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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1363 · फुनहे महला 5 · चउबोले महला 5

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अंग
1363
फुनहे महला 5 · चउबोले महला 5
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  1. है कोऊ ऐसा मीतु जि तोरै बिखम गांठि ॥
  2. संमन जउ इस प्रेम की दम क्यिहु होती साट ॥

है कोऊ ऐसा मीतु जि तोरै बिखम गांठि ॥

अंग 1361 से चला आ रहा अंश

है कोऊ ऐसा मीतु जि तोरै बिखम गांठि ॥
नानक इकु स्रीधर नाथु जि टूटे लेइ सांठि ॥15॥
धावउ दसा अनेक प्रेम प्रभ कारणे ॥
पंच सतावहि दूत कवन बिधि मारणे ॥
तीखण बाण चलाइ नामु प्रभ ध्याईऐ ॥
हरिहां महां बिखादी घात पूरन गुरु पाईऐ ॥16॥
सतिगुर कीनी दाति मूलि न निखुटई ॥
खावहु भुंचहु सभि गुरमुखि छुटई ॥
अंम्रितु नामु निधानु दिता तुसि हरि ॥
नानक सदा अराधि कदे न जांहि मरि ॥17॥
जिथै जाए भगतु सु थानु सुहावणा ॥
सगले होए सुख हरि नामु धिआवणा ॥
जीअ करनि जैकारु निंदक मुए पचि ॥
साजन मनि आनंदु नानक नामु जपि ॥18॥
पावन पतित पुनीत कतह नही सेवीऐ ॥
झूठै रंगि खुआरु कहां लगु खेवीऐ ॥
हरिचंदउरी पेखि काहे सुखु मानिआ ॥
हरिहां हउ बलिहारी तिंन जि दरगहि जानिआ ॥19॥
कीने करम अनेक गवार बिकार घन ॥
महा द्रुगंधत वासु सठ का छारु तन ॥
फिरतउ गरब गुबारि मरणु नह जानई ॥
हरिहां हरिचंदउरी पेखि काहे सचु मानई ॥20॥
जिस की पूजै अउध तिसै कउणु राखई ॥
बैदक अनिक उपाव कहां लउ भाखई ॥
एको चेति गवार काजि तेरै आवई ॥
हरिहां बिनु नावै तनु छारु ब्रिथा सभु जावई ॥21॥
अउखधु नामु अपारु अमोलकु पीजई ॥
मिलि मिलि खावहि संत सगल कउ दीजई ॥
जिसै परापति होइ तिसै ही पावणे ॥
हरिहां हउ बलिहारी तिंन॑ जि हरि रंगु रावणे ॥22॥
वैदा संदा संगु इकठा होइआ ॥
अउखद आए रासि विचि आपि खलोइआ ॥
जो जो ओना करम सुकरम होइ पसरिआ ॥
हरिहां दूख रोग सभि पाप तन ते खिसरिआ ॥23॥

