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अंग 1364 · चउबोले महला 5 · कबीर जी के सलोक

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अंग
1364
चउबोले महला 5 · कबीर जी के सलोक
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  1. सागर मेर उदिआन बन नव खंड बसुधा भरम ॥ मूसन प्रेम पिरंम कै गनउ एक करि करम ॥3॥
  2. कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥
  3. कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥
  4. कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥
  5. कबीर कंचन के कुंडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥
  6. कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥
  7. कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥
  8. कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥
  9. कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥
  10. कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥
  11. कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥

गुरु अर्जन देव जी · चउबोले

सागर मेर उदिआन बन नव खंड बसुधा भरम ॥ मूसन प्रेम पिरंम कै गनउ एक करि करम ॥3॥

अंग 1363 से चला आ रहा अंश

सागर मेर उदिआन बन नव खंड बसुधा भरम ॥ मूसन प्रेम पिरंम कै गनउ एक करि करम ॥3॥
मूसन मसकर प्रेम की रही जु अंबरु छाइ ॥
बीधे बांधे कमल महि भवर रहे लपटाइ ॥4॥
जप तप संजम हरख सुख मान महत अरु गरब ॥
मूसन निमखक प्रेम परि वारि वारि देंउ सरब ॥5॥
मूसन मरमु न जानई मरत हिरत संसार ॥
प्रेम पिरंम न बेधिओ उरझिओ मिथ बिउहार ॥6॥
घबु दबु जब जारीऐ बिछुरत प्रेम बिहाल ॥
मूसन तब ही मूसीऐ बिसरत पुरख दइआल ॥7॥
जा को प्रेम सुआउ है चरन चितव मन माहि ॥
नानक बिरही ब्रहम के आन न कतहू जाहि ॥8॥
लख घाटीं ऊंचौ घनो चंचल चीत बिहाल ॥
नीच कीच निम्रित घनी करनी कमल जमाल ॥9॥
कमल नैन अंजन सिआम चंद्र बदन चित चार ॥
मूसन मगन मरंम सिउ खंड खंड करि हार ॥10॥
मगनु भइओ प्रिअ प्रेम सिउ सूध न सिमरत अंग ॥
प्रगटि भइओ सभ लोअ महि नानक अधम पतंग ॥11॥

हिन्दी अर्थ: समुंद्र, पर्वत, जंगल, सारी धरती, (इनकी यात्रा आदि की खातिर) भ्रमण करने में ही आत्मिक जीवन की ओर से लुटे जा रहे हे मनुष्य! प्रीतम-प्रभू के प्रेम के रासते में मैं तो (इस सारे रटन को) सिर्फ एक कदम के बराबर ही समझता हूँ। 3। हे आत्मिक जीवन लुटा रहे मनुष्य! (चँद्रमा की) चाँदनी सारे आकाश में बिखरी हुई होती है (उस वक्त) भौरे कमल-फूल में भेदे हुए बँधे हुए (कमल-फूल में ही) लिपट रहे होते हैं (इसी तरह जिन मनुष्यों के हृदय-) आकाश को प्रभू-प्रेम की चाँदनी रौशन कर रही होती है (वे मनुष्य प्रभू-प्रेम में) भेदे हुए (प्रभू के) सुंदर चरणों में जुड़े रहते हैं। 4। (देवताओं को प्रसन्न करने की खातिर मंत्रों के) जाप, धूणियां तपानी। इन्द्रियों को वश में करने के लिए (उल्टे लटकने आदि अनेकों) यतन, इन साधनों से मिली खुशी। इज्जत, महानता। इनसे मिला हुआ सुख और अहंकार, इनमें ही आत्मिक जीवन को लुटा रहे हे मनुष्य! मैं तो आँख झपकने जितने समय के लिए मिले प्रभॅू-प्यार से इनके सारे साधनों को कुर्बान करता हूँ। 5। हे आत्मिक जीवन लुटा रहे मनुष्य! (देखें, आपकी तरह ही यह) जगत (प्रेम का) भेद नहीं जानता। (और) आत्मिक मौत मर रहा है। आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी लुटा रहा है। प्रभू-प्रीतम के प्यारे में नहीं भेदता। नाशवंत पदार्थों के कार्य-व्यवहार में ही फसा रहता है। 6। (जब किसी मनुष्य का) घर जल जाता है। धन-पदार्थ जल जाता है (उस जयदाद से) विछुड़ा हुआ वह मनुष्य उसके मोह के कारण बहुत दुखी होता है (और पुकारता है 'मैं लूटा गया। मैं लुट गया')। पर आत्मिक जीवन लुटा रहे हे मनुष्य! (असल में) तब ही लुटे जाते हैं जब दया का श्रोत अकाल-पुरख मन से भूलता है। 7। हे नानक! जिन मनुष्यों का जीवन-निशाना (प्रभू-चरणों का) प्यार है। (जिन मनुष्यों के) मन में (प्रभू के) चरणों की याद (टिकी रहती) है। वे मनुष्य परमात्मा के आशिक हैं। वे मनुष्य ('नवखंड बसुधा भरम' और 'जप तप संजम' आदि) और किसी भी तरफ नहीं जाते। 8। हे भाई! (मनुष्य का) चंचल मन (दुनियावी बड़प्पन की) अनेकों ऊँची चोटियों (पर पहुँचने) को (अपना) निशाना बनाए रखता है। और, दुखी होता है। पर कीचड़ निचली जगह है (निचली जगह बना रहता है। नीची जगह पर बने रहने वाली उसमें) बड़ी निम्रता है। इस जीवन कर्तव्य की बरकति से (उसमें) कोमल सुंदरता वाला कमल-फूल उगता है। 9। हे आत्मिक जीवन को लुटा रहे मनुष्य! अगर आप (उस परमात्मा के मिलाप के) भेद में मस्त होना चाहते हैं जो चाँद से सुंदर मुखड़े वाला है। और सुंदर चित्त वाला है जिसके कमल-फूल जैसे सुंदर नेत्र हैं जिन में काला सुरमा पड़ा हुआ है (भाव, जो परमात्मा अति ही सुंदर है)। तो अपने इन हारों को ('नवखंड बसुधा भरम' और 'जप तप संजम' आदि की दिखावों के) टुकड़े-टुकड़े कर दें। 10। हे नानक! (बेचारा) नीच (सा) पतंगा (अपने) प्यारे (जलते हुए दीए) के प्यार में (इतना) मस्त हो जाता है (कि प्यारे को) याद करते हुए उसे अपने शरीर की सुध-बुध नहीं रहती (वह पतंगा जलते हुए दीए की लाट पर जल मरता है। पर अपने इस इश्क के सदका) नीच सा पतंगा सारे जगत में मशहूर हो गया है। 11।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥

