधबीच में ही लूट लिए जाते हैं (कामादिक विकार अपने जाल में फसा के उनके सारे गुण नाश कर देते हैं। विकारों में पड़ कर यहाँ की राशि पूँजी भी खत्म हो जाती है और परलोक भी बिगड़ जाता है)। 73।
कबीर कूकरु राम को मुतीआ मेरो नाउ ॥ गले हमारे जेवरी जह खिंचै तह जाउ ॥74॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मैं अपने मालिक प्रभू (के दर) का कुक्ता हूँ (प्रभू के दरवाजे पर ही टिका रहता हूँ। और इस कारण) मेरा नाम भी ‘मोती’ पड़ गया है (भाव। दुनिया भी मुझे प्यार से बुलाती है)। मेरे मालिक प्रभू ने मेरे गले में रस्सी डाली हुई है। जिधर वह मुझे खींचता है। मैं उधर ही जाता हूँ। 74।
कबीर जपनी काठ की किआ दिखलावहि लोइ ॥ हिरदै रामु न चेतही इह जपनी किआ होइ ॥75॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! आप तुलसी रुद्राक्ष आदि की माला (हाथ में लेकर) क्यों लोगों को दिखलाता फिरता है। आप अपने दिल में तो परमात्मा को याद नहीं करता। (हाथ में पकड़ी हुई) इस माला का कोई लाभ नहीं हो सकता। 75।
कबीर बिरहु भुयंगमु मनि बसै मंतु न मानै कोइ ॥ राम बिओगी ना जीऐ जीऐ त बउरा होइ ॥76॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘काठ की जपनी’ तो कुछ सवार ही नहीं सकती। पर) जिस मनुष्य के मन में गुरू की शरण पड़ कर विरह का साँप आ बसे (जिस मनुष्य को गुरू-दर से ये सूझ मिल जाए कि इन कामादिकों ने मुझे रॅब से विछोड़ दिया है) (कामादिकों का) कोई मंत्र उस पर नहीं चल सकता। परमात्मा से विछोड़े को महसूस करने वाला मनुष्य जी ही नहीं सकता। (भाव। परमात्मा से विछोड़े का अहसास एक ऐसा डंक है कि इसका डसा हुआ वयक्ति मायावी भोगों के लिए जी ही नहीं सकता) जो जीवन वह जीता है। दुनिया की बाबत तो वह पागलों वाला जीवन है। 76।
कबीर पारस चंदनै तिन॑ है एक सुगंध ॥ तिह मिलि तेऊ ऊतम भए लोह काठ निरगंध ॥77॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! पारस और चँदन- इन दोनों में एक-एक गुण है। लोहा और सुगंधि-हीन लकड़ी इनके साथ छूह के उक्तम बन जाते हैं (लोहा पारस को छू के सोना बन जाता है; साधारण वृक्ष चँदन के नजदीक रह के सुगन्धी वाला हो जाता है। वैसे ही पहले कामादिकों से बिका हुआ मनुष्य गुरू को मिल के ‘राम बियोगी’ बन जाता है)। 77।
कबीर जम का ठेंगा बुरा है ओहु नही सहिआ जाइ ॥ एकु जु साधू मोुहि मिलिओ तिनि॑ लीआ अंचलि लाइ ॥78॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कामादिकों के बस में पड़े रहने से जम का डंडा सिर पर बजता है। जनम-मरन के चक्करों में पड़ा जाता है। और) जम की (यह) चोट इतनी बुरी है कि सहनी बड़ी ही मुश्किल है। (परमात्मा की कृपा से) मुझे गुरू मिल गया। उसने अपने आँचल से लगा लिया (और मैं कामादिकों के) बहकावे में नहीं आया। 78।
कबीर बैदु कहै हउ ही भला दारू मेरै वसि ॥ इह तउ बसतु गुपाल की जब भावै लेइ खसि ॥79॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! वैद्य (तो) कहता है कि मैं बहुत समझदार हूँ (रोग आने पर प्राणों को शरीर से विछुड़ने से बचाने के लिए) इलाज मेरे इख्तियार में है (मैं रोग का इलाज करना जानता हूँ)। पर ये जिंद उस मालिक प्रभू की (दी हुई अमानती) चीज़ है। जब वह चाहता है (शरीर में से) वापस ले लेता है (यहाँ सदा नहीं टिके रहना। इसलिए जम के ठेंगे का ख्याल रखो ओर। गुरू-दर पर आ के ‘गुन कउ मरीअै रोइ’)। 79।
