Lulla Family

अंग 1366

अंग
1366
राग Salok Kabeer Jee
राग: Salok Kabeer Jee · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ऐसे मरने जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥29॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: (साध-संगति में प्रभू की सिफतसालाह करके) जो मनुष्य जीते-जी ही मरता है (‘दुनिया’ से मोह तोड़ता है) उसको फिर यह सहम नहीं रहता। 29।
कबीर मानस जनमु दुलंभु है होइ न बारै बार ॥
जिउ बन फल पाके भुइ गिरहि बहुरि न लागहि डार ॥30॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है। (और। यदि प्रभू का नाम बिसार के सिर्फ ‘दुनिया’ में लग के एक बार हाथ से निकल गया) तो बार-बार नहीं मिलता; जैसे जंगल के पेड़ों के पके हुए फल (जब) जमीन पर गिर जाते हैं तो दोबारा डाली पर नहीं लगते। 30।
कबीरा तुही कबीरु तू तेरो नाउ कबीरु ॥
राम रतनु तब पाईऐ जउ पहिले तजहि सरीरु ॥31॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: सो) हे कबीर ! (सदा ऐसे कह- हे प्रभू !) आप ही सबसे बड़ा है। आपका ही नाम सबसे बड़ा है। (पर इस सिफतसालाह के साथ हे कबीर !) अगर आप पहले अपने शरीर का मोह भी तयागे। तब ही परमात्मा का नाम रूप रत्न मिलता है। 31।
कबीर झंखु न झंखीऐ तुमरो कहिओ न होइ ॥
करम करीम जु करि रहे मेटि न साकै कोइ ॥32॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘शरीर त्यागने’ का भाव ये है कि ‘दुनिया’ की खातिर) गिले-शिकवे ना करते रहें। (दुनिया की लालच में फसा हुआ) जो कुछ आप कहता है वही नहीं हैं सकता। (सिफतसालाह करने के साथ-साथ ये भी यकीन रख कि) बख्शिश करने वाले प्रभू जी जो बख्शिशें (जीवों पर) करते हैं उनको (और जीव) कम-ज्यादा नहीं कर सकता। 32।
कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥
राम कसउटी सो सहै जो मरि जीवा होइ ॥33॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो मनुष्य ‘दुनिया’ के साथ मोह करने वाला है वह उस कसौटी पर खरा साबित नहीं होता जिससे मनुष्य की प्रभू से सच्ची प्रीति परखी जाती है। प्रभू के साथ प्रीति की परख में वही मनुष्य पूरा उतरता है जो ‘दुनिया’ के मोह से मर के ‘दीन’ के प्यार में जी पड़ा है। 33।
कबीर ऊजल पहिरहि कापरे पान सुपारी खाहि ॥
एकस हरि के नाम बिनु बाधे जम पुरि जांहि ॥34॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (सिर्फ ‘दुनिया’ के व्यापारी लोग अपने आप के दिखावे-शौकीनी के लिए) बढ़िया कपड़े पहनते हैं और पान सुपारियां खाते हैं; पर (शरीर को सजाए रखने के मोह से) बँधे हुए वे मौत आदि के सहम में बने रहते हैं क्योंकि वे परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं (‘दीन’ विसार के ‘दुनी’ का मोह हर हालत में दुखदाई है)। 34।
कबीर बेड़ा जरजरा फूटे छेंक हजार ॥
हरूए हरूए तिरि गए डूबे जिन सिर भार ॥35॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अगर एक बहुत ही पुराना जहाज़ हो। जिसमें हजारों ही छेंक पड़ गए हों (वह आखिर में समुंद्र में डूब ही जाता है। इस जहाज के मुसाफिरों में से) सिर्फ वही लोग तैर के पार लांघ जाते हैं जिन्होंने कोई भार नहीं उठाया होता; पर जिनके सिर पर भार होता है। (वे भार तले दब के) डूब जाते हैं।
