कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: फंदे ले के (दूसरों का घर लूटने के लिए) चल पड़ते हैं। पर यकीन जानो ऐसे लोग रॅब की ओर से मारे हुए हैं। 10।
कबीर चंदन का बिरवा भला बेड़ि॑ओ ढाक पलास ॥ ओइ भी चंदनु होइ रहे बसे जु चंदन पासि ॥11॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! चँदन का छोटा सा भी पौधा बेहतर जानो। चाहे वह ढाक-पलाह जैसे पेड़ों से घिरा हुआ हो। वह (ढाक-पलाह जैसे बेकाम के वृक्ष) भी। जो चँदन के पास उगे हुए होते हैं। चँदन ही हो जाते हैं। 11।
कबीर बांसु बडाई बूडिआ इउ मत डूबहु कोइ ॥ चंदन कै निकटे बसै बांसु सुगंधु न होइ ॥12॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! बाँस का पौधा (ऊँचा-लंबा होने के) माण में डूबा हुआ है; बाँस चाहे चँदन के पास भी उगा हुआ हो। उसमें चँदन वाली सुगन्धि नहीं आती। (हे भाई !) तुममें से कोई भी बाँस की तरह (अहंकार में) ना डूब जाना। 12।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! गाफिल मनुष्य ने ‘दुनिया’ (के धन-पदार्थों) की खातिर ‘दीन’ गवा लिया। (आखिर में यह) दुनिया भी मनुष्य के साथ ना चली। (सो) लापरवाह बंदे ने अपने पैरों पर अपने ही हाथ से कोहाड़ा मार लिया (भाव। अपना नुकसान आप ही कर लिया)। 13।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मैं जहाँ-जहाँ गया हूँ। जगह-जगह ‘दुनिया’ वाले रंग-तमाशे ही (देखें हैं); पर मेरे लिए तो वह जगह उजाड़ है जहाँ परमात्मा के साथ प्यार करने वाला (संत) कोई नहीं (क्योंकि वहाँ ‘दुनिया’ ही ‘दुनिया’ देखी है ‘दीन’ का नाम-निशान नहीं)। 14।
कबीर संतन की झुंगीआ भली भठि कुसती गाउ ॥ आगि लगउ तिह धउलहर जिह नाही हरि को नाउ ॥15॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! संतों की छोटी सी कुल्ली भी (मुझे) सुंदर (लगती) है। (वहाँ ‘दीन’ विहाजते हैं कमाते हैं) पर खोटे मनुष्य का गाँव (जलती हुई) भट्ठी जैसा (जानो) (वहाँ हर वक्त दुनिया की तृष्णा की आग जल रही है)। जिस महल-माढ़ी में परमात्मा का नाम नहीं सिमरा जाता। उसे आग लगे (मुझे ऐसे महल-माढ़ियों की जरूरत नहीं)। 15।
कबीर संत मूए किआ रोईऐ जो अपुने ग्रिहि जाइ ॥ रोवहु साकत बापुरे जु हाटै हाट बिकाइ ॥16॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! किसी संत के मरने पर अफसोस करने की आवश्यक्ता नहीं। क्योंकि वह संत तो उस घर में जाता है जहाँ उसको कोई निकालेगा नहीं (भाव। वह संत ‘दीन’ का व्यापारी होने के कारण प्रभू चरणों में जा पहुँचता है); (अगर अफसोस करना ही है) उस अभागे (के मरने) पर अफसोस करो जो प्रभू-चरणों से विछुड़ा हुआ है। (वह अपने किए हुए बुरे कर्मों के बदले में) हरेक हाट पर बिकता है (भाव। सारी ‘दुनिया’ की खातिर भटकना करके अब कई जूनियों में भटकता है)। 16।