कबीर नउबति आपनी दिन दस लेहु बजाइ ॥ नदी नाव संजोग जिउ बहुरि न मिलहै आइ ॥80॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (यदि आप ये नहीं सुनता। तो आपकी मर्जी) मन-मर्जी की मौज कर ले (पर ये मोजें हैं सिर्फ) दस दिनों के लिए ही। जैसे नदी से पार लांघने के लिए बेड़ी में बैठे मुसाफिरों का मिलाप है (फिर वे सारे कभी नहीं मिलते) वैसे ही (मन-मानी मौजों में गवाया हुआ) ये मनुष्य-शरीर दोबारा नहीं मिलेगा। 80।
कबीर सात समुंदहि मसु करउ कलम करउ बनराइ ॥ बसुधा कागदु जउ करउ हरि जसु लिखनु न जाइ ॥81॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! यदि मैं सातों ही समुंद्रों (के पानियों) की स्याही बना हूँ। सारे पेड़-पौधों की कलमें घड़ लूँ। सारी धरती को कागज़ के रूप में इस्तेमाल करूँ। तो भी परमात्मा के गुण (पूरी तौर पर) लिखे नहीं जा सकते (भाव। इन्सान ने परमात्मा के गुण इस वास्ते नहीं गाने कि उसके गुणों का अंत पाया जा सके। और सारे गुण बयान किए जा सकें)। 81।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू के गुण गाने से गुणों का अंत नहीं पड़ सकता। पर सिफतसालाह की बरकति से) मेरी (नीच) जुलाहा-जाति मेरे अंदर निताणा-पन पैदा नहीं कर सकती क्योंकि अब मेरे हृदय में सृष्टि का मालिक परमात्मा बस रहा है। हे कबीर ! प्रभू की याद में जुड़ (सिर्फ नीच जाति की कमजोरी ही नहीं) माया के सारे ही जंजाल समाप्त हो जाएंगे। 82।
कबीर ऐसा को नही मंदरु देइ जराइ ॥ पांचउ लरिके मारि कै रहै राम लिउ लाइ ॥83॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (भले ही सिफतसालाह में बड़ी बरकति है। पर शारीरिक मोह और कामादिक का इतना जोर है कि) कोई विरला ऐसा मनुष्य होता है जो शारीरिक मोह को जलाता है। कोई विरला है जो कामादिक माया के पाँचों पुत्रों को मार के प्रभू के साथ लिव लगाए रखता है। 83।
कबीर ऐसा को नही इहु तनु देवै फूकि ॥ अंधा लोगु न जानई रहिओ कबीरा कूकि ॥84॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (माया के प्रभाव के कारण) कोई विरला ही ऐसा मिलता है जो (प्रभू की सिफतसालाह करे। और) शारीरिक मोह को जला दे। जगत मोह में इतना ग़र्क है कि इसको अपनी भलाई सूझती ही नहीं। (भले ही) कबीर ऊँचा-ऊँचा (कूक के) बता रहा है। 84।
कबीर सती पुकारै चिह चड़ी सुनु हो बीर मसान ॥ लोगु सबाइआ चलि गइओ हम तुम कामु निदान ॥85॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो स्त्री अपने परलोक पहुँचे पति को मिलने की खातिर उसके शरीर के साथ अपने आप को जलाने के लिए तैयार होती है वह चिखा पर चढ़ कर दलेर हैं के कहती है- हे वीर मसाण ! सुन। सारे संबन्धी मेरा साथ छोड़ गए हैं (मुझे कोई मेरे पति के साथ नहीं मिला सका) आखिर। हे वीर ! मुझे आपके साथ गरज़ आ पड़ी है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।