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1367
कबीर जी के सलोक
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- कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेलिओ जालु ॥
- कबीर समुंदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥
- कबीर निगुसांएं बहि गए थांघी नाही कोइ ॥
- कबीर बैसनउ की कूकरि भली साकत की बुरी माइ ॥
- कबीर हरना दूबला इहु हरीआरा तालु ॥
- कबीर गंगा तीर जु घरु करहि पीवहि निरमल नीरु ॥
- कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु ॥
- कबीर हरदी पीअरी चूंनां ऊजल भाइ ॥
- कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥
- कबीर मुकति दुआरा संकुरा राई दसएं भाइ ॥
- कबीर ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥
- कबीर ना मोुहि छानि न छापरी ना मोुहि घरु नही गाउ ॥
- कबीर मुहि मरने का चाउ है मरउ त हरि कै दुआर ॥
- कबीर ना हम कीआ न करहिगे ना करि सकै सरीरु ॥
- कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै रामु ॥
- कबीर माटी के हम पूतरे मानसु राखिओु नाउ ॥
- कबीर महिदी करि घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥
- कबीर जिह दरि आवत जातिअहु हटकै नाही कोइ ॥
- कबीर डूबा था पै उबरिओ गुन की लहरि झबकि ॥
· सलोक
कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेलिओ जालु ॥
कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेलिओ जालु ॥
इह टोघनै न छूटसहि फिरि करि समुंदु सम॑ालि ॥49॥
इह टोघनै न छूटसहि फिरि करि समुंदु सम॑ालि ॥49॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! यदि मछली थोड़े पानी में रहती हो, तो मछुआरा आ के जाल डाल देता है (वैसे ही अगर जीव दुनियावी भोग, विद्या, धन आदि को अपने जीवन का आसरा बना ले तो माया के 'पांचउ लरिका' आसानी से ही ग्रस लेते हैं)। हे मछली! इस तालाब में रह के आप मछुआरे के जाल से बच नहीं सकतीं। अगर बचना है तो समुद्र ढूँढिए (हे जीवात्मा! इन भोग-पदार्थों को आसरा बनाने से आप कामादिक की मार से बच नहीं सकतीं। ये तुच्छ आसरे छोड़ें और परमात्मा को तलाशें)। 49।
· सलोक
कबीर समुंदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥
कबीर समुंदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥
पोखरि पोखरि ढूढते भलो न कहिहै कोइ ॥50॥
पोखरि पोखरि ढूढते भलो न कहिहै कोइ ॥50॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! समुद्र नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे (उसका पानी) कितना ही खारा हो। छोटे-छोटे तालाबों में (जीवात्मा का आसरा) ढूँढने को कोई अच्छा काम नहीं कहता। 50।
· सलोक
कबीर निगुसांएं बहि गए थांघी नाही कोइ ॥
कबीर निगुसांएं बहि गए थांघी नाही कोइ ॥
दीन गरीबी आपुनी करते होइ सु होइ ॥51॥
दीन गरीबी आपुनी करते होइ सु होइ ॥51॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (यह संसार मानो समुद्र है, जिसमें जीवों की जिंदगी के बेड़े तैरकर गुजर रहे हैं।) जिन बेड़ों का कोई मालिक नहीं, जिन पर कोई गुरु-मल्लाह नहीं, वे डूब जाते हैं। जिन लोगों ने अपनी चतुराई छोड़कर नम्रता और दीनता धारण की है और गुरु-मल्लाह का आसरा लिया है, वे संसार-समुद्र की लहरें देखकर घबराते नहीं। जो होता है, उसे करतार की रज़ा जानकर बेफिक्र रहते हैं। उन्हें अपने बेड़े के डूबने की चिंता नहीं होती। 51।