कबीर साकतु ऐसा है जैसी लसन की खानि ॥ कोने बैठे खाईऐ परगट होइ निदानि ॥17॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जो मनुष्य रॅब से टूटा हुआ है (जो ‘दुनिया’ की खातिर ‘दीन’ गवाए जा रहा है) उसको यूँ समझो जैसे लस्सुन की भरी हुई कोठरी है। लस्सुन कहीं छुपी हुई जगह भी बैठ के खा लें। तो भी वह हर हाल में (अपनी बदबू से) जाहिर हो जाता है (साकत के अंदर से जब भी निकलेंगे बुरे वचन ही निकलेंगे)। 17।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! इस ‘दुनिया’ (‘माया’) को दूध की भरी चाटी समझो। (हरेक जीव की) हरेक सांस (उस चाटी को मथने के लिए) मथानी मिथ लो। (जिनको ये दूध मथने की जाच आ गई। जिन्होंने परमात्मा का सिमरन करते हुए इस माया को बरता। जिन्होंने ‘दुनिया’ का वणज किया पर ‘दीन’ भी गवाने नहीं दिया) उन संत जनों ने (इस मंथन में से) मक्खन (हासिल किया और) खाया (भाव। मनुष्य-जनम का असल मनोरथ हासिल किया। जैसे दूध को मथने बका मकसद है मक्खन निकालना); पर सिर्फ ‘दुनिया’ का व्यापारी (मानो।) लस्सी ही पी रहा है (मनुष्य-जन्म का असल मनोरथ नहीं पा सका)। 18।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! यह ‘दुनिया’ (‘माया’) मानो। दूध की चाटी है (इस चाटी में नाम की) ठंडक वाले श्वास। मानो। जैसे मथानी चलाई जा रही है। जिस (भाग्यशाली मनुष्य) ने (इस मथानी से दूध) मथा है उसने (मक्खन) खाया है। बाकी के और लोग सिर्फ रिड़क ही रहे हैं (उन्हें मक्खन खाने को नहीं मिलता) (भाव। जो लोग निर्वाह-मात्र माया को बरतते हैं। और साथ-साथ श्वास-श्वास परमात्मा को याद रखते हैं। उनका जीवन शांति भरा होता है। मनुष्य-जन्म का असल मनोरथ वे प्राप्त कर लेते हैं। पर। जो लोग ‘दीन’ को बिसार के सिर्फ ‘दुनिया’ के पीछे भाग-दौड़ करते हें। वे दुखी होते हैं। और जीवन व्यर्थ गवा देते हैं)। 19।
कबीर माइआ चोरटी मुसि मुसि लावै हाटि ॥ एकु कबीरा ना मुसै जिनि कीनी बारह बाट ॥20॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ये दुनिया। ये माया। चोरनी है (जो लोग ‘दीन’ बिसार के निरी ‘दुनिया’ की खातिर भटक रहे हें। उनको) ठग-ठग के यह माया अपनी दुकान (और-और) सजाती है। हे कबीर ! सिर्फ वही मनुष्य इस ठॅगी से बचा रहता है जिसने इस माया के बारह टुकड़े कर डाले (जिसने इसकी ठॅगी को तोड़ के रख दिया है)। 20।
कबीर सूखु न एंह जुगि करहि जु बहुतै मीत ॥ जो चितु राखहि एक सिउ ते सुखु पावहि नीत ॥21॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘दीन’ बिसार के। परमात्मा को भुला के आप जो पुत्र स्त्री धन जमीन आदि) कई मित्र बना रहा है। इस मनुष्य जनम में (इन मित्रों से) सुख नहीं मिलेगा। सिर्फ वह मनुष्य सदा सुख पाते हैं जो (‘दुनिया’ में कार्य-व्यवहार करते हुए भी) एक परमात्मा के साथ अपना मन जोड़ के रखते हैं। 21।
कबीर जिसु मरने ते जगु डरै मेरे मनि आनंदु ॥ मरने ही ते पाईऐ पूरनु परमानंदु ॥22॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (‘दुनिया’ की खातिर ‘दीन’ को बिसार के मनुष्य धन-पदार्थ पुत्र स्त्री आदि कई मित्र बनाता है। और इनसे सुख की आस रखता है। इस आस के कारण ही इनसे मोह तोड़ नहीं सकता; पर) हे कबीर ! जिस (के त्याग रूप) मौत से जगत डरता है। उससे मेरे मन में खुशी पैदा होती है; दुनिया’ के इस मोह से मरने पर ही वह परमात्मा मिलता है जो मुकम्मल तौर पर आनंद स्वरूप है। 22।
