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अंग 1367

अंग
1367
राग Salok Kabeer Jee
राग: Salok Kabeer Jee · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेलिओ जालु ॥
इह टोघनै न छूटसहि फिरि करि समुंदु सम॑ालि ॥49॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! थोड़े पानी में मछली रहती हैं। तो झिउर मछुआरा आ के जाल डाल देता है (वैसे ही अगर जीव दुनियावी भोग विद्या धन आदि को अपने जीवन का आसरा बना ले तो माया के ‘पांचउ लरिका’ आसानी से ही ग्रस लेते हैं)। हे मछली ! इस तालाब में रह के आप झिउर के जाल से बच नहीं सकती। अगर बचना है तो समुंद्र ढूँढ (हे जीवात्मा ! इन भोग-पदार्थों को आसरा बनाने से आप कामादिक की मार से बच नहीं सकती। ये होछे आसरे छोड़। और परमात्मा को तलाश)। 49।
कबीर समुंदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥
पोखरि पोखरि ढूढते भलो न कहिहै कोइ ॥50॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! समुंद्र नहीं छोड़ना चाहिए चाहे। (उसका पानी) जितना भी खारा हो। छोटे छोटे तालाबों में (जीवात्मा का आसरा) तलाशने से- कोई नहीं कहता कि ये काम अच्छा है।
कबीर निगुसांएं बहि गए थांघी नाही कोइ ॥
दीन गरीबी आपुनी करते होइ सु होइ ॥51॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (यह संसार। मानो समुंद्र है। जिसमें से जीवों के जिंदगी के बेड़े तैर के गुजर रहे हैं। पर) जो बेड़े निखस्मे (मालिक के बगैर) होते हैं जिन पर कोई गुरू-मल्लाह नहीं होता। वे डूब जाते हैं। जिन लोगों ने (अपनी समझदारी छोड़ के) निम्रता और गरीबी धार के (गुरू-मल्लाह का आसरा लिया है। वे संसार-समुंद्र की लहरें देख के) जो होता है उसको करतार की रजा जान के बेफिक्र रहते हैं (उनको अपने बेड़े के डूबने का कोई फिक्र नहीं होता है)। 51।
कबीर बैसनउ की कूकरि भली साकत की बुरी माइ ॥
ओह नित सुनै हरि नाम जसु उह पाप बिसाहन जाइ ॥52॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (किसी) भगत की कुक्ती भी भाग्यशाली जान। पर रॅब से टूटे हुए व्यक्ति की माँ भी दुर्भागिनी है; क्योंकि वह भगत सदा हरी-नाम की वडिआई करता है उसकी संगति में रह के वह कुक्ती भी सुनती है। (साकत नित्य पाप कमाता है। उसके कुसंग में) उसकी माँ भी पापों की भागणि बनती है। 52।
कबीर हरना दूबला इहु हरीआरा तालु ॥
लाख अहेरी एकु जीउ केता बंचउ कालु ॥53॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! यह जगत एक ऐसा सरोवर है जिसमें बेअंत मायावी भोगों की हरियाली है। मेरा ये जिंद-रूप हिरन कमजोर है (इस हरियाली की तरफ जाने से रह नहीे सकता)। मेरी जिंद अकेली है (इसको फसाने के लिए मायावी भोग) लाखों शिकारी हैं (इनकी मार से अपने उद्यम से) मैं ज्यादा समय बच नहीं सकता। 53।
कबीर गंगा तीर जु घरु करहि पीवहि निरमल नीरु ॥
बिनु हरि भगति न मुकति होइ इउ कहि रमे कबीर ॥54॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! यदि आप गंगा के किनारे पर (रहने के लिए) अपना घर बना ले। तो (गंगा का) साफ पानी पीता रहे। तो भी परमात्मा की भगती किए बिना (‘लाख अहेरी’ आदि विकारों से) मुक्ति नहीं हो सकती। कबीर तो ये बात बता के परमात्मा का नाम ही सिमरता है। 54।
कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु ॥
पाछै लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर ॥55॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (गंगा आदि तीर्थों के साफ जल के किनारे रिहायश रखने से तो कामादिक विकार खलासी नहीं करते। और ना ही मन ही पवित्र हो सकता है। पर) जब (परमात्मा के नाम का सिमरन करने से) मेरा मन गंगा के साफ पानी जैसा पवित्र हो गया। तो परमात्मा मुझे कबीर कबीर कह के (आवाजें मारता) मेरे पीछे चलता फिरेगा। 55।
कबीर हरदी पीअरी चूंनां ऊजल भाइ ॥
राम सनेही तउ मिलै दोनउ बरन गवाइ ॥56॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! हल्दी पीले रंग की होती है। चूना सफेद होता है (पर जब ये दोनों मिलते हैं तो दोनों का रंग दूर हो जाता है; इसी तरह) परमात्मा से प्यार करने वाला मनुष्य परमात्मा को तब मिला हुआ समझो। जब मनुष्य ऊँच-नीच जातियों (का भेद) मिटा देता है। (और उसके अंदर सब जीवों में एक प्रभू की ज्योति ही देखने की सूझ पैदा हो जाती है)। 56।
कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥
बलिहारी इह प्रीति कउ जिह जाति बरनु कुलु जाइ ॥57॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (जब हल्दी और चूना मिलते हैं तो) हल्दी अपना पीला रंग छोड़ देती है। चूने का सफेद रंग नहीं रहता। (इस तरह सिमरन की बरकति से नीच जाति वाले मनुष्य के अंदर से नीच जाति वाली ढहिंदी कला नीच बिरती मिट जाती है। और ऊँची जाति वाले के मन में से उच्चता का घमण्ड दूर हो जाता है)। मैं सदके हूँ इस प्रभू-प्रीति से। जिस सदका ऊँच नीच जाति वर्ण कुल (का फर्क) मिट जाता है। 57।
कबीर मुकति दुआरा संकुरा राई दसएं भाइ ॥
मनु तउ मैगलु होइ रहिओ निकसो किउ कै जाइ ॥58॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! वह दरवाजा जिसमें से लांघ के ‘लाख अहेरी’ और ‘पांचउ लरिका’ से खलासी होती है। बहुत सँकरा है। राई के दाने से भी दसवाँ हिस्सा समझो। पर जिस मनुष्य का मन तीर्थ-स्नान और ऊँची जाति में जन्म लेने के अहंकार से मस्त हाथी जैसा बना हुआ है। वह इस दरवाजे में से नहीं गुजर सकता। 58।
कबीर ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥
मुकति दुआरा मोकला सहजे आवउ जाउ ॥59॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अगर कोई ऐसा गुरू मिल जाए। जो प्रसन्न हो के (मनुष्य पर) मेहर करे तो वह दरवाजा जिससे इन कामादिकों से मुक्ति हो सकती है। खुला हो जाता है। (गुरू दर से मिली) अडोल अवस्था में टिक के फिर बेशक काम-काज करते फिरो। 59।
कबीर ना मोुहि छानि न छापरी ना मोुहि घरु नही गाउ ॥
मत हरि पूछै कउनु है मेरे जाति न नाउ ॥60॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मेरे पास ना कोई छंन ना कुल्ली; ना मेरे पास कोई घर ना गाँव; जैसे मेरे मन में जाति का कोई भेद-भाव नहीं वैसे ही मल्कियत की शोभा की भी कोई चाह नहीं (अगर जाति अभिमान और माया की ममता छोड़ दें तो) शायद परमात्मा (हमारी) बात पूछ ले। 60।
कबीर मुहि मरने का चाउ है मरउ त हरि कै दुआर ॥