· सलोक
कबीर बैसनउ की कूकरि भली साकत की बुरी माइ ॥
कबीर बैसनउ की कूकरि भली साकत की बुरी माइ ॥
ओह नित सुनै हरि नाम जसु उह पाप बिसाहन जाइ ॥52॥
ओह नित सुनै हरि नाम जसु उह पाप बिसाहन जाइ ॥52॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (किसी) भगत की कुत्ती भी भाग्यशाली जानिए। पर प्रभु से टूटे हुए व्यक्ति की माँ भी दुर्भागिनी है; क्योंकि वह भगत सदा हरि-नाम की महिमा गाता है। उसकी संगति में रह के वह कुत्ती भी सुनती है। (साकत नित्य पाप कमाता है। उसके कुसंग में) उसकी माँ भी पापों की भागीदार बनती है। 52।
· सलोक
कबीर हरना दूबला इहु हरीआरा तालु ॥
कबीर हरना दूबला इहु हरीआरा तालु ॥
लाख अहेरी एकु जीउ केता बंचउ कालु ॥53॥
लाख अहेरी एकु जीउ केता बंचउ कालु ॥53॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! यह जगत एक ऐसा सरोवर है जिसमें अनगिनत मायावी भोगों की हरियाली है। मेरा ये जिंद-रूप हिरन कमजोर है (इस हरियाली की ओर जाने से अपने को रोक नहीं सकता)। मेरी जिंद अकेली है (इसको फँसाने के लिए मायावी भोग) लाखों शिकारी हैं (इनकी मार से अपने ही प्रयास के बल पर) मैं ज्यादा समय बच नहीं सकता। 53।
· सलोक
कबीर गंगा तीर जु घरु करहि पीवहि निरमल नीरु ॥
कबीर गंगा तीर जु घरु करहि पीवहि निरमल नीरु ॥
बिनु हरि भगति न मुकति होइ इउ कहि रमे कबीर ॥54॥
बिनु हरि भगति न मुकति होइ इउ कहि रमे कबीर ॥54॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! यदि आप गंगा के किनारे पर (रहने के लिए) अपना घर बना लें और (गंगा का) साफ पानी पीते रहें, तो भी परमात्मा की भक्ति किए बिना ('लाख अहेरी' आदि विकारों से) मुक्ति नहीं हो सकती। कबीर तो ये बात बता के परमात्मा का नाम ही सिमरता है। 54।
· सलोक
कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु ॥
कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु ॥
पाछै लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर ॥55॥
पाछै लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर ॥55॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (गंगा आदि तीर्थों के स्वच्छ जल के किनारे रहने से काम आदि विकारों से छुटकारा नहीं मिलता और मन भी पवित्र नहीं होता।) जब परमात्मा का नाम सिमरने से मेरा मन गंगा के साफ पानी जैसा पवित्र हो गया, तो परमात्मा मुझे कबीर, कबीर कहकर पुकारते हुए मेरे पीछे चलता फिरेगा। 55।
· सलोक
कबीर हरदी पीअरी चूंनां ऊजल भाइ ॥
कबीर हरदी पीअरी चूंनां ऊजल भाइ ॥
राम सनेही तउ मिलै दोनउ बरन गवाइ ॥56॥
राम सनेही तउ मिलै दोनउ बरन गवाइ ॥56॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! हल्दी पीले रंग की होती है। चूना सफेद होता है (पर जब ये दोनों मिलते हैं तो दोनों के रंग बदलकर लाल रंग बन जाता है; इसी तरह) परमात्मा से प्यार करने वाले मनुष्य को परमात्मा से मिला हुआ तब समझिए, जब मनुष्य ऊँच-नीच जातियों (का भेद) मिटा देता है (और उसके अंदर सब जीवों में एक प्रभू की ज्योति ही देखने की सूझ पैदा हो जाती है)। 56।
· सलोक
कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥
कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥
बलिहारी इह प्रीति कउ जिह जाति बरनु कुलु जाइ ॥57॥
बलिहारी इह प्रीति कउ जिह जाति बरनु कुलु जाइ ॥57॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (हल्दी और चूना मिलने पर) हल्दी का पीला रंग और चूने का सफेद रंग नहीं रहते। (इसी तरह सिमरन से नीची कही जाने वाली जाति के व्यक्ति के मन की निराशा मिट जाती है और ऊँची कही जाने वाली जाति के व्यक्ति का जाति-अभिमान दूर हो जाता है।) मैं उस प्रभु-प्रीति पर न्योछावर हूँ जिससे ऊँच-नीच, जाति, वर्ण और कुल का भेद मिट जाता है। 57।
· सलोक
कबीर मुकति दुआरा संकुरा राई दसएं भाइ ॥
कबीर मुकति दुआरा संकुरा राई दसएं भाइ ॥
मनु तउ मैगलु होइ रहिओ निकसो किउ कै जाइ ॥58॥
मनु तउ मैगलु होइ रहिओ निकसो किउ कै जाइ ॥58॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! वह दरवाजा, जिसमें से पार होकर 'लाख अहेरी' और 'पांचउ लरिका' से छुटकारा मिलता है, बहुत सँकरा है। उसे राई के दाने का भी दसवाँ हिस्सा समझिए। पर जिस मनुष्य का मन तीर्थ-स्नान और ऊँची जाति में जन्म लेने के अहंकार से मस्त हाथी जैसा बना हुआ है, वह इस दरवाजे में से नहीं गुजर सकता। 58।
· सलोक
कबीर ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥
कबीर ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥
मुकति दुआरा मोकला सहजे आवउ जाउ ॥59॥
मुकति दुआरा मोकला सहजे आवउ जाउ ॥59॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! अगर कोई ऐसा गुरू मिल जाए, जो प्रसन्न हो के (मनुष्य पर) कृपा करे, तो वह दरवाजा, जिससे इन कामादिकों से मुक्ति हो सकती है, खुला हो जाता है। (गुरू दर से मिली) अविचल अवस्था में टिक के फिर बेशक काम-काज करते फिरें। 59।
· सलोक
कबीर ना मोुहि छानि न छापरी ना मोुहि घरु नही गाउ ॥
कबीर ना मोुहि छानि न छापरी ना मोुहि घरु नही गाउ ॥
मत हरि पूछै कउनु है मेरे जाति न नाउ ॥60॥
मत हरि पूछै कउनु है मेरे जाति न नाउ ॥60॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मेरे पास ना कोई छप्पर ना झोंपड़ी; ना मेरे पास कोई घर ना गाँव; जैसे मेरे मन में जाति का कोई भेद-भाव नहीं वैसे ही संपत्ति के स्वामित्व की प्रतिष्ठा की भी कोई चाह नहीं। (अगर जाति-अभिमान और माया की ममता छोड़ दें तो) शायद परमात्मा (हमारी) बात पूछ ले। 60।
· सलोक
कबीर मुहि मरने का चाउ है मरउ त हरि कै दुआर ॥
कबीर मुहि मरने का चाउ है मरउ त हरि कै दुआर ॥
मत हरि पूछै कउनु है परा हमारै बार ॥61॥
मत हरि पूछै कउनु है परा हमारै बार ॥61॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मेरे अंदर तमन्ना है कि मैं अहंभाव मिटा दूँ, ममता खत्म कर दूँ; पर ये अहंभाव तभी मिट सकता है जब प्रभु के दर पर गिर जाएँ। (इस तरह कोई अजब बात नहीं कि) कृपा करके क्षमा करने वाला प्रभु पूछ ही बैठे कि मेरे दरवाजे पर कौन गिरा पड़ा है। 61।
· सलोक
कबीर ना हम कीआ न करहिगे ना करि सकै सरीरु ॥
कबीर ना हम कीआ न करहिगे ना करि सकै सरीरु ॥
किआ जानउ किछु हरि कीआ भइओ कबीरु कबीरु ॥62॥