राम पदारथु पाइ कै कबीरा गांठि न खोल॑ ॥ नही पटणु नही पारखू नही गाहकु नही मोलु ॥23॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: (जिधर देखो। ‘दुनिया’ की खातिर ही दौड़-भाग है; सो) हे कबीर ! (सौभाग्य से) अगर आपको परमात्मा के नाम की सुंदर (अमूल्य) वस्तु मिल गई है तो ये गठड़ी औरों के आगे ना खोलता फिर। (जगत ‘दुनिया’ में इतना मस्त है कि नाम-पदार्थ के खरीदने के लिए) ना कोई मंडी है ना कोई वस्तु की कद्र करने वाला है। ना यह कोई वस्तु खरीदनी चाहता है। और ना ही कोई इतनी कीमत ही देने को तैयार है (कि ‘दुनिया’ से प्रीति तोड़े)। 23।
कबीर ता सिउ प्रीति करि जा को ठाकुरु रामु ॥ पंडित राजे भूपती आवहि कउने काम ॥24॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! उस (सत्संगी) के साथ सांझ बना जिसका (आसरा) वह परमात्मा है जो सबका पालक है। (‘राम पदारथ’ के बन्जारों से बनी हुई प्रीति आखिर तक निभ सकती है। पर जिन्हें विद्या रात भूमि आदि का माण है। जो ‘दुनिया’ के व्यापारी हैं वह) पण्डित हों चाहे राजा हों चाहे बहुत सारी भूमि के मालिक हों किसी काम नहीं आते। 24।
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (‘दुनिया’ वाला) और-और सहम तब ही दूर होता है जब एक परमात्मा से पयार डाला जाय। (जब तक प्रभू के साथ प्रीति नहीं जोड़ी जाती। ‘दुनिया’ वाली ‘दुबिधा’ नहीं मिट सकती) चाहे (राख मल के) लंबी जटाएं रख ले। चाहे बिलकुल ही रोड-मोड कर ले (और जंगलों अथवा तीर्थों पर जा के डेरा लगा ले)। 25।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ‘दुनिया’ का मोह। मानो। एक ऐसी कोठड़ी है जो कालिख से भरी हुई है; इसमें वे लोग गिर गए हैं जिनकी आँखें बंद हैं (जिनको ‘दीन’ की सूझ नहीं आई। चाहे वह पण्डित राजे भूपति हैं। चाहे जटाधारी सन्यासी आदि हैं)। पर। मैं उन पर से सदके हूँ। जो इसमें गिर के दोबारा निकल आते हैं- (जो एक परमात्मा के साथ प्यार डाल के ‘दुनी’ के मोह को त्याग देते हें)। 26।
कबीर इहु तनु जाइगा सकहु त लेहु बहोरि ॥ नांगे पावहु ते गए जिन के लाख करोरि ॥27॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! यह सारा शरीर नाश हो जाएगा। यदि आप इसको नाश होने से बचा सकते हैं तो बचा लो (भाव। कोई भी अपने शरीर को नाश होने से नहीं बचा सकता। यह अवश्य ही नाश होगा)। जिन लोगों के पास लाखों-करोड़ों रुपए जमां थे। वे भी यहाँ से नंगे पैर ही (भाव। कंगालों की तरह ही) चले गए (सारी उम्र ‘दुनिया’ की खातिर भटकते रहे। ‘दीन’ को बिसार दिया; आखिर यह ‘दुनिया’ तो यहीं रह गई। यहाँ से आत्मिक जीवन में निरोल कंगाल हो के चले)। 27।
कबीर इहु तनु जाइगा कवनै मारगि लाइ ॥ कै संगति करि साध की कै हरि के गुन गाइ ॥28॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ये शरीर नाश हो जाएगा। इसको किसी (उस) काम में जोड़ (जो आपके लिए लाभप्रद हो); सो। साध-संगति कर और प्रभू की सिफत-सालाह कर (‘दुनी’ तो यहीं रह जाती है। ‘दीन’ ही साथी बनता है)। 28।
कबीर मरता मरता जगु मूआ मरि भी न जानिआ कोइ ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (निरी ‘दुनिया’ का व्यापारी) जगत हर वक्त मौत के सहम में दबा रहता है। (सिर्फ माया का व्यापारी) किसी को भी समझ नहीं आती कि मौत का सहम कैसे खत्म किया जाए।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 20 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “फंदे ले के (दूसरों का घर लूटने के लिए) चल पड़ते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।