कबीर हाड जरे जिउ लाकरी केस जरे जिउ घासु ॥
इहु जगु जरता देखि कै भइओ कबीरु उदासु ॥36॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: तब) हे कबीर ! (शरीर को चिखा में डालने पर) हड्डियां लकड़ियों की तरह जलती हैं। केस घास की तरह जलते हैं। इस सारे संसार को ही जलता देख के (भाव। ये देख के कि सभ जीवों का इस शरीर से विछोड़ा आखिर जरूर होता है) मैं कबीर इस शरीर के मोह से उपराम हो गया हूँ (मैंने शरीर का मोह छोड़ दिया है)। 36।
कबीर गरबु न कीजीऐ चाम लपेटे हाड ॥
हैवर ऊपरि छत्र तर ते फुनि धरनी गाड ॥37॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (इस शरीर की जवानी सुंदरता आदि का) माण नहीं करना चाहिए (आखिर है तो ये) हड्डियों (की मूठ) जो चमड़ी से लपेटी हुई हैं। (इस शरीर का अहंकार करते) वे लोग भी (अंत को) मिट्टी में जा मिले जो बढ़िया घोड़ों पर (सवार होते थे) और जो (झूलते) छतरों तले बैठते थे। 37।
कबीर गरबु न कीजीऐ ऊचा देखि अवासु ॥
आजु कालि॑ भुइ लेटणा ऊपरि जामै घासु ॥38॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अपना ऊँचा महल देख के (भी) अहंकार नहीं करना चाहिए (ये भी चार दिनों की ही खेल है; मौत आने पर इस महल को छोड़ के) आज या कल मिट्टी में ही मिल जाना है। हमारे (शरीर) पर घास उग आएगा। 38।
कबीर गरबु न कीजीऐ रंकु न हसीऐ कोइ ॥
अजहु सु नाउ समुंद्र महि किआ जानउ किआ होइ ॥39॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (यदि आप धनवान है। तो इस धन-पदार्थ का भी) माण नहीं करना। ना किसी कंगाल को देख के हँसी-मजाक करना। (आपकी अपनी जीवन-) बेड़ी अभी समुंद्र में है। पता नहीं क्या हैं जाए (ये धन-पदार्थ हाथ से जाने पर देर नहीं लगती)। 39।
कबीर गरबु न कीजीऐ देही देखि सुरंग ॥
आजु कालि॑ तजि जाहुगे जिउ कांचुरी भुयंग ॥40॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! इस सुंदर रंग वाले शरीर को देख के भी अहंकार नहीं करना चाहिए; ये शरीर भी थोड़े दिनों में ही छोड़ जाएँगे जैसे साँप कुँज उतार देता है (प्राण और शरीर का भी पक्का साथ नहीं है)। 40।
कबीर लूटना है त लूटि लै राम नाम है लूटि ॥
फिरि पाछै पछुताहुगे प्रान जाहिंगे छूटि ॥41॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘दुनिया’ की खातिर क्या भटक रहा है। देख) परमात्मा के नाम की लूट लगी हुई है (दबादब बाँटा जा रहा है)। अगर इकट्ठा करना है तो यह नाम-धन इकट्ठा कर। जब प्राण (शरीर में से) निकल गए। समय बीत जाने पर बाद में अफसोस करना पड़ेगा। 41।
कबीर ऐसा कोई न जनमिओ अपनै घरि लावै आगि ॥
पांचउ लरिका जारि कै रहै राम लिव लागि ॥42॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: (पर नाम धन इकट्ठा करने के लिए जरूरी है कि मनुष्य अपनत्व को पहले खत्म करे। और) हे कबीर ! (जगत में) ऐसा कोई विरला ही मिलता है जो अपने शरीर मोह को जलाता है। और। कामादिक माया के पाँचों ही पुत्रों को जला के परमात्मा (की याद) में सुरति में जोड़े रखता है। 42।
को है लरिका बेचई लरिकी बेचै कोइ ॥