मत हरि पूछै कउनु है परा हमारै बार ॥61॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मेरे अंदर तमन्ना है कि मैं स्वै-भाव मिटा दूँ। ममता खत्म कर दूँ; पर ये स्वै-भाव तब ही मिट सकता है अगर प्रभू के दर पर गिर जाएं। (इस तरह कोई अजब बात नहीं कि मेहर करके वह बख्शिंद) प्रभू पूछ ही बैठे कि मेरे दरवाजे पर कौन गिरा पड़ा है। 61।
कबीर ना हम कीआ न करहिगे ना करि सकै सरीरु ॥
किआ जानउ किछु हरि कीआ भइओ कबीरु कबीरु ॥62॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ये मेरी हिम्मत नहीं थी कि कामादिक ‘लाख अहेरी’ की मार से बच के मैं प्रभू-चरनों में जुड़ सकता; आगे को भी मेरे मन में ताकत नहीं आ सकती कि खुद इन विकारों का मुकाबला करूँ; मेरा ये शरीर इतने लायक है ही नहीं। असल बात ये है कि कामादिकों को जीत के जो थोड़ी-बहुत भगती मुझसे हुई है यह सब कुछ प्रभू ने आप किया है और (उसकी मेहर से) कबीर (भगत) मशहूर हैं गया है। 62।
कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै रामु ॥
ता के पग की पानही मेरे तन को चामु ॥63॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! सोए हुए सपने में ऊँचा बोलने से अगर किसी मनुष्य के मुँह से परमात्मा का नाम निकले तो उसके पैरों की जूती के लिए मेरे शरीर की खाल हाजिर है (भाव। मैं हर तरह से उसकी सेवा करने को तैयार हूँ)। 63।
कबीर माटी के हम पूतरे मानसु राखिओु नाउ ॥
चारि दिवस के पाहुने बड बड रूंधहि ठाउ ॥64॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! हम मिट्टी की पुतलियां हैं। हमने अपने आप का नाम तो मनुष्य रख लिया है (पर रहे हम मिट्टी के पुतले ही। क्योंकि जिस परमात्मा ने हमारा यह पुतला सजा के इस में अपनी जोति डाली है उसको बिसार के मिट्टी से ही प्यार कर रहे हैं); हम यहाँ चार दिनों के लिए मेहमान हैं पर ज्यादा से ज्यादा जगह कब्जा करते जा रहे हैं।
कबीर महिदी करि घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥
तै सह बात न पूछीऐ कबहु न लाई पाइ ॥65॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (मेहंदी पीस-पीस के बारीक की जाती है। और फिर पैरों पर लगाई जाती है। इस तरह मेहंदी द्वारा सहे हुए कष्ट। मानो।कबूल हो जाते हैं; पर) जिस मनुष्य ने तप आदि से कष्ट दे कर बड़ी मेहनत की जैसे मेहंदी को पीस-पीस के बारीक किया जाता है। हे प्रभू ! तूने उसकी की हुई मेहनत की तरफ तो पलट के देखा भी नहीं। तूने उसको कभी अपने चरनों से नहीं जोड़ा । 65।
कबीर जिह दरि आवत जातिअहु हटकै नाही कोइ ॥
सो दरु कैसे छोडीऐ जो दरु ऐसा होइ ॥66॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो दरवाजा ऐसा है कि उस दर पर टिके रहने से (‘लाख अहेरी’ ‘पांचउ लरिका’ आदि में से) कोई भी (जीवन की) सही राह में से रोक नहीं डाल सकता। वह दर कभी छोड़ना नहीं चाहिए। 66।
कबीर डूबा था पै उबरिओ गुन की लहरि झबकि ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (संसार-समुंद्र में) मैं डूब चला था। पर प्रभू की सिफतसालाह की लहर के धक्के से (सांसारिक मोह की लहरों में से) मैं ऊपर उठ आया।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 19 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे कबीर ! थोड़े पानी में मछली रहती हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।