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अंग 1364

अंग
1364
राग Salok Kabeer Jee
राग: Salok Kabeer Jee · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सागर मेर उदिआन बन नव खंड बसुधा भरम ॥ मूसन प्रेम पिरंम कै गनउ एक करि करम ॥3॥
मूसन मसकर प्रेम की रही जु अंबरु छाइ ॥
बीधे बांधे कमल महि भवर रहे लपटाइ ॥4॥
जप तप संजम हरख सुख मान महत अरु गरब ॥
मूसन निमखक प्रेम परि वारि वारि देंउ सरब ॥5॥
मूसन मरमु न जानई मरत हिरत संसार ॥
प्रेम पिरंम न बेधिओ उरझिओ मिथ बिउहार ॥6॥
घबु दबु जब जारीऐ बिछुरत प्रेम बिहाल ॥
मूसन तब ही मूसीऐ बिसरत पुरख दइआल ॥7॥
जा को प्रेम सुआउ है चरन चितव मन माहि ॥
नानक बिरही ब्रहम के आन न कतहू जाहि ॥8॥
लख घाटीं ऊंचौ घनो चंचल चीत बिहाल ॥
नीच कीच निम्रित घनी करनी कमल जमाल ॥9॥
कमल नैन अंजन सिआम चंद्र बदन चित चार ॥
मूसन मगन मरंम सिउ खंड खंड करि हार ॥10॥
मगनु भइओ प्रिअ प्रेम सिउ सूध न सिमरत अंग ॥
प्रगटि भइओ सभ लोअ महि नानक अधम पतंग ॥11॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: समुंद्र। पर्वत। जंगल। सारी धरती- (इनकी यात्रा आदि की खातिर) भ्रमण करने में ही आत्मिक जीवन की ओर से लुटे जा रहे हे मनुष्य ! प्रीतम-प्रभू के प्रेम के रासते में मैं तो (इस सारे रटन को) सिर्फ एक कदम के बराबर ही समझता हूँ। 3। हे आत्मिक जीवन लुटा रहे मनुष्य ! (चँद्रमा की) चाँदनी सारे आकाश में बिखरी हुई होती है (उस वक्त) भौरे कमल-फूल में भेदे हुए बँधे हुए (कमल-फूल में ही) लिपट रहे होते हैं (इसी तरह जिन मनुष्यों के हृदय-) आकाश को प्रभू-प्रेम की चाँदनी रौशन कर रही होती है (वे मनुष्य प्रभू-प्रेम में) भेदे हुए (प्रभू के) सुंदर चरणों में जुड़े रहते हैं। 4। (देवताओं को प्रसन्न करने की खातिर मंत्रों के) जाप। धूणियां तपानी। इन्द्रियों को वश में करने के लिए (उल्टे लटकने आदि अनेकों) यतन- इन साधनों से मिली खुशी। इज्जत। महानता। इनसे मिला हुआ सुख और अहंकार- इनमें ही आत्मिक जीवन को लुटा रहे हे मनुष्य ! मैं तो आँख झपकने जितने समय के लिए मिले प्रभॅू-प्यार से इनके सारे साधनों को कुर्बान करता हूँ। 5। हे आत्मिक जीवन लुटा रहे मनुष्य ! (देख। आपकी तरह ही यह) जगत (प्रेम का) भेद नहीं जानता। (और) आत्मिक मौत मर रहा है। आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी लुटा रहा है। प्रभू-प्रीतम के प्यारे में नहीं भेदता। नाशवंत पदार्थों के कार्य-व्यवहार में ही फसा रहता है। 6। (जब किसी मनुष्य का) घर जल जाता है। धन-पदार्थ जल जाता है (उस जयदाद से) विछुड़ा हुआ वह मनुष्य उसके मोह के कारण बहुत दुखी होता है (और पुकारता है ‘मैं लूटा गया। मैं लुट गया’)। पर आत्मिक जीवन लुटा रहे हे मनुष्य ! (असल में) तब ही लुटे जाते हैं जब दया का श्रोत अकाल-पुरख मन से भूलता है। 7। हे नानक ! जिन मनुष्यों का जीवन-निशाना (प्रभू-चरणों का) प्यार है। (जिन मनुष्यों के) मन में (प्रभू के) चरणों की याद (टिकी रहती) है। वे मनुष्य परमात्मा के आशिक हैं। वे मनुष्य (‘नवखंड बसुधा भरम’ और ‘जप तप संजम’ आदि) और किसी भी तरफ नहीं जाते। 8। हे भाई ! (मनुष्य का) चंचल मन (दुनियावी बड़प्पन की) अनेकों ऊँची चोटियों (पर पहुँचने) को (अपना) निशाना बनाए रखता है। और। दुखी होता है। पर कीचड़ निचली जगह है (निचली जगह बना रहता है। नीची जगह पर बने रहने वाली उसमें) बड़ी निम्रता है। इस जीवन कर्तव्य की बरकति से (उसमें) कोमल सुंदरता वाला कमल-फूल उगता है। 9। हे आत्मिक जीवन को लुटा रहे मनुष्य ! अगर आप (उस परमात्मा के मिलाप के) भेद में मस्त होना चाहता है जो चाँद से सुंदर मुखड़े वाला है। और सुंदर चित्त वाला है जिसके कमल-फूल जैसे सुंदर नेत्र हैं जिन में काला सुरमा पड़ा हुआ है (भाव। जो परमात्मा अति ही सुंदर है)। तो अपने इन हारों को (‘नवखंड बसुधा भरम’ और ‘जप तप संजम’ आदि की दिखावों के) टुकड़े-टुकड़े कर दे। 10। हे नानक ! (बेचारा) नीच (सा) पतंगा (अपने) प्यारे (जलते हुए दीए) के प्यार में (इतना) मस्त हो जाता है (कि प्यारे को) याद करते हुए उसे अपने शरीर की सुध-बुध नहीं रहती (वह पतंगा जलते हुए दीए की लाट पर जल मरता है। पर अपने इस इश्क के सदका) नीच सा पतंगा सारे जगत में मशहूर हो गया है। 11।