साझा करै कबीर सिउ हरि संगि बनजु करेइ ॥43॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: कोई विरला ही होता है जो परमात्मा से (उसके नाम का) वणज करता है। जो (नाम-धन खरीदने के लिए कामादिक माया के पाँच) पुत्र और (आशा तृष्णा ईष्या आदि) लड़कियों के बदले में देता है। कबीर चाहता है कि ऐसा मनुष्य (इस व्यापार में) मेरे साथ भी सत्संग की सांझ बनाए। 43।
कबीर इह चेतावनी मत सहसा रहि जाइ ॥
पाछै भोग जु भोगवे तिन को गुड़ु लै खाहि ॥44॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि कहीं ये भरम रह जाए। जो भोग अब तक तूने भोगे हैं (ये ना समझ लेना कि तूने बहुत मौजें माण ली हैं। दरअसल) इनकी पायां बस इतनी ही है (जैसे किसी दुकान से सौदा ले के झूँगे के तौर पर) थोड़ा सा गुड़ लेकर खा लिया। 44।
कबीर मै जानिओ पड़िबो भलो पड़िबे सिउ भल जोगु ॥
भगति न छाडउ राम की भावै निंदउ लोगु ॥45॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (यहाँ काशी में उच्च जाति वालों को वेद-शास्त्र आदि पढ़ता देख के) मैंने समझा था कि विद्या पढ़नी मनुष्य जन्म का सबसे अच्छा काम होंगे। पर (इन लोगों के निरे वाद-विवाद को देख के मुझे यकीन हो गया है कि ऐसी विद्या) पढ़ने से प्रभू-चरनों में जुड़ना (मनुष्य के लिए) भला है। (सो। इस बात से) जगत बेशक मुझे चाहे बुरा कहता रहे मैं (विद्या के बदले भी) परमात्मा की भगती नहीं छोड़ूँगा। 45।
कबीर लोगु कि निंदै बपुड़ा जिह मनि नाही गिआनु ॥
राम कबीरा रवि रहे अवर तजे सभ काम ॥46॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जिस मनुष्य के अंदर (यह) समझ नहीं है (कि विद्या के मुकाबले पर पभू की भगती कितनी बहुमूल्य दाति है। वह मनुष्य यदि मेरे इस चयन पर मुझे बुरा कहे) तो उस मनुष्य का यह निंदा करने का कोई अर्थ नहीं। सो। कबीर (ऐसे लोगों की इस दंतकथा की परवाह नहीं करता। और) परमात्मा का सिमरन कर रहा है। और अन्य सारे (कामों के) मोह का त्याग कर रहा है।
कबीर परदेसी कै घाघरै चहु दिसि लागी आगि ॥
खिंथा जलि कोइला भई तागे आंच न लाग ॥47॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: इस परदेसी जीव की ज्ञान-इन्द्रियों को हर तरफ से विकारों की आग लगी हुई है। (जो परदेसी जोगी बेपरवाह हो कर इस आग की गर्मी का आनंद लेता रहा। उसकी) शरीर गोदड़ी (विकारों की आग में) जल के कोयला हो गई। (पर जिस परदेसी जोगी ने इस गोदड़ी के धागे का। इस शरीर में बसते प्राणों का। ख्याल रखा और विकार-अग्नि की गर्मी का रस लेने से संकोच करता रहा। उसकी) आत्मा को (इन विकारों की आग का) सेक भी ना लगा (भाव। वह जलती आग में बच गया)। 47।
कबीर खिंथा जलि कोइला भई खापरु फूट मफूट ॥
जोगी बपुड़ा खेलिओ आसनि रही बिभूति ॥48॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (विकारों की आग में पड़ कर जिस बद्नसीब जीव जोगी की) शरीर-गोदड़ी जल के कोयला हो गई और (जिसका) मन-खप्पर दर-दर से वासना की भिक्षा ही इकट्ठी करता रहा। (वह) दुर्भाग्यपूर्ण जीव-जोगी मनुष्य जनम की खेल उजाड़ के ही जाता है। उसके पल्ले खेह-ख्वारी ही पड़ती है। 48।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 20 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(साध-संगति में प्रभू की सिफतसालाह करके) जो मनुष्य जीते-जी ही मरता है (‘दुनिया’ से मोह तोड़ता है) उसको फिर यह सहम नहीं रहता।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।