सलोक भगत कबीर जीउ के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥
आदि जुगादी सगल भगत ता को सुखु बिस्रामु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोक भगत कबीर जीउ के ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे कबीर! मेरी जीभ पर राम (का नाम) बस रहा है-यही मेरी माला है। जब से सृष्टि बनी है सारे भगत (यही नाम सिमरते आए हैं)। उसका नाम (ही भगतों के लिए) सुख और शांति (का कारण) है। 1।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥

कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥
बलिहारी इस जाति कउ जिह जपिओ सिरजनहारु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! मेरी जाति पर हरेक व्यक्ति हँसता होता था (भाव, जुलाहों की जाति का हरेक व्यक्ति मजाक उड़ाता है)। पर, अब मैं इस जाति पर से सदके हूँ क्योंकि इसमें पैदा हो के मैंने ईश्वर की बँदगी की है (और आत्मिक सुख पा रहा हूँ)। 2।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥

कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥
सरब सूख को नाइको राम नाम रसु पीउ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (सुख की खातिर परमात्मा को बिसार के) और किस तरफ़ मन को भटका रहा है। (परमातमा की याद से) क्यों आपका मन डाँवाडोल हो रहा है। परमात्मा के नाम का अमृत पिएँ। यह नाम ही सारे सुखों का प्रेरक है (सारे सुख परमात्मा स्वयं ही देने योग्य है)। 3।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर कंचन के कुंडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥

कबीर कंचन के कुंडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥
दीसहि दाधे कान जिउ जिन॑ मनि नाही नाउ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! अगर सोने के कुण्डल बने हुए हों। उन कुण्डलों पर लाल जड़े हुए हों। (और ये 'कुण्डल' लोगों के कानों में पड़े हुए हों); पर जिनके मन में परमात्मा का नाम नहीं बसता। उनके यह कुण्डल जले हुए तिनकों की तरह दिखते हैं (जो बाहर से तो चमकते हैं। पर अंदर से राख होते हैं)। 4।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥

कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥
निरभै होइ कै गुन रवै जत पेखउ तत सोइ ॥5॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! ऐसा कोई विरला ही मनुष्य होता है। जो दुनियावी सुखों के प्रति बेपरवाह रहे। सुख मिले चाहे दुख आए, इस बात की परवाह ना करते हुए वह परमात्मा के गुण गाए जिसको मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मौजूद है। 5।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥

कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥
मोहि मिलिओ प्रभु आपना संगी भजहि गोुबिंदु ॥6॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (प्रभू के गुण याद करके) जब मेरा 'मैं-मैं' करने वाला स्वभाव खत्म हो गया, तब मेरे अंदर सुख बन गया। (निरा सुख ही ना बना) मुझे मेरा प्यारा ईश्वर मिल गया। और अब मेरी साथी ज्ञानेन्द्रियां भी परमात्मा को याद करती हैं (ज्ञानेन्द्रियों की रुचि ईश्वर की ओर हो गई है)। 6।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥

कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥
जिनि ऐसा करि बूझिआ मीतु हमारा सोइ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (हरी-नाम सिमर के अब मेरा 'मैं-मैं' करने वाला स्वभाव हट गया है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि) मैं सबसे बुरा हूँ। हरेक जीव मुझसे अच्छा है; (सिर्फ यही नहीं) जिस-जिस भी मनुष्य ने इस तरह की समझ प्राप्त कर ली है। वह भी मुझे अपना मित्र मालूम होता है।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥

कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥
हम राखे गुर आपने उनि कीनो आदेसु ॥8॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (ये अहंकार जैसे औरों को भरमाने आता है वैसे ही) मेरे पास भी कई शक्लों में आया। पर, मुझे प्यारे सतिगुरू ने (इससे) बचा लिया। और वह 'अहम्' बदल के विनम्रता बन गई। 8।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥

कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥
भलो भलो सभु को कहै बुरो न मानै कोइ ॥9॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! इस अहम् को ही मारना चाहिए। क्योंकि इसको मारने से सुख मिलता है। अहंकार के त्याग को हरेक मनुष्य सराहता है। कोई मनुष्य इस काम को बुरा नहीं कहता। 9।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥

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कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! जब रातें अंधेरी होती हैं, तो चोर आदि काले दिल वाले लोग (अपने घरों से) उठ खड़े होते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1364 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।