अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: कोई विरला ही ऐसा (संत-) मित्र मिलता है जो (इस जीव-भौरे की जिंद को माया के मोह की पड़ी हुई) पक्की गाँठ तोड़ सकता है। हे नानक ! लक्ष्मी का आसरा (सारे जगत का) नाथ प्रभू ही समर्थ है जो (अपने से) टूटे हुओं को दोबारा गाँठ लेता है। 15। हे भाई ! परमात्मा (के चरणों) का प्रेम हासिल करने के लिए मैं कई दिशाओं में दौड़ता फिरता हूं। (पर यह कामादिक) पाँच वैरी सताते (ही) रहते हैं। (इनको) किस तरीके से मारा जाए। (इनको मारने का तरीका यही है कि) परमात्मा का नाम (सदा) सिमरते रहना चाहिए। जब पूरा गुरू मिलता है (उसकी सहायता से सिमरन के) तेज़ तीर चला के (इन कामादिक) कड़े झगड़ालुओं का नाश (किया जा सकता है)। 16। हे भाई ! गुरू की बख्शी हुई हरी-नाम-दाति कभी समाप्त नहीं होती। बेशक आप सभी इस दाति का इस्तेमाल करो। (बल्कि) गुरू की शरण पड़ कर (इस दाति को बरतने वाला मनुष्य विकारों से) बचा रहता है। आत्मिक जीवन देने वाला (ये) नाम-खजाना परमात्मा (स्वयं ही) खुश हो के देता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) सदा इस नाम को सिमरा कर। आपको कभी आत्मिक मौत नहीं आएगी। 17। हे भाई ! जिस जगह पर (भी कोई परमात्मा का) भगत जा बैठता है। वह जगह (सिफतसालाह के वायु-मण्डल से) सुखदाई बन जाती है। परमात्मा का नाम सिमरने से (वहाँ) सारे सुख हो जाते हैं। (वहाँ आस-पड़ोस रहने वाले सारे) जीव परमात्मा की सिफतसालाह करने लग जाते हैं। (पर सौभाग्य की बात है कि) निंदा करने वाले मनुष्य (संत-जनों की वडिआई देख के ईष्या की आग से) जल-जल के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। हे नानक ! परमात्मा का नाम जप-जप के सज्जन जनों के मन में खुशी पैदा होती है। 18। (इस झूठे रंग में टिके रह के) पवित्र-स्वरूप हरी को। विकारियों को पवित्र करने वाले हरी को कभी भी नहीं सिमरा जा सकता। हे भाई ! मायावी पदार्थों के मोह में (फसे र हके जिंदगी की) बेड़ी ज्यादा (सुख से) नहीं चलाई जा सकती। (आखिर) दुखी ही हुआ जाता है। हे भाई ! (मायावी पदार्थों के इन) हवाई किलों को देख-देख के आप क्यों सुख प्रतीत कर रहा है। (ना ये सदा कायम रहने। और ना ही इनके मोह में फस के प्रभू-दर पर आदर मिलना)। हे भाई ! मैं (तो) उनके सदके जाता हूँ जो (परमात्मा का नाम जप-जप के) परमात्मा की हजूरी में सत्कारे जाते हैं। 19। हे भाई ! मूर्ख मनुष्य अनेकों ही कुकर्म करता रहता है। बड़े कुकर्मों की गंदगी में इसका निवास हुआ रहता है जिसके कारण मूर्ख का शरीर मिट्टी में मिल जाता है (अमूल्य मानस-शरीर कौड़ी के बराबर का नहीं रह जाता)। (ऐसा मनुष्य) अहंकार के अंधेरे में चलता फिरता है। इसको मौत (भी) नहीं सूझती। इस हवाई किले को देख-देख के पता नहीं। यह क्यों इसको सदा कायम रहना माने बैठा है। 20। हे भाई ! जिस (मनुष्य) की (उम्र की) आखिरी हद पहुँच जाती है। उसको कोई मनुष्य (मौत के मुँह से) बचा नहीं सकता। हिकमत विद्या के अनेकों ही ढंग (नुस्खे) कहां तक (कोई) बता सकता है। हे मूर्ख ! एक परमात्मा को ही याद किया कर। (वह ही हर वक्त) आपके काम आता है। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना यह शरीर मिट्टी (के समान) है। सारा व्यर्थ चला जाता है। 21। हे भाई ! (आत्मिक रोगों को दूर करने के लिए परमात्मा का) नाम (ही) दवाई है। बहुत ही कीमती दवाई है। (यह दवाई साध-संगति में मिल के) पी जा सकती है। (साध-संगति में) संत-जन सदा मिल के (यह हरी-नाम दवाई) बाँटी जाती है। पर उसी मनुष्य को यह नाम-दवाई मिलती है। जिसके भाग्यों में इस का मिलना लिखा होता है। हे भाई ! मैं सदके जाता हूं उन पर से जो (हरी-नाम जप के) प्रभू-मिलाप का आनंद लेते हैं। हे भाई ! (साध-संगति में आत्मिक मौत से बचाने वाले) हकीमों (संत जनों) की संगति इकट्ठी होती है (उनकी बरती हुई बताई हुई हरी-नाम सिमरन की) दवाई (साध-संगति में) अपना पूरा असर करती है (क्योंकि उस समूह में परमात्मा स्वयं हाजिर रहता है)। (आत्मिक रोगों के वह वैद्य संत-जन) जो-जो नित्य के कर्तव्य करते हें (वह साध-संगति में आए आम लोगों के सामने) बढ़िया पद्चिन्ह प्रकट होते हैं। (इसीलिए साध-संगति में आए भाग्यशालियों के) शरीर से सारे रोग सारे पापा दूर हो जाते हैं। 23।
चउबोले महला ५ सतिगुर प्रसादि ॥ संमन जउ इस प्रेम की दम क्यिहु होती साट ॥ रावन हुते सु रंक नहि जिनि सिर दीने काटि ॥१॥ प्रीति प्रेम तनु खचि रहिआ बीचु न राई होत ॥ चरन कमल मनु बेधिओ बूझनु सुरति संजोग ॥२॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: चउबोले महला ५ वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। हे दानी मनुष्य ! (धन के बदले हरी-नाम का प्रेम नहीं मिल सकता) अगर इस प्रेम की अदला-बदली धन से हो सकती। तो वह (रावण जिसने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए ग्यारह बार अपने) सिर काट के दिए थे (सिर देने की जगह बेअंत धन दे देता। क्योंकि) रावण जैसे कंगाल तो थे नहीं। 1। (हे दानी मनुष्य ! देख। जिस मनुष्य का) हृदय (अपने प्रीतम के) प्रेम-प्यार में मगन हुआ रहता है (उसके अंदर से अपने प्रीतम से) रक्ती भर भी दूरी नहीं होती। (जैसे भौरा कमल-फूल में भेदा जाता है। वैसे ही उस मनुष्य का) मन (परमात्मा के) सुंदर चरणों में भेदा रहता है। उसकी समझने वाली मानसिक ताकत लगन में ही लीन रहती है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कोई विरला ही ऐसा (संत-) मित्र मिलता है जो (इस जीव-भौरे की जिंद को माया के मोह की पड़ी हुई) पक्की गाँठ तोड़ सकता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।