किआ जानउ किछु हरि कीआ भइओ कबीरु कबीरु ॥62॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि कामादिक 'लाख अहेरी' की मार से बचकर मैं प्रभु-चरणों में जुड़ पाता; आगे को भी मेरे मन में ताकत नहीं आ सकती कि खुद इन विकारों का मुकाबला करूँ; मेरा ये शरीर इतने लायक है ही नहीं। असल बात ये है कि कामादिकों को जीत के जो थोड़ी-बहुत भक्ति मुझसे हुई है यह सब कुछ प्रभु ने स्वयं किया है और (उसकी मेहर से) कबीर (भगत) मशहूर हो गया है। 62।
· सलोक
कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै रामु ॥
कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै रामु ॥
ता के पग की पानही मेरे तन को चामु ॥63॥
ता के पग की पानही मेरे तन को चामु ॥63॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! यदि कोई मनुष्य नींद में सपने देखते हुए बोल पड़े और उसके मुँह से परमात्मा का नाम निकले तो उसके पैरों की जूती के लिए मेरे शरीर की खाल हाजिर है (भाव, मैं हर तरह से उसकी सेवा करने को तैयार हूँ)। 63।
· सलोक
कबीर माटी के हम पूतरे मानसु राखिओु नाउ ॥
कबीर माटी के हम पूतरे मानसु राखिओु नाउ ॥
चारि दिवस के पाहुने बड बड रूंधहि ठाउ ॥64॥
चारि दिवस के पाहुने बड बड रूंधहि ठाउ ॥64॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! हम मिट्टी की पुतलियाँ हैं। हमने अपने आप का नाम तो मनुष्य रख लिया है (पर रहे हम मिट्टी के पुतले ही, क्योंकि जिस परमात्मा ने हमारा यह पुतला सजा के इस में अपनी ज्योति डाली है उसको बिसार के मिट्टी से ही प्यार कर रहे हैं); हम यहाँ चार दिनों के लिए मेहमान हैं पर अधिक से अधिक जगह पर कब्जा करते जा रहे हैं। 64।
· सलोक
कबीर महिदी करि घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥
कबीर महिदी करि घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥
तै सह बात न पूछीऐ कबहु न लाई पाइ ॥65॥
तै सह बात न पूछीऐ कबहु न लाई पाइ ॥65॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (मेहंदी पीस-पीस के बारीक की जाती है और फिर पैरों पर लगाई जाती है। इस तरह मेहंदी द्वारा सहे हुए कष्ट मानो कबूल हो जाते हैं; पर) जिस मनुष्य ने अपने को तप आदि के कष्ट देकर बड़ी मेहनत की, जैसे मेहंदी को पीस-पीस के बारीक किया जाता है, हे प्रभू! आपने उसकी की हुई मेहनत की तरफ तो पलट के देखा भी नहीं। आपने उसको कभी अपने चरणों से नहीं जोड़ा। 65।
· सलोक
कबीर जिह दरि आवत जातिअहु हटकै नाही कोइ ॥
कबीर जिह दरि आवत जातिअहु हटकै नाही कोइ ॥
सो दरु कैसे छोडीऐ जो दरु ऐसा होइ ॥66॥
सो दरु कैसे छोडीऐ जो दरु ऐसा होइ ॥66॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जो दरवाजा ऐसा है कि उस दर पर टिके रहने से ('लाख अहेरी', 'पांचउ लरिका' आदि में से) कोई भी (जीवन की) सही राह में बाधा नहीं डाल सकता, वह दर कभी छोड़ना नहीं चाहिए। 66।
· सलोक
कबीर डूबा था पै उबरिओ गुन की लहरि झबकि ॥
कबीर डूबा था पै उबरिओ गुन की लहरि झबकि ॥
हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (संसार-समुद्र में) मैं डूब चला था। पर प्रभू की स्तुति की लहर के धक्के से (सांसारिक मोह की लहरों में से) मैं ऊपर उठ आया।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1367 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।