हिन्दी अर्थ: कोई विरला संत-मित्र ही जीव के मोह की इस कठिन गाँठ को खोल सकता है। नानक कहते हैं: लक्ष्मी के आधार और सारे जगत के स्वामी प्रभु ही अपने से बिछुड़े हुए जीवों को फिर जोड़ सकते हैं। 15। हे भाई! प्रभु का प्रेम पाने के लिए मैं अनेक दिशाओं में दौड़ता हूँ, पर काम आदि पाँच विकार मुझे सताते रहते हैं। इन्हें कैसे मिटाया जाए? प्रभु के नाम का स्मरण करें। पूर्ण गुरु के मिलने पर स्मरण के तीखे बाणों से इन प्रबल शत्रुओं का नाश किया जा सकता है। 16। गुरु की दी हुई नाम की दात कभी समाप्त नहीं होती; आप सभी इसका आनंद लें। गुरु की शरण में रहकर इसे ग्रहण करने वाला विकारों से बच जाता है। प्रभु प्रसन्न होकर आत्मिक जीवन देने वाले नाम का खजाना देता है। हे नानक! सदा नाम का स्मरण करें; इससे आत्मिक मृत्यु नहीं होगी। 17। जहाँ प्रभु का भक्त बैठता है, वह स्थान सुखद हो जाता है। हरि नाम के स्मरण से वहाँ सुख मिलता है और लोग प्रभु की स्तुति करने लगते हैं। निंदक ईर्ष्या में जलकर अपना आत्मिक जीवन खो बैठते हैं। हे नानक! नाम जपने से सज्जन जनों का मन आनंद से भर जाता है। 18। हे भाई! नाशवान पदार्थों के मोह में पड़े रहकर जीवन की नाव कितनी दूर सुख से चल सकती है? अंत में दुख ही मिलता है। इस मोह में फँसा मनुष्य पवित्र प्रभु का स्मरण नहीं करता, जो विकारियों को पवित्र करने वाला है। इन हवाई किलों को देखकर आप सुख क्यों मान रहे हैं? ये सदा नहीं रहेंगे और इनके मोह से प्रभु के दरबार में सम्मान नहीं मिलेगा। मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ जो नाम जपकर प्रभु की हज़ूरी में सम्मान पाते हैं। 19। मूर्ख मनुष्य अनेक कुकर्म करता है और विकारों की गंदगी में रहता है। इस तरह उसका अमूल्य शरीर मिट्टी के समान व्यर्थ हो जाता है। वह अहंकार के अंधकार में भटकता है और मृत्यु का विचार नहीं करता। इस हवाई किले को देखकर वह इसे स्थायी क्यों मान बैठा है? 20। जिसकी आयु पूरी हो गई, उसे कौन बचा सकता है? वैद्य कब तक तरह-तरह के उपाय बता सकते हैं? हे अज्ञानी मनुष्य! एक परमात्मा का स्मरण करें; वही आपके काम आता है। नाम के बिना यह शरीर मिट्टी के समान है और जीवन व्यर्थ चला जाता है। 21। हे भाई! आत्मिक रोगों को दूर करने के लिए परमात्मा का नाम अतुलनीय और अमूल्य औषधि है। साध-संगति में संत जन मिलकर इसका सेवन करते हैं और यह सभी को बाँटी जाती है। इसे वही पाता है जिसके भाग्य में इसकी प्राप्ति है। मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ जो प्रभु के प्रेम का आनंद लेते हैं। 22। हे भाई! साध-संगति में आत्मिक रोगों के वैद्य, संत जन, एकत्र होते हैं। उनके बताए नाम-स्मरण की औषधि प्रभावी होती है, क्योंकि परमात्मा स्वयं उस संगति में उपस्थित है। संत जनों के दैनिक कार्य दूसरों के सामने अच्छे आचरण के उदाहरण बनते हैं। इस संगति से सारे दुख, रोग और पाप दूर होते हैं। 23।

संमन जउ इस प्रेम की दम क्यिहु होती साट ॥

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चउबोले महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संमन जउ इस प्रेम की दम क्यिहु होती साट ॥
रावन हुते सु रंक नहि जिनि सिर दीने काटि ॥1॥
प्रीति प्रेम तनु खचि रहिआ बीचु न राई होत ॥
चरन कमल मनु बेधिओ बूझनु सुरति संजोग ॥2॥

हिन्दी अर्थ: चउबोले महला 5 वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। हे दानी मनुष्य ! (धन के बदले हरी-नाम का प्रेम नहीं मिल सकता) अगर इस प्रेम की अदला-बदली धन से हो सकती। तो वह (रावण जिसने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए ग्यारह बार अपने) सिर काट के दिए थे (सिर देने की जगह बेअंत धन दे देता। क्योंकि) रावण जैसे कंगाल तो थे नहीं। 1। (हे दानी मनुष्य ! देखिए। जिस मनुष्य का) हृदय (अपने प्रीतम के) प्रेम-प्यार में मगन हुआ रहता है (उसके अंदर से अपने प्रीतम से) रक्ती भर भी दूरी नहीं होती। (जैसे भौरा कमल-फूल में भेदा जाता है। वैसे ही उस मनुष्य का) मन (परमात्मा के) सुंदर चरणों में भेदा रहता है। उसकी समझने वाली मानसिक ताकत लगन में ही लीन रहती है। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1363 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।