सलोक भगत कबीर जीउ के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥
आदि जुगादी सगल भगत ता को सुखु बिस्रामु ॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: सलोक भगत कबीर जीउ के वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। हे कबीर ! मेरी जीभ पर राम (का नाम) बस रहा है-यही मेरी माला है। जब से सृष्टि बनी है सारे भगत (यही नाम सिमरते आए हैं)। उसका नाम (ही भगतों के लिए) सुख और शांति (का कारण) है। 1।
कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥
बलिहारी इस जाति कउ जिह जपिओ सिरजनहारु ॥2॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! मेरी जाति पर हरेक व्यक्ति हँसता होता था (भाव। जुलाहों की जाति का हरेक व्यक्ति मजाक उड़ाता है)। पर। अब मैं इस जाति पर से सदके हूँ क्योंकि इसमें पैदा हो के मैंने ईश्वर की बँदगी की है (और आत्मिक सुख पा रहा हूँ)। 2।
कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥
सरब सूख को नाइको राम नाम रसु पीउ ॥3॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (सुख की खातिर परमात्मा को बिसार के) और किस तरफ़ मन को भटका रहा है। (परमातमा की याद से) क्यों आपका मन डाँवाडोल हैं रहा है। परमात्मा के नाम का अमृत पी। यह नाम ही सारे सुखों का प्रेरक है (सारे सुख परमात्मा स्वयं ही देने योग्य है)। 3।
कबीर कंचन के कुंडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥
दीसहि दाधे कान जिउ जिन॑ मनि नाही नाउ ॥4॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अगर सोने के कुण्डल बने हुए हों। उन कुण्डलों पर लाल जड़े हुए हों। (और ये ‘कुण्डल’ लोगों के कानों में पड़े हुए हों); पर जिनके मन में परमात्मा का नाम नहीं बसता। उनके यह कुण्डल जले हुए तिनकों की तरह दिखते हैं (जो बाहर से तो चमकते हैं। पर अंदर से राख होते हैं)। 4।
कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥
निरभै होइ कै गुन रवै जत पेखउ तत सोइ ॥5॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! ऐसा कोई विरला ही मनुष्य होता है। जो दुनियावी सुखों के प्रति बेपरवाह रहे। सुख मिले चाहे दुख आए- इस बात की परवाह ना करते हुए वह परमात्मा के गुण गाए जिसको मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मौजूद है। 5।
कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥
मोहि मिलिओ प्रभु आपना संगी भजहि गोुबिंदु ॥6॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (प्रभू के गुण याद करके) जब मेरा ‘मैं-मैं’ करने वाला स्वभाव खत्म हो गया। तब मेरे अंदर सुख बन गया। (निरा सुख ही ना बना) मुझे मेरा प्यारा ईश्वर मिल गया। और अब मेरी साथी ज्ञानेन्द्रियां भी परमात्मा को याद करती हैं (ज्ञानेन्द्रियों की रुचि ईश्वर की ओर हो गई है)। 6।
कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥
जिनि ऐसा करि बूझिआ मीतु हमारा सोइ ॥7॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (हरी-नाम सिमर के अब मेरा ‘मैं-मैं’ करने वाला स्वभाव हट गया है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि) मैं सबसे बुरा हूँ। हरेक जीव मुझसे अच्छा है; (सिर्फ यही नहीं) जिस-जिस भी मनुष्य ने इस तरह की समझ प्राप्त कर ली है। वह भी मुझे अपना मित्र मालूम होता है।
कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥
हम राखे गुर आपने उनि कीनो आदेसु ॥8॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (ये अहंकार जैसे औरों को भरमाने आता है वैसे ही) मेरे पास भी कई शक्लों में आया। पर। मुझे प्यारे सतिगुरू ने (इससे) बचा लिया। और वह ‘अहम्’ बदल के विनम्रता बन गई। 8।
कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥
भलो भलो सभु को कहै बुरो न मानै कोइ ॥9॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! इस अहम् को ही मारना चाहिए। क्योंकि इसको मारने से सुख मिलता है। अहंकार के त्याग को हरेक मनुष्य सराहता है। कोई मनुष्य इस काम को बुरा नहीं कहता। 9।
कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! जब रातें अंधेरी होती हैं। तो चोर आदि काले दिल वाले लोग (अपने घरों से) उठ खड़े होते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।